
गांव ‘गढखेडा‘ आधुनिकीकरण की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। शहर या कस्बा तो नहीं कह सकते, पर पूरी तरह से गांव भी नहीं है। गांव की तस्वीर इस तरह होती है-कमर पर घड़ा रखे कुँए से पानी भरकर आती औरतें, खेतों से हल-बैल लेकर लौटते किसान, गांव के बाहर के मैदान में गिल्ली-डंडा खेलते बच्चे, दीया और लालटेन की रोशनी में बच्चों को सुलाती दादी मां, आंगन से उठते चूल्हे के धुएं की सोंधी खुशबू और दूर खेतों से आती किसी ट्यूबवेल के चलने की आवाज। जिला मुख्यालय फरीदाबाद से करीब 20 किलोमीटर दूर मोहना रोड स्थित गांव इस तस्वीर को पीछे छोड़ चुका है। बदलते स्वरूप से गांव का आर्थिक, सामाजिक ताना-बाना भी बदल गया है। शहरों की भांति अब गांव में लोग अपने काम से काम रखते है। भागदौड़ और आधुनिकता के चक्कर में गांव अब पहले जैसा नहीं रहा है। गांव की होली और उसका हुडदंग आज भी आंखों के सामने आ जाता है। उस दौरान हम अपने थोक की सभी भाभियों को खूब भिगोया करते थे। भाभियों को भी होली का इंतजार रहता था। लेकिन अब समय बदल गया है। दिल छोटे हो चुके है और प्यार की जगह अब अंहकार ने ले ली है।
गांव ‘गढखेडा‘ का पुराना कुंआ और उसके मीठे पानी का स्वाद आज भी याद है, जहां से हर रोज पूरा गांव पानी भरता था। इस पुराने कुएं का निर्माण बंजारों ने कराया था। कुंए और उसके पास बनी कुंडी अब धरोहर बन गई है। कुंडी पर अवैध निर्माण हो गया। लेकिन कुंए की पूजा आज भी होती है। यहीं पर नवविवाहित जोड़ा पूजा और बाद में पीपल की झंडी से अपने नवजीवन में हंसी-ठिठौली की शुरूआत करता है। इसे संटी-संटा की परंपरा कहा जाता है। इस कुंए के बाद करीब 20 साल पहले गांव में पानी का टयूबवैल लगा। आज हर घर में पानी की पाईप लाइन पहुंच गई है। इसलिए अब सिर पर टोकनी रखकर पानी लाने का रिवाज खत्म हो गया है। जबकि पहले नई बहू (विशेषतौर पर यादव परिवारों में) अपने औन्ने में 5-10-20 का नोट लगाकर सिर पर पानी भरकर लाती थी। ऐसे नई बहू का गांव से परिचय होता था। माताएं नई बहू की चाल-ढाल को देखकर नई बातें गढ़ती थी। अब पता ही नहीं चलता कि किस घर में नई बहू आई है।
कहते हैं कि गांव में पहली बार 1960 में भीमी मिस्त्री रेले साईकिल लेकर आए थे। भीमी मिस्त्री उस जमाने के मशहूर कारीगर थे। हाथ में घर को तराशने का जादू था। इसलिए इलाके के लोग विनती कर उनसे अपना घर बनवाते थे। उनके साथ राजमिस्त्री रामजीलाल, कल्लन, सुखचंदी, गोविंद राम, मेहरचंद और बदन ने गांव का नाम खूब रोशन किया। गांव में पहली बार चौधरी चरणसिंह दयालपुर गांव से 20 ईख (गन्ना) लेकर आए। खेत में ईख बोई गई। लेकिन लोग सारे ईख उखाड़ कर ले गए। हालांकि इसके बाद कई किसानों ने गन्ने की खेती की। जंगली जानवर से बचने के लिए पूरा गांव ईख पर पहरा देता था। 1962 में जब चीन-भारत युद्व हुआ तो मिस्त्री सुखचंदी बाजार से रेडियो खरीदकर लाए थे। कहते है पूरा गांव सुबह-शाम सुखचंदी के पास जाकर युद्व के समाचार लेता था। 1985 के आसपास गांव ‘गढखेडा‘ में पहली बार ब्लैक-ह्वाइट टीवी पहुंचा। दूरदर्शन पर देर रात प्रसारित होने वाली श्रीकृष्ण लीला को देखने के लिए पूरा गांव एक जगह एकत्रित हो जाता था। इसलिए टीवी को घर में नहीं, बल्कि मेन चौराहे पर लगा दिया जाता है। उस समय बिजली का कट भी खूब लगते थे। इसलिए ट्रैक्टर की बैटरी से टीवी चलाया जाता था। धारावाहिक महाभारत, शक्तिमान, चंद्रकांता, शांति, ब्योमकेश बक्शी, श्रीमान-श्रीमति, मंगलवार को हिन्दी फिल्में ऐसे ही पूरा गांव देखता था। 1997 में पहली बार गांव में केबल आई और लोगों ने मनोरजंन का दायरा भी बढा लिया। लेकिन इसके साथ ही इकट्ठा होकर धारावहिक देखना और वहां पर हंसी-ठिठोली करने का प्रचलन खत्म होने लगा।
गांव ‘गढखेडा’ में मंदिर बनने की कहानी भी सुनने व सुनाने लायक है। जब पलवल से आई एक बारात के बाराती ने गांव में मंदिर न होने पर ताना मारा था। इसके बाद युवाओं ने गांव में मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। उस टोली में डॉक्टर धर्मपाल, श्रीचंद मास्टर, खेमचंद, श्रीचंद, रतीराम, ओमप्रकाश जेई, बिजेंद्र राणा शामिल थे। इन्हीं लोगों के परिश्रम से आज गांव में भव्य मंदिर है। सरकारी स्कूल को 8वीं से 10वीं कराने के लिए गांव आज भी मास्टर हरपाल, किशोरीलाल शास्त्री, खेमचंद, शिवराम को याद करता है। गांव के ड्रामा क्लब की कहानी भले ही 35 साल पुरानी है। लेकिन उस क्लब को लोग याद करते है। इस क्लब ने गांव में रामलीला का मंचन किया। उस समय चरणदास, ओमवीर मुख्य कलाकार हुआ करते थे। इस क्लब को आगे बढ़ाने का काम सुंदर जैसे युवाओं ने किया। लेकिन आर्थिक संकट के कारण यह धरोहर खत्म हो गई। 1999 में गांव के युवा हरीदत्त, जीतपाल सरीखे युवाओं ने गांव का विकास करने के लिए ग्रामीण सेवा समिति को पुर्नगठित किया। युवाओं के लिए टाइप सेंटर, पुस्तकालय खोले, खेल प्रतियोगिताएं जैसे कार्यक्रम कराएं। लेकिन लोगों के सहयोग न करने से वे हिम्मत हार गए।
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देश और हमारे हरियाणा प्रदेश के अन्य गांवों की तरह ही पैतृक गांव ‘गढखेडा’ भी बीते सालों में गांव लगातार बदल रहा है और बदल रही पुरानी सभी परंपराएं। गांव को जोडने के लिए अब न सामुहिक होली होती है और रामलीला। फिर भी गांव का प्यार शहर से बहुत अच्छा है। आज भी गांव जाते हैं तो सबसे पहले राम-राम करते युवा मिल जाते है। कभी-कभी लगता है कि हमें विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है। हम अपनी पहचान, अपनी महक, अपना अस्तित्व खो रहे हैं। मुझे टंकी के पानी में पुराने कुंए के पानी वाली मिठास कभी नहीं मिली। खेत से तुंरत लाई गयी ‘तोरी‘ और ‘लौकी‘ की सब्जी वाला स्वाद बाजार के पनीर और मशरूम में कभी नहीं मिला। इसलिए प्रयास करता हूं कि गांव से सदा जुड़ा रहूं, गांव के विकास में कुछ न कुछ योगदान देता रहता हूं क्योंकि गांव तो दिल में बसा है।
(लेखक पेशे से पत्रकार रहे हैं और इन दिनों मुख्यमंत्री हरियाणा मीडिया समन्वयक का दायित्व निभा रहे हैं।)

























