ककवारा… कमराय से नवानी तक पसरी हुई हैं गांव से जुड़ी मेरी स्मृतियां

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डॉ. रीता सिंह ,विभागाध्यक्ष (डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन ) ए. एन. कॉलेज पटना

मुझसे जब भी प्रश्न किया जाता कि आपका गांव कहां है, मैं निःशब्द हो जाया करती हूं। कुछ ठहरती हूं। फिर ध्यान से सोचती हूं और बताती हूं, शहर में पली-बढ़ी लड़कियों के दो गांव तो स्वतः होते हैं – दादी का गांव और नानी का गांव। कालांतर में एक और गांव जुड़ जाता है। ससुराल का गांव। इस तरह हो जाते हैं हमारे तीन-तीन गांव।
मेरा भी है तीन-तीन गांव। दादा का गांव बांका जिला स्थित ककवारा, नाना का गांव मुंगेर जिला स्थित कमराय और अब दिल के बहुत करीब, विवाह संस्कार द्वारा पति गोत्र में शामिल होकर मिला मधुबनी जिले का नवानी गांव। आंखें बंद करूं तो तीनों गांव आपस में घुलमिलकर बातें करने लगते हैं।
अभी कल की ही बात है नवानी के अपने मिट्टी के घर में बैठी थी तो ककवारा का हमारा खूबसूरत घर प्रत्यक्ष आ गया और सीधा नवानी के घर से बातचीत करने लगा, देखो मैं कैसा सुंदर हूं और तुम कैसे टूटे-बिखरे से। तुम क्या? तुम्हारे गांव का तो सभी घर ऐसा ही है।
वह तो बाढ़ के कारण मैं बार-बार दरक जाता हूं, पर तुम क्या जानो यह सब। तुम्हारे इलाके ने कभी बाढ़ देखा हो तब ना। पहाड़ों, पठारों में बसकर तुम भी बहुत कठोर हो गए हो मित्र। नहीं तो मेरी यूं हंसी नहीं उड़ाते। नवानी गांव के घर ने थोड़ी पीड़ा के साथ कहा।
वह फिर कहता है, मैं भी कमजोर नहीं हूं। थोड़ा छोटा हूं। दरका हूं क्योंकि अभी-अभी बाढ़ के मार से उबरा हूं। बाढ़ की मार, भूकम्प की गड़गड़ाहट, हमें बार-बार सताती है। तुम्हें तो हमारा यह मचान भी छोटा लग रहा होगा,पर इसी मचान पर बैठकर हमारे बच्चे कई-कई दिन जीवन को सुरक्षित रखते हैं।
आहत घर को कैसे सांत्वना दिया जाय मैं सोच ही रही थी कि मेरा नानी घर आ पहुंचा।

हमारा ककवारा का सबसे पुराना घर

अब इस नानी गांव को भी अभी ही टपकना था। मैं किस-किस का बचाव करूँ?
ओह! तो
नानी गांव “कमराय” तो नेउता लेकर आया है। तुम दोनों लड़ते रहो हमेशा। पिछले साल ही तुम दोनों को मैंने नेउता दिया था कि सावन में मेरे यहां आना। सावन का इतना सुंदर मेला लगता है। चारों ओर से कांवरियों का तांता लगा रहता है।  पर तुमदोनों को बस एक-दूसरे की टांग खींचना है। अब छोड़ो सबकुछ और चलो कमराय गांव। वहां तुमदोनों  को अपना-सा लगेगा।
मैं सुन रही हूं तीनों की वार्ता। कमराय मेरा नानीघर है। मैं बहुत नहीं गई हूं वहां। पर इस बार अपने दीदी के गांव सबलपुर से लौटते हुए ददिहाल, ननिहाल सभी जगह गई और सब जगह के अपने सौंदर्य ने आकर्षित किया।

 

चर्चा मैं अपने प्यारे नवानी गांव का ही करूंगी क्योंकि गांव को मैंने वही जिया है। तीस साल का संबंध कम नहीं होता है। पहली बार जब लाल साड़ी में लिपटी मैं गांव में प्रवेश की तो शाम के सात बज रहे थे, पर जाड़े की शाम के कारण बिल्कुल अंधेरा था। फिर भी आदेशात्मक शब्द मेरे कान में गूंजे, अपने सिर पर आंचल रख लो। मैंने सिर को ढंका, लेकिन यह काफी नहीं था। गाड़ी दरवाजे पर रुकी भी नहीं थी कि एक नन्हीं बालिका का रहस्यमय हाथ गाड़ी में प्रवेश किया और मेरे आंचल का लंबा घूंघट बन गया। मुझे घबड़ाने का मौका भी ना मिला। गाड़ी रुकी, टीका और आरती संपन्न हो गया, और मिट्टी की सोंधी सुगंध से भरे घर में मेरा प्रवेश हुआ। शायद अभी-अभी घर को लीपने का कार्य पूरा हुआ था। गांव की यह सोंधी सुगंध आज भी मेरे नथुने में भरी है। घूंघट के भीतर मैं श्वासों और स्पर्श से ही समेट सकती थी उस गांव को अपने भीतर।

एक-एक कर मेरे हाथ कई घट में डाले जा रहे थे। यह तो चावल का स्पर्श है, कुछ मोटा-सा। शायद उसना चावल खाते हैं यहां के लोग। यह दही। हां! मिथिला में दही का तो बड़ा महत्व है। ओह! यह तो मछली है। झटके से हाथ ने खुद को उस स्पर्श से बाहर किया। शाकाहारी मन ने उस स्पर्श को स्वीकार नहीं किया। पर हंसी की एक लहर के बीच शब्दों की खनक मछली तो मिथिला के शगुन छिय ने। घूंघट के भीतर मुड़े-तुड़े चेहरे पर आयरन चला गया और चेहरे को बिल्कुल सीधा कर गया।
मैथिली भाषा के माधुर्य से मैं भींग गई और अपने गांव से पहला परिचय मुझे स्नेहासिक्त कर गया। सामानों से भरे कमरे में ढेर सारे चूहे भी हमारे साथ अठखेलियां कर रहे थे। सुबह घर से परिचय बढ़ा। मैं अपने कमरे के दरवाजे से खड़े होकर देख रही थी। ठीक सामने काले लकड़ी से बना दो पल्ले वाला दरवाजा, एक लंबे पटरे से बंद था। उसके बगल में ही चूल्हा दिखाई दे रहा है, शायद यही रसोई है। जहां मैं खड़ी हूँ वहां से दरवाजे के बीच में बड़ा-सा खुला आंगन है। दाहिने तरफ एक बड़ी दीवार। दीवार से सटे सब्जियों के कुछ लत्तर हैं। एक सिला रखा है, जहां जूठे बर्तन पड़े हैं, शायद यहीं बर्तन धोए जाते हैं। बायीं तरफ की दीवार आधी ढही हुई है। उसी तरफ एक तुलसी चौड़ा है। बाथरूम किधर होगा? कहीं दिख नहीं रहा।
बाहर होगा।
भाभी! चलू, बाहर जैवे?
अरे, बाहर क्यों जाना मुझे? मैं चुप रही। एक लोटा पानी लेकर मेरी ननद साथ में खड़ी हो गई। जाना ही होगा साथ। बगल वाले कमरे से पीछे का दरवाजा खोलकर बाहर निकली। घर के पिछली दीवार से सटे चार अंगुली की जगह, पैर रखना भी मुश्किल। नीचे गड्ढा और दूर तलक खुला खेत। उसी पैर भर रखने की जगह में एक और छोटा गड्ढा दिखा, जिसके दोनों ओर दो ईंट रखकर पायदान बनाया गया था। यह नई दुल्हन के लिए बनाया गया नया शौचालय था। भींगी हुई मिट्टी में मेरा पैर, साड़ी सब लथपथ हो रहा था। सामने के दूर तलक खुले खेत की व्यापकता से शौच तो भयभीत होकर पेट के अंदर की सटक गया। दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में खुले चापाकल पर नहाने की पेशकश ने नहाने के उत्साह को धूमिल कर दिया। हाथ-पैर धोकर साड़ी बदल ली। गांव की महिलाओं की पहली खेप का आगमन शुरू हो गया था। मुंह दिखाई का रस्म खत्म हुआ और गांव के सोंधी सुगंध में जीने का सुंदर सपना, सपना में ही अच्छा है की सोच के साथ लौट आई पटना।

इस परिचय के साथ लंबे अरसे तक जीती रही मैं और करती रही तुलना अपने ककवारा गांव के रूमानी यादों के साथ। आमों के दिन में अमियों के खट्टे चटखारे। पहाड़ों के तराई में फैली जड़ी-बूटियां, जो जीवनदायिनी भी थी और नवजात बच्चियों के इहलीला को समाप्त करने वाली भी। यह पक्ष थोड़ा दर्द देने वाला है। पर आधुनिक सुविधाओं से भरे चाचा के घर में मिलता सम्मान उस दर्द को कम कर देता है। सुंदर भगवती का मंदिर, उसके चारों ओर बिखरे उड़हुल के फूल। बड़का बाबू पर रामनवमी के दिन हनुमान का आना। हर मंगलवार को उनपर भगवती का आना। सैकड़ों लोगों की भीड़। भीड़ के हर व्यक्ति को समाधान देते बड़का बाबू की गरिमामयी छवि। मेढ़ों से खेतों में जाना। ट्रैक्टर से खेतों की जुताई। चार चाचा और एक बुआ के घर को अपना बताना। सबकुछ कितना सुंदर और प्यारा होता है मायका का।

उस समय पता भी कहाँ था कि मायका से विदा होकर जिस गांव की होने जा रही थी, वह सामान्य नहीं था। वर्षों पता भी नहीं चला। चर्चा ही नहीं की कभी किसी ने। युवाओं के लक्षण देखकर धारणा निर्धारित हो गई थी कि नवानी गांव में शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं है। खाओ, पीओ और मस्त रहो, बस यही जिंदगी। लेकिन उस दिन के सेमिनार में मैं धन्य-धन्य हो गई। नवानी गांव की बहू होना बड़े गर्व की बात है, यह जान पाई। मेरा विवाह एक ऐसे गांव में हुआ था, जो हजारों विद्वानों के लिए तीर्थस्थली थी। वहां की थोड़ी-सी मिट्टी पाने को लालायित थे भारत के कोने-कोने से आये संस्कृत के प्रकांड विद्वान। किन-किन का नाम लूं। 2011 में कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में अपना योगदान दिया। राष्ट्रीय सेमिनार में सैकड़ों विद्वतजन जुटे थे।
एक महाशय ने पूछा, आपका घर कहां है?
नवानी।
नवानी, बच्चा झा वाला नवानी।
मैं क्या कहती, चुप उनको देखने लगी। मेरे सहयोगी प्रोफेसर ने बताया, हां, वही नवानी।
यह क्या!
एक के बाद एक विद्वान।
मैं तो उस गांव की सिर्फ बहू हूं। मुझे कुछ नहीं पता।
आप बहुत भाग्यशाली हैं। उस मिट्टी की आप बहु बनी, जिस मिट्टी ने संस्कृत जगत को सर्वतन्त्रस्वतंत्र विद्वान बच्चा झा दिया। उस ग्राम ने हजारों विद्वान दिए। न्यायशास्त्र, नव्य न्याय के उच्चस्तरीय पठन-पाठन की व्यवस्था सिर्फ इसी गांव में थी। पूरे भारत के विद्यार्थी यहां उच्च शिक्षा के लिए आते थे।
मैं अचंभित, स्तंभित, मौन, बस सुन रही थी।
इतनी भाग्यशाली मैं। अब तो उस मिट्टी से मुझे उकेर लेना है सारी विद्वता अपने भी भीतर।
वैसे तो 2003 में मैं उस गांव के कोने -कोने में घूम आई थी। अपना शोध विषय था, बिरौल अनुमंडल के मुसहर जाति की सामाजिक और पोषणीय स्थिति। शोध क्षेत्र मिथिला में होने के कारण विषय समझने के ख्याल से नवानी के हर मुहल्ले में गई। 20 टोले के नवानी गांव में चार टोला ब्राह्मण का, चार टोला राजपूत का इसके अलावा मुसहर, खतवे, केवट, धानुक, रविदास आदि मूल रूप से हैं। आर्थिक स्थिति के अनुरूप लगभग एक-सा रहन-सहन। मेरा घर पूर्वी ऊंच टोला में है। यह बीच गांव से थोड़ा हटकर है।
गांव के बीच में ब्राह्मणों का टोला है। 2002-03 में गांव के भीतर जाने की पक्की सड़क से सुबह में पैदल चलना दूभर था। सड़क के दोनों तरफ ताजे शौच आपका दिन खराब करने को मुंह बाए खड़े होते थे। दोपहर बाद तक वह ट्रैक्टर, बाइक लोगों के आवागमन से सड़कों पर पसरकर मिट्टिनुमा रूप ले लेती थी तो आप मन माने तो जा बागी सकते थे। बहुत जरूरी ना हो तो मन काहे को माने भला। अब तो स्थिति सुधरी है। शौचालय की संख्या बढ़ी है।
खैर,2012 के बाद मेरा जाना एक नवीन एहसास के साथ था। अब वहां की मिट्टी में विद्वानों की धमक की गूंज सुनाई पड़ती। मैं अब हर सप्ताह जाती और अपने गांव के इतिहास को उकेरती।

नदियों से पूछती, टूटे खण्डहर से सुनती, बुजुर्गों को पकड़ती। संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को वांचती और प्यार में जकड़ती जाती अपने गांव के।
हमारा यह गांव प्राचीन संस्कृत विद्या का शिक्षण केंद्र था। 1860 ई. में इस गांव में एक यशस्वी बालक ने जन्म लिया। गांव की बुजुर्ग महिला बताती है कि बड़का पंडित जी के जन्म से पहिने गाम के मंदिर के घण्टा खुद बाजयत रहे, तहि से लोग कहलखिन कि कोनो महात्मा के जन्म भेलेय गाम में, तेकर खुशी भगवानो मनवय छतिन। कथा की माने तो बड़का पंडित जी से बड़ा ज्ञानी आजतक नहीं हुआ। वह गांव में बच्चों को पढ़ाते थे। गुरुकुल की अलग व्यवस्था थी इस गाम में।
बच्चे एक स्थान पर नहीं रहते थे। वह गाम के अलग-अलग गृहस्थ के साथ रहते हैं। गृहस्थ अपने साथ रह रहे बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उठाते थे। बच्चा झा जी के द्वारा सभी बच्चों को रात में दूध उपलब्ध कराया जाता था। जब वह गांव में रहते, स्वयं हर बच्चे के पास जाते, दूध पिलाते, पढ़ाई-लिखाई की प्रगति पूछते और अंत में स्वयं दूध पीते।

 

पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

मैथिली और हिंदी साहित्य की कथाकार पदमश्री डॉ. उषा किरण खान बताती है कि हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार नागार्जुन ने भी उस गांव में पढ़ाई की है। उनके अनुसार, नागार्जुन कहा करते थे कि वह सुंदर बाला उस गांव में आम लेकर उनका इंतजार करती थी।
बच्चा झा जी ने दरभंगा महाराज से सर्वतन्त्रस्वतंत्र की उपाधि पाई थी। शिक्षा के लिए समर्पित बच्चा झा भले ही मुज्जफरपुर के संस्कृत महाविद्यालय के संस्थापक प्राचार्य नियुक्त हुए थे, पर उनकी आत्मा नवानी के बच्चों में, मां और भौजाइयों में बसती थी।
आज भी वहां संस्कृत विद्यालय का होना इस बात का गवाह है। यह अलग बात है कि उस ऐतिहासिक धरोहर के चहारदीवारी के लिए आई राशि का भी बंदरबांट करने में अभी के मुखिया को हिचक नहीं हुई। चहारदीवारी नहीं बन पाया। भवन टूटने के कगार पर है। एक इतिहास खत्म होने वाला है, पर गांव के लोग चुप हैं।
मैं संस्कृत विद्यालय के प्रांगण में हूं। सामने भगवती का विशाल मंदिर निर्मित हो रहा है,पर शिक्षा का मंदिर उपेक्षित है। टीसता है मन, जब इस शिक्षा के इस मंदिर के निर्माण की राशि का हिसाब गांव के युवा मांगते हैं तो उनपर चोरी और हमला का केस दर्ज होता है। दुखद यह कि महिला मुखिया केस करती हैं। अपने ही ललना को द्रोही कहती हैं। बच्चा झा जी की आत्मा जरूर कहीं कराह रही होगी गांव की इस दीनता पर।

थोड़ी ही आगे निकलती हूं तो कोई टोकता है यह गांव नहीं सुधरने वाला। जहां अब दूध की जगह पौआ बिके और युवा पानी की कीमत 10 रुपये जानकर 7 रुपये का पौआ खरीदकर पिये, वहां संस्कार की बात करना ही बेमानी है। आप लौट जाइये अपने गांव, यह गांव आपके मतलब का नहीं।
आगे आम का बगान है। मंजर आ चुका है। हवा के झोंके के साथ डोलता आम का पल्लो कह रहा है वसंत तो आएगा। होगी फिर एक दिन शिक्षा की हरियाली यहां। खुलेंगे बंद आखों के दरवाजे।

यह पुस्तकालय है? एक व्यक्ति अलसाया सा बता रहा है, हां है तो पुस्तकालय। पर अब बंद है। वहां गायें बंधी है। सरकार ने भी इसके मौखिक जर्जर मान लिया है।
लौटती हूं अपने दरवाजे पर।

नवानी का हाट

बच्चों का झुंड मुझसे मिलने को खड़ा है। यही आशा है। अपने सपनों का गांव जरूर जागेगा।
मैं बच्चों के संग भूसे के ढेर पर खड़ी सोच रही हूं तस्वीर बदलनी चाहिए। बच्चे तैयार हैं। हम योगाभ्यास के लिए बच्चों के संग खुले मैदान में हैं। हमारी गैया भी रंभा रही है। वृक्षारोपण के लिए बच्चे उत्साहित है। फिर से बच्चा झा जीवित होंगे।

पैतृक गॉंव चमथा में बीते बचपन के दिन भी क्या दिन थे

तबतक

था वह मेरे सपनों का गांव
वहां की मिट्टी, वहाँ के खेत
खेतों के मिट्टी की सोंधी सुगंध
वह खूबसूरत शाम की गपशप
पकौड़ी संग चाय की चुसकी
टोले की ढेरों चटपटी कहानियाँ

जाना चाहती थी मैं वहां
बार-बार, हर बार, बारम्बार
कहते वह मुझसे, नहीं है अब
गांव की मिट्टी में सोंधी सुगन्ध
बंट गए टुकड़ों में खेत-खलिहान
मर गई टोले की चटपटी कहानियाँ

नहीं मरता मेरे मन का विश्चास
जीवित था मेरे गहरे भीतर
वह सुंदर मेरे सपनों का गांव
सोंधी सुगन्ध, प्यारे संबन्ध
टोले की ढेरों चटपटी कहानियाँ

लेकिन यह क्या दिख रहा
सच में खेत बंट गए, खलिहान बंट गए
यह भी कोई बड़ी बात नहीं
लेकिन यहां तो मन ही बंट गए हैं
टोले की हो गई सारी, वीरान कहानियां
 
समझाया अपने मन को मैंने
लिखी जाएंगी इन्हीं वीरानियों में
पुनः अब एक नई कहानी
बच्चे के मन से निकलेंगे
हर टोले की फिर कुछ चटपटी कहानी।

(लेखिका डॉ. रीता सिंह ए. एन. कॉलेज पटना में डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन में विभागाध्यक्ष हैं।)

मेरा गाँव स्मृतियों के पन्नों में…

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