narendra singh tomar

अपने टोले ही चलेंगे…जैसे लाखों लोग गए…जो होगा…देखा जाएगा

बाबा चले गए, मेरे लिए गांव का मतलब ही बदल गया. बैराग मेरे अंदर भी जागने लगा. मैं भी बाबा की तरह रक्त होकर भी विरक्त होने लगा. तब ये समझ नहीं आता था- ये कैसा अमोह है, जो मेरे अंदर उठ रहा है. क्यों गांव अब सूना लगने लगा है. इसका दायरा सीमित लगने …

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बाबा ने ठाना… मंदिर बनाकर ही मरूंगा

कुमार विनोद, वरिष्ठ टीवी पत्रकारअब नई दिक्कत शुरु होती है- बघड़ियों के टीले पर. बाबा ने अपने पांच बेटों के साथ टोला तो बसा लिया, लेकिन खाने पीने की दिक्कत तमाम थी. ये फतेहपुर बाजार तो अब हुआ है न, जहां सबकुछ मिल जाता था. पहले नून-तेल-मसाला और सरकारी राशन लेने के लिए भी पुराने …

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…खाक में क्या सूरतें होंगी

बघड़ियों का टीला… वो ख़ाक की तरह ही दिखता है अब यादों के झरोखे से. मिर्जा गालिब के मशहूर शेर में इस बयान की तरह. ये खाकसार भी उसी खाक से, उसी मिट्टी से बना है, जिसमें दबी गड़ी जाने कितनी ही सूरतें बरसों की खाक कुरेद जाती हैं- सूरतें कुछ देखी हुईं और कुछ …

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ग्राम आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हुए… लेकिन टूटी है सामाजिक एकजुटता

प्यारे मोहन त्रिपाठीमेरा गांव उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मनियाहू तहसील में हरद्वारी है। ये तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ है। मेरी उम्र अभी लगभग 84 साल है लेकिन गांव में सड़क नहीं है। जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो गांव खेती किसानी दृष्टि से खुशहाल था। खेती-बाड़ी ही मुख्य पेशा …

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ददिहाल के गांव बड़ौत से ज्यादा…ननिहाल के गांव पुरकाजी से रहा है नाता

निशि सिंह हम सभी की जड़ें गांव से जुड़ी हैं। व्यक्ति उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुंच जाये, सफलता की कितनी भी सीढ़ियां चढ़ लें लेकिन जब यादों का पिटारा खोलता है,  तमाम खिड़की, दरवाजों,झिर्रियों के पार बचपन के वो अनमोल क्षण कुछ चुहल,कुछ बदमाशियां, कुछ सखी-कुछ सहेलियां सामने आ खड़े होते हैं। स्वाभाविक …

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बदल गया है सामुदायिक जीवन

डॉ अनामिका मेरा जन्म चीन से युद्ध के समय हुआ था। उस समय की घटनाएं याद नहीं हैं। एक-दो दृश्य याद हैं। भैया हमको कहते थे कि चाइनीज है। मेरी नाक चपटी थी, इसलिए चिढ़ाते थे। हमको याद है कि नेपाल के बॉर्डर से आती थी एक बूढ़ी औरत, स्मगलिंग की साड़ियां लेकर। कुछ दूसरे …

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समझ रहा है कॉरपोरेट इंडिया…भविष्य गांव का ही है

संकल्प सिन्हा तुलसी दास ने लिखा है धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ अर्थात धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। लेकिन इस कोरोना रूपी महामारी के इस दौर में जब पूरा देश लॉक डाउन में था तो इन चारों की तो परीक्षा हो …

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कृषि पत्रकार बृहस्पति पाण्डेय को मिला आई सी ए आर का राष्ट्रीय पुरस्कार

आलोक रंजन लखनऊ: देश में खेती किसानी पर लिखने पढ़ने वाले पत्रकारों में अपनी खास पहचान रखने वाले बृहस्पति कुमार पाण्डेय को 2019 का “चौधरी चरण सिंह पुरस्‍कार” प्रदान किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें भारत सरकार के भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रिंट मीडिया हिंदी की श्रेणी में दिए जाने वाले कृषि अनुसंधान और …

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पढ़ी लिखी पंचायत के बाद 50 फीसदी महिला आरक्षण से सशक्त होंगी हरियाणा की पंचायतें

अभिषेक राज चंडीगढ़: हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल की सरकार हमेशा प्रदेश के पंचायती राज संस्थाओं में आमूलचूल बदलाव के लिए याद की जाएगी। अपने पिछले कार्यकाल के शुरूआती दिनों ने यानी मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद जब उन्होंने यह निर्णय लिया कि प्रदेश की पंचायत पढ़ी लिखी होंगी यानी कोई भी अंगूठाटेक अब …

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गांवो के आत्मनिर्भरता की बात निकली है तो उत्तराखंड में दूर तलक जाएगी

मंगरूआ उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में “कोरोना संकट : बचाव एवं राहत तथा आत्मनिर्भर गांव” बिषय पर आयोजित तीसरी सरकार अभियान के वेबीनार में वक्ताओं ने रखी राय हरिद्वार: कोरोना महामारी के दौरान प्रवासियों के गांव लौटने का सिलसिला चला। स्वाभाविक था देश के अन्य राज्यों की तरह ही प्रवासी राज्य उत्पारखंड से भी …

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