बहुत दिन नहीं बीते होंगे। चार दशक पहले तक पेयजल और सिंचाई के स्रोत गांव में कुएं ही होते थे। ज्यादातर गांवों के पनघट का केंद्र कुएं ही थे। बाल्टी-डोरी लेकर लोग सुबह-शाम जाते, नहाने-धोने के काम करते और लौटते वक्त एक हाथ में लपेट कर रस्सी और बाल्टी भर पानी लेकर लौटते। खाना, बनाना हो या प्यास बुझाने के लिए लोटे भर पानी गटकना, कुएं के बिना इसकी कल्पना ही ग्राम्य जीवन में बेमानी थी। सिंचाई के लिए ढेंकुल से बरहा (धान के पुआल की बुनी मोटी रस्सी) कूंड़ (पानी निकालने का लोहे का बड़ा बर्तन टंगे होते थे। कहीं कहीं रहट भी हुआ करती थी। एक घिर्नी जैसे यंत्र में लगे छोटे-छोटे डब्बे रहट में होते थे। बैल के सहारे रहट की घिर्नी नाचती रहती और पानी की धार नालियों से लगातार बहती हुई खेतों तक बनी कच्ची नालियों के सहारे पहुंचती। तब गांव के हर घर में बैलों की जोड़ी होती थी। बड़े किसानों के यहां तो कई-कई जोड़े बैल होते थे।
अब न रहट है और न ढेंकी या ढेंकुल। कूंड़, बरहा, चौना (जहां कुएं से निकला पानी गिरता) के बारे में सोचना तो अब बेमानी ही है। इन शब्दों से नयी पीढ़ी के बच्चे भी अनजान हैं। कुंए भी अब अधिकतर नदारद है। जो बचे भी हैं, उनका उपयोग नहीं हो रहा। कुछ समय बाद धरती पर बढ़ती आबादी बचे कुओं को भी ढंक कर वहां मकान खड़ा कर दे तो आश्चर्य की बात नहीं। 15 से 25 फीट की गहराई में बने ये कुंए वाटर हार्वेस्टर का काम करते थे। तभी तो ये कभी सूखते नहीं थे और भूगर्भ के जलस्तर लगातार घटने की चिंता ही नहीं थी। तब आर्सेनिक जैसे जहर के धरती में पाये जाने का संकट भी नहीं था।
नमूने के तौर पर मैं अपने गांव को देखता हूं। कभी डेढ़ दर्जन से ज्यादा कुएं मेरे गांव में थे। इनमें चार-पांच सरकार द्वारा खुदवाये गये थे तो अधिकतर लोगों ने अपनी जरूरतों को ध्यान में रख कर निजी तौर पर खुदवाये थे। इन कुओं को खोदते वक्त गांव के लोगों में जबरदस्त उत्साह होता। हर आदमी कुछ न कुछ श्रमदान जरूर करता। बाजाप्ता इंद्र भगवान का पूजन किया जाता, फिर कुआं खोदने का काम शुरू होता। लोग बढ़ते गये तो घर बंटते गये। जमीन सीमित, इसलिए कुएं और इनके इर्दगिर्द की जमीन भी बसने के उपयोग में लाने की लोगों ने योजना बना ली। इसलिए कि तब तक चापाकल घरों में लगने लगे थे। कुएं अनुपयोगी हो गये। बोरिंग से निकला पानी सिंचाई के लिए खेतों तक पहुंचने लगा। हालत यह है कि डेढ़ दर्जन से अधिक कुओं वाले मेरे गांव में अब गिनती के दो-चार कुएं हैं। वे भी, जो सरकारी जमीन पर सरकार के खर्चे से खोदे गये थे। उन्हें भी पाटने और दखल की कोशिशें होती रहती हैं। कुओं की यह दास्तान मैं उस गांव को केंद्र में रख कर सुना रहा हूं, जो बिहार के सीवान जिले की एक पंचायत कैलगढ़ उत्तरी का हिस्सा है।
इस बीच बिहार सरकार ने कुओं की खोज खबर लेनी शुरू की है। बिहार सरकार ने सर्वे कराया और राज्य के तकरीबन 70 हजार सार्वजनिक कुओं के जीर्णोद्धार का फैसला लिया है। हालांकि इक्कसवीं सदी यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि बिहार सरकार जहां अपनी महत्वाकांक्षी नल-जल योजना के तहत पाइप के जरिए घरों में पानी पहुंचाने की एक तरफ कोशिश कर रही हैं, वहीं कुओं के जीर्णोद्धार की योजना के पीछे उसका क्या मकसद है। इसका इस्तेमाल खेती-किसानी में होगा या पेयजल के स्रोत के रूप में। हां, जैसा विशेषज्ञ कहते हैं, अगर इनका इस्तेमाल पेयजल के लिए होने लगे तो पानी में फ्लोराइ और आर्सेनिक की जो समस्या सामने आ रही है, वह खत्म हो जाएगी।
बिहार सरकार के पंचायती राज विभाग ने तय किया है कि राज्य के 69768 सार्वजनिक कुओं का जीर्णोद्धार कराया जायेगा। इनमें 67,554 कुओं का जीर्णोद्धार जून, 2021 तक ही कर लेना था, लेकिन प्रगति की ताजा जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिर भी यह मान लेना चाहिए कि सरकार ने अगर तय किया है तो यह योजना भी अवश्य पूरी होनी चाहिए।
बिहार सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम जल जीवन हरियाली कार्यक्रम के तहत राज्य भर के कुओं का सर्वेक्षण कराया था। इस सर्वेक्षण में बिहार में कुल 3,14,982 कुओं का पता चला था। राज्य सरकार ने इनमें से उन कुओं के जीर्णोद्धार कराने का फैसला लिया है, जो जर्जर हाल हैं। हालांकि इन्हें पेयजल के स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जायेगा या इनका कुछ और ही इस्तेमाल होगा, यह स्पष्ट नहीं है।
बिहार सरकार का यह फैसला अनूठा है इसलिए लगता है कि एक तरफ सरकार राज्य में सार्वजनिक कुओं के जीर्णोद्धार की बात कर रही है तो दूसरी ओर राज्य सरकार नल-जल योजना के तहत पाइप के जरिये हर घर में पीने का पानी पहुंचाने की योजना भी चला रही है। इसके तहत हर गांव में बोरिंग के जरिये भूगर्भ जल निकाल कर उसे शुद्ध किया जा रहा है और पाइप लाइन के जरिये घर-घर पहुंचाया जा रहा है। ऐसे में कुओं के जीर्णोद्धार की इस योजना से आमलोगों को कुछ लाभ भी होगा या धरोहर के रूप में इसे संवार कर रखा जायेगा, यह देखने वाली बात होगी।
(लेखक गोरूबथान इंटर कॉलेज कलिम्पोंग, पश्चित बंगाल में प्रोफेसर हैं।)


