मौका मिलते ही गांव जाना चाहता है शहरवासी

डॉ इंदुप्रकाश सिंह

मेरा गांव तरांव, जौनपुर जिले के डोभी प्रखंड स्थित कराकत तहसील में है। भौगोलिक अवस्थिति की बात करें तो गांव आजमगढ़ और गाजीपुर की सीमा पर है और बनारस से 30 किलोमीटर दूर अवस्थित है। मेरी पैदाइश 20 जुलाई 1959 को गांव में ही हुई। मेरे पिता स्वर्गीय विंग कमांडर डी डी सिंह स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

इसके पीछे का एक वाकया साझा करना चाहूंगा। रामसुंदर बाबा की इच्छा थी कि मेरे पिता इं​जीनियर बने। वे कम उम्र में यानी 8 वीं कक्षा में पिताजी को कोलकाता ले गये। वहीं से स्कूली शिक्षा पूरी की। 1948 में जब गांधी जी की हत्या होती है तो उस समय देश के हजारों-लाखों की तरह मेरे पिता काफी गमगीन थे। मानो घर का बुजुर्ग का देहांत हो गया हो। जिसको जहां पोखरा-तालाब मिला वही मुंडन कराया। उसी वक्त से पिताजी ने शपथ ली थी कि वे जीवन पर्यंत मूछ नहीं रखेंगे जिसकी पालना उन्होंने जीवन के आखिरी सांस तक की।
गांधी जी ने कहा था कि स्वदेशी विद्यालय, विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करना है और स्वदेशी वस्त्र पहनना है। उन्होंने गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर जादवपुर विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग किया, न कि प्रेसीडेंसी काॅलेज से। इस लिहाज से गांधी की सोच हमें विरासत में मिली है।

इसी तरह गांव से जुड़े, पिताजी से जुड़े कई प्रसंग हैं जिनका जिक्र यहां समीचिन होगा। मुझे एक वाकया याद आ रहा है। गांव में एक विधवा थीं जिन्हें हम नौरहियापर की आजी के नाम से पुकारते थे। कुछ विशेष घटना के कारण उनको लेकर गांव उद्वेलित था। गांव के लोगों का दबाव था कि इस महिला को गांव से बाहर निकाला जाए। लेकिन मेरा युवा पिता ने इस बात का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि महिला बाहर जाएगी तो गुनहगार को भी बाहर जाना होगा। पिता के विरोध में खड़ा होने पर पंचायत को मजबूर होना पड़ा और वे गांव में ही रहीं।
हमारी एक बुआ थीं जिनका नाम शांति था। पढ़ने-लिखने में सदैव अव्वल। इतनी तेज थीं कि बनारस के राजा ने बाकायदा बुलाया और हाथी पर बैठाकर जुलुस निकलवाया और कहा कि ये बच्ची पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छी है। लेकिन इस प्रसंग के कारण गांव में गोतिया-पट्टीदार के लोग काफी नाराज हो गये कि लड़कियों को क्यों आगे बढ़ाया जा रहा है। जब शांति बुआ की शादी तय हुई तो इन ग्रामीणों ने कुछ अड़ंगा डालना चाहा। वजह कोई और बताई गई लेकिन मूल में यही था। हमारे परिवार के पास 21 गांव की जमींदारी थी। जब शांति बुआ की शादी तय हुई तो इन सभी गांवों में निमंत्रण भेजा गया। इस दौरान पट्टीदार के लोग जो मौके की तलाश में एक शर्त रख दी। शर्त ये थी कासीदास पुर गांव के लोगों को शादी में बुलाओगे तो हम नहीं खायेंगे। ऐसे में भला मेरे पिता कहां ​पीछे हटने वाले थे। उन्होंने साफ लहजे में कह दिया कि मेरी बड़ी बहन की शादी है, सबको निमंत्रण देंगे, जिसको आना है आये, नहीं आना है नहीं आये। हर आने वाले का स्वागत है। द्वार पर बारात आई। द्वारा पूजा शुरू हुआ। हमारे ही खानदान वालों ने रंग में भंग डालने की सोची।

उन्हीं में से किसी ने लड़के के पिता रामचंद्र सिंह के कान में धीरे से कहा,’खानदान इनके इहां खाना न खात हउए।’ लड़के के पिता ने बेलौस अंदाज में कहा— ”राजू (भाई)राम सीता के शादी होत हव, काहे तू लोगन अड़ंगा डालत हउअ। केहू आवे चाहे न आवे, हमन बारात लेकर आ गयल हईं-शांति बिटिया के विदा कराके ले जावल जाई।” ये बात जब शांति बुआ को भी पता चल गई। वे मेरे पिताजी को बहुत मानती थीं। विदाई के वक्त हमारे पिताजी से कहा, हमारे खानदान वाले तो हमें क्वांरे ही छोड़ दिए होते—ये तो हमारे देवता तुल्य पिता व श्वसुर के कारण शादी संपन्न हुई,लेकिन भईया हम तोहसे शपथ चाहत हईं कि जबतक तू जियब खानदान में खाना ने खईब।


बारात विदा होने के बाद गांव वालों को अपने गलती का अहसास हुआ। उन्होंने कहा कि आप यदि अब भी निमंत्रण देंगे तो पंगत में बैठेंगे। पिताजी का जवाब था कि बहन तो विदा हो गई। निमंत्रण आपको भी था और यदि आप पंगत में बैठना चाहते हैं तो हम खुशी—खुशी उसी निमंत्रण पर भोजन परोसेंगे। लेकिन जीते जी मैं नहीं जाउंगा और वे नहीं गये।
पिताजी के इन्हीं विचारों और महिला विरोधी घटनाओं में महिलाओं के पक्ष में खड़े होने की प्रवृति के कारण खानदान वालों ने हमें खुद से अलग कर दिया और हमारे परिवार को गांव में बहिष्कार का सामना करना पड़ा। पिताजी ने गांव में किसी के यहां खाना, पीना, जाना छोड़ दिया था। आज भी पूरे गांव में एक मात्र हमारा ही परिवार है जो संयुक्त परिवार माना जाता है। हमारे परिवार में कई पीढ़ियों से लोग एक साथ रह रहे हैं। संयुक्त परिवार है, साझा खेती है। इसी संयुक्त परिवार की बदौलत आज भी हमारा संबंध गांव से बना हुआ है।

हमलोग प्रायः गर्मियों की छुट्टी में गांव जाते थे। बजरंग नगर से गांव 20 किलोमीटर दूर है। कभी बैलगाड़ी से जाना होता तो कभी पैदल पगडंडी से होकर। पिताजी ने न कभी कार किया, न टैक्सी। रास्ते में हरे-भरे खेत। कहीं मटर की छीमी लगी हुई है, तो कहीं चने। आते-जाते जिसके खेत में हमारा मन आया कुछ उखाड़ लेते और खाते, बतियाते, गांव-ज्वार के लोगों का दुआ सलाम करते आर्शीवाद पाते, कब सफर कट जाता पता ही नहीं चलता। नर्सरी की पढ़ाई जौनपुर के स्कूल से हुईं। उसके पश्चात आगे की पढ़ाई पूना के एयर फोर्स स्कूल से। कहते हैं कि बचपन की ठिठोली और जवानी के दिनों के हमजोली भूलाए नहीं भूलते। तो आज भी हमें अपने बचपन का गांव याद आता है। तरह-तरह के खेल खेलना, पेड़ पर चढ़ना, दोल्हापाती खेलना, वो मस्तियां, छोटी-बड़ी बातों पर झगड़ना, फिर कुछ ही पल या घंटे, दो घंटे में एक होकर ठहाके लगाना, मानो कुछ हुआ ही न हो। ये हुड़दंग नहीं था, शैतानी नहीं थी, मस्ती थी।

गांव में कभी-कभी हमारा सामान्य ज्ञान या अंग्रेजी ज्ञान जांचने के लिए बड़ों के सामने या शिक्षकों के सामने पेशी होती। वे जब हमारे जवाबों से संतुष्ट होते तो अपने बच्चों के सामने हमारा उदाहरण पेश करना न भूलते। इससे हमें भी प्रोत्साहन मिलता और हमारे उम्र के अन्य बच्चों को भी। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि बाल्यावस्था में जो दोस्त बने, वे आगे चलकर पढ़ाई छोड़ते चले गए। स्कूल से उनका नाता टूटता गया। ऐसे में उनसे खेल और गांव के परिवेश पर तो बात होती, लेकिन पढ़ाई की बात नहीं हो पाती। ऐसा नहीं था कि इसे लेकर हमारे मन में कोई अभिमान या सुपेरियोरिटी कंप्लेक्स हो। शिक्षा व्यवस्था चरमराई हुई थी। लेकिन उन्हें गांव की समझ थी, गांव की व्यवस्था के अनुरूप उन्हें ज्ञान था और वे खेती-किसानी में दक्ष थे। इनमें से कुछ ठेकेदारी करते हैं। अब कुछ बच्चे अच्छा पढ़-लिख रहे हैं।

हमारी अगली पीढी़ में शायद ही कोई बच्चा हो जो स्कूली शिक्षा न प्राप्त कर रहा हो या फिर अपने बच्चों को इससे दूर रखने की सोच रखता हो। हमारे दादा रामसुंदर सिंह ने 1930 में बने तिलकधारी काॅलेज के निर्माण में दान दिया था। यह काॅलेज भले ही हमारे घर से 50 किलोमीटर दूर है लेकिन उसके निर्माण में दानदाताओं की सूची में अपने दादाजी का नाम देखकर बहुत खुशी होती है।


यह गांव कभी दमनकारी गांव नहीं रहा है बल्कि ऐतिहासिक गांव के रूप में पहचाना जाता है। बक्सर के युद्ध में जब वीर कुंवर सिंह के पीछे अंग्रेज सेना पड़ी हुई थी। रास्ते में जो भी ठाकुरों के गांव पड़े, किसी में हिम्मत नहीं हुई की उन्हें शरण दे। वे जब तरांव के पास से गुजर रहे थे और गांव के ठाकुरों को जब यह पता लगा, विशेष रूप से मेरे परदादा कुनई सिंह को तो उन्होंने वीर कुंवर सिंह को अपने घर में शरण दिया। अंग्रेज सेना जब उन्हें ढूढ़ कर वापस चली गई तब वीर कुंवर सिंह ​अपने लोगों के साथ बक्सर की ओर निकले। जब अंग्रेजों को इस विषय में पता चला कि तरांव के ठाकुरों ने इनको शरण दिया था तो एक षड्यंत्र के तहत 84 गांव के प्रमुख लोगों को निमंत्रण भेजा और इन चौरासी लोगों को फांसी पर लट​का दिया।

आज भी गांव के सबलोग भूमि संबंधों और खेती-किसानी से जुड़े रहे हैं। यहां तक की दलितों से बेअदबी या उनका अपमान जैसी बात हमारे गांव में नहीं है। सभी बड़ों का सम्मान किया जाता है चाहे जाति कोई भी रही हो। वर्तमान गांव को छोटा ही कहा जायेगा जहां की आबादी मात्र 500 है जिसमें हर समाज के लोग हैं। ठाकुर बहुल इस गांव में ब्राहम्ण, कुम्हार, भर दलित, बढ़ई, जुलाहे, साहूकार सब है। तरांव पंचायत में लगभग 10 गांव है। पहले पंचायत प्रधान हमारे गांव के ही लोग होते थे लेकिन हाल में स्थिति बदली है। अन्य जातियों और अन्य गांवों के लोग भी प्रधान हो रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं के जरिए गांव में बदलाव आया हैं। गांव में अब खड़ंजे की सड़क बन गयी है। चकबंदी के जरिए खेती-किसानी का परिदृश्य बदला है। इसके जरिए लोगों की सारी जमीन एकत्रित हो गई हैं, हालंाकि सीलिंग एक्ट के कारण कई लोगों की जमीन चली भी गई। हमारा संयुक्त परिवार है इसलिए खेती साझी ही है। जमीन नहीं बंटी है, और न ही बिकी है, और न ही किसी के अंदर जमीन बेचने का लालच है। सबलोग बाहर पढ़ाई-लिखाई नौकरी-चाकरी कर रहे हैं। चार भाईयों में सबसे बड़े भाई वहीं वकील हैं इसलिए वे घर तो संभालते ही हैं, गांव-ज्वार के लोगों को कानूनी मसलों में मदद भी करते हैं। लोभ-लालच न होने व अपने सरल स्वभाव के कारण दीवानी वकील के रूप में अच्छी साख है।
आज दिल्ली में छत्तरपुर गांव में हमारा मकान है। पिताजी ने सेवानिवृति के पश्चात इसी गांव में अपना मकान बनाया। ये भी एक गांव ही है। यहां छत्तरपुर मंदिर के नजदीक आदी कात्यायनी शक्तिपीठ मंदिर के संस्थापक स्वर्गीय नागपाल बाबा से उनका गहरा रिश्ता था। इस मंदिर के निर्माण में पिताजी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। फौज के अनुशाषित दिनचर्या में रहने के साथ ही वे एक समर्पित हिंदू थे। पूजापाठ में उनका गहरा यकीन था। इस मंदिर में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आना जाना था। जब भी इंदिरा जी आतीं तो नागपाल बाबा पिताजी को आगे कर देते थे ताकि मंदिर के लिए जमीन लेने और निर्माण कराने में सुविध हो

आज भी मैं दिल्ली में जो काम कर रहा हूं, वह भी कहीं न कहीं गांव से और गांव के लोगों से ही जुड़ा हुआ है। क्योंकि इस महानगर में फूटपाथ पर सोने वाले गांव के ही लोग हैं। देश भर के गांवों से आए हुए लोग हैं। 1999 में जब काम शुरू हुआ तो रैन-बसेरों की सिर्फ बात होती थी। मैंने इसको विस्तार देने का प्रयास किया। इस दौरान फूटपाथ के लोगों के जीवन को करीब से देखा और समझा। इस दौरान जो बातें प्रमुख रूप से समझ में आयीं, वह है कि ज्यादातर लोग गांव के जात-पांत, बेरोजगारी की वजह से शहर में आए थे। काम तो मिल जाता था लेकिन इतने पैसे कहां से लाएं जिससे मकान लेकर रह सकें। सरकार की तरफ से 21 रैन बसेरे की बात थी। केवल 19 रह गए। 2001 आते-आते 10 रह गए। बाकी मेट्रो और कथित विकास के नाम पर तोड़ दिए गए। आबादी बढ़ती गयी, आश्रय-स्थल कम होते गए। फतेहपुरी, लाहौरी गेट में काम करने वाले लोग रहते हैं। उनसे रैन बसेरों की बात की।

इस संबंध में मेरी जो समझ थी या मेरी जो प्रेरणा थी, वह गांव ही था। ग्रामीण जनजीवन की समझ थी, दो बिगहा जमीन जैसे फिल्मों का असर था। वहां से अब तक हमने लंबी दूरी तय की है।

इस बार जनवरी के महीने में दिल्ली में 272 आश्रय गृह बने हैं जो विश्व के किसी भी शहर से ज्यादा हैं। पहले आश्रय-गृह सिर्फ पुरूषों के लिए बनाए जाते थे। आज आश्रय-गृह में महिलाएं, बच्चे सब रहते हैं। परिवारों के लिए, गर्भवती महिलाओं के लिए, गर्भ के 6 माह बाद तक के लिए आश्रय-गृह में सुविधाएं दी जा रही हैं। कोशिष है कि उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए और उनका जीवन सरल हो। जीवन के विभिन्न परिस्थितियों में रहने के लिए आश्रय-गृह उनका ठीकाना बने ये प्रयास है। 2003 में सुप्रीम कोर्ट में मैंने अपने साथियों के साथ एक मुकदमा किया था, उसके परिणामस्वरूप देश भर में आश्रय-गृह बन रहे हैं। राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन पूरे देश में चल रहा है। पहले एक करोड़ का बजट था, अब 1000 करोड़ का बजट है। राज्य स्तरीय शेल्टर माॅनिटरिंग कमिटी में मैं दिल्ली से सदस्य हूं।

इन तमाम सुविधाओं के बावजूद मुझे नहीं लगता कि कोई भी शहर में खुश है या रैन बसेरे में रहना चाहता है। कौन चाहेगा कि संदिग्ध हालत में रहे, पुलिस के डंडे खाए। कई साथी अपने-अपने गांव वापस गए हैं। परिवार में लौटे हैं। हमारे द्वारा किए गए इस तरह के प्रयास से कई लोगों का गांव से संबंध जुड़ा है। शहर से लोगों ने गांव वापस जाना शुरू कर दिया है। यदि गांव की स्थितियां ठीक होती, जाति-पाति की समस्या नहीं होती, उन्हें सही इलाज गांव में मिल जाता तो कौन नहीं गांव लौटना चाहेगा। यहां तो टीबी जैसी बीमारी के इलाज के लिए भी लोगों को शहर आना पड़ रहा है।

कानून-व्यवस्था, अस्पताल, शिक्षा की सही व्यवस्था, आजीविका की व्यवस्था हो तो कोई भी अपना गांव छोड़कर शहर नहीं आएगा। शहर में कोई भी आता है तो मजबूरीवश आता है और मौका मिलने पर अपने गांव खुशी-खुशी लौटता है। आप जब इन रैन बसेरों में घूमेंगे तो पाएंगे कि कई लोग ऐसे हैं जो शहर में मजदूरी करते हैं लेकिन अपने घर परिवार से मिलने, अपनों का प्यार संजोने दो-तीन माह पर गांव जरूर जाते हैं।

यदि गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना सही तरीके से जमीन पर उतरी होती या उस दिशा में काम हुआ होता तो शहर नहीं रहते। शहर एक विकृति है। गांव में अपनापन है जबकि शहर में अपने भी बेगाने हो जाते हैं। गांव में समुदाय है, सामाजिकता है जबकि शहर समुदाय विहिन है। शहर में काम करना कठिन है। गांव में जो चीजें एक नागरिक को सहज रूप से उपलब्ध होती हैं, शहर में उसके लिए भी संघर्ष करना होता है। गांव में कुछ हद तक स्वशासन की संभावनाएं अब भी बनी हुई है, जबकि इससे अलग शहर में दूसरों का शासन है। उसमें स्व खत्म हो जाता है।

(डॉ इंदुप्रकाश सिंह,सामाजिक कार्यकर्ता, आश्रय अभियान, दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित आशाकिरण कॉम्प्लेक्स का चेयर मैन बनाया गया है।)

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