आंसू से मुस्कान तक, धूप से छांव तक… जारी है झौवा गांव की यात्रा

हरेन्द्र प्रसाद सिंह

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती समारोह पूरे भारत में चल रहा है। बापू ने कहा था कि स्वातंत्र्योत्तर भारत का विकास गांवों के विकास से ही होना चाहिए क्योंकि 70 फीसदी जनसंख्या गावों में ही वास करती है। किन्तु, ऐसा हुआ नहीं। सरकार शहरों के विकास में लग गई और गांव हाशिए पर चले गये। शहरों को सुविधाएं मुहैया करायी गयीं और गांव विकास का मुंह ताकता रह गया। कृषि आधारित गांव शहर की ओर पलायन को बाध्य हो गया। जीविकोपार्जन उनकी समस्या बन गई। भारत के लगभग सात लाख गावों की स्थिति कमोबेश यही है। हमारा गांव झौंवा,सारण इससे अछूता नहीं है।

पतित पावनी सुरसरी की सफेद रेत पर उगनेवाले हरे-भरे पौधे को झाव या झाउ व झउआ कहा जाता है। गंगचाल पर बसे इस बड़े-से गांव का नाम “झउआं” रखा गया होगा जो ब्रिटिशकाल में झौवा (JHAUA) हो गया। यह गांव छपरा के गांधी चौक से 22 किमी. पूरब और प्रसिद्ध सोनपुर मेला से 32 किमी. पश्चिम एन.एच. 19 के उत्तर में स्थित है। इसकी लंबाई 3 किमी. और चौड़ाई 2 किमी. है। झौवा की जनसंख्या 16 हजार है जिसमे लगभग सात हज़ार मतदाता हैं। झौवा अकेला ग्राम पंचायत है जिसमें 16 वार्ड्स हैं अर्थात इस पंचायत में दूसरा गांव शामिल नहीं है।
हरिद्वार से कोलकता तक गंगातट पर बसे गांवों में झौवा ही एक बड़ा सा गांव है। यहां मंदिर है, नहर है, तलाब है और 1962 ई. से बिजली-व्यवस्था है। दिघवारा प्रखण्ड का झौवा ही प्रथम गांव हैं। यहां विद्युतीकरण हुआ और गांव चक्की, स्पेलर, ट्यूबवेल और स्ट्रीट लाईट से लबरेज हुआ। ढ़िबरी और लालटेन से 50 फीसदी घरों को मुक्ति मिल गई। 20-25 वर्ष पूर्व महुआनी झौवा में एक मस्जिद बन गई। इस गांव की सड़कें और गलियां चौड़ी-चौड़ी हैं। गांव की बसावट ऐसी कि आप हर दरवाजे पर चार चक्के से पहुंच सकते हैं। आवागन हेतु राजपथ, जलपथ और रेलपथ उपलब्ध है। पहले संठा रेलवे स्टेशन हुआ था जो गंगा के कटाव के कारण 1941 ई. में तीन कि.मी. उत्तर बड़ागोपाल चला गया।


झौवा गांव की जमींदारी सुरवारी टोला के पास थी। गांव के मुख्य चार मुहल्ले थे – सुरवारी टोला, झौवा बाजार, सैदपुर झौवा और झौवा टोला। 1930-32 ई. के गंगा के कटाव में दियारा के तीन गांव- भेड़िहारी, छक्कन टोला और सोबरना कट गये। इन तीनों गावों को झौवा में शरण मिला और ये यही बस गये। अतएव इसकी जनसंख्या घनी हो गई। सुरवारी टोला गर्ग गोत्रीय राजपूतों का टोला है। जमींदारी के कारण इस टोले का पूरे गांव में दबदबा था। इनके पास 2700 बीघे की जमींदारी थी जिसमें गाराईपुर और बोधा छपरा गांव के पूरब का भू-भाग 500 बीघे मथुरापुर में शामिल था। जमींदारी उन्मुलन 1956 ई. के बाद मथुरापुर बोधा छपरा, आमी पंचायत में चला गया। झौवा कि 2200 बीघे सुरवारी टोला की सात पट्टियों में विभाजित थे।

अतएव हर पट्टी के अपने-अपने आसामी थे जो शादी-विवाह, जन्म-मृत्यु, जग-परोजन में मुफ्त सेवा देते थे। ये छोटे जमींदार थे किन्तु रूआब बड़े जमींदारों सा था। किसी के पास हाथी नहीं था। हां कुछ दरवाजे पर नस्ली घोड़े अवश्य थे। गाय, भैंस, बैल और बकरी इनके मुख्य पशु थे जिनकी सेवा आसामी करते थे। कृषि के अतिरिक्त इनके पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं था। गोयाकि सुरवारी टोला खूब संपन्न् जमींदारी टोला नहीं था। किन्तु जमींदारी परंपराएं कायम थी, संस्कार कायम थे। घर में उत्सवों के लिए इन्हें अपने आसामियों से जमीन बेचने पड़े और धीरे-धीरे 70 फीसदी जमीन इस टोले की बिक गई। आधुनिक शिक्षा और शारीरिक सौष्ठव के बल पर ये सरकारी नौकरियों में आ गये और इन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की। यह है हाल-ए-जमींदारी टोला का !


झौवा गांव बखूबी बसा हुआ गांव है जो पूर्वजों की विशेष देन है। 2200 बीघे में 1000 बीघे में बगीचा था जिसमें आम, महुआ, शीशम, नीम, जामुन और बांस मुख्य वृक्ष थे। शेष भू-भाग पर खेती होती थी। हम बच्चों के चार महीने – मार्च, अप्रैल, मई और जून बगीचे में ही बीतते थे। घूम-घूमकर मीठे आम चूसचूस कर खाना और वर्षा होने पर चिक्का-कबड्डी खेलना हमारा नित्य कर्म था। आम बिकते नहीं थे- अमावट-रस में डूबो-डूबो खाते थे। महुआ देकर ककरी, लालमी, तरबूज, खरबूज और दूध दही लिया जाता था। यानी विनमय-प्रणाली को हमने देखा है क्योंकि गांवों में मुद्रा का अभाव था। अब लोग आम काटकर खा रहे हैं, क्योंकि 90 फीसदी वृक्ष कट चुके हैं। वे बगीचे खेत बन चुके हैं। आम तोड़-तोड़ के खाना, मारपीट करना, दौड़ा-दौड़ी करना, टोकरी के टोकरी पके आम घर लाना कितना मजेदार था। कहां गये वो दिन! ये मौका सिर्फ सुरवारी टोला के पास था। अब 40—50 रूपया किलो खरीदकर कोई कितना खाएगा?

बहरहाल, झौवा गांव की बनावट वर्णनीय है। इसका सामाजिक ढांचा सुदृढ़ है क्योंकि प्रत्येक जाति के अलग-अलग मुहल्ले हैं। सबकी अपनी-अपनी परंपरायें, रहन-सहन है। पहले लोग एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में जरूरतवश ही जाते थे। आज आवारागर्दी के लिए आना-जाना होता है। जातियों का तालमेल नहीं था जो अब एक दूसरे में समा गये हैं। अब सबकी संस्कृति दिखाई देती है जो अच्छी बात है। वर्तमान राजनीतिक परिवेश ने सामाजिक सद्भाव पर कुठाराघात किया है। जो यदाकदा; विशेषकर निर्वाचन के समय, जातिगत और सामाजिक तनाव उत्पन्न करता है और हिंसा तक पहुंच जाता है। इस स्थिति का ग्वाह झौआ गांव भी है। गांव में बुद्धिजीवियों का अभाव है क्योंकि वे प्रवासी हो गये हैं।
शिक्षा मानव समाज के विकास का अहं हिस्सा है। झौवा गांव में शिक्षा अपेक्षाकृत देर से आई। हालांकि संस्कृत शिक्षा में झौवा का विशिष्ट स्थान था। यहां गुरुकुल थे। काशी के वेदज्ञ आचायों में पं. कृष्ण वल्लभ मिश्र का नाम अंकित था। जब दयानन्द सरस्वती आर्य समाज की स्थापना कर रहे थे तो वे शास्त्रार्थ हेतु झौवा पधारे और मिश्र जी का आतिथ्य ग्रहण किया, शास्त्रार्थ किया और मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ हेतु सहरसा प्रस्थान कर गये। आचार्य शिव कुमार मिश्र सात विषयों में आचार्य थे और वे जयपुर संस्कृत विश्वविद्यालय, राजस्थान में प्रोफेसर थे। वे 1955 ई. में अवकाश ग्रहण कर गांव आ गये थे। उनकी भविष्यवाणी फलित होती। आज भी हमारे गांव के पंडित अगल-बगल के गांव में पूजा-पाठ हेतु आमंत्रित होते हैं। किन्तु संस्कृत शिक्षा ब्राह्मणों तक ही सीमित थी। जमींदार लोग भी मात्र साक्षर थे, अन्य वर्ग की बात छोड़ दी जाय। जमींदारों को कुश्ती का शौक था। बापू परगन सिंह जिले के अग्रणी पहलवानों में थे। गोराईपुर के बाबू बीर सिंह का भी पहलवानों में नाम था। गांव-गांव में महावीरी अखाड़ा जमता और कुश्ती-प्रतियोगिताएं होती थीं। झौवा बाजार का उस्ताद अखाड़ा था। अर्थात् तब बुद्धिजीवी कम, बलजीवी अधिक थे। यह स्थिति 1920-25 ई. तक देखी गयी।
ब्रिटिश काल में शिक्षा का स्वरूप परिवर्तित हुआ। आधुनिक शिक्षा की नीव पड़ी। मैकाले की शिक्षा नीति का प्रचार-प्रसार हुआ। जिले में एक हाई स्कूल, 15-20 गांव पर मिडिल स्कूल और 8-10 गांव पर एक प्राइमरी स्कूल स्थापित हुई। कई गांवों के लिए झौवा में भी एक प्राइमरी स्कूल स्थापित हुई। तब शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी थी जो स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी हुई। बुनियादी शिक्षा-प्रणाली आरंभ हुई जिसमें सर्वांगीण विकास पर जोर दिया गया। पुस्तकीय ज्ञान के अतिरिक्त बागवानी, तकली-चरखा से सूत कताई, हस्तकला में कागज के फूल, बांस-ताड़ पत्ते की चटाई खजूर पत्ते का झाडू, टोकरी, कपड़े से रूमाल और उस पर कढ़ाई आदि और अनिवार्य व्यायाम एवं खेलकूद पाठ्यक्रम में सम्मिलित हुई। सबकी परीक्षा होती और अंक दिए जाते थे। वार्षिक परीक्षाफल समवेत अंकों के साथ घोषित होता था।


मैं भी उसी प्राइमरी स्कूल, झौवा का छात्र था और 1960 ई. में पासकर रामावतार मिडिल एवं हाई स्कूल, गोराईपुर में दाखिल हुआ। प्राइमरी स्कूल में तीन कमरे थे और तीन ही शिक्षक थे जो मिडिल पास थे। उनकी अद्भूत शिक्षण कला थी। गांव-समाज में उनका आदर-सम्मान था। हम बस्ता और चटाई लेकर स्कूल जाते थे। रास्ता भर शैतानी, खेलकूद, आम-अमरूद-बेर आदि तोड़ते आना-जाना होता था। मारपीट भी होती थी जिसका फैसला कुश्ती से होता था। गुरूजी की सपासप छड़ियां भी पड़ती थी। गणेश पूजा बाद चौका चंदा होता था जिसमें सभी डांडिया बजाते-गाते गुरूजी के साथ घर-घर जाते थे, मिठाइयां मिलती थी और गुरूजी को घरवाले यथाशक्ति उपहार देते थे। अद्भूत आनन्द था चौका चंदा में। शनिवार को एक आना (चार पैसे) हम शनिचरा देते थे। शिक्षकों का वेतन मात्र 30-35 रूपये ही थे। फिर भी वे संपूर्ण शिक्षक थे। आज बैठने के लिए कक्षाओं में बेंच है, पक्के दो तल्ला बिल्डिंग हैं, कई-कई शिक्षक हैं, शिक्षण-सामग्री है। छात्र-छात्राएं ड्रेस में आते हैं, वह भी साईकिल से। हमलोग तो सातवीं कक्षा तक जूता-चप्पल भी नहीं पहनते थे। पाजामा, धोती, कुर्ता हमारा ड्रेस था। अब तो कक्षा एक के भी छात्र-छात्रा जूता-मोजा, ड्रेस, टिफिन और स्कूल बैग से लैस स्कूल जाते हैं- सरकारी या निजी स्कूल में। हमारे समय में एक-दो छात्राएं ही कक्षा में हुआ करती थीं, जबकि अब आधा-आधा हैं। निश्चय ही स्त्री-शिक्षा प्रसार पाई है। सुरवारी टोला संपूर्ण साक्षर टोला है झौंवा पंचायत में। विडंबना यह है कि इतने बड़े गांव में आज तक एक हाई स्कूल नहीं है। हालांकि चार-चार जूनियर हाई स्कूल हैं।
झौवा में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आरंभिक काल से ही थी। लकवा और धात रोग विशेषज्ञ वैद्य थे जो पूरे प्रदेश स्तर पर जाने जाते थे। उनमें वैद्य मोरंग साह, वैद्य बंगाली साह, वैद्य राधा वल्लभ पाठक(डिग्रीधारी), चन्द्र चूड़ामणि मिश्र अग्रणी थे। जब पारा मेडिकल की पढ़ाई करके कई लोग एलोपैथी डाक्टर बन गये हैं, किन्तु आज तक झौवा में एक भी एम.बी.बी.एस डाक्टर नहीं हुआ। हालांकि बी.डी.एस हुए हैं। इंजीनियर तो बहुत हो गये, किन्तु सभी प्रवासी हो गये। अधिकारी भी हुए और यू.पी.एस.सी एवं बैंकिंग सेवा में गये किन्तु स्वाध्याय से; गांव की शिक्षा-व्यवस्था से नहीं। ऐसे प्रतिभाशाली लोगों का लाभ गांव को नहीं मिला, क्योंकि ये सभी प्रवासी हो गये। सुरवारी टोला से पुलिस सेवा, सेना और शिक्षा सेवा में अधिक लोग गये। अब तो निजी इंगलिश मिडियम स्कूल और कोचिंग सेंटर कई-कई चल रहे हैं। लोगों का ध्यान शिक्षा व उच्च शिक्षा की और आकर्षित हुआ है। विडंबना है कि झौवा में एक भी पुस्तकालय नहीं है जबकि 1948 ई. में जिला बोर्ड, छपरा के उपाध्यक्ष श्री शर्मा जी की उपस्थिति में “श्री अमर गांधी पुस्तकालय” झौवा की स्थापना बड़े धूमधाम से हुई थी। इसने 35-40 वर्ष पूर्व ही दम तोड़ दिया। कहा गया है कि अच्छे से गांव में पुस्तकालय सोने की अंगूठी में हीरे का नग होता है। अब इंटरनेट से ज्ञानार्जन हो रहा है, पुस्तक-अध्ययन कम हो गया है। टी.वी न्यूज से लोगों की जानकारी में वृद्धि हुई है। फिर भी समग्र ज्ञान हेतु पुस्तकाध्ययन आवश्यक है जो हमारे गांव में 1990 ई तक था।


भारत एक धर्मप्राण देश है। हमारा गांव धार्मिक आयोजनों का केन्द्र था, क्योकि यहां दो बड़े मठ हैं- सुरवारी टोला में राम-जानकी मंदिर और सैदपुर झौंवा में शिव-मंदिर। शिव-मंदिर की वास्तुकला से पता चलता है कि यह प्राचीन मंदिर है। मार्कण्डेय पुराण वर्णित अम्बिका भवानी मंदिर आमी और मौर्यध्वज गढ़ चिरांद के बीच गंगा किनारे यही एक मंदिर था। संत बाला दास जैसे ज्ञानी, त्यागी और समर्पित भक्त इसके महंथ थे। राम-जानकी मंदिर (पोखरा पर) लगभग तीन सौ वर्ष बना था जिसके महंथ संत गिरधारी दास, मौनी बाबा, संत राम लखन दास जैसे विद्वान साधु हुए। इन मंदिरों पर रामनवमी, कृष्णाष्टमी, शिवरात्रि धूमधाम से मनाया जाता था, जाता है। अयोध्या, काशी, मथुरा के विद्वान धर्मज्ञ राम-जानकी मंदिर पर प्रवचन हेतु पधारते थे। हमने श्रद्धेय वेदांती जी, प्रपन्नाचार्य, भीमचंडी व्यास, तर्क भयंकराचार्य एवं अन्यान्य संतों पंडितों और प्रवचनकर्ताओं को आशीरवचन श्रवण की है। बचपन में हमने इन मंदिरों पर खूब प्रसाद पाया है। यहां यज्ञ-हवन आदि समयानुसार होता रहता था और हरि कीर्तन और गायन होते रहते थे। अखंड रामचरितमानस पाठ संपूर्ण झौवा में चलता रहता है। महुआनी के वासुदेव सिंह ग्वालियर घराने के शास्त्रीय गायक इस गांव में हुए जिनके शिष्य बैकुंठ सिंह आधुनिक व्यास के रूप में जिले में विख्यात हैं।

1944 ई. में झौवा बाजार पर दुर्गापूजा समारोह आरंभ हुआ। शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा शारदीय नवरात्रि में अति श्रद्धापूर्वक धूमधाम से आयोजित होती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु रंगमंच है। “आदर्श नाट्य निकेतन झौवा (सारण)” नामक नाट्य संस्था हैं जो स्थापना से अद्यतन, अबाध नाटक, प्रहसन, गीत-संगीत और नृत्य कला का प्रदर्शन करता आ रहा है। छोटा-सा मेला भी लगता है। अतएव झौवा के बालक, वृद्ध दशहरा की आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं, खुलकर चंदा देते हैं, व्यवस्था मे शामिल होकर अपना दायित्व निभाते हैं। यह सार्वजनिक आयोजन है और जवार का प्रथम दुर्गापूजा समारोह है।

गांव का शायद ही कोई शिक्षित व्यक्ति जो इस समारोह का हिस्सा न बना हो। अभिनय कला सुरवारी टोला और झौवा खास को विरासत में मिली है। विगत बीस वर्षों से मेरे द्वारा लिखित नाटकों का मंचन मेरे ही निर्देशन में होता आया है। धनंजय सिंह “मासूम” बॉलीवुड तक पहुंच गये हैं इसी मंच से। मंच पर साधन बढ़े हैं किन्तु कलात्मक ह्वास हुआ है। अब तो गांव-गांव दुर्गा-पूजा आरंभ हो गई। झौवा पंचायत के महुआनी और झौवा टोला में होने लगी। गोयाकि झौवा में तीन जगह शरदीय दुर्गापूजा हो रही है। मइया-स्थान, ब्रह्मस्थान, महावीर स्थान तो झौवा में कई-कई हैं जिनके पूजक ओझा और पहलवान हुआ करते थे। अब तो ओझा लोग बोझा बांध चुके हैं किन्तु मांदर झाल बजाकर देवी पूजा हेतु भीख मांगने की परम्परा आज भी चल रही है। सच है, “मानों तो देव नही तो पत्थर” गोयाकि झौवा की धर्मिक और सांस्कृतिक परम्परा समृद्ध रही है, किन्तु राजनीतिक रूप में यह पिछड़ा रह गया। इस गांव में राज्य स्तरीय भी कोई नेता जन्म नहीं लिया।

थोड़ी आर्थिक चर्चा भी समाचीन है। प्राचीनकाल से यहां कई व्यापार-केन्द्र था। यहां हप्ते में दो दिन हाट लगते थे। 20-25 गांव के लोगों का बाजार झौवा ही था। झौवा खास में हर वस्तु की दुकाने थीं। यहां के सेठ-महाजन, बनियों का व्यापार दिघवारा-छपरा और मनेर से था। आज भी गल्ले, ग्रोसरी, स्टेशनरी, दवा की बड़ी दुकानें झौवा में मौजूद हैं। सोने-चांदी की भी दुकान हैं। महुआनी में तो कपड़े की भी दुकान है। तीन दिन झौवा और तीन दिन महुआनी में बाजार लगता है। अब तो मुख्य सड़क किनारे गुमटियां मुहल्ले-मुहल्ले में बैठ गई हैं जिनमें मुख्यतः पान मसाला, गुटका, खैनी-बीड़ी, सिगरेट और गांजा-शराब की बिक्री होती है। बिहार में शराबबंदी है किन्तु इन गुमटियों में खुलेआम बिकती है। सुरवारी टोला के लोग दारू-शराब और ताड़ी से दूर-दूर रहते थे किन्तु अब खूब पीने लगे हैं। इसे शौक या फैशन मान लिया गया हैं। पहले मठ पर साधु-संत गांजा सेवन करते थे। अब तो गली-गली में गांजा का अड्डा है- सम्पूर्ण पंचायत में। नई पीढ़ी नशे का शिकार हो गई हैं। दारू-ताड़ी के अड्डे पर भाईचारा देखते ही बनता है।
बहरहाल, अर्थ के लिए झौवा में एक खास कुटीर उद्योग है- अरकत पात बनाना। रूई का गोल-गोल पत्ता बनाना, उसे रंगना, हुंडी बनाना और होल सेलर बेचना। यह लाल पत्ता पूजा-पाठ, घर-सजावट और मैया-स्थानों में उपयोग में आता है। सम्पूर्ण बिहार में यह पात झौवा गांव ही आपूर्ति करता है। इसके लिए महिला समितियां बनी हैं जिसे उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक, झौवा फाइनेन्स करता हें इस बैंक में कई गांव के लोगों के दस हजार से अधिक खाते हैं। यह किसानों को कृषि लोन मुहैया कराता है। आमदनी के लिए कुछ लोग टेम्पू, कार, पिकअप आदि भाड़े पर चलाते हैं। गांव में तीन-चार बड़े टेन्ट हाउस और डेकोरेटर भी हैं जिनके पास माईक, लाउडस्पीकर जेनरेटर आदि मौजूद है। दो अच्छे बैंड पार्टी हैं जो शादी-विवाह में अनिवार्य होते हैं। 5-6 कैटरर हैं जो पार्टियों में सुस्वाद भोजन बनाने में पारंगत हैं। खोमचे और फेरीवाले, ठेलेवाले, फल, मिठाई, समोसे, चाट, गोल-गप्पे आदि बेचकर अच्छा कमा रहे हैं। सब्जी व्यापारी तो हैं ही।


झौवा ढाला पर बालू का बहुत बड़ा व्यापार है। गांव में सिमेंट, लोहे का रड, कंकरीट, रंग पेन्ट, जेरोक्स मशीन और आईस क्रीम फैक्टरी भी मिल जायेंगे। झौवा में 8-10 पीडीएस दुकानें हैं। डीलर मालामल हैं। निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधिगण सरकारी योजनाओं को लूटकर मालामाल हो रहे हैं। भ्रष्टाचार चरम पर है, शिकायत की कोई सुनवाई नहीं है क्योंकि लूट में चेन सिस्टम है। कार्ड धारियों को 5 किलो की जगह 4 किलो अनाज दिया जाता है। वह भी दो-तीन महीने के अंतराल पर। लोग ‘भागे भूत की लंगोट’ ही सही समझ कर ले लेते हैं। गांव में शहर प्रवेश कर गया है। समवेत, झौवा की आर्थिक क्रिया प्रगति पथ पर है। फिर भी 8-10 ही करोड़पति मिलेंगे।

आधुनिक भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता-संग्राम महत्वपूर्ण पड़ाव है। झौवा में इस संग्राम की झलक 1930 ई. के बाद दिखाई दी। विद्यार्थी वर्ग आंदोलित हुआ। रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस भवन एवं अन्य सरकारी भवनों पर तोड़फोड होने लगा। इसी क्रम में छपरा के प्रसिद्ध वकील स्वर्गीय राधेश्याम सिंह के नेतृत्व में संठा रेलवे स्टेशन से मालगाड़ी के तीन डिब्बे धक्का देकर झौवा ढ़ाला के पास गंगा नदी में बलि चढ़ा दी गई। वकील साहब बगल के गांव धनौरा के निवासी थे। उपर्युक्त घटना व आंदोलन का प्रमाण इस बात से साबित होता है कि सुरवारी टोला के बाबू गोरख नाथ सिंह और सैदपुर झौवा के पंडित रामचन्द्र उपाध्याय को आजीवन स्वतंत्रता सेनानी पेंशन प्राप्त हुआ। शिक्षित युवकों ने आम लोगों में आजादी की ललक पैदा करने के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की तरह नाटकों का सहारा लिया और उसी समय रंगमंच की स्थापना हुई जो आज भी बदस्तूर संचालित है। थोड़ा ही सही, किन्तु झौवा का सहयोग तो था।


पुरातन से नूतन तक/शोषण से स्वछंदता तक/ घूंघट से जीन्स-टॉप तक/ शास्त्रीय संगीत से फिल्मी गीत तक/ बैलगाड़ी से मोटर गाड़ी तक/ कीचड़ भरे सड़क से पी.सी.सी. रोड तक/ मिट्टी और फूस के घर से उंची-उंची बिल्डिंगों तक/ पारंपरिक खेती से आधुनिक खेती तक/ कृषि-व्यापार से उद्योग तक/ महाजनी प्रथा से बैंक तक/लाठी-भाला पहलवानी से बंदूक-पिस्तौल तक/ मोटे अन्न के भोजन से रिफाईन आधुनिक भोजन तक/ संस्कृत से अंग्रेजी तक/ जड़ सोच से प्रगतिशील चिंतन तक/ निरक्षरता-साक्षरता से उच्च शिक्षा तक, सामाजिक भेदभाव से समरसता तक। स्लेट-पेंसिल से इंटरनेट तक/ डोमकच से टी.वी. सीरियल तक/ बोरा-चटाई से कुर्सी-बेंच तक/ चौकी-खटिया से सोफा सेट तक/ मिट्टी-राख से साबुन, सैम्पू-सेन्ट तक/ खाली पांव से बाटा और कैनवास शू तक/ खादी से सिल्क-पॉलिस्टर तक/ ढ़िबरी-लालटेन से बिजली तक/ वानिकी से वृक्ष-कटाई तक/ ताड़ी से हिव्स्किी -रम तक/ बारात में पवंरिया नाच से छिछोरे नाच तक/ शिष्टाचार से भ्रष्टाचार तक/ सेंधमारी से रंगदारी तक। बड़प्पन से अधोपतन तक/ दया-धर्म से क्रूरता-रक्तपात तक/ चरण स्पर्श से हस्तमेल तक/ प्रणामा-पाती से हाय हेलो तक। आंसू से मुस्कान तक धूप से छांव तक/ की यात्रा हमारे गांव झौवा ने की है। हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है। सुविधाएं बढ़ी हैं। किन्तु, बहुत कुछ बाकी है। अन्य गांव की तरह झौवा भी समग्र और समेकित विकास की राह देख रहा है।
(अध्यापन, रेलवे उच्च विद्यालय, जाने माने कवि,साहित्यकार,नाट्य लेखक व विभिन्न मंचों से जुड़े रहे हैं।)

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