” बहरवांसु ” होने के कारण गांव में नहीं थी ” हरमुठाह ” काम की इजाजत

मेरा गांव बिहार के छपरा सिवान की सीमा पर है। प्रशासनिक दृष्टि से या सिवान जिले का भाग है पर शिक्षा , स्वास्थ्य , बाजार आदि की जरूरतों के लिए ग्रामीण छपरा की ओर रुख करना अधिक पसंद करते हैं । क्योंकि यह पुराना जिला है और अब प्रमंडल का मुख्यालय भी । छपरा के रसूलपुर और सिवान के चैनपुर को जोड़ने वाली बारहमासी सड़क के आठवें किलोमीटर पर मेरा गांव है । दोनों जिलों तक आवागमन के लिए अच्छी सड़कें भी हैं ।
गांव के इतिहास और मान्यताओं के बारे में विशेष नहीं बता पाऊंगा पर एक लक्षण बचपन से ही देखते आ रहा हूं। मेरे गांव के आस पास आम के बहुत सारे पेड़ और बगीचे हैं । शायद इसी कारण इसगांव का नाम बंगरा के बारी पड़ा हो । कुछ कम ही सही यह पेड़ अब भी हैं । बारी को बगीचा या फुलवारी भी कह सकते हैं। बहुत सारे पेड़ थे। इन पेड़ों में बीजू आम के पेड़ों की संख्या ही अधिक थी। महुआ,जामुन, बेल करौंद, आंवला आदि के पेड़ भी थे पर बहुत कम। इनमें से पुराने पेड़ खंखर हो गिरते चले गए। इन बगीचों में बीजू या देसी आमों के अनेक प्रकार के पेड़ थे । हर पेड़ के आम का अलग आकार प्रकार, रस गंध और स्वाद ।
जिस प्रकार जैव विविधता पूरे विश्व में संकट में है, आधुनिक सभ्यता और तकनीकी द्वारा इस विविधता को खत्म किया जा रहा है, उसका एक सटीक उदाहरण मेरे गांव के पेड़ और खेती भी हैं। देसी आमों के पेड़ों के गिर जाने के बाद कुछ किसान नये बगीचे लगा रहे हैं। पर यह सभी पेड़ कलमी आम के होते हैं। कलमी आम के तीन चार प्रकार ही आर्थिक लाभ की दृष्टि से लगाए जा रहे हैं। ये हैं मालदह, सुकुल, सीपिया व बम्बई। इन कुछ प्रकारों में से मालदह पेड़ों की संख्या सबसे अधिक 90 फीसदी के आसपास होगी। महुआ , जामुन , बेल , करौंद , आमला लगाने के बारे में किसान अब सोचते भी नहीं। आम की फसल मध्य मई से प्रारंभ होकर अगस्त तक तैयार होती रहती है । अगात प्रकार में मुंबई और जर्दा हैं । इसमें शुकुल , सीपिया और मिठूआ आदि पछात किस्म के आम हैं जो जुलाई अगस्त में पकते हैं। किसान अब बगीचे में रहना नहीं चाहते हैं। मशीनीकरण ने उनके जीवन को आराम तलब बना दिया है। वे थोड़े समय में ही अधिकतम लाभ की भावना से खेती करते हैं । इस कारण मध्यवर्ती मालदह उन्हें अधिक मुफीद महसूस होता है। जहा। मेरे बचपन के बगीचे अप्रैल में टिकोले के दिनों से जुलाई तक आबाद रहते थे, हम बच्चों का कीड़ा स्थल बने रहते थे अब वे 10 -15 दिनों में ही उदास हो जाते हैं। इस प्रकार देसी आमों के अनगिनत प्रकार तो नष्ट हो ही गए । कलमी आमों में भी मालदह को छोड़ बाकी सब बाजार के आकर्षण के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बेल,आंवला, महुआ आदि की बात कौन पूछे ?


व्यावसायिक खेती के चलन का असर जैव विविधता पर भी दिख रहा है। हजारों पेड़ों से भरे मेरे गांव के बगीचे से मधुमक्खियां पलायन कर गई हैं । यह पर्यावरण का भी संकट है । आम के मंजर मध्य फरवरी तक आने लगते हैं । बसंत का समय होता है यह। प्रकृति विविध फूलों से लदने लगती है । इसी समय किसान या बगीचे खरीदने वाले व्यवसायी मंजरों को मधुआ कीट से बचाने के लिए और टिकोलो के विकास के लिए पेड़ों पर प्रत्येक 10-15 दिनों के अंतराल पर 4 बार कीटाणु नाशक दवाइयों का छिड़काव करते हैं। जो गति गिद्धों की हुई थी वही अब मधुमक्खियों की हो रही है। मंजर और टिकोले तो बच जाते हैं पर मधुमक्खियां नहीं आ रही हैं । गिद्ध और मधुमक्खियां ही क्यों देसी गायों और मुर्गियों की प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है। यह अकारण नहीं है। प्राकृतिक और जैव असंतुलन का परिणाम मानवता को अभी और देखना बाकी है। कोरोना तो शुरुआत है। इस तरह के अनेक संक्रमण अब आते रहेंगे ।

हम सभी जानते हैं ग्रामीण जीवन का मुख्य आधार खेती है । विश्व के लिये अनाज गांव के खेतों में ही उपजते हैं। खेती पर भी वैश्विक उपभोक्तावादी संस्कृति का जबरदस्त प्रभाव साफ दिखने लगा है। मेरा गांव इसका सटीक उदाहरण बन के उभरा है। दुनिया एक भाषा, एक संस्कृति, एक पहनावा की ओर धीरे-धीरे केंद्रित होती जा रही है। गांव की खेती भी तालमेल बिठाते हुए एक फसली, मोनो क्रॉप की ओर अग्रसर है। हरित क्रांति के पहले किसान मौसम की अनुकूलता,साधन की उपलब्धता और पारिवारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर कई प्रकार के मोटे अनाजों को भी बोते थे। गेहूं,चावल और मकई के अलावा दूसरे मोटे अनाजों में थे मडुआ, खेसारी, तीसी,केराव,मटर, मकई,टांगुन ,चीना सरसों आदि। हरित क्रांति के अनिवार्य प्रतिफल के रूप में किसानों का झुकाव गेहूं, धान और मकई की फसलों को लगाने में ही अधिक है । सरकार की ओर से इन्हीं फसलों को लगाने में ही अधिक प्रोत्साहन मिलता है। खाद्य के रूप में किसानों के जीवन से मोटे अनाजों का चक्र समाप्त हो जाने के कारण मिट्टी की उर्वरता तो प्रभावित हो ही रही है । किसानों की संपूर्ण जीवन शैली और स्वास्थ्य पर भी इसका असर दिखने लगा है ।


अपने गांव में खेती के तौर-तरीकों में धीरे धीरे आ रहे आमूलचूल परिवर्तनों का मैं साक्षी नहीं भागीदार भी रहा हूं। बचपन में काठ के हल और बैल से खेती होती थी। यह 70 के दशक के आसपास की बातें हैं। खेत जोतने के लिए हलवाहे होते थे। हल जोतने के एवज में कुछ खेत या फसल का कुछ कुछ हिस्सा दिया जाता था। हलवाहे वर्ष भर के लिए दिए गए उस खेत की उपज के मालिक होते थे। खेती मूलतः वर्षा जल पर आधारित थी। अतिरिक्त जल की जरूरत को कुओं या ठहरे पानी को दोन से चला कर पूरी की जाती थी। इस व्यवस्था की और कुओं का अपना एक अलग सांस्कृतिक ताना-बाना होता था जो सदियों से ग्रामीण जीवन का आधार था।
फिर मशीनीकरण का दौर आया। कुंओं से पटवन के लिये राहट लगाए जाने लगे जिसे कोल्हू की तरह बैल गोल चक्कर लगा कर चलाते थे। यहां इस बिंदु तक किसान पारंपरिक खेती,पटवन, बीज कृषि कार्य की परस्परता और सामूहिकता के प्राचीन रस्मों से बंधे हुए थे। हरित क्रांति ने इस पूरे ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। उत्पादन बढ़ा, गाँव की भूख मिटी पर गांव के संबंध छीजने लगे। उन्नत बीज,कीटनाशक, रासायनिक खाद, पटवन और दौनी के लिए पंपिंग सेट , डीजल आदि का प्रवेश गांव में होता गया। खेती जो श्रम और सामूहिकता पर आधारित थी पूंजी आधारित हो गई। श्रम और सहयोग का महत्व कम होने लगा। सरकार और बैंक भी किसानों को खेती के लिए अनुदान और कर्ज देने लगे। इसप्रकार किसान एक अलग तरह के ऋण चक्र में फँसने लगे। महिलाओं के होठों पर से गीत गायब होने लगे। गाव की चौपालों से उठने वाले होली,चैता,बिरहा के स्वर धीमा पड़ने लगे। कम मेहनत कर अच्छी फसल लेने की चाह किसानों में बढ़ने लगी। वे आराम तलबी होने लगे ।


मशीनों के आने से बोना,पटाना,काटना और अनाजों का संग्रह करना आसान हो गया। उत्पादन भी बढ़ा पर वायु,जल,मिट्टी,जीवन और संस्कार प्रदूषित होते चले गए। यह चक्र अनवरत आज भी जारी है। मनुष्य आज संपूर्ण परिवेश का एक सक्रिय भागीदार ना होकर उसका एक यंत्रवत उपभोक्ता है । गाँव में आया यह बदलाव दुखदाई है ।
धरती को छेद कर जल निकालने की तकनीक और मशीन ने कुओं और तालाबों को नष्ट कर दिया । गेहूं पटाने के लिए जनवरी फरवरी माह में ही तालाबों गढ़ों का पानी पंपिंग सेट से उलीच लिया जाता है। इनसे जुड़ी संस्कृति भी मरने लगी है। बैल उपयोगी न रहे। कोई किसान आज बैल नहीं रखता। कुछ किसानों के दरवाजे पर गायें हैं पर उनके बछड़ों का कोई उपयोग नहीं है। देसी गायें भी अब कम बची हैं। अधिक दूध देने वाली वर्णसंकर गाय किसान रखने लगे हैं जिनके बछड़ों का कोई उपयोग नहीं है। इन गायों का दोहन काल भी कम है। 6-7 वर्षों बाद ये गायें दूध देना बंद कर देती हैं। वर्णसंकर प्रजातियों ने एक अलग तरह की नैतिक विडंबना को भी जन्म दिया है। बिसुक चुकी गायें और उनके बछड़े एक दो हाथ बदलकर सीधे कसाई खाने पहुंचते हैं। यह नैतिक विडंबना कुछ ऐसी ही है जैसे कि माता-पिता को वृद्धावस्था में घर से निकाल देना या न कमाने वाले भाइयों को बाहर कर देना ।

गिद्धों के विलुप्त होने का कारण,उनके सामजिक मौत का कारण जानवरों को दी जाने वाली दवा डाइक्लोफिनाक है। वे दृश्य जिन्हें हम बचपने में गांव के सिवाने में गिद्धों को कूद—कूद कर मृत पशुओं पर टूटते देखते थे गायब हो चले हैं। मेरे बचपने का किसान इतना मजबूर या स्वार्थी न था। जीवन उसका इतना नीरस, प्रकृति से दूर और संगीतहीन भी नहीं था। उसकी उपज में देवी—देवता,साधु—सन्यासी,आदमी—मजदूर, चिड़िया आदि सभी जीवों का हिस्सा होता था ।
मेरा पुराना घर मिट्टी और खपरैल का बना था। बड़ा सा आंगन था। इसके निर्माण में गांव के बाहर से उत्पादित किसी भी वस्तु का प्रयोग नहीं था। बांस,लकड़ी, छप्पर के लिए खपड़ा सब गांव में ही बने थे। अधिकांश गांव के पुरुषों के श्रम के सहयोग से ही बना था। इसमें आंगन तो बड़ा था पर दीवार में खिड़कियों के नाम पर ऊंचे स्थानों पर छोटे-छोटे रोशनदान लगे थे। स्त्रियों का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं माना जाता था। बाजार जाना तो और भी बुरा माना जाता था । घर से बाहर केवल मात्र वृद्ध स्त्रियां ही निकलती थी। स्त्री शिक्षा न के बराबर थी । अधिकतम गांव के स्कूलों तक ही। आज तो सैकड़ों लड़कियां विद्यालय जाती हैं। साइकिल चलाती हैं और अपनी इच्छा अनुसार कार्य करती हैं। स्त्री शिक्षा की स्वीकार्यता 70 दशक के बाद तेजी से बढ़ी है । संयुक्त परिवारों का एकल परिवारों में टूटने के कारणों में एक स्त्री की और अधिक अधिकार और स्वतंत्रता की इच्छा भी है ।
मेरी शिक्षा गांव के विद्यालय में नहीं हुई। पूरब ओर ही दूसरे गांव में एक प्राथमिक विद्यालय था। कुछ दूर चैनपुर के एक छोटे बाजार में एक उच्च विद्यालय भी खुल चुका था। पिता कोयलांचल के एक छोटे अंग्रेजी कंपनी में कार्यरत थे। वह मुझे भी अच्छी शिक्षा दिलाने की अस्पष्ट सी कल्पना लिये अपने साथ लेते गयेॅ। गाव के विद्यालय जैसा ही साधारण था वह विद्यालय। महँगे अंग्रेजी माध्यम के उस विद्यालय जैसा तो कतई नहीं था जहाँ छात्र स्कूल यूनिफार्म में टाई लगाए जूते मोजे पहने बसों से लदकर जाते थे और आपस में अंग्रेजी में बातें करते थे ।


मेरा गांव मेरी आंखों के सामने जीवंत हो जाता था, एक बड़े आंगन की तरह पसर जाता था जब मैं छुट्टियों में सपरिवार गांव लौटता था। या किसी पर्व त्यौहार या विवाह के अवसर पर गाँव जाना होता था । मैं ” बहरवांसु ” ( बाहर वास करने वाला ) छात्र था। इस कारण मुझे गांव के लोग और हमउम्र लड़के कुछ अलग दृष्टि से देखते थे। मुझे सुकुमार समझा जाता था। ” हरमुठाह ” (हल के मुठ के पकड़ की तरह का कठोर कार्य ) काम से मुझे बचाया जाता था । परिवार के लोगों ने मुझे कभी भी ‘छोटा ‘ समझे जाने वाले कार्य के लिए प्रेरित नहीं किया । मेरे साथ शब्दों का व्यवहार भी उसी तरह रुक्ष ना होकर शिष्ट तरीके से करते थे । गांधी ने श्रम, शिक्षा और संस्कृति के इस दुराव को समझ लिया था। इस दरार को वो कम करना चाहते थे ।

छुट्टियों में जब यह कहा जाता था घर चलना है तो इसका अर्थ गांव चलना होता था । गांव जाने का तात्पर्य परदेश से देश जाना होता था। ये बातें इतने सामान्य ढंग से घुल मिल गईं थी । प्रो सुधा सिंह ने अपने संस्मरण में इसका अच्छा विश्लेषण किया है। बाहर जाने का तात्पर्य परदेस जाना होता था। बाहर की आमदनी यदि घर में हो तो इसे अच्छा माना जाता था। खेती स्वतः संपूर्ण आर्थिक रूप से कभी न थी। खेती को मात्र साधारण जीवन यापन का साधन माना जाता था। बहरा या बाहर की नौकरी को अब थोड़ा सम्मान मिलने लगा था।
खेती पर निर्भर किसान अपनी जीवन दशा से प्रायः संतुष्ट नहीं रहते थे। खेती से जीवन चलता था पर यह कर्म उनके लिये कठिन, उबाऊ और हमेशा भरोसेमंद नहीं था। प्रायः बाढ़ सूखा आदि प्राकृतिक आपदायें उनके लिये घोर निराशा का कारण होते थे। इसके अतिरिक्त शादी विवाह ,स्वास्थ्य , शिक्षा संबंधी अन्य आकस्मिकताओं में वे अपने को लाचार पाते थे । ऐसे में परिवार के सदस्यों का बाहर की कमाई ही सहारा होता था ।


ऐसा भी नहीं है कि मैं अपने गांव के प्राथमिक विद्यालय में गया ही नहीं । ऐसा भी नहीं है कि ‘ बहरवांसु ‘ होने के कारण मैंने अपने गांव के हमउम्र लड़कों से बातें नहीं की । मैं उनके साथ गांव के बगीचे में हर प्रचलित खेल जैसे कि गुल्ली डंडा,चीका,कबड्डी, लुकाछिपी आदि खेलता था। पके आम टपकने पर दौड़ कर पहले लूट लेने का खेल भी इसमें शामिल है । पर मैं उनकी नजरों में विशिष्ट था या हो सकता है मैंने यह भ्रम अपने अंदर पाल रखा हो या परिवार के लोगों ने इसे मेरे अंदर प्लांट किया हो । 70- 80 के दशक तक गांव में फुटबॉल वॉलीबॉल और क्रिकेट के खेलों का आगमन हो चुका था । क्रिकेट के प्रचार में रेडियो से प्रसारित कमेंट्री बहुत सहायक सिद्ध हुई और फिर इस खेल ने तो फुटबॉल वॉलीबॉल सहित गांव के सभी पारंपरिक खेलों को डुबो दिया। मोनोकल्चर , एक भाषा , एक संस्कृति का यह एक और स्पष्ट उदाहरण है ।
मैंने अपने गांव के पढ़ाई के तरीकों और वातावरण में भी काफी परिवर्तन देखा है। एकाध दर्जन बार गांव के विद्यालयों में हमउम्र बच्चों के साथ बैठा भी। कक्षाएं शोरगुल से भरी होती थी। बीच-बीच में अध्यापक शोरगुल ना करने की धमकियां दिया करते थे। छात्रों को कक्षाओं में ही प्रारंभिक गणित आदि का सामूहिक पाठ करा कर याद करा दिया जाता था। छात्र ऊंची आवाज में संगीतमय स्वर में पहाड़ों को दोहराते थे। उल्टी गिनती गिनते थे। अद्धा, पौने, सवैया,डेढा, अढ़इया आदि का पहाड़ा उन्हें पाठ करा कर याद करा दिया जाता था। प्रार्थना से विद्यालय प्रारंभ होता था। छात्र अनुशासित हो बहुत मीठे स्वर में समूह गान करते थे ,
” माँ शारदे कहाँ तू वीणा बजा रही हो ….. ”
प्रतिदिन अध्यापक और अभिभावक भी सुलेख के लिए प्रेरित करते थे। प्रारंभिक कक्षाओं में मैंने प्रारंभ के दिनों में गांव के छात्रों को कंडे की कलम से अक्षर बनाकर लिखते देखा है । स्कूल के पास ही साह जी की दुकान में नील की छोटी-छोटी गोटिया मिलती थी। उन्हें पानी में घुलाकर छात्र स्याही बनाते थे। और उस स्याही में कंडे की कलम डूबा डूबा सुलेख का अभ्यास करते थे । पर यह कुछ दिन ही चल । कठपेंसिल आ गई। फिर लकड़ी में निब वाली कलम, फिर स्याही भर कर लिखने वाली निब की कलम यानी फाउंटेन पेन भी आई। सबसे अंत में बॉल पॉइंट पेन आया ।
इस प्रकार माध्यमिक तक आते-आते गांव के लड़कों का सुलेख और गणित एक स्तर तक ठीक हो जाता था। पर वे अंग्रेजी से बहुत डरते थे। बहुत छात्र माध्यमिक परीक्षाओं में अंग्रेजी में फेल भी करते थे। उन दिनों अंग्रेजी विषय में पास करना अनिवार्य था। उस जमाने में मैट्रिक की परीक्षा पास करना एक बड़ा समाचार होता था। बिहार बोर्ड का परीक्षा फल अखबारों में आता था । बहुत छात्र अंग्रेजी में फेल होते थे इसे देखते हुए सरकार में 1967 के आसपास अंग्रेजी में फेल छात्रों को भी पास करने का निर्णय लिया।


पिता ने अपने “बहरा की कमाई” से एक अलग घर बनाया। पुराने घर में उनके हिस्से एक मिट्टी का कमरा था जो हम चार भाई बहनों के लिए अपर्याप्त था। उसी बाहर की आमदनी से यथासंभव भाइयों को पढ़ाया और बहनों का विवाह किया। वह तो स्वयं नौकरी में थे सो सदेह उपस्थित हो घर उन्होंने नहीं बनाया। पट्टीदारी में एक विश्वासी ‘काका’ को पैसे भेज देते थे। घर बनवाने का काम उन्हीं के जिम्मे था। बनाने के लिए ईंटों का एक छोटा पिजवा लगाया गया था। पर घर बन जाने के बाद उसमें रहने वाला कोई नहीं था मां के सिवा। भाई भी पढ़ाई में थे या कहीं नौकरी पा चुके थे। नतीजतन पुराने घर में जिस किसी का भी घर ढहता वह हमारे नये घर में आकर टिक जाता। बरस दर बरस तब तक निसंकोच आराम पूर्वक रहता जब तक उसका अपना घर तैयार नहीं हो जाता। हमें भी खुशी होती कि अपने परिवार की कुछ सदस्यों के काम नया घर आया।
कोरोना घर बंदी के संक्रमण काल में चारों ओर से खबरें आ रही हैं कि गंगा के 34 घाटों में 29 घाटों का पानी नहाने योग्य हो गया है। दिल्ली में यमुना अब साफ और स्वच्छ बह रही है । जालंधर मुजफ्फरनगर आदि सैकड़ों मील दूर शहरों से हिमालय के धवल शिखर दिख रहे हैं।  आज भी गांव में प्रातः खाट पर लेटे लेटे 8 किलोमीटर दूर रेल की पटरी पर दौड़ती रेलों की धड़धड़ाहट और सीटी की आवाज सुनी जा सकती है। भले ही गांव की मिट्टी प्रदूषित हुई है, उसकी उर्वरा क्षमता कम हुई है, थोड़ा भूजल का स्तर गिरा है पर गांव के खुले आकाश को रात में खाट खटोली ऊपर बैठ तारों और बादलों का नैसर्गिक दृश्य देखना और खुली विस्तीर्ण धरा , हरे-भरे फसलों बगीचों का विकल्प कभी भी शहर का वातावरण नहीं हो सकता। वायु प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण से तो अभी लाखों कोस दूर हमारे गांव हैं। आधुनिक जीवन की भागम भाग की जटिलताओं से दूर साधारण जीवन के लिए आज भी गांव जाने जाते हैं। आवश्यकता है ग्रामीण स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं को बढ़ाया जाये। नई संचार की तकनीकी का प्रयोग करते हुए कृषि उत्पादन और वितरण की व्यवस्था को दुरुस्त किया जाये । जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए ग्राम वासियों को शिक्षित किया जाये ।


यह सत्य है मेरे सपनों का आदर्श गांव यथार्थ में वैसा नहीं रह गया है। कई परिवर्तन हुए हैं । अंत में अपनी एक भोजपुरी कविता से समाप्त करना चाहूँगा
गांव हमार
बीतल भोगल भुलाइल सचाई ह
गांव हमार
एगो आदर्शवादी कल्पना ह
प्रेमचंद के पंच परमेश्वर
सुदर्शन के हार की जीत जस
कई गो चित्र किताबन के राहे
कई गो चित्र चित्रकारन के सुघर रंगल चित्रन के राहे
आयिल बाड़ी सन
कुछ त दूर देशन के जतरा अनुभव से
कुछ कुछ त हमार नवका फोटोकारी के सवख से
बीछा के यादन के देवाल पर जम गईल बाड़ी सन
कभी सलगा त
कभी टूटल भांगल रूप में
दूर अतीत के झरोखा से
झांके ली सन रह रह के
हमार बीतल भोगल अस्तित्व के मन पारत
जइसे पुस्तकालय के अलमारी में कई गो खन्दा होला
सभ तरह के आदर्श
भुलाइल बीतल सच्चाई
दुखन से भरल आज
सभ किताब
सजल बा ओह यादन के
किताबन के आलमारी में
जब घुप अन्हरिया में
हाथ के हाथ ना देख पावे
जब परचंड तेज घाम में
मजूर के माथ के पसेना
भौंव तक ना पहुँच पावे
सुख जाला रहते में
जब पसेनाजामा पर
नून के सुखल नदी जस
रेघारी छोड़ जाला
कितबिया यादन के अलमारी
से निकल झांकेली सन
बतियावेली सन
चानी के चमकत कुरसी पर बईठल पंच बनल
हमार आदर्श गांव के चित्र
मुसुकात लउकेला
हमार गांव
भोगल सुख के
जीयत दुःख के
एगो सैद्धांतिक आदर्शवादी चित्रन के मिश्रण ह
जेकरा के हरेक अनुभव एगो नया चमकत कलेवर देत रहेला ।

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