बरखा-बुनी, जिनगी के हेन तेन अउर पापा

मुन्ना के. पाण्डेय

सावन का आधा हिस्सा बीतते और भादो की चकवादह बरखा-बुनी के बीच गाँव का जीवन और लैंडस्केप एक नया आकार लेने लगता। सड़क किनारे के उपेक्षित गड्ढे चंवरे, धान के खेत और हर छोटे-बड़े गड्ढे पानी से लबालब हो जाते। इन दो महीनों में जीवन में दो ही रंग हर ओर शामिल हो जाते थे, एक, मटमैला और दूसरा, चटख हरा। पानी का रंग कैसे तय करूँ वह जिस पर गिरता, वैसा ही हो जाता, ठीक मुकेश के उस गीत जैसा, पानी रे पानी तेरा, रंग कैसा, जिसमें मिला दो लगे उस जैसा..’-।


मटमैला हमारे लिए अछूतों वाला रंग कभी न रहा हां! माँ जरूर घर में घुसने से पहले चांपाकल पर गोड़ धोकर घर के अंदर आने के लिए जरूर कहती। इन्हीं दो महीने में खपरैल की छत, भुसउल सबकी परख भी होती, जब पापा उनकी छत की मेड़ पर पॉलीथिन की चादर बिछाकर ईंटों से ढंकते, दबाते रहते और उनके सर और पीठ पर जूट का बोरा कवच की तरह टंगा रहता। ऐसा नहीं था कि हमारे खपरैल के बड़े से घर में छाता नहीं था पर आदमी छत पर चढ़ बारिश और हवा में छाता संभाले कि छत सही करे? फिर चकवादह में हवा ऐसी चलती कि छाता बार बार उलटता था। पापा बारिशों में भी दिन भर भींगते चेहरे से पानी काछते कभी गाय और भैंस की सानी पानी करते, लेदी काटते तो कभी धान के खेतों की मेड़ पर खड़े होकर हम दोनों भाइयों को बगीचे से वापिस आने के लिए तेज़ चिल्लाकर बुलाते – “ऐ रे आईबा सन की हम आईं? तोनी के सब खेला छोड़ा देब।”- इन्हीं दिनों अक्सर पास के किसी पोखर से या कहीं और से बारिश के इस मौसम में बहकर आई मछलियों को ढलान से ऊपर पानी के विपरीत स्थिति में जाते देखने का सुख पापा के साथ ही था।


उन दिनों धान के खेत वैसे भी पोखरे और ईश्वर की कृपा से सिल्वरकार्प या नैनी और गरई मछलियों की शरण स्थली हो जाया करते थे। मैं आजतक बारिश के सीजन में कभी 20 मिनट से अधिक नहीं भींगा होऊँगा, अलबत्ता मेरा छोटा भाई पापा के साथ खूब भींगा है। मुझे कंपकंपी हो जाती। पर यह मेरी पसंद का मौसम रहा। मुझे आज तक यह नहीं समझ आया कि पापा कौन-सी इच्छाशक्ति से इसी बारिश में दिन भर उघारे देह, लुंगी ठेहुन तक खोंटे हुए कभी तरकारी तोड़ते तो कभी एक जगह जम रहे पानी को फरुई या कुदाल से रास्ता देते। बारिश थोड़ी रुकती तो हम मियाँ टोली फरार हो लेते। हमारे मजे मियाँ टोली जाकर थी।


नूर दादा के घर से इस्माईल चाचा के घर तक के रास्ते के बीचो- बीच की डरेड़ थोड़ी गहरी थी तो पानी का बहाव तेजी से इस्माइल चाचा के घर तक आता था और फिर बँसवारी में पसर जाता। इसी धार में आरसी लगाकर डेरीं, सिधरी पकड़ने वाले मछरीमार शिकारियों में सही जगह आरसी रखने की होड़ लगी रहती कि कौन पहले जाकर अपनी आरसी सही ढाल पर रख दे। कुछ होशियार तो ऐसे होते। वे कई जगहों, खेतों, ढालों, जहाँ पानी की धार लगती है वहाँ बाँस के सहारे सूपा रख देते थे और छोटी मछलियाँ उछलकर सूप में अटक जाती। हमारे टोले के कुछ ठाड़ी चिक्का के छरहर खिलाड़ी घर से मसहरी लाकर अगल बगल के गड्ढों में पानी में उतरकर मछरी छानते। यह प्रक्रिया बेचने के लिए न होकर विशुद्ध खुद के लिए होती।
जोंको और चेरा समूहों के बीच केकड़ा, घोंघा पकड़ने वाले का दल भी सक्रिय रहता। उनका हथियार हड़िया या छोटी छइंटी होती, जिसमें वह घोंघा, केकड़ा छानते। केकड़े को बिलों से घोंककर निकालने की कला भी कुछ ही महारथियों को हासिल थी। इस कला का सबसे बड़ा माहिर अमर महतो था जो हमारे बगीचे के पुरुब ओर सड़क के किनारे का था। वह गर्मियों में माथे में गुलेल फँसाये जहाँ-तहाँ, बकुला, मैनी, महोखल जैसी चिड़िया मारते रहता और बंसी तो सालों भर उसके साथ रहती, जो हर मौसम में चँवरा में काम आती थी। मुझे आजतक समझ नहीं आया कि ऐसे अनगिनत चेहरे आसपास थे, उनके घर का खर्च कैसे चलता रहा होगा।


शिवपूजन पंडित के घर से पहले एक छोटी पुलिया थी, जिससे बारिश का पानी खेतों में न लगकर आगे दक्खिन ओर इंजीनियर के घरों की ओर निकल जाता था। उस बहाव में कुछ लड़के रस्सी से छाता लटका देते और उस रस्सी का एक सिरा अपने पैरों से दबा कर पुलिया पर बैठकर आराम से खैनी ठोंकते इधर-उधर की बतकही करते रहते। उन दिनों ऐसा दृश्य मैंने बंजारी मोड़ वाले पुल और कररिया वाले जीन बाबा के पास भी खूब देखा है, जब छाता मछरी मारने का एक साधन हो जाता था।
यह तब मेरे लिए कौतुक का विषय था। एक दफे छठु काका के बेटे हीरामन से मैंने यह ट्रिक जाननी चाही तो उसने ऐसा मुँह बनाया गोया बाघ ने बिल्ली से पेड़ पर चढ़ने का तरीका पूछ लिया हो। वह तिरंगा खाया करता था।

तिरंगा यानी तब का मशहूर गुटखा और इसी गुटखे पर भोजपुरी के एक चेथरु गायक गुड्डू रंगीला ने गीत भी गाया था – “खा लू तिरंगा, गोरिया हो फार के, जा झार के, बाकी अईहा ऐतवार के जा झार के”- खैर, हीरामन ने ज्ञान दिया – “सब केहू इहे करी? सीखल एतना आसान नईखे, जा बंसी से मछरी मार ल ओहुमे कारीगरी चाहीं। – उस वक़्त कसम से जी में आया हीरामन को उसी पुलिया से नीचे ढाह दूँ लेकिन मन मसोसकर उसको केवल ‘सार तू नाही, ढेर काबिल बनsताड़s कहकर बंसी के जुगाड़ में चला गया था। पुरुब टोला के उस रास्ते के दोनों ओर खाल था सो पानी दोनों ओर लगता था और उसमें गरई, नैनी, ग्लास्काट(ग्लासकोर्प, सिल्वरकार्प) मछरी खूब आती थी।


ग्लासकोर्प मत्स्य पालन वालों के हिस्से का होता, जिनके पोखरे बारिश में उफन जाते और उनकी मछरियों के तमाम बीज बारिश के पानी के साथ आगे तक खेतों में फैल जाते। पोखर वहीं रहता पर उसमें की संपत्ति पब्लिक हो जाती। धान के खेत से गरई पकड़ने में टभका शैली अपनायी जाती थी। बंसी में मजबूत कोइन और प्लास्टिक वाली रस्सी के साथ थोड़ा बड़ा कांटा चाहिए होता था। बंसी में चेरा फंसा कर धान की जड़ो के आसपास कोइन को टपका खेलाया जाता था। मुझे चेरा पकड़ने में घिन्न आती थी, तो किसी न किसी को कहकर चेरा लगाने को कहता और उससे गरई मछरी मारने का तरीका सीख गया था, जिसमें कभी कभी नैनी भी फँसती थी। हालांकि मछरी मेरा फेवरेट कभी न रही और मछरी मारकर घर ले जाने पर पिटने का खतरा अलग से था। सो मछरी मारना ही मेरा प्रिय शौक रहा। मुझे मछरी मरते हुए ऐसा लगता गोया टॉम एंड जेरी चल रहा हो।
आरसी बाँस या सरका की पतली सींकों से बीनकर बनाई जाती थी और आरसी बनाने में पापा उस्ताद थे। मैं सोचता था पापा ने यह सब कहाँ से सीखा होगा? पापा हमेशा आश्चर्य में डाल देते। एक दफे तो उन्होंने पूरा ताजिया बना डाला था और फिर अगले बार भी बनाया। इस पर फिर कभी।


सो, अब मैं पुरुब टोला के लड़कों के साथ टभका मछरी मारना सीख गया था। बंसी लाने और उसमें चेरा फंसाने के लिए एक चेला फिट था। सब ठीक था। उस रोज भी मैं सड़क के किनारे टेकर मियाँ के खेत के ओर बंसी डाले अपने असिसटेंट को डीलिंग देते मछरी के शिकार में डूबा था कि अचानक मेरा सहायक ‘बाबाsssss’ चिल्लाते भाग गया मैं भी उस पर चिल्लाने ही वाला था तभी मेरे पीठ की ओर एक धमाका हुआ, मैं सीधे मुँह कमर भर मटियल पानी में था। आँखों से पानी काछ कर देखा पापा लुंगी लपेटे दोनों कमर पर हाथ रखे, दाँत पीसते कह रहे थे – मछरी मरवा भईल बाड़s चलs तहार मछरी निकालsतानी…। तिरंगा मार्का हीरामन के बाबूजी मेरे यहाँ ही काम करते थे, पापा जी का मंतर सुनते घर की ओर निकला तो देखा हीरामन भी फरार था। उसका छाता पुलिया से नीचे कहीं धान में अटका हुआ था। और मै पापा के आगे चलता सोच रहा था, जवन जिंदा होइहs सन उ मछरिया भाग गइल होइहs सन।


अब भी खूब बारिश है इधर गाँव के गड्ढे भर गए हैं। लोगों ने सऊदी अरब और अन्य माध्यमों से कमाई करके जहाँ-तहां घर खड़े कर लिए हैं सो अब पानी जहाँ – तहां समाता है। बच्चे घरों में कैद किये जाते हैं कि बरसात में काई होगा फिसल जाओगे, चोट लगेगी, कपड़े गंदे होंगे, बीमार पड़ोगे। अब भी बारिश होती है, पानी लगता है, संकट की स्थिति है अखबार ऐसा लिखते हैं, उसमें हमारी या जनप्रतिनिधियों की भूमिका तय नहीं की जाती। सब बीमार जो हैं, बारिश हमारे गाँव में अब समस्या है शायद। लड़के पुलिया पर नहीं जमते। आरसी बनाने वाले कम हो गए या खत्म हो गए। शायद छोटकी मछरी, डेरा, बघवा, सिधरी मछरियों का चोखा और मकई की मोटी रोटी का सोन्ह स्वाद भूल गए हैं सब। जीवन का सोंधापन गंदले पानी की भेंट चढ़ गया है। पापा की बारिश भी अब घर के भीतर ही कटती है।

हम ब्राह्मणों के घर पैदा हुए। पर दसवीं से आगे न पढ़े मेरे पापा ने कभी पंडिताई न डाली हम पर। मियाँ टोली के लिए हमेशा मुस्कुराकर कहते हैं कि “हमनी के पटीदार हवन सन।” सावन, भादों का, बारिश का, आरसी का, बंसी का, मछरियों का, चँवरा, गड़हा का चाहे जो हो पर इस मौसम के हीरो हैं – हमारे पापा। लिट्टी-मटन के उस्ताद बनवनिहार।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं और भाषा के मर्मज्ञ हैं। इनका गांव बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित भितभेरवाँ है।)

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