ग्राम आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हुए… लेकिन टूटी है सामाजिक एकजुटता

प्यारे मोहन त्रिपाठी
मेरा गांव उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के मनियाहू तहसील में हरद्वारी है। ये तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ है। मेरी उम्र अभी लगभग 84 साल है लेकिन गांव में सड़क नहीं है। जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो गांव खेती किसानी दृष्टि से खुशहाल था। खेती-बाड़ी ही मुख्य पेशा था। सिंचाई के साधन कम ही थे। इसलिए कभी एक फसल तो कभी दो फसल हो जाया करता था। लेकिन बावजूद इसके स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति गांव में काफी चेतना थी। 1920 में हमारे चचेरे भाई रमेश चंद्र शर्मा ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। तीन कार्यकाल तक विधायक रहे। पढ़े लिखे कम ही थे लेकिन थे बहुत ईमानदार। सवारी-शिकारी की व्यवस्था के फेरे में कम ही रहते, पैदल बहुत चलते थे। घोड़ा वाला तांगा मिल जाये तो बैठ जाते। बाहर के गांव में काम कराया लेकिन अपने गांव के लिए कुछ खास नहीं किया। आदमी अच्छे थे। सड़क, ट्यूबवेल गांव में आ जाये इस दिशा में काम नहीं किया।


यदि गांव के सामाजिक बनावट—बुनावट की बात करूं तो हमारा गांव ब्राह्मणों की बस्ती कही जाएगी। तेली,बनिया,बढ़ई,बीन, गडरिया सब हैं। एक टोले पर कुर्मी बसे हुए हैं तो दो टोला अनुसूचित जातियों का भी है। ब्राह्मण पढ़ाई—लिखाई में आगे थे तो कुर्मी खेती—बाड़ी में। गांव में सिर्फ प्राईमरी स्कूल था लेकिन बावजूद इसके उस जमाने में भी कई लोगों ने एम किया। उल्लेखनीय रूप से तीन नाम यहां लेना समीचिन होगा। श्री देव तिवारी ने ईलाहाबाद से अर्थशास्त्र में एम किया। कैलाश नाथ त्रिपाठी कानपुर से एमएससी एग्रीकल्चर में डिग्री ली। तीसरा मैं, ईलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन में एम किया। आयु सीमित थी। यूपी पीएससी से बीडीओ की परीक्षा पास की। किसी तरह हमारे मां बाप ने गरीबी में भी किफायत करके पढ़ाया था। इकलौता बेटा कमाने लगा। 1962 से 1966 के बीच मिर्जापुर के कोण ब्लॉक का बीडीओ रहा। उस समय गांव सही मायने में गांव थे। समरिया में कालीन का धंधा होता था। ईहीलेने कंपनी, औबीटी कंपनी आदी विदेशी कंपनी थीं। कई स्तर के काम होते थे। कच्चा माल कंपनी देती थी। सब कांट्रेक्टर के पास लूम था, सबसे नीचे बुनकर होता था। बच्चों से बिनवा के काम देते थे। उस समय बीडीएन शाही ने काम की मजदूरी की स्थिती में सुधार करवाया। इसके कारण अर्थव्यवस्था बेहतर थी। वे 5 साल रहे। बहुत अच्छा काम हुआ। पूरी ईमानदारी से काम किया। इसी बीच खबर आई की जयप्रकाश जी अवार्ड के काम में लेना चाहते हैं। दिसंबर 67 या मार्च 68 में सरकार ने मुझे भेज दिया।
जयप्रकाश नारायण के साथ
अप्रैल 1968 में जेपी ने बिहार बुलाया। हजारी बाग के चतरा सबडिविजन के प्रताप पुर प्रखंड गया। यहां बिहार में विनोबा भावे के भूदान अभियान के तहत देश का प्रथम प्रखंड दान हुाअ। चार मंझोले बांध, छोटे—छोटे मिट्टी के बांध बनाये गये। आहर का काम हुआ। इस दौरान फूड फॉर वर्क—मजदूरी के बदले अनाज। इसके तहत दो तिहाई गेंहूं एक तिहाई नकद दिये जाने की व्यवस्था की गई। वहां खेती में काम के बजाय सामुदायिक उत्पादक संपत्ति के सृजन का काम हुआ।
एक मार्च 1970 को जयप्रकाश नारायण वहां आये। उनके साथ पुलिस अधिकारी ने कहा कि अच्छा काम हुआ है। हालाकि जेपी ने कहा कि आप समय—समय यहां के काम के विषय में मुझे बताते रहिए। आप बताते नहीं है। इसी बीच 31 मई या एक जून के आसपास मुजफ्फर पुर के मुसहरी प्रखंड में नक्सली हिंसा हुआ। नक्सलियों ने 8—10 लोगों को मारा। इसी दौरान उन्होंने जिला सर्वोदय मंडल के मंत्री को नोटिस दिया और कहा गया कि आप क्रांति के रास्ते में रोड़ा न बने। जेपी उत्तराखंड में विश्राम के लिए गये थे। उन्हें जब सूचना मिली तो वे मुसहरी आया। उन्होंने गांव वालों से बात की। पीड़ितों से भी उनकी बात हुई। जेपी ने एलान किया या तो मुसहरी प्रखंड से नक्सली हिंसा खत्म होगी या हड्डी गलेगी। 1970—71 के मध्य तक जेपी ने वहां केंद्रित किया। लोगों को समझाया की हिंसा से हानी है। भूदान के जमीन का वितरण कराया, कब्जा कराया। विस्थापितों के पुर्नवास के लिए काम किए। ग्रामदानी गांव बनाए गये।

जेपी द्वारा स्थापित संस्था अवार्ड के अध्यक्ष प्यारे मोहन त्रिपाठी


बिहार ग्रामदान एक्ट के तहत ग्रामदानी गांव वो गांव हुए जहां गांव के 75 फीसदी लोग शामिल हो जाए तो ग्रामदानी गांव कहलाता था। वहां दान पात्र भराया जाता था। मुसहरी प्रखंड के ज्यादातार गांव ग्रामदानी गांव बन गए। इसके तहत ये प्रावधान भी था कि दानदाता को पत्र दिखाया जाये। उसकी स्वीकृति के बाद जिला भूदान अधिकारी इसके कानूनी रूप से मान्यता देता था। इसके तहत लोकशिक्षण का काम हुआ, शोषण—उत्पीड़न न हो, मजदूरी बढ़े। इसके तहत हरिजन बस्ती में पीने की पानी और सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी। किसी के पास 10 कट्ठा खेत है तो उनकी मांग होती थी ट्यूबवेल दे दीजिए। वहां 1970 में काम शुरू हुआ और 1971 में हमारी जरूरत महसूस हुई। 1971 से 79 के बीच मैं मुसहरी प्रखंड में रहा। 1974 में जेपी आंदोलन में लग गए। कठिन परिस्थितियों के कारण व शारीरिक रूप से अस्वस्थता के बीच भी वे बीच—बीच में आते रहे। जनवरी 1974 के अंतिम सप्ताह में एक सप्ताह के लिए मुसहरी में आए। इस बीच वे समय—समय पर बुलाकर मार्गदर्शन देते रहे। 1978 में जब कर्पूरी ठाकुर की सरकार बनी तो जेपी ने सलाह दिया कि जिन नक्सलियों के खिलाफ साधारण आरोप हैं उन्हें छोड़ दें।

नकसल मूवमेंट और ग्राम विकास के प्रयोग

इसके तहत मुसहेरी के 33 नक्सली भी छूटे। थोड़ा भय का माहौल फिर से बना। इस बाबत जब जेपी से बात की तो उन्होंने सुझाव दिया आपलोग इनसे बात करें। हमने इनसे बात की। उनका मानना था कि हमने जो मुसहरी में काम किया उससे गरीबों को काफी फायदा हुआ। आखिर में उनलोगों ने कहा कि हमें पुर्नवास चाहिए। इस दिशा में काम शुरू हुआ। डॉ अनिरूद्ध प्रसाद ने प्रश्नावली बनाई। बैंक से ऋृण दिलाने का प्रयास हुआ। रामचंद्र पासवान जो 16 वर्ष के उम्र में जेल चले गए थे, 25 वर्ष की उम्र में जेल से रिहा हुए। यानी वे 9 वर्ष जेल में रहे। झोपड़ी नहीं रही। मां—बाप नहीं रहे। उनकी इच्छा थी कि उन्हें बोझ ढ़ोने का रिक्शा बनवा दिया जाए। 2500 रूपये की कार्यकारी पूंजी भी दी गई। वे नरौली बाजार से एक रिक्शा सब्जी खरीदकर मजफ्फर पुर में बेचते थे। उन्होंने झोपड़ी बनवाने की बात कही तो अंचलाधिकारी ने झोपड़ी बनवा दिया। इसी तरह रामप्रीत राम मुसहरी ब्लॉक के सामने गुमटी लगाई। वे वहां जूते बनाते थे, मरम्मती आदी करते थे। इस तरह से उनका पुर्नवास भी किया गया। कुल मिला के 33 में 36 लोगों का पुर्नवास किया गया।
1980 में इंदिरा गांधी आईं। काम में व्यवधान पैदा हुआ। अवार्ड जैसी संस्था के काम में व्यवधान पैदा हुआ। इसलिए 26 के पुर्नवास के बाद छोड़ दिया गया। जेपी ने सर्वोदय मंडल बनाया था। मुजफ्फर पुर विकास मंडल नाम की संस्था जेपी ने बनाई। सभी संस्था जो काम कर रही थीं, उनके समन्वय के बाद ही 23 ग्राम सभाओं को कानूनी मान्यता मिली थी। अब वहां नक्सली नहीं हे रही है। हमारे काम का सबसे उल्लेखनीय योगदान यही रहा कि नक्सली हिंसा ग्रस्त क्षेत्र में शांति बहाल कराने में सफल हुए। पशुपालन का काम हुआ, खेती का काम हुआ। छोटे—छोटे उद्योग बढ़ाने क का काम हुआ। जिसके तहत महिला दर्जी को प्रशिक्षण देकर, मशीन दिलवाकर काम शुरू कराया गया। मोची प्रशिक्षण का काम भी शुरू कराया गया। इस तरह देखें तो इस दौरान का अनुभव काफी सुखद रहा। लेकिन यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि आज विशेष किस्म के भूमंडलीकरण के दौर में अब वो गांव तो नहीं रहे। ग्रामदानी ग्रामसभायें अब उस रूप में काम नहीं कर रही हैं।


वर्तमान गांव की परिस्थिती
यदि मैं अपने गांव की ओर चलूं तो आज हमारे गांव में शिक्षा के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा है। आईएएस, पीसीएस सब हैं। जो कम पढ़े लिखे लोग थे वे अहमदाबाद, सूरत, के कपड़ा मिलों में काम करने लगे। इसके अलावा भी बहुत तरह के काम धंधे गांव या उसके आस पास उपलब्ध हैं। किसी ने छोटी दुकान खोल ली। पढ़े लिखे लोग अध्यापक बन गए। स्थानीय स्तर पर शिक्षण का काम करने लगे। इस लिहाज से देखें तो पहले से आर्थिक दृष्टि से लोग सुखी हुए हैं लेकिन सामाजिक दृष्टि से एकजुटता टूटी है। हालाकि समय—समय पर होने वाले सामाजिक आयोजनों व कामों में एकजुटता दिखती है बावजूद इसके अब मेल मिलाप कम हुआ है। पहले किसी भी विवाह—शादी या आयोजनों में गांवो में ही सारी चीजें उपलब्ध हो जाती थी। जिसके जिम्मे जो काम या पेशा है वो आयोजनों में बढ़ चढ़कर भागीदारी करता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब गांव में सामुदायिक भावना कमजोर हुआ है।
आज का जो नवउदारवादी मॉडल है वह सामाजिक दृष्टि से अन्यायपूर्ण, आर्थिक दृष्टि से अकुशल, पर्यावरण की दृष्टि से विनाशकारी, राजनीतिक दृष्टि से अस्थिरता पैदा करने वाला, रोजगार विहीन यानी पूंजी बहुत लगता है और उसकी कम रोजगार पैदा करने वाला व न उपनिवेशवाद को बढ़ावा देने वाला मॉडल अपनाया है। जिससे व्यवस्थायें कमजोर हो रही हैं।
गांधी की 150 वीं जयंती
हालांकि हमने अवार्ड के जरिए गांधी की 150 वीं जयंती के मौके पर 18 सूत्री रचनात्मक काम अपने लिए निर्धारित किया है। क्योंकि अभी भी गांधी ही एकमात्र रास्ता है। हमें बुद्धियुक्त ढंग से गांधी को समझने की जरूरत है। गांधी नित्य नूतन की बात करते थे। वे प्रौद्वोगिकी के इस्तेमाल के खिलाफ नहीं थे बल्कि प्रौद्योगिकी की मर्यादा क्या होगी इसको लेकर सचेत थे। धीरेंद्र मजूमदार ने गांधी के प्रौद्योगिकी संबंधी विचारों को इस रूप में सामने रखा है:— हर हांथ को काम, हर शरीर को आराम। हमें हर मन को आराम देने वाली प्रौद्योगिकी अपनानी होगी।
स्मृति शेष


वरिष्ठ गांधीवादी एवं जेपी (जय प्रकाश नारायण) के अनन्य सहयोगी रहे पी एम त्रिपाठी (प्यारे मोहन त्रिपाठी) नहीं रहे। गत 13 सितंबर को हृदयाघात से उनका निधन हो गया।
पी एम त्रिपाठी, जेपी की बनाई ग्रामीण विकास को समर्पित प्रमुख संस्था अवार्ड (AVARD) के लंबे समय से अध्यक्ष थे। वे अनेक वर्षों तक अवार्ड के महासचिव भी रहे। केंद्रीय गांधी स्मारक निधि,आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट,राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, गांधी शांति प्रतिष्ठान, सन्निधि जैसी राष्ट्रीय महत्व की अनेक संस्थाओं से सम्बद्ध रहे। लगभग एक साल पहले तक सामाजिक जीवन में वे पूरी तरह से सक्रिय थे।
उल्लेखनीय है कि पी एम त्रिपाठी एक जमाने में उत्तर प्रदेश सरकार की सेवा में बीडीओ (खंड विकास अधिकारी) के पद पर आसीन थे। जेपी आंदोलन के दौरान ये जेपी के निकट संपर्क में आये और उनके आह्वान पर सरकारी सेवा से त्याग-पत्र देकर सामाजिक कार्यों में जुट गए। अनेक वर्षों तक मुजफ्फरपुर (बिहार) में रहकर भी कार्य किया।
पी एम त्रिपाठी समस्त गांधीवादी संस्थाओं के लिए अभिभावक तुल्य थे। गांधी 150, देश के 150 गांव की कहानियों के कारवां के लिए यह आलेख उनसे हुई बातचीत पर आधारित है।

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