घना कोहरा,हाड़-कंपाती ठंढ़..सर्द रात में ठिठुरती दिल्ली.. पि​कनिक स्पॉट बना हुआ है ​किसान आंदोलन

मंगरूआ

नयी दिल्ली: दिसंबर जनवरी की हाड़-कंपाती ठंढ़ के बीच किसान आंदोलन से सजे दिल्ली के सभी बोर्डर चाहे सिंघु बोर्डर हो,टिकरी बोर्डर हो, गाजीपुर बोर्डर हो या चिल्ला बोर्डर गुजरते वर्ष और नये साल के आगमन के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए दिल्ली वालों के लिए नया पर्यटन स्थल बन कर उभरा है। माहौल वही है जो अन्ना आंदोलन के समय था। लोग गाहे-बेगाहे जंतर-मंतर,और रामलीला मैदान पहुंच जाया करते थे। कुछ यही आलम किसान आंदोलन के दौरान भी है। हो भी क्यों न। साल के अंत और नये साल के आगमन की खुशी और उसपर आगे भी दो दिन शनिवार और रविवार को छुट्टी। ऐसे में दिल्ली वाले तफरी के वास्ते कहें या देशी सैलानी के वेष में बड़ी संख्या में किसान आंदोलन में पहुंच रहे हैं। और पहुंचने की योजना बना रहे हैं। इनमें में बहुत सारे के लिए ये नया है, बहुतों का जड़ गांव से जुड़ा हुआ है तो बहुतों ने दिल्ली के बहुमंजली ईमारतों में अपना आशियां सजाया हुआ है।

मॉल और मार्ट में घूमने वाली दिल्ली और गमले की खूबसूरती को खेती समझने वाली भीड़ का किसानों से नाता बस इतना ही है कि उन्हें टीवी,सोशल मीडिया और अखबारों के जरिए ही पता चलता रहा है कि दिल्ली के सभी बोर्डर पर किसान बैठे हुए हैं। वे सरकार के कुछ मांग रहे हैं। जिसे सरकार पूरा नहीं कर रही है। और यदि सरकार पूरा नहीं करती है तो किसानों को डर है कि इससे उनकी खेती-किसानी बर्बाद हो जाएगी। उनका खेत अंबानी और अडानी के कब्जे में चला जाएगा, और इसे हर हाल में बचाना है।


क्या है कृषि कानून, किन कृषि कानूनों को लागू करने के विरोध में हमारा अन्नदाता आंदोलन कर रहा है, इसका क्या नुकसान होगा,क्या फायदा होगा इन बातों की जानकारी न तो लगभग 37 दिनों से धरणा स्थल पर जमे अधिकांश प्रदर्शनकारियों को है न ही दिल्ली के इन सैलानियों को जो गुजरे वर्ष के जाने और नये वर्ष के आगमन व सप्ताहांत ​गुजारने के मकसद से इन धरणा स्थलों पर पहुंच रहे हैं। इन शहरी बासिंदों के लिए ये विलेज पर्यटन जैसा है जहां जाने पर न तो कोरोना के पाबंदियों का सामना करना पड़ेगा और तो और लोग किसानों के पक्ष में खड़ा भी समझेंगे। यही कारण है कि बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं इस मौके पर आंदोलन स्थल पर देखे जा रहे हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में एनजीओ से जुड़े लोग भी इस आंदोलन में पहुंच रहे हैं जिनका खेती किसानी और किसानों से कोई लेना देना नहीं है। वहां डपली भी बज रही है और थपड़ी भी। कुछ उसी तरह का नजारा है जैसा जनलोकपाल आंदोलन में था।
हालांकि इस भीड़ में कुछ संजीदा लोग भी पहुंच रहे हैं। इनमें से कुछ लेखक भी हैं और पत्रकार भी।


पत्रकार रंजन सिंह ने लिखा है कि
दिल्ली के ठिठुरन भरे जाड़े मे पारा १.१ डिग्री पर जा पहुँचा है और हमारे अन्नदाता फिर भी डटे हुए हैं क्योंकि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनकी माँगे सौ फ़ीसदी जायज़ हैं। न्याय के लिए लडा गया युद्ध धर्म युद्ध कहलाता है ऐसे में सिंघू से लेकर गाजिपुर तक का इलाक़ा धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे बन गया है! आज साल के पहले दिन मेरे किसान संस्कारों ने मुझे इन किसानों के साथ कर दिया। मुझे लगा कि हम जैसे लोग इनके समर्थन में आगे नहीं आएँगे तो हम उनके खेतों का क़र्ज़ कैसे उतार पाएँगे! और इसमें मेरा साथ मेरी पत्नी ने भी दिया। हम दोनों आज गाजिपुर सीमा पर किसानों के साथ रहे! यहाँ मेरठ, बरेली, श्यामली, ग़ाज़ियाबाद, मुरादाबाद, जाने कहाँ कहाँ के किसान महीने भर से बैठे हैं और अपने घरों में टीवी समाचार देखकर हमें यही लगता है कि महज़ पंजाब के कुछ बहके हुए लोग यह उपद्रव कर रहे हैं। महिलाओं की संख्या भी वहाँ कम नहीं थी! सब कीर्तन- भजन करते हुए मटर के दाने छील रही थीं! मेरी पत्नी ने भी इस कारसेवा में उनका साथ दिया! मैंने अपनी ज़िन्दगी में न जानें कितने आंदोलन देखे हैं। बहुत आंदोलन किए भी हैं। पर मैं शपथ पूर्वक कह सकता हूँ कि इतना व्यवस्थित और शांत प्रदर्शन मैंने दूसरा नहीं देखा! महात्मा गांधी के सत्याग्रह में जो और जितना बल रहा होगा, उससे कम यह नहीं है। ये किसान स्वयं को तकलीफ़ देते हुए सत्य के प्रति आग्रह करते बैठे हैं। वे किसी और को क्या तकलीफ़ देंगे भला! ईश्वर सरकार और उसके हुक्मरान को सुबुद्धि दें!


वहीं लेखक शिवमूर्ति लिखते हैं कि
वर्ष 2021 का पहला दिन सिंघू बार्डर पर आन्दोलनरत किसानों के बीच गुजरा।
मुझे भी किसानों के प्रति लेखकीय दायित्व को प्रस्तुत करने व शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर मिला। वे लिखते हैं कि ये अनुभव अविस्मरणीय रहा और वे कल टिकरी व ग़ाज़ीपुर बार्डर पहुंचेगे।
खैर आंदोलन है किसान अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। सरकार बातचीत कर रही है। कुछ मुद्दों पर सहमती बनी है और उम्मीद की जा रही है कि 4 जनवरी को केंद्रीय मंत्री के साथ किसान संगठनों की होने वाली बातचीत में किसानों से जुड़े मुद्दे पर सहमती बने। इस बीच दिल्ली की ठंढ़ में बोर्डर पर जुटे किसानों के लिए अलाव ही सहारा है और ट्रैक्टर ट्राली ही छत बनी हुई है। लेकिन दिल्ली की सर्द रात सिर्फ किसानों पर ही भारी नहीं है। ये रात भारी है उन पुलिस कर्मियों और अद्र्धसैनिक बलों पर भी जिसमें बीएसएफ, सीआईएसएफ और आरएएफ आदि शामिल हैं जो कपकंपाती ठंड और सर्द रात के बीच किसानों के साथ जुटे हुए हैं, उनके पास ठंड से बचने के लिए न तो अलाव है और न ही वॉटरप्रूफ टेंट। वे रात में भी बैरिकेड्स के पीछे और तय स्थानों पर खड़े रहते हैं।
इस बीच 4 जनवरी को सरकार के साथ होने वाली बैठक के साथ किसान संगठनों की बैठक हुई। इस बैठक के विषय में सिंघु बॉर्डर पर किसानों की बैठक से पहले भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा ​की, ‘4 जनवरी को होने वाली बैठक में कानूनों की वापसी और एमएसपी पर कानून बनाने पर चर्चा होगी। आज सभी लोग विधिवत रूप से इस पर चर्चा करेंगे कि पहले हुई बैठक में क्या हुआ और अगली बैठक में क्या होगा। वहीं स्वराज इंडिया से जुड़े योगेंद्र यादव ने किसानों की बैठक के बाद कहा कि किसानों के ये आंदोलन अब निर्णायक दौर में है, 30 तारीख की वार्ता के बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि अभी तो पूंछ निकली है, हाथी निकलना अभी बाकी है। एमएसपी को क़ानूनी अधिकार मिलने और तीनों कृषि क़ानूनों को खारिज करने पर सरकार टस से मस नहीं हुई है।
योगेंद्र ने कहा कि 4 तारीख (4जनवरी) को हमारी वार्ता है, अगर परिणाम संतोषजनक नहीं निकलते हैं तो 6 तारीख को KMP राजमार्ग पर मार्च किया जाएगा। 6 तारीख से 20 तारीख तक 2 हफ्ते पूरे देश में देश जागृति अभियान चलाया जाएगा।

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