जिंदगी में घुला है मेरा गांव

डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर, आजतक

बरवां, यही नाम है मेरे गांव का। आर्थिक रूप से पिछड़े सिद्धार्थनगर जिले का छोटा सा गांव, लेकिन जितनी अमीरी हमने अपने गांव में देखी, उतनी कहीं और दिखाई नहीं पड़ी। बचपन में जब होश संभाला तो चारों तरफ रिश्ते ही रिश्ते बिखरे थे। गांव के चाचा-चाचियां, काका-काकियां, दादा-दादियां। पूरा गांव जैसे एक परिवार हो। गांव में 50 फीसदी मुस्लिम थे, लेकिन हमें हिंदू-मुस्लिम का फर्क समझाया नहीं गया था। हमारे झिन्ना चाचा थे, जो रात को गजब की कहानियां सुनाते थे। बारी काका को नौकर लिखने में हाथ कांप रहे हैं क्योंकि वो नौकर थे भी नहीं। बाबूजी हमेशा उन्हें बदरी भाई ही बुलाया। बारी दरअसल उनकी जाति थी, नाम तो बदरी ही था। सब लोग उन्हें बारी काका ही कहते थे। बारी काका का खाना हमारे घर में ही बनता था, लेकिन बारी काका हम लोगों की जिद पर अपने घर में गीला चावल और शानदार चोखा बनाते थे, उसकी याद करके अभी भी मुंह में पानी आ जाता है। खानदान में ऐसा कोई बच्चा नहीं, जिसे बारी काका ने अपने कंधे पर घुमाया ना हो।

गांव से मुश्किल से आधा किलोमीटर दूर घोंघी नदी बहती है। बीच में बांध है और इस पार हमारा गांव। पहले आधा गांव घोंघी नदी में ही नहाता था। बचपन में हम सब नदी नहाने का मौका ढूंढते रहते थे। घोंघी में ही तैराकी सीखी। बरसात के महीने में कई बार घोंघी उफनाती थी। लेकिन बांध की वजह से पानी इस पार नहीं आता था। होली में तो नियम था कि करीब करीब पूरा गांव घोंघी में ही नहाता था। होली के रंग घोंघी में ही छूटते थे। होली की बात चली तो कुछ चर्चा गांव की होली की भी कर ली जाए।
गांव में होली से पहले काली माई के थान के पास हर साल होलिका दहन होता था। हमारे गांव की सम्मति मइया (होलिका) पूरे इलाके में मशहूर होती थी। बड़े हम लोगों की पीठ ठोंकते थे और हम सब जुट जाते थे सम्मत मइया को सबसे बड़ी करने में। बच्चों की टोली हर घर से पांच गोइठा (बड़े साइज का उपला) मांगने जाती थी। हर घर के सामने जाकर बच्चे एक सुर में गाते थे-अपने भतारे के मउसी हो, पंचगोइठी द..। होली के पहले तो सभी गालियां ठिठोली बन जाती थीं। हर घर की महिला हंसते हंसते पंचगोइठी देती थी। पहले तो गोइठा का ही अम्बार लग जाता था। फिर किसी का छप्पर, किसी के भुसौले की टाटी, लाकर सम्मत मइया के हवाले कर दी जाती थी। बाग में पड़े लकड़ी के मोटे मोटे-बोटे भी डाल दिए जाते थे। बड़ों की टोली फगुआ गाती थी, गांव के बच्चे कबीरा के नारे लगाते थे.. सम्मति मइया को तरह तरह के विभूषणों से विभूषित किया जाता था।

होली के दिन सुबह नींद खुलती थी तो हंगामे के साथ। होलिका की राख गमछे में भरकर लड़के सुबह से ही ऊधम काटना शुरू कर देते थे। पहली होली राख के साथ। यानी शुरुआत जीवन के आखिरी सच के साथ। सबको एक दिन राख होना है, तो प्रेम का त्योहार इसी राख के साथ शुरू होता था। फिर कबीरा टोली इकट्ठा होती थी। कबीरा टोली में सबसे ज्यादा संख्या मुसलमानों की होती थी। मसाक भाई, असीन भाई, पुद्दन, शराफत, तकीन, अमीन, कोईल भाई, झिन्ना चाचा कबीरा के मास्टर थे। करीब 20 लोग गाने वाले और उनके पीछे गांव के नवयुवकों की टोली। टोली के नायक होते थे पतिराज भाई। पतिराज भाई जिंदगी में कभी पति नहीं बन पाए, शादी नहीं हुई। होली पर सिर्फ पतिराज भाई भांग पीकर मस्त हो जाते थे। ढकिया का पिछवाड़ा काटकर उनकी टोपी बनती थी। हाथ में एक डंडा होता था। जिसे शरीर के विभिन्न भागों में घुमाते हुए पतिराज भाई नाचते थे। इसी नाते उनका दूसरा नाम नाचन भी पड़ गया था।


कबीरा टोली के घर-घर घूमते घूमते दोपहर के दो बज जाते थे। फिर पूरा गांव जाता था घोंघी नदी में नहाने। गाय, बैल, भैंस, बकरी, सभी का नदी स्नान होता था। बाबूजी सुबह ही खली भिगवा देते थे। उस दिन खली लगाना अनिवार्य होता था। रंग भी उतर जाता था और त्वचा भी नम रहती थी। फिर लौटकर भोजन पानी। दूसरी पारी में रंग और अबीर की होली होती थी। शाम ढलने से पहले सब मेरे घर पर इकट्ठा होते थे। फगुआ होता था, फिर पंडित काका पत्रा निकालकर नए संवत्सर का फल बताते थे। सबको उत्सुकता ये जानने की होती थी कि इस साल बारिश होगी कि नहीं, होगी तो कैसे होगी। इस फलादेश के बाद फिर ठंडाई छनती थी, रात नौ-दस बजे तक ढोलक, मजीरे के ताल पर फगुआ चलता था। सुबह का फगुआ संभोग श्रृंगार रस में होता था, रात होती थी नंदलाल के होली वर्णन से।

पंडित काका हमारे गांव के प्रधान थे। जब तक जीवित रहे, कभी चुनाव नहीं हुआ। गांव में दशकों तक पुलिस नहीं आई। कभी चोरी नहीं हुई, कभी डाका नहीं पड़ा। एक बार एक दबंग थानेदार आया हमारे लोटन थाने में। बड़े आदमियों की मीटिंग बुलाई। उसने बाबूजी से कहा-बाबाजी! आपके गांव में कभी कोई चोरी-डकैती नहीं हुई। कहीं ऐसा तो नहीं है कि सारे चोर-डकैत आपके ही चेले हों। मीटिंग में बैठे तमाम लोगों ने थानेदार को घुड़ककर चुप करा दिया। बाबूजी बोले-किसी रात हमारे गांव आइए, पता चल जाएगा। तो एक रात थानेदार रात 11 बजे के आसपास गांव में पहुंचा। गांव वाले जानते होंगे कि रात 11 बजे गांव के लिए आधी रात से ज्यादा का वक्त हो जाता है। दरोगा बुलेट से अपने सिपाही के साथ पहुंचा। गरमी की खिली हुई चांदनी रात थी। मेरे दुआरे पर सलीता बिछा था। गांव के लोगों की तीन टोलियां अलग-अलग ताश खेलने में लगी थीं। तमाशबीन अलग से थे। दरअसल हमारा पुराना घर 10 एकड़ जमीन के बीच था। आगे-पीछे कोई निर्माण नहीं। तीन-चार एकड़ का तो दुआरा ही होगा। गरमी में लंबा चौड़ा सलीता बिछता था। गांव के तमाम लोग वहीं आकर सोते थे। ढिबरी की रोशनी में ताश चलता। जब चांदनी खिली रहती तो ढिबरी की भी जरूरत नहीं पड़ती। थानेदार ने जब ये रंग देखा तो बाबूजी से माफी मांगी।

गांव में पहले स्कूल नहीं था। बगल के गांव सैनुआ के स्कूल में पढ़ने जाते थे। स्कूल जाने की तैयारियां किसी रण पर जाने की तैयारियों से कम नहीं थीं। लकड़ी की काली पटरी को और भी काली करने के लिए खास उपाय होता था। ढिबरी छोटे ताक पर रख देते थे। रात भर काली राख ऊपर जमा हो जाती, उसे पानी में घोलकर पहले पटरी काली की जाती थी। इतने से काम नहीं बनता था। पटरी सूखने के बाद उसे मठारा जाता था। इसके लिए एक शीशी पटरी पर रगड़ी जाती थी। तब तक जब तक कि पटरी चमकने ना लगे। फिर दुद्धी वाली दवात में धागा डुबो कर पटरी पर इधर से उधर लगाकर छिट्टा मारकर लाइन तैयार की जाती थी। इन लाइनों के बीच में ही लिखना होता था। फिर स्कूल की तरफ चल देते थे। ममेरे, फुफेरे मिलाकर छह भाई बहन स्कूल जाते थे। साथ में बारी काका बोरा और टाट पट्टी बांधकर चलते थे।

स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में घूरे काका घास काटते करीब करीब रोज मिलते थे। वे हम लोगों से कहवाते थे, बोलो बेटा-माता एक पिता दस बारह..। मौसी एक मौसा अट्ठारह..। हम लोग कह देते थे, फिर वो ठहाके लगाते। एक बार यही जुमला घर में जोर जोर से दोहरा रहे थे हम लोग, इतने में मां आई, फिर पिटाई भी लगी। गांव के काका लोग मजाक में हम बच्चों से कहते-देखो मौसा मत कहना नहीं तो मैं कुएं में कूद जाऊंगा, फिर क्या था हम लोग मौसा मौसा कहते थे, वो दौड़ लगाते थे। सबका मनोरंजन होता था, गांव की काकियां, चाचियां और मां हम लोगों से कहती थीं कि मौसा नहीं फूफा कहो। हम फूफा कहते तो काका लोग डांटते-पिता को गाली पड़ती है बाबू, मत बोलो।

गांव में होली, दिवाली, दशहरा और मुहर्रम हिंदू-मुस्लिम साथ मिलकर मनाते थे। मुहर्रम आने के कई दिन पहले से ही ढोल ताशे बजने लगते थे और शुरू हो जाता था झर्रा। मूल रूप से इसमें करबले की कहानी होती थी। इसी कहानी को गीत के माध्यम से गाया जाता था। दर्जन भर लोग बिना माइक के गाते थे और सैकड़ों लोग दम साधे सुनते रहते थे। हसन-हुसैन भाइयों की कुर्बानी जैसे ही बयान होती थी, सबकी आंखों में आंसू आ जाते थे। झिन्ना चाचा झर्रा गाने के अगुवा थे। मुहर्रम मातम का त्योहार था, लेकिन बचपन में इसे नहीं जानते थे। हम लोगों के लिए तो मुहर्रम का मेला सबसे बड़ा उत्सव होता था। गांव में ही मुहर्रम का मेला लगता था। पुरखों ने गांव के ही मंतू चाचा के परिवार को जमीन दे रखी थी। उसकी एवज में उनका परिवार हमारे घर के नाम से भी एक ताजिया बनाता था। हालांकि सबसे बड़ा ताजिया गांव के लड्डन पहुना बनाते थे। जाति के पंवरिया थे, गाकर, सारंगी बजाकर भीख भी मांगते थे, लेकिन ताजिया हर साल शानदार बनाते थे।

बादशाह के आल्हा की चर्चा के बगैर तो मेरा गांव पूरा ही नहीं होगा। बादशाह नौजवानी के दिनों में बहुत अच्छा गाता था। शिव-पार्वती विवाह हो या कोई मंगल गान। बादशाह सारंगी पर तान छेड़ता तो लोगों के पांव ठिठक जाते। इसके बाद बादशाह अल्हइत हो गया यानी आल्हा गाने लगा। पूरी आल्हा उसे जुबानी याद थी। आल्हा की पूरी टीम थी उसके पास। छोट्टे भाई, मोटकू चौकीदार, फेंकू काका, झाबर काका, असीन भाई..। ढोल या नगाड़े पर रहते थे अमीन मास्टर। बादशाह अगुवा रहता था और बाकी सब पछुवा। मंगलाचरण के बाद.. एक ओर बैठें दाढ़ी वाले, एक ओर बिना मूंछ के ज्वान (जवान) से होते हुए आल्हा युद्ध कथा तक पहुंचता तो बादशाह जोश में आ जाता, ऐसा लगता था जैसे सामने वाले को अभी पटककर मार देगा। भृकुटी तन जाती थी। मुट्ठियां बंध जाती थीं, आवाज अपने आप ऊंची हो जाती थी। बादशाह का आल्हा हर हफ्ते होता था। मेरे घर पर होता और पूरा गांव जुटकर सुनता था। बादशाह गांव में ही नहीं, आसपास के गांव में भी आल्हा गाने जाता था। वो आल्हा गाने का पैसा नहीं लेता था। इसी बात का तो बादशाह था।

बादशाह का असली नाम हनीफ मुहम्मद था। लेकिन बादशाह नाम उसे मेरी मां ने दिया था। मां बताती है कि बादशाह गरीब जरूर था, लेकिन बहुत स्वाभिमानी था। बादशाह ने कभी किसी से कुछ मांगा नहीं, रहन सहन भी उसका औरों से अलग था। लकदक सफेद कपड़ा पहनता था, दाढ़ी उसने कभी मुंड़वाई नहीं। उसके पूर्वज भले ही गाकर मांगते खाते थे, लेकिन बादशाह शौक के लिए गाता था। मेरे बाबा बादशाह को बहुत मानते थे, कहीं बाहर जाते तो बादशाह को साथ जरूर ले जाते। हमारे सारे रिश्तेदारों, नातेदारों के घर बादशाह यूं ही चला जाता था, जब तक जी करता, वहां रहता। रिश्तेदारों के यहां उसका सत्कार घर के सदस्य की तरह ही होता था। बड़े बाबूजी (डॉ. विद्यानिवास मिश्र) के पास बनारस गया तो उन्होंने उसे 10 दिन रोक लिया। रोज उससे लोकगीत सुनते, आल्हा सुनते।

पहले बड़े आदमियों की हैसियत कार-बंगले और बैंक बैलेंस से नहीं होती थी। दरवाजे पर बैल कितने बंधे हैं, गाय-भैंसें कितनी हैं। घोड़े कितने हैं, इससे हैसियत तय होती थी। जिसके घर हाथी होता था, उसकी हैसियत के लिए बाकी पैमाने देखे भी नहीं जाते थे। विनम्रता से कहना चाहता हूं कि हमारे घर में ये सब कुछ था। इसके साथ ही बहुत अनुशासन में रखे गए हम लोग। हमें अपने से एक भी दिन के बड़े इंसान को उसका नाम लेकर पुकारने की इजाजत नहीं थी। गांव का हर बड़ा सदस्य, भइया, काका, चाचा ही होता था। मुंह से गाली भी नहीं निकाल सकते थे हम लोग। मेरे गांव की एकता बेमिसाल थी। एक हांक में पूरा गांव इकट्ठा हो जाता था। एक बार सूखा पड़ा तो गांव वालों ने मिलकर घोंघी नदी में बांध बना दिया था। बारिश के लिए भी बहुत उपाय हुए। बच्चों को काल कलौटी खिलवाया गया। गांव के दर्जन भर से ज्यादा बच्चे तन पर सिर्फ जांघिया पहनकर जमीन पर लेटते, उनके ऊपर बाल्टियों से पानी डाला जाता। बच्चे पानी और मिट्टी में सराबोर होकर गाते-काल कलौटी, उज्जर धोती, मेघा सारे पानी दे।

मेरे बचपन में रिश्तों से इतना समृद्ध गांव अब वैसा नहीं रह गया है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन बहुत कुछ बदल गया है। गांव के तमाम जवान पैसे कमाने के लिए दिल्ली-मुंबई-पंजाब जा पहुंचे हैं। होली के दिन धमाल मचाने वाले पतिराज नहीं रहे, आल्हा गाने वाला बादशाह भी चला गया तो झर्रा गाने वाले, बचपन में हमें कहानियां सुनाने वाले झिन्ना चाचा भी नहीं रहे। बारी काका, नंदा काका, घूरे काका समेत तमाम बड़े बुजुर्ग जिनकी गोद में हम लोग खेले, वो अब नहीं रहे। गांव में एकता की बात कौन कहे, मेरे ही घर में बंटवारा हो चुका है। दो चचेरे भाइयों ने अलग आशियाना कर लिया। दस एकड़ के अहाते में जो एक घर था, अब तीन हो गए हैं। गांव को एक सूत्र में जोड़े रहने वाले ना तो मेरे बाबूजी रहे और न ही पूरे गांव के बच्चों पर अपनी ममता लुटाने वाली मेरी मां। घोड़े, बैल और हाथी भी बीते जमाने की बात हो गई। ट्रैक्टर ने बैलों की, कार ने बैलगाड़ी की और बाइकों ने घोड़े की जगह ले ली। गांव में अब होली के त्योहारों का रंग भी फीका पड़ गया है। कुछ साल पहले कोई मौलवी गांव के मुसलमानों को समझा गया कि होली-दिवाली मनाना इस्लाम के खिलाफ है। तो अब हिंदुओं के किसी भी त्योहार पर मुस्लिमों का ज्यादा उत्साह नहीं दिखता। बरसों से मुहर्रम का मेला नहीं देखा, जाने कितना उत्साह होता होगा उसमें। हां, मुहर्रम में अभी भी हर साल मेरे घर का ताजिया बनता है। सारे ताजिए आज भी मेरे घर से ही उठते हैं। पहले चुनाव आने से पहले गांव वालों की बैठक मेरे दुआरे पर हो जाती थी। वहीं तय हो जाता था कि वोट किसे देना है। लेकिन तीन दशकों से गांव में राजनीति भी घुस आई। प्रधानी का चुनाव होने लगा तो उसका असर भी रिश्तों पर पड़ गया। राजनीति ने गांव के आपसी रिश्तों का बहुत नुकसान कर दिया।

जो घोंघी नदी साल भर सदानीरा रहती थी, उसे देखकर तरस आता है। ठहरा हुआ पानी। वो भी मटमैले रंग का। पहले तो इतना साफ पानी होता था कि इसे हम लोग चुल्लू में लेकर पी भी लेते थे। लेकिन अब पानी पीने तो दूर की बात, नहाने लायक भी नहीं रह गया है। जिस घोंघी को हम लोग तैरकर पार करते थे, उसे अब पैदल पार कर सकते हैं, नदी पर जगह जगह बांध बना दिए गए हैं, बाकी कसर प्रदूषण ने पूरी कर दी है। बाबूजी और मां के निधन के बाद संस्कारों के तहत घोंघी नदी में नहाना पड़ा। कहीं कमर भर से ज्यादा पानी नहीं था। बदबू ऊपर से।

बचपन में जैसा मेरा गांव था, वैसा नहीं रहा, लेकिन इसमें ज्यादा निराश होने की वजह नहीं है। वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है। गांव की महिलाएं अब घरों की छत पर जाकर दिल्ली-मुंबई में रह रहे अपने पति से मोबाइल पर बतियाती हैं। मोबाइल घर-घर पहुंच गया है। बचपन में सिर्फ पंडित काका का घर पक्का था। अब 90 फीसदी से ज्यादा पक्के घर हैं। पहले गांव में एकाध घर में रेडियो था, लेकिन अब रेडियो गायब हो गया है। लोग मोबाइल में गाना सुन रहे हैं। लड़के लड़कियों की सेटिंग मोबाइल पर हो जाती है। मिलने की जगह भी तय हो जाती है। कई घरों में रंगीन टीवी आ चुकी है। कई नौजवानों के पास मोटरसाइकिल है। बंधे के किनारे पेड़ लग गए हैं। बड़े पेड़ों वाला बाग हमारा कट चुका है, लेकिन कलमी आम लग गए हैं।

मनरेगा की कृपा से गांव थोड़ा सुंदर हो गया है। गांव के बाहर पोखरा बन गया है, गांव के लड़के नहाते हैं। महिलाएं कपड़े धोती हैं। गांव में अब प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल खुल चुका है। बच्चे दोपहर के खाने के चलते आते हैं, लेकिन इसी बहाने अक्षर ज्ञान तो हो जाता है। गांव से अभी भी रिश्ता जुड़ा हुआ है। बच्चों को साल में कई बार भेजता हूं, ताकि माटी की महक उनके व्यक्तित्व में बनी रहे। मेरा गांव चाहे जैसा रहा हो, चाहे जैसा हो, आज अगर मेरे भीतर और मेरे पास कुछ भी अच्छा है तो उसमें मेरी मिट्टी की बहुत बड़ी भूमिका है। गांव ही आखिरी पहचान है हमारी।

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