परायी बिटिया को सारा प्यार उड़ेल देना चाहते हैं ग्रामवासी

प्रतिमा कुमारी पासवान

मेरी जन्मस्थली और पैतृक गांव अंजनी पटना के धनरुआ प्रखंड के पतरघट पंचायत में है। यह गांव पटना मुख्यालय से 30 किलो मीटर की दूरी पर पटना गया लाइन पटना के दक्षिण पूर्व दिशा में बसा हुआ छोटा सा गांव है। यदि गांव के रकबे को देखें तो मात्र 300 एकड़ का सुंदर सा गांव जिसकी आबादी लगभग 700 है। यदि जातीगत आबादी की बात करें तो गांव में लगभग आधी आबादी भूमि​हार जाती की है और आधे में बाकी सभी समुदाय के लोग बसे हैं । गांव में शुरू से आपसी समरसता रही है। शुरू से कहने का तात्पर्य है ब्रिटिश हुकुमत के समय से ही। उसी समय से लोग शिक्षा के प्रति सचेष्ट रहे। ​परिणाम स्वरूप इस छोटे से गांव में बड़े—बड़े पदों पर लोग नौकरी करते रहे हैं। अंजनी में दो जज,डॉक्टर, रेलवे ड्राइवर,बैंकर एवं अन्य प्रशासनिक सेवाओं में लोग कार्यरत रहे है। भले ही गांव छोटा सा था लेकिन आजादी और उसकी बाद की पी​ढ़ी में नया उमंग और कुछ कर गुजरने का उर्जा, उत्साह था। बुजुर्ग बताते हैं कि जब आजादी मिली तो देश के अन्य गांव, कस्बों, शहरों की तरह इस गांव में भी इसबात पर जोर था कि अब देश हमारा है और मातृभूमि की सेवा में बढ़ चढ़कर भागीदारी करनी है और गांव को खूब आगे बढ़ाना है। इसी क्रम में लोगों ने बढ़ चढ़कर पढ़ाई लिखाई शुरू की। यहां तक न सिर्फ एक जाती में बल्कि सभी जातियों में शिक्षा के प्रति जागरूकता देखी गई। गांव शिक्षा के मामले में इतना ज्यादा सचेत था कि गांव से पंद्रह किलोमीटर दूर मिसनरी स्कूल में जा कर गरीब घरों के बच्चें भी पढ़ पा रहे थे।


घरेलू महिलाओं का रहा अहम योगदान
मेरे पिता जी कहा करते थे उस समय शिक्षा को आगे बढाने में विशेषकर अनुसूचित जाति समुदायों में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा क्योकि कम उम्र में विवाह होती थी। महिलाएं घर मे खाना बनाने से लेकर खेतों में परिवार के साथ मिलकर काम करती थी और अपने पतियों को पढ़ाई के लिए सहयोग करती थी। सुबह उठ कर या रात में हीं लिट्टी बनाकर रख देती थी जिससे बस्ते में लेकर सूर्य निकलने से पहले हाई स्कूल के लिए निकलते थे। सर्दी के दिनों में ओस से पांव कांपने लगते थे, तलवे में ठिठुरन होती थी। इस लिए उस समय के लोग पांव में एक एक मीटर के लंबे कपड़े बांध पन्द्रह किलोमीटर स्कूल जाया करते थे।
इसके अलावा गांव की एक महत्वपूर्ण विशेषता ये थी ​इस गांव में कथा की परंपरा रही थी। जिसकी भी शादी होकर आती महिलाओं को इस गांव के उन सभी परिवारो की कहानियों को सुनाया जाता था कि उन्होंने पढ़ाई कर कैसे अपना जीवन संवारा। आगे बढ़े, नौकरी पायी व शहर में बस गए। कथा—कहानियों का सिलसिला जब चलता तो जज साहब से लेकर गांव के पुलिसकर्मियों तक कथा का विस्तार होता। नयी नवेली बहुंए पूरे मनोयोग से इसे सुनतीं और अपने पति के सपने के साथ खुद को जोड़ते हुए अपनी पूरी निष्ठा के साथ दिन रात मेहनत मजदूरी में लग जाती थी। लेकिन इसका एक दूरगामी परिणाम यह हुआ कि ज्यादातर लोग शिक्षा के बाद शहरों में बस गए और गांव की वह समृद्ध परंपरा जिसने नवयुग का प्रारंभ किया वह धीरे धीरे खत्म होता चला गया। ग्रामवासी स्कूल के नजदीक होते चले गये अर्थात स्कूल से गांव की दूरी कम होती गई लेकिन शिक्षा प्राप्त करने और उसके जरिए अपने सपने को साकार करने की वह परंपरा लुप्त होती चली गई जिसने गांव को एक नई पहचान से जोड़ा था।


मुझे अपने गांव मे रहने का अवसर नहीं मिला। पिताजी एवं परिवार के आधे सदस्य रांची में नौकरी करने लगे। जैसा कि अमूमन होता आया है कि जो जहां नौकरी करने जाता है वहीं बसने की चेष्टा करता है और गंवई पहचान पीछे छूटती चली जाती है। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ। शहर ने नौकरी तो दी लेकिन समय के साथ गांव से ताल्लुकात कम हुआ। बावजूद इसके गांव कभी भी हमारे परिवार के सदस्यों के जेहन से अलग नहीं हुआ। ठीक वैसे ही जैसे जहाज के मातुल पर बैठा पक्षी चाहे कितना उड़ान भर ले लेकिन लौटता मातूल पर ही है। और यह गांव हमारा मातुल था और परिवार के नौकरी पेशा लोग उड़ान भरने वाले पक्षी की मानिंद। रांची में नौकरी करने के बावजूद परिवार के सदस्य समय—समय पर गांव जाते। उनके साथ मुझे भी बचपन मे दो बार गांव जाने का मौका मिला। संख्यात्मक दृष्टि से दो बार जाने का भले ही महत्व न हो लेकिन मेरे बाल मन में आज भी उस गांव यात्रा का अंश विद्यमान है। मुझे आज भी अपना घर याद है। मिट्टी का खूबसूरत घर। बड़े— बड़े खपरैल के मकान में चारों ओर फैले कमरे और बीच में बड़ा सा आंगन। उसके बाहर लंबा चौड़ा डेवढ़ी जहां जानवरों को लाइन से बांधा जाता था। मुख्य दरवाजे से दाहिनी ओर छोटा सा कुआं, जो कभी नहीं सूखता था। उसके बाहर दालान जहां पुरुष सोते थे, उसके बाद जानवर को खाने की जगह जिसे दूर बोलते थे थ। ठीक मेरे घर के बाद से मुसहरी शुरू होती है। यहां पर बड़ा सा खाली स्थान था जहां गांव की महिलाएं चौहट, झूमर आदि खेलती थीं।
अब जब मैं बड़ी हो गई हूं। पढ़—लिख गई हूं। नये सिरे से सांसारिक रिश्तों में बंध गई हूं बावजूद इसके आज भी जब गांव जाना होता है, तो वहां जाने पर अपने उस कोने को निहारती रहती हूं, जहां मेरा जन्म हुआ। उस मिट्टी को चूम कर आनंदित होती हूं जहां मेरी मां प्रसव पीड़ा को झेलते हुए मेरे जन्म के बाद मुस्कुराई थी, और टूटे हुए खपरैल छप्पर से छनकर आती चांद की तेज मीठी रौशनी को उस छोटे से बच्चे ने इस जमीन पर आते हीं निहारा था। घर के बड़े—बुजुर्ग कहते हैं कि जब मेरा जन्म हुआ तो चांदनी रात थी। और जब सुबह हुआ तो सूर्य की रोशनी की ओर देखकर मेरे दादाजी ने मेरा नाम प्रतिमा रखा। गांव में मेरा लालन—पालन कम ही हुआ है लेकिन आज भी जब गांव जाना होता है तो लोग मुझे मेरे नाम से पुकारते है। मेरा नाम अभी भी कोई घरों में याद रखे गए है। शायद यह मां के अच्छे कर्मों और सब के साथ बना कर रहने और उनके सुख—दुख में काम आने की प्रवृती का ही नतीजा है कि गांव के लोग आज भी मुझे बहुत लार—दुलार देते हैं। हालांकि मेरे भाई मुझसे बड़े थे और उनका अक्सर गांव में आना—जाना होता था लेकिन आज भी मुझे इस बात की खुशी होती है कि उनकी तुलना में लोग मुझे ज्यादा स्नेह देते है। शायद बिटिया को पराया धन मानने की गांव की परंपरा के वशीभूत गांव के लोग अपनी परायी बिटिया को सारा प्यार उड़ेल देना चाहते हों।


गांव में प्रवेश के के लिए दो मुख्य मार्ग है। एक उतरी एवं दक्षिणी मार्ग। अब दोनों तरफ पक्की सड़क बन गई है। पहले कच्चे रास्ते थे। आज भी गांव के आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि ही है। हालांकि भू संपदा पर ज्यादातर हक जैसा कि मैं बचपन से देखते आ रही हूं बड़ी जातियों के पास ही हैं। अधिकतर भूमिहारों एवं बगल के गांव गोविंदपुर में राजपूतों के पास ही खेती थी। अन्य जातियों के मेहनत मजदूरी कर जीविको पार्जन करने वाले लोग बड़े किसानों के घर हरवाहा, हलवाहक के रूप में काम करते थे। हालांकि इनका पूरा ख्याल रखा जाता था। न सिर्फ इनका बल्कि पूरे परिवार के देखभाल और ​जीविको पार्जन का जिम्मा किसान के जिम्मे होता था। हालांकि इस क्रम में इक्का—दुक्का जातीय उत्पीड़न और विद्वेष की घटनायें भी सामने आती थी। लेकिन यह आम नहीं था। ज्यादातर लोग अपने साथ काम करने वाले परिवारों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार भी करते थे। कृषि पर आधारित श्रम का सम्मान था, एक दूसरे के हुनर, श्रम एवं संसाधन से जीवन जीने की व्यवस्था थी। आज भी इस गांव में बाइस बीघे की समतल,सपाट,हरा भरा चारागाह है जहां सभी लोग जानवरों को चराने के लिए ले जाया करते हैं। चारागाह की जमीन पर युवाओं की प्रैक्टिस होती है एवं विभिन्न तरह के खेल प्रति​स्पद्र्धाओं का आयोजन मैं बचपन से ही देखती आ रही हूं जो सतत रूप से जारी है। आम तौर पर गाव मे कबड्डी ,खोखो एवं फुटबॉल खेल पारंपरिक तौर पर खेला जाता रहा है।


गांव में भौतिक संरचनाओं एवं संसाधनों का विकास हुआ है। आज गांव में प्राथमिक स्कूल, एक किलोमीटर पर मध्य विद्यालय एवं दो से तीन किलोमीटर पर हायर सेकंडरी स्कूल बना है। सड़कें पक्की हुई है एवं बिजली आपूर्ती के लिए गांव में पावर ग्रीड का निर्माण हो रहा है। हालांकि स्वास्थ्य देखरेख की समस्या आज भी गंभीर बनी हुई है। आज भी इस गांव से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पंद्रह किलोमीटर दूर है। ऐसे में प्रसव के समय मे महिलांओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।


एक बात जो और चिंतित करता है वो है सामाजिक योजनाओं में भेदभाव। अंजनी गांव का मुसहर टोला जहां आज भी लोग खुले नाले पर जीने को मजबूर है। यह न्याय के साथ विकास वाली सरकार ने दोनों ओर पक्की सड़क तो बनाया लेकिन गांव के दलित टोले के साथ यह भेदभाव किया गया आज भी लोग गंदगी के अंबार पर लोग जीते है। जो कभी कबीर टोला हुआ करता था आज इसको महादलित टोला का नाम देकर भी सरकार ने अनुसूचित जाति जनजाति फंड का दुरुपयोग किया और कीचड़ से सना ह दृश्य आज भी देखने को मिल रहे है। पूर्व विधायक रेखा देवी ने भी इस गांव पर ध्यान नही दिया आज भी इस टोले से बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते है। इस लिए मेरा अगला कदम इस टोले के विकास के लिए होगा एक छोटा सा समुदाय भवन इस टोले में बना है। अगला सफर इस टोले के विकास का होगा।
देश व विशेष रूप बिहार के अन्य गांव की तरह ही हमारा गांव अंजनी भी सांस्कृतिक रूप से काफी चलायमान रहा है। गांव के ज्यादातर लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों विशेष रूप से शादी—ब्याह के अवसर पर महिलाओं द्वारा झूमर ,सांझा, कुलदेवता के गीत एवं बारात आगमन पर पहले मोर ,मोरनी का नाच पूरा गांव गुंजायमान रहता था। बारहमासी-गाई जाती थी जिसमें हिंदी के विभिन्न मास की विशेषताओं का वर्णन करती महिला अपने पिया की आस लगाए हुए गाती थीं और अतिंम पंक्ति में कहती थी कि अब बीत गए बिरह के दिन अगले महीना पिया हमारे आएंगे। भादव के गीत -चौहट में वर्षा आकाश बादल एवं इंद्र को गीत के माध्यम से घरती पर हरियाली की चादर बिछाने की अपील करती थी महिलाएं। इसके साथ ही कबीर के दोहे घर घर गाये जाते थे। अल्लहा रूदल की वीरता के गीत गाये जाते थे। फाग एवं चैता इस गाँव का मशहूर हुआ करता था। ग्रामीण जनजीवन में लोक कथाओं का अपना रंग रहा है। गांव में रानी सुरंगा, राजा ​ब्रिजभार, सती बिहुला,राजा हरिश्चंद्र का पाठ,अल्लहा रूदल के कथानक गांव को जीवन बनाये रहते थे।
लेकिन समय के साथ कथित आधुनिकता की छांव में लोग पुरातन कहे जाने आचार,विचार, व्यवहार को भुलाते जा रहे हैं। फलस्वरूप इसका प्रभाव गांव की एकजुटता पर भी पड़ा है और सामूहिकता कम होती जा रही है। सामाजिक समरसता जहां सब मिलजुलकर समृद्ध संस्कृतिक कार्यक्रमों को आनंद लेते थे, औरतों के मधुर आवाज में बारहमासी की झंकार समय के साथ लुप्त होती गई है। आज भोजपुरी के अभद्र अश्लील गाने पर महिलाएं भी शादी विवाह में झूमती नजर आती है। यह खेल पूरी तरह से पैसे का है पैसे ने हमारी संस्कृतियों को नष्ट कर दिया और सबसे ज्यादा इसका प्रभाव गरीब एवं अनुसूचित जाति समुदायों पर पड़ा है।


पटरहट पंचायत के खडीहा गांव के सामाजिक कार्यकर्ता 55 वर्षीय अजय कुमार निराला जी की माने तो आज से 40 साल पहले तक महिलाओं की सुरक्षा को लेकर इतनी बातें नहीं होती थी। ऐसा नही है कि उस समय प्रेम संबंध या सहमती से संबंध नहीं होते थे। उस समय भी थे लेकिन दबे जुबान में लोग बात करते थे। लेकिन छोटी बच्चियों के साथ रेप जैसे या गैंग रेप जैसी घटनायें नहीं थी। आज गांव—गांव में ऐसी घटनायें सामने आ रही हैं। जिस तरह शहरों में देह व्यापार का चलन बढ़ा उसी तरह फिल्मों को देख कर रेप जैसे दुष्कर्म भी बढ़े है। पहले गांव में कोई शराब पीता था, तब छुप कर पीता था और ऐसा करते हुए उसे लोकलाज की​ चिंता भी सताती थी। लेकिन आज नशे के लत के गिरफ्त में वह समाज का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है। शराब ने सबसे ज्यादा नुकसान समाज के हाशिए पर बैठे लोगों का किया है जिसकी वजह से उनमें आज भी गरीबी के साथ ही सामाजिक, शैक्षणिक पिछड़ापन देखा जा रहा है।
इन सब के बावजूद मुझे अपने गाव से बेहद प्रेम है। हालांकि जाने के बाद मन दुःखी हो जाता है अब न वह आपसी प्रेम समरसता रहा न ही वह समृद्ध संस्कृति।
(सामाजिक कार्यकर्ता, फुलवारी शरीफ़ विधानसभा से स्वतंत्र प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं,ऑटो रिक्शा चुनाव चिन्ह मिला है।)

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