कुंभ का समय चल रहा था तो ट्रेनें भी कोचमकोच भरी हुई जा रही थी। लेकिन मन में गंगा जी में डुबकी लगाने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि प्रतापगढ़ की ओर जाने वाली कम भीड़ वाली ट्रेन में चल पड़े। ट्रेन तेजी से गांव दर गांव, कस्बा दर कस्बा होते हुए सुबह-सुबह प्रतापगढ़ स्टेशन पहुंची। स्टेशन से बरियासमुद्र नामक गांव की ओर जाना हुआ। अच्छा ही हुआ, संगम से पहले इस इलाके की सबसे महत्वपूर्ण नदी सई के भी दर्शन हो गए। वैसे नदी अब नाले में बदल गई है और उसके संरक्षण के लिए कहीं कुछ होता नजर नहीं आया। यह गंगा की सहायक नदियों में से एक है। पर नदी की दुर्दशा तो सभी जगह एक जैसी है, कारण थोड़े बहुत अलग हो सकते हैं।
सुना था कि इस इलाके में आंवले के बाग बहुत हैं लेकिन गांव के सफर में कहीं भी बाग नहीं दिखे। बताया गया कि बाग खेतों के बाद है। तो पहले गेहूं और सरसों के खेतों में पहुंचें। दूर-दूर तक लहलहाते गेहूं के खेतों के बीच टहलने, सरसों के खेतों के बीच शाहरूख खान की फिल्मों की सिमरन की तरह सेल्फी लेना भी भा रहा था। वहां बकरियों को चराने आईं औरतें से मुलाकात हुई। बकरियां घास चर रही थी और औरतें गप्पियां रहीं थी।
कुछ अपनी कहानी सुनाने लगीं। लेकिन मेरे मन में कई दूसरे सवाल बादलों की तरह उमड़ रहे थे, सबसे परेशान करने वाला सवाल गांव का नाम था ही। भई बरियासमुद्र का नाम कैसे रखा गया होगा, जब यहां कोई ताल-तलैयां तक नहीं। तो गांव समुद्र कैसे बना? हमें गांव घुमाने वाली लड़कियों मनु और तनु ने बताया कि पहले यहां कोई बड़ा तालाब हुआ करता था जिससे समुद्र का नाम दे दिया गया। यह स्वाभाविक ही लगता है क्योंकि पहले के लोगों ने समुद्र के बारे में सुना ही होगा। उन्हें लगता होगा कि हर बड़ा तालाब एक समुद्र की तरह होता है।
इन सब बातों की बीच हम गांव से बाहर आंवले के बाग में गए। मार्च और अप्रैल में बाग में ज्यादा रौनक नजर नहीं आती क्योंकि पेड़ों की शाखों पर एक भी पत्ता नजर नहीं आता। अलबत्ता नील गाय के झुंड वहां आराम करते नजर आएं। कुछ पेड़ों पर आंवले के दर्शन जरूर हुए। गांव की रहने वाली मनु बताती हैं कि आंवले का सीजन सितंबर से जनवरी तक होता है। सितंबर से आंवले लगने शुरू होते हैं। आंवले के व्यापारी अपनी जरूरत और मुनाफे के साथ आंवला के बाग मालिकों से सौदा करते हैं। दूर-दूर तक आंवलों के पेड़ों की खूबसूरती जितनी आंवलों से भरे और लदे होने पर होती है, उतना ही खूबसूरत बिना फल और पत्तों के भी दिखती है। बेहद खूबसूरत और शीतलता का अहसास कराने वाला दृश्य। पर इससे इतर ग्रामीण लोगों की शिकायत है कि उन्हें मेहनत के मुताबिक मुनाफा नहीं होता। आंवले के उत्पाद बनाने वाले लोग आंवले को कम से कम दामों में खरीदते हैं। सबसे खास बात कि सभी को अच्छे खरीददार नहीं मिलते। मुझे लगता है कि कुछ गांवों के ऊपर एक हाट बनाया जाए जिससे आंवला सीधे उत्पाद बनाने वाले को मिले और बिचौलिए से छुटकारा मिले। पर ऐसा होता कहां है, बिचौलियों का ही हर जगह हस्तक्षेप होता है।
फिर हम गांव के ट्यूबवेल और खेतों में लगे कौओं को भगाने वाले पुतले स्केयर क्रो को देखने पहुंचे। धरती की गोद से निकलते निर्मल ठंडे पानी की शीतलता भी वातावरण में घुलमिल जाती है। दुपहरी में भी कहीं भीषण गर्मी का अहसास नहीं हुआ। संगम के लिए उसी दिन निकलना था लेकिन गांव की मान्यता के अनुसार गुरूवार को दक्षिण की तरफ यात्रा नहीं करना चाहिए, इस किंतु परंतु के कारण हम वहीं रूके। शाम और रात का अहसास भी गांव में बहुत अलग है। गोधूली बेला में घरों में अब भी चूल्हे से उठते धुएं की झांस का अहसास होता है। वहीं आंगन में शांत बैठी गाय और उनके बछड़ों की बेचैनी भी सूरज ढलते बढ़ने लगती है। दूध निकालने का समय, ताजे दूध का सेवन अच्छा होता लेकिन शहरी जीवन में कुछ भी ऐसे ही लेने में शहरियों को थोड़ा तो डर लगता है। लेकिन वहां किसी चीज का भय नहीं है।
घर के आंगन में पड़ी खटियां पर सुस्ताते हुए साफ आकाश की चादर जिसमें टिमटिमाते तारों के झुंड में अपने मनपसंद सात ऋषि का झुंड भी कई दिनों बाद देखा। झींगुर की आवाज अपने होने का अहसास कराती, आप उसे सुनना चाहो या नहीं। बल्कि मुझे अपने बचपन की याद हो आई जब हम रात के अंधेरे में झींगुर की आवाज सुना करते थे, उसपर जुगनू के टिमटिमाने से भूत-प्रेत की कहानियां मन में मंडराने लगती थी। पर दोस्तों और सहेलियों के साथ घंटों छत पर गुफ्तगू हो जाती थी। गांव में शाम होते ही रात हो जाती है और आठ-नौ बजते बजते ही चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है। शहरियों को रात 11 बजे तक नींद नहीं आती। कभी कभी तो दफ्तर की चिंता के मारे पूरी रात नहीं आती। गांव की रात कम से कम बिना चिंता की तो होती ही है। सकून अब भी बचा है गांव में, नई पीढ़ी को इसे समझने की जरूरत है।
प्रतापगढ़ जिला सन 1628 में स्थापित हुआ तब यहां के राजा प्रताप बहादुर हुआ करते थे। उन्होंने 1682 तक राज किया। प्रतापगढ़ में पुराना किला दर्शनीय है जिसे राजा प्रताप सिंह ने बनवाया था। सई नदी के किनारे बेल्हा देवी का मंदिर है जिसे रामायण काल से जोड़ा जाता है। मंदिर के पुजारी ने बताया था कि यहां भगवान राम ने बनवास के दौरान बेला देवी की पूजा की थी। इस मंदिर के बारे में माना जाता है कि शिव भगवान की पत्नी सती का कमर यानी बेला यहां गिरा था। इसलिए यह एक सिद्धपीठ भी है। मंदिर की बनावट नई है क्योंकि स्थानीय नेताओं ने इसका भव्य निर्माण कराया है। सई नदी तो नाले में तब्दील हो गई है, सो इस पर सरकार की कृपा दृष्टि पड़ने की जरूरत है क्योंकि गंगा की सहायक नदियों को जीवित किए बगैर गंगा को दोबारा से निर्मल बनाने का काम पैसे की बर्बादी है। यही कारण है कि गंगा को साफ करने में अब तक भले कई हजार करोड़ रूपए बह गए लेकिन गंगा में न तो पानी साफ हुआ और न ही पानी की मात्रा बढ़ी। पत्रकार हूं, इसलिए सरकारी कमियों की ओर चाहे-अनचाहे नजर चली जाती है।
इस गांव में मुझे सबसे चौकाने वाला स्थान लगा सराई नाहर गांव जो यहां से कुछ ही दूरी पर है। गांव का इतिहास सैंकड़ों नहीं, बल्कि लाखों साल पुराना है। यहां करीब 40 साल पहले हुई खुदाई में लाखों साल पहले के मानव कंकाल और पत्थर के औजार मिले। पास के महादाहा, काकोरिया गांव में भी पाषण युग के प्रमाण मिले हैं। चूंकि यह स्थान नदी के किनारे बसा हुआ है तो स्वाभाविक है कि यहां प्राचीन संस्कृतियों की बसावट हुई होगी। महादाहा, काकोरिया और सराई नाहर गांव में अलग अलग स्थानों पर हुई खुदाई का अध्ययन अभी अधूरा है। विशालकाय मानव हड्डियां और औजारों से उसकी प्राचीनता के संकेत मिले हैं। इलाके में रामायण और महाभारत काल से जुड़ी कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। बहरहाल, इन स्थानों पर मिली चीजें भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण के संग्रहालय में मौजूद है और देखे जा सकते हैं। खुदाई स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली।





