गांधी वास्तविकता में कम, कल्पना में ज्यादा जीते थे

डाॅ मैनेजर पांडेय
मेरा गांव लोहटी गोपालगंज जिले के कटिया थाने में हैं। वैसे तो गांव साल में एक-दो बार ही जाना होता है लेकिन गांव से जुड़ाव है। हमारा गांव भी देश के दूसरे गांव की तरह बहुत बदल गया है। विशेष रूप से मानवीय संबंध के मामले में ईष्र्या, द्वेष के कारण लड़ाई, झगड़े काफी बढ़ गए हैं। आसपास के गांवों में मुकद्दमेबाजी तो होती थी लेकिन हमारे गांव में यह चलन कम ही था। बदलाव के इस दौर ने यह कसर भी पूरी कर दी है।
देश के अन्य गांवों की तरह ही जाति व्यवस्था ने हमारे गांव को भी जकड़ रखा है। गांव में ब्राह्मणों की संख्या ज्यादा है। कुछ घर अहीर, कुछ कोईरी और कुछ घर मुसलमानों के हैं। हरिजनों की भी अच्छी खासी संख्या है। ब्राह्मण अपेक्षाकृत साधन-संपन्न हैं और दलितों के साथ मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। कुछ लोग तो मारपीट भी करते हैं। पहले मजदूरी का काम ज्यादातर हरिजन परिवारों के बच्चे करते थे, लेकिन अब ज्यादातर युवा पलायन करके शहर में चले आए हैं। इसका फायदा हुआ है कि उन्हें वहां नकद मजदूरी मिलती है और गाली व अपमान नहीं सहना पड़ता। लेकिन शहरों की ओर पलायन का गांव पर असर यह हुआ है कि अब खेती के कामों के लिए मजदूर नहीं मिलते। खेती में काम आने वाले मजदूरों का घोर अभाव है। ब्राह्मण लोग पहले भी हल नहीं चलाते थे। यहां तक कि हल-कुदाल चलाने में अपमान समझते हैं और जो इन खेतों में काम करते थे वो बाहर चले गए। बीच की जातियों में संपन्नता आई है क्योंकि वे अपना काम खुद करते हैं। जैसे-जैसे उनकी आर्थिक स्थिति बदली है तो ब्राह्मणों से डर भी कम हुआ है। दोनों आपस में झगड़ते नहीं हैं लेकिन दबते भी नहीं है। इस तरह आपसी सदभाव कम हुआ है।

जहां तक गांधी के ग्राम स्वराज और ग्राम संबंधी चिंतन का प्रश्न है गांधी वास्तविकता में कम, कल्पना में ज्यादा जीते थे। गांधी जी की कल्पना थी कि गांव, जातिवाद के भ्रम, विकृतियों, बदमाशियों से मुक्त गांव होना चाहिए। किसी ने लिखा है अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है? उन्होनें साग, भाजी, लौकी का जिक्र किया है लेकिन इससे गांव नहीं बनता। ग्रामीण जीवन तो बेहतर तब होगा जब कृषि प्रधान देश में खेती की व्यवस्था सुधरेगी और आज तो मजदूर गांव में है ही नहीं तो खेती कैसे सुधरेगी। जो संपन्न लोग हैं वे ट्रैक्टर से खेती कराते हैं, लेकिन पूरी खेती नहीं थोड़ी बहुत खेती कर पाते हैं। बंटाई पर खेती का काम होता है। इस कार्य में बीच की जातियां जो श्रम करने में भरोसा करती है वो लगी हुई हैं। लेकिन भूमि-मालिक आधा उपज ले लेता है। गांधी ग्राम पंचायत की व्यवस्था को मजबूत करना चाहते थे कि इससे जमीनी लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यही पंचायती राज व्यवस्था गांव को खा गया। हमारा ग्रामीण समाज अभी भी अतीत जीवी है। लोग ऐसी बातें कहते मिल जाएंगे कि ऐकरा से नीमन अग्रेजे रलन ह स।
गांव की सारी दुरावस्था का मूल है जाति-व्यवस्था। जब तक जातिवादी व्यवस्था गांव से नहीं जाएगी, तब तक गांव में वास्तविक बदलाव नहीं आ पाएगा। चुनावी राजनीति ने इसे और बल दिया है। जातियों की बहुलता के आधार पर उम्मीदवारों को खड़ा करते हैं। यदि वह जीत जाता है तो केवल अपनी जाति के कल्याण के लिए ही समर्पित दिखता है। इसतरह के लोकतंत्र से ग्राम स्वराज की परिकल्पना कैसे पूरी होगी। इसलिए मैंने कहा कि हिंदुस्तान के गांवों की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण जाति-व्यवस्था है। प्रेम, सदभाव व एकता के लिए जाति व्यवस्था का अंत जरूरी है। लेकिन ऐसा करना न सरकार चाहती है, न वर्तमान राजनीति चाहती है। सरकारी अधिकारी राजनीतिज्ञों के इशारे पर चलते हैं और ग्राम प्रधान और गांव के लोगों की सुनता नहीं है।

 

गांधी के ग्राम स्वराज की संकल्पना को जमीन पर उतारने के लिए ईमानदार प्रयास करने की जरूरत थी। लेकिन ऐसा होता तो नहीं दिख रहा है। मैथिली शरण गुप्त गांधी के गांव की कल्पना की तारीफ करते थे, जबकि दूसरी ओर प्रेमचंद जैसे लेखक थे, जिन्होंने गांव, गरीबी और विकृति को दिखाने का प्रयास किया।

ऐसे में कहा जा सकता है कि न अंग्रेजी राज्य में गांव बेहतर स्थिति में थे और न ही कांग्रेसी राज्य में कुछ बदला। वर्तमान में भी बदलाव के आसार नहीं दिखते। केवल मेरा गांव ही क्यों गांव के बीस किलोमीटर के दायरे में कोई आदर्श गांव नहीं दिखता। यह शासकों के लिए डूब मरने की बात है लेकिन मरते नहीं है। अंग्रेजी की प्रभुता का आलम यह है कि आप जब सफर कर रहे हों और आसपास कोई बिना टिकट का यात्रा कर रहा हो शुद्ध हिंदी में बोलेंगे तो थोड़ा सहमेगा, अंग्रेजी में बोलिए तो बैठ जायेगा और यदि भूल से आप देशी बोली बोलने लगे वो आपके उपर चढ़ जाएगा।


गांव में रहना इतना आसान नहीं है। मेरे गांव में अखबार तीन दिन बाद मिलता है। कोई यदि बाजार गया, कहीं मिल गया तो खरीद लेगा। दूसरी बात बिजली जितनी आती है उससे ज्यादा जाती है। पढ़ने-लिखने वाले लोग गांव में कैसे रह पाएंगे। इसलिए गांव के लड़के जो बाहर जाते हैं, वे गांव में वापस नहीं आते। खेती की आदत तो छूट ही गयी है। सवर्ण जातियों को तो पहले ही नहीं पड़ी थी तो छूटने का सवाल ही नहीं। शहरों में कम से कम नौकरी तो मिल जाती है। गांव में तो नौकरी भी नहीं है। शहर गांव के नजदीक नहीं है लेकिन कस्बे हैं। जहां से खेती-किसानी व घर-परिवार की जरूरतों का सामान लोग खरीदते हैं। एक बड़ा बदलाव यह आया है कि नयी उम्र के लड़के दारू पीने लगे हैं। पहले गांव में लोग दारू और दारू पीने वालों से घृणा करते थे। लेकिन अब यह प्रतिष्ठा का सबब बनता जा रहा है।
हमारे गांव में मनरेगा नहीं है। जहां है वहां ठीक से पैसा नहीं मिलता। मजदूरी करने लोग दिल्ली, पंजाब चले जाते हैं क्योंकि गांव में शोषण है, उत्पीड़न है और बेगार करवा लेने की चाहत है। लेकिन बाहर में भी उन्हें चैन कहां है। गांधी के गुजरात से बिहार, उत्तर प्रदेश के लोग खदेड़े जा रहे हैं। इसके साथ ही बिहार जैसे प्रांत में लोगों को प्राकृतिक आपदाओं का दंश भी झेलना पड़ता है। लू के थपेड़ों से, बाढ़ से, सर्दी से लोगों की जान जाती है। प्रकृति का शिकार मनुष्य तभी होता है जब वह विज्ञान से दूर होता है।

भारतीय जीवन में पाखंड बहुत है। गांव भी उसी पाखंड में जी रहा है। ऐसा नहीं है कि बाहर रह रहे लोग गांव में कुछ करना नहीं चाहते। पिछले दस साल से मैं इस कोशिश में लगा हुआ हूं कि गांव के प्राईमरी स्कूल को मिडिल स्कूल बनवाया जा सके। लेकिन लोगों के रूख इस बात से समझ सकते हैं कि लोग यह कहते हुए भी मिले कि, ‘‘उनका कुछ लाभ होई तभी ए फेरा में बारन।’’ ऐसे में सदभाव और सहयोग के अभाव में बाहर पढ़े-लिखे लोग भी कुछ कर नहीं पाएंगे। महिला शिक्षा के प्रति भी लोगों में निराशा का भाव है। पढ़ के का करिहन। रोटी बनईहे आउर का करेके बा। कुछ महिलाओं को नौकरी मिली है। कुछ महिलाओं को शिक्षिका बनवा दिया गया। पर वे ठीक से पढ़ी ही नहीं हैं तो पढ़ाएंगी क्या?
यह जरुर है कि गांव ने जो भी हासिल किया है वो शिक्षा के बल पर हासिल किया है। जो संपन्न थे वो अपनी संपन्नता के बल पर पढ़ गए। और जब पढ़ लिख गए तो वो गांव में रहने के बजाय बाहर चले गए, और भी आगे बढ़े तो अमेरिका चले गए। इस स्थिति को बदलने की जरुरत है।
प्रसिद्ध लेखक, सेवानिवृत प्राध्यापक, जेएनयू।

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