बदले-बदले सरकार नजर आते हैं… अन्नदाताओं को अंबानी-अडानी के यार नजर आते हैं

मंगरूआ

नयी दिल्ली: रूठे रूठे पिया मैं मनाउं कैसे
आज न जाने बात हुई क्या क्यों… रूठे मुझसे।
देश के अन्नदाताओं की हालात आजकल इस गीत के नायक जैसी हो गई है और उनको मनाने की जिम्मेवारी जिनपर है वो समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर कैसे उन्हें मनाना है। कैसे उन्हें भरोसा दिलाना है कि ये जो कानून लाये गये हैं वो उनके अच्छे दिन के लिए हैं,उनकी बेहतरी के लिए हैं,उनकी आमदनी में बढ़ोतरी के लिए है। क्योंकि वो अब तो 2022 भी करीब आने वाला जब किसानों की आमदनी दुगुनी होनी है और जिसका सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही लगातार दिखा रहे हैं। और जिनके अच्छे दिन आने हैं वो आंदोलन पर उतारू हैं और कहते हैं कि बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं अन्नदाताओं को अंबानी-अडानी के यार नजर आते हैं। हालांकि जब देश के कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर किसान आंदोलन पर मीडिया के समक्ष अपनी बात रख रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि सरकार को जो कहना है कह दिया, अब अन्नदाता को तय करना है कि वो या तो हल निकाले या सर्दी में ठिठुरते हुए सड़क जाम कर आंदोलन करे।


क्या कहा कृषि मंत्री ने
कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को मंडियों की जंजीरों से मुक्‍त कराना चाहती है ताकि वे अपनी उपज मंडी से बाहर कहीं भी, किसी को भी और मनचाही कीमत पर बेच सकें। इतना ही नहीं किसानों को कृषि सुधार के जिन प्रावधानों पर आपत्तियां हैं, सरकार उनके बारे में खुले दिल से बातचीत करने को तैयार है। उन्‍होंने कहा कि केन्‍द्र ने किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि नए कानूनों का कृषि उत्‍पाद विपणन समितियों और न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर कोई बुरा असर नहीं पडेगा। उन्‍होंने कहा कि सरकार ने समर्थन मूल्‍य और मंडियों के बारे में किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए प्रस्‍ताव भेजा लेकिन किसान नेताओं ने इसे अस्‍वीकार कर दिया।
कोई भी कानून पूरी तरह बुरा नहीं होता
कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने कहा कि संसद के सत्र में सरकार कृषि से जुड़े तीन कानून लेकर आई थी। इन कानूनों पर संसद में सभी दलों के सांसदों ने अपना पक्ष रखा था। लोकसभा और राज्यसभा में बिल पारित हुआ था। चर्चा के दौरान सभी सांसदों ने अपने विचार रखे। कृषि के क्षेत्र में निजी निवेश गांव तक पहुंचे, इसके लिए पीएम के मार्गदर्शन में काम हुआ। ये तीनों कानून आज देशभर में लागू हैं।
बावजूद इसके किसान नेता कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि कोई कानून पूरा खराब या खरा नहीं हो सकता, जिस प्रावधान पर दिक्कत है उस पर खुले मन से हम चर्चा करने को तैयार है। किसी भी समय किसान चर्चा करने के लिए आगे आएं, हम तैयार हैं।

चर्चा चल रही तो आगे आंदोलन की घोषणा ठीक नहीं
कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने कहा कि किसानों को आंदोलन का रास्ता छोड़ना चाहिए और जब चर्चा चल रही है तो आगे के आंदोलन की घोषणा वाजिब नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हमने प्रस्ताव भेजा है। उस प्रस्ताव पर जो कहना है वह अगले दिन वार्ता में कही जा सकती है। वार्ता टूट जाए तो आंदोलन के आगामी चरण की घोषणा उचित है। अभी भी आग्रह करूंगा अगले चरण के आंदोलन को वापस लेकर वार्ता के माध्यम से रास्ता ढूंढना उचित रहेगा।’ उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से भेजे गए प्रस्ताव में किसानों या प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों को अगर लगता है कि उनकी कोई बात छूट गई है जो चर्चा करनी चाहिए, या फिर कोई आपत्ति है तो सरकार चर्चा करने के लिए तैयार है।


जरूरी है किसान व गांव की आत्मनिर्भरता
कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश को आत्मनिर्भर बनाने की लगातार कोशिश की जा रही है और इसके लिए किसानों को और गांव को आत्मनिर्भर बनाना ही होगा। ‘जब तक कृषि और गांव दोनों आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे तब तक देश को आत्मनिर्भर बनाने का जो सपना है पूरा नहीं होगा। इसलिए सरकार द्वारा कोशिश की गई कि गांव और किसान आत्मनिर्भर बनें और समृद्ध बनें। कृषि कानूनों के माध्यम से हमने नये द्वार खोलने की कोशिश की है। इस पर जो किसानों की भ्रांति थी, उस भ्रांति को दूर करने के लिए हमने प्रस्ताव भेजा है। मैं संगठनों से पुनः आग्रह करता हूं जल्दी से वार्ता के लिए तिथि तय करें । सरकार उनसे बातचीत करने के लिए तैयार है।’
पीछे हटने को तैयार नहीं है अन्नदाता
भले ही हुक्मरान सर्द रातों में ठिठुरते हुए अन्नदाताओं और आंदोलन को लेकर चिंता जता रहे हों लेकिन हुक्मरान के इन चिंताओं का असर आंदोलनकारी किसानों पर हो रहा हो ऐसा नहीं दिखता। धरणा स्थलों पर पर किसान दंड बैठक करते देखे जा रहे हैं। यहां किसान आंदोलन के अलावा नुक्कड़ नाटक, भजन-कीर्तन आदि का शोर भी सुनाई दे रहा है और
सरकार के खिलाफ हुंकार भी भरा जा रहा है और मांग न माने जाने तक आंदोलन से पीछे हटने के कोई संकेत तो नहीं ही दिखते,हां आंदोलन को और तेज किये जाने और सरकार के लिए मुश्किल खड़ा करने का संकल्प जरूर दिखाई दे रहा है। सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि आजादी के बाद ये सबसे लंबा संघर्ष है। यह संघर्ष अब चरम पर पहुंच चुका है। सरकार नहीं मानी तो लड़ाई का तरीका बदल लेंगे, लेकिन कानून वापस करवा कर रहेंगे।
क्या कहते हैं किसान नेता

किसान नेता बूटा सिंह ने कहा कि भाजपा नेताओं और हमारे मंत्रियों को कहना चाहूंगा कि एकजुट हो जाइए। प्रधानमंत्री कुछ और, गृहमंत्री कुछ और व कृषि मंत्री कुछ और बोल रहे हैं। विनती है कि हम एकजुट हैं और हमारी चुनी हुई सरकार को भी एकजुट होकर किसानों के पक्ष में फैसला लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमने 10 तारीख का अल्टीमेटम दिया हुआ था कि अगर प्रधानमंत्री मोदी ने हमारी बातों को नहीं सुना और कानूनों को रद्द नहीं किया तो सारे धरने रेलवे ट्रैक पर आ जाएंगे। आज की बैठक में ये फैसला हुआ कि अब रेलवे ट्रैक पर पूरे भारत के लोग जाएंगे। संयुक्त किसान मंच इसकी तारीख की जल्द घोषणा करेगा। बूटा सिंह ने यह भी दावा किया कि पंजाब में टोल प्लाजा, मॉल, रिलायंस के पंप, भाजपा नेताओं के दफ्तर और घरों के आगे धरना अभी भी जारी है। इसके अलावा 14 तारीख को पंजाब के सभी डीसी ऑफिसों के बाहर धरने दिए जाएंगे।


वहीं भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि यदि केंद्र हमारी 15 में से 12 मांगों पर सहमत हो रहा है, इसका मतलब है कि बिल सही नहीं हैं। इन कानूनों को रद्द कर देना चाहिए। हमने एमएसपी पर एक कानून की मांग की थी, लेकिन सरकार अध्यादेश के माध्यम से तीन बिल ले आए। हमारा विरोध शांतिपूर्वक जारी रहेगा। 


स्पष्ट है जो कल ​तक देश में हवा बनाकर अच्छे दिन का दावा करते हवाएं बदलने निकले थे
वो हवाओं के यार बन बैठे हैं
और अब उनकी नियत पर हमारा अन्नदाता भरोसा करने के बजाय न सिर्फ शक करने लगा है बल्कि पूंजीप​ती घरानों के साथ उनकी गलबहियां को लेकर सवाल उठाने लगा है और अंबानी-अडानी के खिलाफ आंदोलन पर उतारू है। ऐसे में चुनी हुई सरकार जितना जल्दी अन्नदाताओं को ये भरोसा दिलाने में कामयाब हो कि ये कानून उनके हक में हैं और आंदोलन खत्म हो इसी बात में देश का भविष्य छिपा हुआ है।

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