सदानंद शाही
कुछ साथियों के बुलावे पर पिछले माह 29 तारीख को देवरा गांव जाना हुआ। कोशिश हुई गांव के लोगों से संवाद की। वैसे तो इस आयोजन में शरीक होकर मुझे बहुत खुशी हुई।देवरा गांव की महिलायें गांव में नशाबन्दी के लिए अभियान चला रही हैं।इन्हीं महिलाओं से संवाद हुआ।
मुझे लगा कि गांव में नशे का सवाल सिर्फ नशे का सवाल नहीं है।यह शिक्षा का सवाल भी है,चिकित्सा का सवाल भी है,रोजगार का सवाल भी है।गांव की पुरानी व्यवस्था बदल गयी लेकिन जो नयी व्यवस्था आयी वह मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो पायी।अनजाने ही शहरीकरण हमारा आदर्श हो गया। गांव की कीमत पर शहरीकरण को बढावा दिया गया।गांव को शिक्षा ,चिकित्सा और रोजगार के केन्द्र बनाने की कोशिशें नहीं हुईं।शहर की नकल करते हुए गांवों ने अपना स्वरूप खो दिया।वे न तो शहर बने और न ही गांव रह पाये।शहरों के स्वरूप में बेतहाशा वृद्धि हुई।ग्रामीण आबादी का शहरों में पलायन हुआ।एक तरह से देखें तो विकास के शहर केन्द्रित मॉडल की गाडी ही उलाड हो गयी।सत्तर से ज्यादा फीसदी आबादी गांवों में रहती है,इसे नजरन्दाज करते हुए विकास का अर्थ समझा गया -शहरीकरण।गांधी ने ग्राम स्वराज्य की बात की थी । ग्राम अपने आप में समग्र इकाई के रूप में विकसित हों यह हमारे सोच में ही नहीं आया।
हमने जो प्रलोभनवादी लोकतंत्र विकसित किया ,उसमें यह संभव भी नहीं था।लोकतांत्रिक चेतना को विकसित करने के बजाय जनता को घूस देकर अनुकूलित करने की कोशिश की जाती रही।कभी रेडियो, कभी टीवी,कभी सायकिल तो कभी सीधे सीधे रूपये का प्रलोभन देकर जन चेतना को कुन्द और दृग्भ्रमित किया गया।जनता सरकार और राजनीतिक दलों का मुंह जोहती रही।दलों और नेताओं का एजेण्डा प्रमुख हो गया।जनता के वास्तविक सपने खो बिला गये।
ऐसे माहौल में अगर किसी गांव की सामान्य महिलायें नशाबन्दी जैसे सवाल को उठाती हैं और इसे गांव की समग्र बेहतरी से जोडने की पहल करती हैं तो निश्चित ही स्वागत योग्य है।ऐसी ही पहलों के बीच से विकास की फर्जी अवधारणाओं की पोल खुलेगी और ग्रामीण भारत की उन्नति का सच्चा रास्ता प्रशस्त होता है।
