गांव हो गए सरकारी!

कमलेश कुमार सिंह

हाजीपुर: हाल ही में गांव जाना हुआ। पिताजी भी साथ थे। बटाइदार से गेंहू लाना था। बटाइदार पारस राय पिताजी को गेंहू का हिसाब किताब बता रहा था। इसी बीच एक बुजुर्ग वहां से गुजरते हुए अचानक रुक गये। उन्होंने मुझे टोकते हुए पूछा कहां से आये हो, किसके लड़के हो। तभी पिताजी उनके पैर छूने झूके। इसके बाद परिचय कराया गया। बातचीत के दौरान उन्हें मेरे पत्रकार होने की जानकारी हुई। बस क्या था। उन्होंने कहा, निकालो कलम-काॅपी। लिखो आज गांवों का हाल क्यों बदहाल है। जो मूल समस्या और कारण है उसके बारे में कोई बोलता, सुनता, समझता ही नहीं। अब उस समय तो मेरे पास कुछ भी ना था। खैर, तुरंत जुगाड़ हो गया। लेकिन ताना सुनने को भी, हें कैसा पत्रकार हो। उन बुजुर्ग से जो सुना, उसे आप लोगों से साझा कर रहा हूं-

आजादी के बाद गांव की सामूहिकता धीरे-धीरे समाप्त होती गई। सत्ता संभालने वाली पार्टी ने गांव के सामूहिक और सार्वजनिक स्थानों का निर्माण अपने हाथों में ले लिया। सड़क, तालाब, विद्यालय, पुस्तकालय से लेकर स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण सरकार करेगी। समाज नहीं। धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज और गांव की जिम्मेदारी न के बराबर रह गई। गांव वालों का काम सरकार के आगे हाथ फैलाकर या आंखें दिखा कर अपने लिए मांग करना रह गया, निर्मित स्थानों की तोड़फोड़ भी। उन भवनों या सड़क जलाशयों से अपनेपन का भाव समाप्त हो गया। सार्वजनिक से सरकारी बन गए। सब लोग उपयोगी उपकरण और स्थान। ‘सब धन सरकारी’ के भाव आने से उन निर्णयों का रक्षक कोई नहीं बना जिनके लिए वे उपकरण या भवन बनते हैं। उनके निर्माण में उनकी भागीदारी नगण्य हो गई। इसलिए जब कभी पुस्तकालय, विद्यालय या सड़क बनाने के लिए एक ट्रक ईंट गिराई जाती है, तो गांव वाले 10-10 या इससे अधिक लेकर अपने-अपने घरों की नालियां गड्ढे भरते हैं। सरकारी धन है, रोके कौन। दस या हजार ईंट लेने वाले सब हैं। सार्वजनिक स्थानों से सार्वजनिक लाभ का भाव ही समाप्त हो गया। अपने घर के आगे गड्ढा भी है तो स्वयं अपने प्रयास से नहीं भरेंगे।

सरकार का समाज का गांव मुखापेक्षी हो गया। यह सिलसिला दीर्घकाल तक चलते रहने के कारण यही सामाजिक व्यवहार बन गया। परंतु लोकतंत्र में यह तो गलत सिलसिला था। इसलिए जब सत्ता में कांग्रेस का बोलबाला समाप्त हुआ तो राज्यों में भी दूसरे दलों की सरकारें बनने लगी। लेकिन, कांग्रेस द्वारा की गई भूलों, डाली गई गलत परंपराओं को समाप्त करने की पहल नहीं हो पाई। पुनः सरकारी योजनाओं के लागू होने में जनभागीदारी का महत्व नहीं समझा गया। सरकारी योजनाओं के नियमों के निर्माण के समय स्थानीय जनता को सूचित करना और समय-समय पर उनका सहयोग दर्ज कराना ही जनतंत्र का तकाजा होता है। परंतु स्वतंत्रता के बाद शासन में आई सरकारी पार्टी ने लोकतंत्र प्रणाली को छोड़कर राजसत्ता द्वारा ही विकास के कार्य करने का मन बना लिया। जनतांत्रिक प्रणाली में जनता भी हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई। एक अवधि में तो उसे मतदान के लिए भी मतदान केंद्र पर जाना नहीं पता था। उनका मत पड़ जाता था। इस प्रकार जनतंत्र में जनता निष्क्रिय और नगण्य हो गई। सरकार चल रही है। निठल्ले बैठी जनता और भ्रष्टाचार में डूबे सरकारी कर्मचारियों के गले से जनभागीदारी उतर नहीं रही।

जिन राज्य सरकारों में हर सरकारी योजना में जनता की भागीदारी कागजों पर ही सुनिश्चित की वहां का विकास के परिणाम हमारे आपके सामने हैं। जनभागीदारी का भाव भरना एक कठिन कार्य है। जन भागीदारी का भाव जन-जन में भरने से लेकर उन्हें सरकार के साथ व्यवहारिक भागीदार बनाने का लक्ष्य अभी दूर के ढोल के समान है। क्योंकि कई दशकों में सरकार और जनता का भी अभ्यास छूट गया है। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी को इस भाव और कार्य के लिए प्रेरित किया जाए उनके मन में अपना हाथ अपना गांव का भाव पाठ्यक्रम के द्वारा भी भरा जा सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी विभिन्न निर्माण कार्य, कोशी बांध जैसे आपदा नियंत्रण कार्यों में विद्यार्थियों की सहभागिता होती थी। युवाओं में शारीरिक क्षमता ही नहीं जीवन मूल्य और संभालने की मानसिक ऊर्जा भी होती है।

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