गांव में जिस रफ्तार से बढ़ी भौतिक समृद्धि, उससे ज्यादा रफ्तार से हुआ चारित्रिक पतन

डॉ अमरनाथ
गांव का सामाजिक जीवन बड़ा ही आत्मीयतापूर्ण था. हिन्दू हों या मुसलमान अमूमन लोग किसी को नाम लेकर नहीं बुलाते थे। चाचा, बाबा, भइया, बाबू, भौजी, दीदी, चाची, मामी, नानी, आदि ही संबोधन चलते थे। मोहर्रम हो या फगुआ (होली) हिन्दू मुसलमान दोनो समान उत्साह से मनाते थे। फागुन लगते ही ढोल की थाप सुनाई देने लगती थी। भोजन के बाद शाम होते ही किसी के भी बरामदे में पड़ोस के लोग इकट्ठा हो जाते और रात बारह बजे तक फगुआ का समूह गान चलता रहता था। प्राय; सबके घरों में ढोल, झाल या करताल अर्थात् कोई न कोई बाजा जरूर रहता था। हमें स्मरण है, हमारे गांव में एक चौकीदार थे उनका नाम था- हमारे गांव में सबसे अच्छा फगुआ वही गाते थे। हिन्दू भी मोहर्रम उसी उत्साह से मनाते जिस उत्साह कोई मुसलमान। मैं जब इंटर में पहुंचा तब कहीं यह समझ पाया कि मोहर्रम वास्तव में मुसलमानों का त्योहार है। हमारे गांव के सोनपुर टोले में एक भी घर मुसलमान का नहीं था। किन्तु वहां कई ताजिए रखे जाते थे। मुझे तो लगता है पाय़ख सबसे ज्यादा उसी टोले के लोग बनते थे। इधर कई दशक से मोहर्रम और फगुआ गाँव पर नहीं मनाया इसलिए आज का यथार्थ नहीं बता सकता, किन्तु ऊपर से जो देख पा रहा हूं उससे भविष्य के प्रति आशंका पैदा हो रही है। पहले हमारे गांव में सिर्फ एक मस्जिद थी, मेरे टोले पर जो हमारे सामने बनी और मन्दिर तो कोई था ही नहीं। आज यहां कई मस्जिद और कई मन्दिर बन चुके हैं। हमें लगता है कि हम जैसे जैसे भौतिक दृष्टि से समृद्ध और शिक्षित हो रहे हैं। हिन्दू और मुसलमान अधिक बनते जा रहे हैं इनसान कम।

मुझे याद है मेरा नाम जी.एस.वी.एस. इंटर कालेज में डॉ.ऐनुल हक ने लिखाया था- अपनी मोटरसाइकिल पर ले जाकर। प्रिंसिपल महेन्द्रनाथ द्विवेदी के कक्ष में वे मुझे ले गए और उनसे परिचय कराया। मेरे बाबूजी मेरे साथ नहीं गए थे। डॉ. ऐनुल हक महाराजगंज के बड़े ही प्रतिष्ठित डॉक्टर थे। प्रिंसिपल साहब ने उनका बड़ा सम्मान किया था। डॉ. साहब जब भी किसी मरीज को देखने मेरे गांव आते मेरे, घर दो रोटी खाकर ही जाते। मजहबी कट्टरता या तो हमें तालिबान बनाती है या हमसे बाबरी मस्जिद गिरवाती है। हमारा देश बँट गया उससे किन्हें फायदा हुआ? चंद अमीरों को. किन्तु करोड़ो आम इन्सान बरबाद हो गए।

निदा फाजली ने ठीक कहा है-
“हिन्दू भी मजे में हैं, मुसलमां भी मजे में, इन्सान परेशान यहां भी है वहां भी।”
हमारा मकसद् अच्छा इन्सान बनाने का होना चाहिए, दिल को जोड़ने का होना चाहिए।

आतिश ने कहा है,
“ बुतखाना खोद डालिए, मस्जिद को ढाइए। दिल को न तोड़िए ये खुदा का मुकाम है।”
हम खुशनसीब और गौरवान्वित हैं कि हमारे गाँव में आज भी साम्प्रदायिक सद्भाव बना हुआ है। किन्तु जिस रास्ते हम जा रहे हैं पता नहीं कब कौन सा मानवता का दुश्मन आकर हमारे बीच फिरकापरस्ती का बीज बो दे और हमारे बीच के कुछ लोग उसके बहकावे में आ जाएं? हमे हमेशा सावधान रहना होगा और प्रयास करना होगा कि ऐसे तत्वों को पनपने का मौका ही न दें। हमें जो कुछ करना है मानवता की भलाई के लिए करना है और सामाजिक काम करने वालों के लिए अवसरों की कमी नहीं है, निदा फाजली ने लिखा है-
“अपना गम लेके कहीं और न जाया जाए। घर की बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए,
घर से मस्जिद है बड़ी दूर चलो यूं कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।”
पहले मेरे गांव के हर टोले पर सावन आते ही अखाड़े जरूर खोद लिए जाते थे, एक –एक टोले पर कई –कई अखाड़े. मुख्य खेल कुश्ती, चीका और कबड्डी होता था। बच्चे गुल्ली डंडा खेलते थे। स्कूलो और कालेजों में भी यही खेल होते थे। हाँ, वहाँ फुटबाल और बालीबाल की टीमें भी होती थीं। सिर्फ ज. ने. डिग्री कालेज महाराजगंज में ही हाकी की भी टीम थी। क्रिकेट का नाम तो सुनने को भी कहीं नहीं मिलता था। किन्तु आज! मैं यह देखकर हैरान हूँ कि मेरे गांव में अब कुश्ती और कबड्डी का खेल सुनने में नहीं आता। सुना है कि एक भी अखाड़ा नहीं चलता। इन खेलों में खर्च लगभग नहीं के बराबर होते थे, समय कम लगता था और शरीर के अंगों की वर्जिश भी खूब होती थी। क्यों छोड़ दिया लोगों ने इन खेलों को खेलना? क्रिकेट कहां से आ गया? इतना खर्चीला, समय बर्बाद करने वाला? खेलते हैं दो लोग बाकी जैसे चस्मदीद हों।


अपने गांव में प्राथमिक विद्यालय की स्थापना के लिए उस समय गाँव के प्रधान सहित कई अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अथक प्रयास किया था। कई वर्ष तक आपसी सहयोग से विद्यालय चलाया गया तब जाकर कहीं वह सरकारी विद्यालय बन सका। मैने देखा कि आज उस विद्यालय में सिर्फ एक शिक्षिका हैं और वह भी अपनी आयु एवं अस्वस्थता के कारण पढ़ा सकने में पूर्णत: सक्षम नहीं है। विद्यालय में केवल एक शिक्षा मित्र के भरोसे कक्षाएं चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इन शिक्षामित्रों को शिक्षा शत्रु कहा है। क्या गांव के लोगों ने अध्यापकों के लिए कभी कोई आवेदन अधिकारियों तक भेजा? नहीं पता। भला ऐसी स्थिति में कोई वहाँ अपने बच्चे को क्यों भेजेगा?

इससे भी ज्यादा चिन्ता की बात यह है कि विद्यालय के ठीक सामने सड़क की दूसरी ओर एक शराब की दूकान खुल गयी है। हमारे गांव ने उसका स्वागत किया होगा। इसी से हमारे गांव की मानसिकता का अनुमान लग जाता है। आज हमारे गांव की नयी पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा होश सम्हालते ही गुटका और शराब के नशे का आदी हो जाता है। छोटी छोटी उम्र के बच्चों को भी मैने गुटका फांकते देखा है। पहले भी लोग तम्बाकू खाते थे किन्तु बहुत कम। गुटका तब नहीं चलता था। तब पत्ते वाली सुरती चलती थी। जो खाते थे वे अपने साथ चुनौटी भी रखते थे। आज भी उस पीढ़ी के कुछ लोग चूना मिलाकर सुरती मलते दिखायी दे जाते हैं। वह सुरती गुटके की तरह कैन्सर पैदा करने वाली नहीं होती थी। मुजफ्फरपुर में मैने उसकी खेती देखी है। इसी तरह सिगरेट की जगह बीड़ी का प्रचलन था। पहलवान छाप बीड़ी या 36 नं. मेरे ममेरे भाई बीड़ी पीते थे और फेफड़े की बीमारी से मरे।
मेरा एक आम का बाग था। उसमें जामुन और बेल के भी पेड़ थे ज्यादातर आम के पेड़ देशी थे, बड़े-बड़े पेड़, किन्तु फल अमूमन छोटे-छोटे। अलग-अलग रूप, रंग और गुण के। कोई बहुत मीठा होता तो कोई खट्टा, किसी की गंध लहसुन की तरह होती तो किसी की टटके गुड़ की तरह। सबके आकार भी अलग –अलग होते। कोई समय से पहले पक जाता तो कोई बाद में। कितना वैविध्य था उनमें। उसी के अनुरूप हमने उनका नामकरण भी कर दिया था। मिठउआ, गुरहवा, लिटिअहवा, कोनहवा, लहसुनवा, सेनुरिहवा, बुदबुदिअहवा, मल्दहवा, छिहुलवा, किरहवा, गुठलिहवा आदि। नदुआ, रेहाव और बागापार जाने वाले पैदल यात्री अमूमन हमारे बाग के बीच से होकर गुजरते थे। हम बच्चे बाल्टी में पानी भरकर उसमें पका आम डाल देते थे और जो भी यात्री आते उन्हें आग्रह पूर्वक बैठाकर भरपेट आम खिलाते तब कहीं जाने देते। उस समय प्रतिष्ठित घरों के लोग आम नहीं बेचते, बल्कि लोगों में बांट देते। हमलोग तो आम के दिनों में भोजन कम करते और आम खाकर ही पेट भर लेते। मुझे आम का गाद ( गूदा ) और भूजा मिलाकर खाना बहुत अच्छा लगता और खूब खाता। देशी आम नुकसान तो करता नहीं, हां, जुलाई आते-आते हमारा शरीर जरूर निखर आता। वैविध्य में कितना सौन्दर्य होता है इसका अनुमान हम आमों की विविधता देखकर ही कर सकते हैं। अब बाजार में लंगड़ा, दशहरी आदि तीन चार किस्म के आम ही दिखायी देते हैं।


मेरे गांव में जिस रफ्तार से भौतिक समृद्धि बढ़ी है उससे ज्यादा रफ्तार से चारित्रिक पतन हुआ है। आज गाँव मे जिनके घरों में बेटियां हैं वे उनकी सुरक्षा को लेकर परेशान हैं। पहले गांव के लोग अपने गांव की बहू -बेटियों की इज्जत अपनी इज्जत समझते थे और हर तरह से उनकी हिफाजत करते थे। आज अपने गांव वालों से, पड़ोसियों से यहां तक कि सगे-संबंधियों से ही बेटियों को खतरा है। मैने देखा आज फिर से इज्जत बचाए ऱखने के लिए लोग बेटियों की शादी कम उम्र करने लगे हैं।

पहले की तुलना में अन्य गांवो और शहरो की तरह आज हमारा गांव भी समृद्ध हुआ है। भौतिक साधनों से संपन्न हुआ है। गाँव के बीच से जाने वाली पुरानी कच्ची सड़क अब पक्की हो चुकी है। जहां पहले एक भी स्कूल नही था वहां एक सरकारी स्कूल के साथ दो -दो निजी विद्यालय चल रहे हैं। जहां अपने गांव में मैं पहला ग्रेजुएट था वहां आज कई ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट हो चुके है। हमारे गांव के लड़के आज डाक्टर और इंजीनियर जैसे प्रतिष्ठित पदों पर विराजमान हैं। विरले ही होंगे जो स्कूल न जा रहे हों। गांव में ही बाजार आ चुका है और जरूरत की चीजें गांव में सुलभ है। कई चिउड़ा मिलें हैं। भूजा बनाने की भी मिल है। हमारे गांव का उत्पादित चिउड़ा और भूजा असम तक जाता है। किन्तु लोगों के चेहरों से सुख और सुकून गायब है।

गांव का एक भी परिवार ऐसा नहीं दिखा जिसमें जवान बेटे अपने माता पिता के साथ रह रहे हों। खाने के लाले हैं किन्तु मां –बाप से अलग हो चुके हैं। घर-घर लोग रोग से ग्रसित हैं। हमारे गांव में कई डाक्टर दूकान खोले चौबीस घंटे मौजूद रहते हैं। जानता नहीं कि उनके पास डाक्टरी की डिग्री है या नहीं किन्तु उनकी चलती खूब है। पहले सूगर बुद्धिजीवियों का रोग माना जाता था। किन्तु आज हमारे गाँव में सूगर और ब्लडप्रेशर से मरीज भरे पड़े हैं। चिन्ता रूपी डायन ने पूरे गांव को ग्रस लिया है।
गांव में अब काम नहीं रह गया है। खेती मशीन से होने लगी है। उसके लिए अब न बैलों की जरूरत है और न फसल काटने वाले मजदूरों की। सिर्फ पैसा चाहिए। ट्रैक्टर से बुवाई होती है और कम्पायन से कटाई। अब तो सुना है कि मशीन लेकर लोग घरों तक चले जाते हैं और आप का धान आप के घर पर ही कूटकर साल भर के लिए आप को चिन्तामुक्त कर देते है। खेती करना अब इतना मंहगा हो चुका है कि उसके भरोसे गुजर होना कठिन है, इसलिए घर-घर में लोग बाहर मजदूरी करते हैं या दूसरे पेशे अपनाकर गुजर कर रहे हैं। हमारे गांव के कई दर्जन युवक सऊदी अरब जा चुके हैं। बहुतेरे, दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई आदि दूसरे शहरों में कोई न कोई काम करके जीविका चला रहे हैं। जो बाहर हैं उनके विषय में तो नहीं पता किन्तु जो गांव में रह रहे हैं वे पथभ्रष्ट और कुसंस्कार से ग्रस्त हो रहे हैं। क्या विकास का यही वाजिब रास्ता है?

(लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे हैं।)
कहानी की दूसरी और अंतिम कड़ी। पहली कड़ी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जायें।

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