पानी के बहाने.. स्मृतिपटल पर बसे पुरखों द्वारा खुदवाये गये कुएं

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 डॉ पवन कुमार सिंह

 अफ़सोस की बात है कि जहां बांस बोरिंग के आविष्कारक घनश्याम मंडल को पद्म पुरष्कार मिलना चाहिए था, वहां वे कुत्ते के रेबीज से बिना समुचित इलाज के कुत्ते की मौत मरकर गुमनामी के अंधेरे में खो गये।
माई के आंगन से बाहर निकलकर बाबा के दरवाजे पर आया तो जो चीजें स्थाई रूप से स्मृतिपटल पर बस गयीं उनमें बड़का बाबा का कुआं भी शामिल है। बुढ़िया कबड्डी से लेकर ‘बच्चा फुटबॉल’ खेलने और साईकिल चलाना सीखने तक विस्तृत बाबा के दरवाजे के अंतिम सिरे पर सड़क के किनारे था वह विशाल कुआं। सड़क के उस पार एक बट और एक पाकड़ का बड़ा छतनार वृक्ष। दोनों की शाखाएं एक-दूसरे को छूती थीं और बट की एक लम्बी डाली कुएं के बड़े चबूतरे के एक कोने पर बांह फैलाए शीतल छाया बरसाती थी।

ठीक दरवाजे के सामने उत्तर-दक्षिण एक सीध में हमारे बाबा के बाबा द्वारा रोपे गये वे दोनों पेड़ लगभग दस कट्ठे जमीन में फैल गये थे। हजारों चिरई-चुरमुन और छोटे जीव-जंतुओं का बसेरा तो था ही, घर के पालतू पशुओं सहित राही-मुसाफिरों का विश्रामस्थल भी था वृक्षों का वह जोड़ा। इनारे के पश्चिम बट-पाकड़ की सीध में सड़क के इसपार एक पुराना अशोक था, बाबा के चाचा बड़का बाबा का लगाया। कहते हैं कि इसके पश्चिम वाला इसका जोड़ा भरी जवानी में साथ छोड़ गया था। फिर उसका जोड़ा लगाने की कोशिश नहीं की गयी थी।

अशोक और बड़-पाकड़ के बीच से गांव की सड़क गुजरती थी। गांव हमारे घर से लगभग चार सौ मीटर दूर पश्चिम में था। हमारे पूर्वजों का पहले ‘बासा’ था, जो रायबहादुर से बंटवारे के बाद घर हो गया था। गांव के लोग हमारे घर को बासा ही कहते थे। हमारे पूर्वजों के बसने के पूर्व से गांव आबाद था। पहले यादव, गंगोता, हलवाई, नाई और पासवान की आबादी थी। बंटवारे के बाद बाबा लोग कानू जाति के चार परिवारों के रैयतों को बासा और गांव के बीच अपनी पिछुअत्ती में बसाये थे।

हमारे कोसी क्षेत्र में बड़े कुएं को ‘इनारा’ कहते हैं। बड़का बाबा ने उसे शायद बीसवीं सदी के दूसरे या तीसरे दशक में खुदवाया था। लगभग पन्द्रह-सत्रह फीट की गोलाई में डेढ़ हाथ ऊंचे और उतने ही चौड़े जगत पर पूरब तरफ शिलापट पर मैथिली अथवा कैथी लिपि में कुछ-कुछ लिखा हुआ है जो अस्पष्ट है। जगत के चारों ओर लगभग चालीस फीट की गोलाई में ढलान युक्त चबूतरा है, जिसमें चारों दिशाओं में एक-एक नाली का निकास मार्ग बना हुआ है।

हमारे इलाके में कुओं पर घिरनी-रस्सी लगाने का चलन नहीं है. वहाँ ‘ढेंकुल’ लगाने का रिवाज है। ढेंकुल किसी वृक्ष की मजबूत शाखा से बनाया जाता है, जो ऊपरी सिरे पर गुलेल की मूठ के आकार का होता है। अंग्रेजी के ‘वाई’ अक्षर जैसे उस खम्भे पर सबसे ऊपर लोहे की धुरी जमाकर उसपर बड़े बांस का लीवर बनाया जाता है। यह देहाती यंत्र लीवर तकनीक पर ही काम करता है। आधार के पीछे वाले बांस के छोर पर आवश्यकतानुसार भारी लोहा या पत्थर बांध दिया जाता है, फिर कुएं की ओर वाले छोर पर कुएं की गहराई जितनी लम्बी रस्सी से बाल्टी बांधी जाती है। भार का संतुलन ऐसा कि कमजोर लोग या बच्चे भी कुएं से बाल्टी भरकर पानी निकाल लें।


गांव के मध्य में सीता मड़र के दरवाजे पर एक बिना ढेंकुल के छोटा कुआं था, जिससे गांव के सारे लोग पानी भरते थे। इन्हीं दोनों कुओं से गांव भर के लोग रसोई बनाने और पीने के लिए पानी की जरूरतें पूरी करते थे। नहाने, कपड़ा-बर्तन धोने या मवेशियों को पानी पिलाने के लिए कोसी के कोल (ढाब) का इस्तेमाल होता था, जिसमें सालों भर पानी होता था। भूमि क्षरण के कारण अब यह उथला हो गया है, जिसमें केवल बाढ़ के दिनों में पानी रहता है।
जब हम स्कूल जाने लगे तब इलाके में चापाकल का प्रचलन आरम्भ हुआ था। पहले प्रत्येक टोले में एकाध सरकारी चापाकल सार्वजनिक जगहों पर लगाये गये थे। तब शायद निजी चापाकल बाजार में उपलब्ध नहीं था। कुछेक वर्षों के बाद सम्पन्न लोगों ने अपने आंगन-दरवाजों पर चापाकल लगवाना आरम्भ किया। ये चापाकल दरवाजों पर प्रायः गलियों या सड़कों के बगल में गाड़े जाते थे, जिनसे आम लोग भी पानी ले सकते थे। हमारे क्षेत्र में मिट्टी बलुआही है। पांच-आठ फीट जमीन के नीचे तो खालिस उजली बालू ही है। भूगर्भीय जलस्तर भी काफी ऊपर है; इस कारण चापाकल गाड़ना बहुत आसान होता है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि डीप बोरवेल और मोटर पम्प के प्रचलन से पहले भोज-भात के आयोजन में जहां-जहां पानी की आवश्यकता होती, वहीं चापाकल गड़वा दिया जाता था। दुकान से नया चापाकल सेट लोग ले आते थे; गड़वा लेते थे और भोज ख़त्म होने के बाद उखड़वाकर दुकान पहुंचा देते थे। केवल गलाने-उखाड़ने की मजदूरी और एक वाशर के खर्च में काम चल जाता था। सत्तर के दशक तक हरेक गांव-टोले में चापाकल की भरमार हो गयी थी। उसी दौर में इलाके में डीप बोरवेल का चलन शुरू हुआ। आरम्भ में सरकारी योजनाओं के तहत मोटे गेज के पाइपों व फिल्टरों वाला डेढ़-दो सौ फीट गहरा बोरिंग किया जाता था, जिसे गाड़ने के लिए भारी भरकम मशीनों और जुगाड़ों की जरूरत होती थी। इसके लिए इंजीनियरों की देखरेख में दर्जनों मजदूर हफ्ते-पखवाड़े तक काम करते थे। ऐसे बोरिंग में बहुत बड़े डीजल पम्पिंग सेट लगते थे। अधिक खर्च और भारी तामझाम के चलते ऐसे बोरिंग केवल बड़े किसान ही करवा पाते थे।


अस्सी के दशक में बांस बोरिंग के अविष्कार से हमारे इलाके में सिंचाई क्रांति आ गयी। मेरी जानकारी में बांस बोरिंग के आविष्कारक कटिहार (तत्कालीन पूर्णिया) जिले के कोशकीपुर निवासी चापाकल मिस्त्री घनश्याम मंडल थे। उन्होंने बांस, लोहे के पत्तर और नारियल की रस्सी से फिल्टर बनाकर गलाने और उसके ऊपर बीस फीट लोहे की पाइप लगाकर बोरिंग का सफल परीक्षण करके चमत्कार कर दिखाया। यह बोरिंग पूर्णतः बिहारी जुगाड़ तकनीक पर आधारित था। पत्तरों के रिंग बनाकर उनके ऊपर बांस की फट्ठिया। कीलों के सहारे जमायी जाती थीं। उसके ऊपर नारियल की रस्सी की दो सतहें लपेटी जाती थीं। इस प्रकार तैयार बीस फीट का फिल्टर बीस फीट नीचे गलाया जाता, फिर उसके ऊपर बीस फीट पाइप लगायी जाती थी। खालिस बालू होने के कारण फिल्टर दस वर्ष से भी अधिक सही-सलामत रह जाता था। बाद के दिनों में धीरे-धीरे इस तकनीक में सुधार होता गया। निरंतर लागत कम और बोरिंग की आयु बढ़ती चली गयी।

आजकल नारियल की रस्सी के बदले सिंथेटिक मच्छरदानी और लोहे की पाइप के बदले पीवीसी पाइप का इस्तेमाल किया जाने लगा है। कुल मिलाकर लागत इतनी घट गयी है कि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बोरिंग करवाकर सीमांत किसान तीन-तीन फसलें उपजाने लगे हैं। यहां उल्लेखनीय है कि इतने बड़े पैमाने पर भूगर्भीय जलस्रोत का दोहन होने के बावजूद उस क्षेत्र का जलस्तर बहुत नीचे नहीं गिरा है। इसका कारण यह है कि बलुआही मिट्टी और सालाना बाढ़ के चलते जमीन के अन्दर वाटर रिचार्ज होता रहता है। 

इस अविष्कार के आम प्रचलन से कोसी क्षेत्र में सही मायने में हरित क्रांति चरितार्थ हो रही है।किन्तु अफ़सोस की बात है कि जहां बांस बोरिंग के आविष्कारक घनश्याम मंडल को पद्म पुरष्कार मिलना चाहिए था, वहां वे कुत्ते के रेबीज से बिना समुचित इलाज के कुत्ते की मौत मरकर गुमनामी के अंधेरे में खो गये। कोसी क्षेत्र के किसान और आम जनता की ओर से उस क्रांतिकारी आविष्कारक को कोसिपुत्र का बारम्बार नमन!

(लेखक एसएसवी कॉलेज, कहलगाँव में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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