मैं ही महेंदर मिसिर हूं…

निराला विदेशिया
हेंदर मिसिर कलकत्ता गये। एक गायिका की महफिल में पहुंचे। उस गायिका ने उस शाम महेंदर मिसिर के ही गीतों को सुनाया। वह चेहरे से नहीं जानती थी महेंदर मिसिर को, इसलिए स्वाभाविक तौर पर वह जान न सकी कि श्रोताओं में महेंदर मिसिर भी हैं। लोग वाह-वाह करते रहे।

असल में उस गायिका की ख्याति भी महेंदर मिसिर के गीतों को गाने की वजह से तेजी से फैली थी। महेंदर मिसिर पहुंचे भी थे ख्याति सुनकर ही। गायन खत्म हुआ। लोग नेग-न्योछावर कर रहे थे महफिल में। वह नेग या न्योछावर लेने महेंदर मिसिर के सामने पहुंची। महेंदर मिसिर ने कहा कि आप बहुत अच्छा गायीं। और अच्छे से गा सकती थी। पुरबी गा रही थीं तो उठान-रूकान-ढलान पुरबी गायकी का मूल होता है। गायिका आग-बबूला। वह गुस्से में बोली कि आप समझाओगे मुझे महेंदर मिसिर के गीतों को गाना। मुझे उन्होंने खुद गीत दिये हैं, उनसे ही सिखी हूं कि कैसे गाना है। आप सिखाओगे पुरबी और उसमें भी महेंदर मिसिर का गाना। महेंदर मिसिर चुप। गायिका का गुस्सा उतरने का नाम नहीं ले रहा था। उसे लगा कि उसकी गाय​की पर टिप्पणी कर एक नये श्रोता ने उसकी तौहिनी कर दी।

उसने महेंदर मिसिर के सामने हारमोनियम रखा। कहा कि पुरबी गा सकते हो? गा सकते हो, सउर है तो पुरबी का आलाप लेकर, गाकर सुनाओ। गायिका को यह मालूम था कि पुरबी सुनना रसदार होता है, आनंद से भरनेवाला लेकिन पुरबी गाना सबके बस की बात नहीं होती। पुरबी गाने के लिए सुरों की साधना के साथ अंदर उर्जा भी चाहिए होती है। महेंदर मिसिर ने कहा कि आप बेजा बुरा मान गयीं, मैंने टिप्पणी नहीं की, बस लगा तो कहा। गायिका हारमोनियम सामने रखकर बदला लेने की जिद पर थी। महेंदर मिसिर हारमोनियम पर बैठे। गाना शुरू किये। अपने ही पुरबी को गाना शुरू किये। महफिल स्तब्ध। गायिका स्तब्ध। गायन खत्म हुआ। गायिका पूछी कि आप महेंदर मिसिर के गीत और उसमें भी पुरबी, इतने साधकर कैसे गा रहे? क्या आप उनके ही इलाके से हैं? उनसे सिखे हैं क्या? महेंदर मिसिर चुप थे। गायिका के बार-बार पूछने पर उन्होंने आहिस्ते से कहा-मैं ही महेंदर मिसिर हूं। गायकी रूक गयी थी। गायिका के आंखों में आंसुओं की धार शुरू हो चुकी थी।


महेंदर मिसिर, भिखारी ठाकुर और गांधीजी
आज महेंदर मिसिर की जयंती है। कायदे से उन पर ही बात होनी चाहिए, पर उनका स्मरण करते हुए भिखारी ठाकुर और गांधीजी की भी याद आ रही है । तीनों में एक समानता मिलती है । ये तीन ऐसे नायक होते हैं, जो पुरबिया इलाके में तवायफों को उन्हें उनका सम्मान दिलवाते हैं । मुख्यधारा में समान अधिकार दिलवाने की कोशिश करते हैं । भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाटक तो जानते ही हैं हम सब । उसका मर्म और मूल तो यही है कि उसके जरिये भिखारी ठाकुर रखैलीन को,जो कलकत्ते की तवायफ है, उसके प्रेम को, उसकी संतानों को घर में स्वीकार्य करवाते हैं। अब बात गांधी की तो, दो किस्से याद आ रहे हैं। एक, जब राष्ट्रीय आंदोलन के दिनों में गांधी काशी आये । काशी आये तो उन्होंने विद्याधरी बाई से मुलाकात की । अपने जमाने की मशहूर गायिका, कलाकार । उन्होंने कहा कि आपलोग भी राष्ट्रीय आंदोलन में अपना योगदान दे । गांधी ने विद्याधरी भाई से खुद यह आग्रह किया ।

असर यह हुआ कि अखिल भारतीय तवायफ संघ बना । तवायफों ने चंदा किया । राष्ट्रीय आंदोलन में दान दिये । गांधी कलकत्ता पहुंचे तो उन्होंने खुद पहल कर गौहर जान से मुलाकात की । गौहर जान को गांधी ने कहा कि मेरी इच्छा है कि आप अपना विशेष कंसर्ट राष्ट्रीय आंदोलन के लिए चंदा जुटाने के लिए भी करें। गौहर जान के लिए यह अविश्वसनीय था कि युगपुरूष उन्हें सामने से आकर जुड़ने का आह्वान कर रहा है। गौहर जान ने ऐसा किया। और महेंदर मिसिर की बात तो हम सब जानते ही हैं। वह तो अपने समय में पुरबिया इलाके के तवायफों, गायिकाओं के आधार सरीखे थे। बनारस से कलकत्ता के बीच जो पुरबिया इलाका बनता है, इस इलाके में बसी तवायफों का महेंदर मिसिर से रागात्मक लगाव था । भोजपुरी में लिखनेवाले महेंदर मिसिर उनके लिए हिंदी-उर्दू गजलों को लिखना शुरू कर दिये थे, ताकि उनकी महफिल गुलजार रहे। और यह किस्सा तो सब जानते ही होंगे जब महेंदर मिसिर को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उनके जमानत लेने की बारी आयी तो न जाने कितनी तवायफें पटना पहुंच गयी अपने गहना-पटोर और पैसे के साथ। जज के सामने यह अर्जी लेकर कि हुजूर कितनी रकम चाहिए बाबा के जमानत के लिए। जीवन भर की कमाई हम न्योछावर कर देंगी, बस बाबा का जमानत चाहिए।

(फेसबुक पोस्ट साभार)

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