स्कूली बच्चों के लिए लाईब्रेरी संवारते फैसल…

 

ये पूछने पर कि आप किस लाइब्रेरी को ज्यादा पसंद करते हैं डिजिटल या फिजिकल फैसल ने हंसते हुए कहा बेशक फिजिकल उसका कोई मुकाबला नहीं इसलिए मैंने हमेशा बच्चों को लाइब्रेरी में आने को प्रेरित किया है, मैं उन बच्चों को भी लाइब्रेरी आने को कहता हूं जो कोई किताब नहीं पढ़ना चाहते, मेरा मानना है वो देखकर बहुत सीखते हैं और प्रेरित होते हैं।

मनोरमा सिंह, घुमंतू पत्रकार

भारत में शिक्षा में प्रयोगों और ख़ासतौर पर प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर प्रयोगों को लेकर अक्सर एक किस्म का यथास्थितिवाद रहा है जबकि यहां बेहतर किये जाने की विशाल संभावनाएं हैं। हालांकि  इंटरनेट, डिज़िटल और ऑनलाइन पढ़ने -पढ़ाने के इस दौर में काफी कुछ बदल गया है और शैक्षिक प्रथाओं में बदलाव के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी में बड़े पैमाने पर निवेश भी किया गया, लेकिन शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन लाने के लिए बहुत अधिक प्रयास नहीं किए गए हैं। वैसे कोविड -19 के कारण शुरू हुए लॉक डाउन ने जरूर काफी कुछ बदल दिया है डिजिटल या ऑनलाइन शिक्षा पिछले डेढ़ साल में अब अनिवार्य जरूरत साबित हो चुकी है और भविष्य इसी का है।

बहरहाल, इसी व्यवस्था में हमेशा से कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने समय से आगे सोचते हैं और उस सोच को हकीकत में भी बदलते हैं,केरल के तिरुवनन्तपुरम जिले के पट्टोम केंद्रीय विद्यालय के लाइब्रेरियन, फैसल एस एल भी ऐसे ही लोगों में से एक हैं। जिन्होंने कोविड काल में नहीं बल्कि साल 2003 से ही जबसे उन्होंने केंद्रीय विद्यालय ज्वाइन किया तबसे नई तकनीक और स्कूल में छात्रों के पढ़ने -पढ़ाने में रोज उसके इस्तेमाल को लेकर प्रयोग करते रहे हैं।

नए और सफल प्रयोगों के लिए उनके नाम इतने सम्मान और पुरस्कार हैं कि यहां सबका जिक्र करना मुश्किल है। इसी वर्ष सितंबर में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2021 के 44 शिक्षकों में से एक होना भी इसी की अगली कड़ी है। फैसल इस सम्मान को सबसे ख़ास मानते हैं आखिरकार ये देश की ओर से दिया जाने वाला  राष्ट्रीय सम्मान है और उनके अब तक के किये गए प्रयोगों और नवाचारों का सम्मान है।  वो कहते हैं अब  मेरी जिम्मेदारी और बढ़ गई है, इस सम्मान से मुझे और बेहतर सोचने और करने की प्रेरणा मिली है।

फैसल को 2017 में शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कार के लिए चुना गया था। उनके द्वारा किए गए आईसीटी हस्तक्षेपों के कारण स्कूल को “केवीएस-इंटेल इंटीग्रेशन ऑफ टेक्नोलॉजी इन स्कूल अवार्ड” हासिल हुआ। वर्ष 2011 में  आईसीटी परियोजना, ‘लाइब्रेरी जंक्शन’ ने एनसीईआरटी और केवीएस द्वारा अभिनव अभ्यास और प्रयोग के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। उन्हें 2012 में स्कूल लाइब्रेरियनशिप के लिए आईएएसएल इंटरनेशनल एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

फैसल मूलतः केरल के त्रिवेंद्रम के रहने वाले हैं, 2003 में उन्होंने एक लाइब्रेरियन के रूप में जम्मू और कश्मीर के बारामूला में केंद्रीय विद्यालय ज्वाइन किया था और उसी स्कूल से लाइब्रेरी में अपने नए प्रयोगों की शुरुआत की थी। कश्मीर के अनुभव के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कश्मीर में सामाजिक जीवन थोड़ा मुश्किल था लेकिन बच्चों के साथ बहुत मज़ा आया। अपने कार्यकाल में स्कूल की लाइब्रेरी को फैसल ने अपनी सोच और संकल्पना से केंद्रीय विद्यालय जम्मू क्षेत्र की सबसे बेहतरीन लाइब्रेरी में बदल दिया।

2007 में उनका स्थानांतरण केरल के तिरुवनन्तपुरम में स्थित पट्टोम केंद्रीय विद्यालय में हुआ और तब से लगातार वो इस स्कूल में कुछ नया, कुछ अलग करने की कोशिश करते रहे हैं।  2007 में स्कूल लाइब्रेरी ब्लॉग लॉन्च करने वाले वे  देश के पहले व्यक्ति थे। उन्होंने  2010 में एक ऑनलाइन अकादमिक सोशल नेटवर्क, ‘लाइब्रेरी जंक्शन’ विकसित किया। ई-रीडिंग को बढ़ावा देने के लिए 2014 में एक ‘ई-रीडिंग हब’  पुस्तकालय में 10 ई-रीडर के साथ स्थापित किया। अपनी इन योजनाओं के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा -2007 में जब पट्टोम केवी ज्वाइन किया तब स्कूल की लाइब्रेरी उतनी व्यवस्थित नहीं थी मैंने लाइब्रेरी के ऑटोमेशन से शुरुआत की। 2007 के आखिर में  लाइब्रेरी ब्लॉग वेबसाइट शुरू किया जो देश का पहला लाइब्रेरी ब्लॉग था, जहाँ लाइब्रेरी की हर किताब, सिलेबस और स्टडी मटीरियल और रिसोर्स की जानकारी उपलब्ध थी। इस ब्लॉग पर प्रतिदिन 2000 से ज्यादा विजिट दर्ज़ होती है।  इसके बाद देश के हर केवी के लिए लाइब्रेरी ब्लॉग अनिवार्य कर दिया गया।  2008  में फैसल ने ई मैगज़ीन की शुरुआत की ये भी अपने समय से पहले की बात थी जहाँ बच्चे अपनी रचनात्मकता शेयर कर सकते थे, बाद में इसे भी सभी केंद्रीय विद्यालयों में अनिवार्य किया गया।  2009  में होमवर्क और असाइनमेंट को भी इन्होने ऑनलाइन किया ताकि छात्र  जिस दिन गैरहाज़िर रहे उस दिन के होम वर्क और असाइनमेंट को भी कहीं से भी देख सकें, डाउन लोड कर सकें और अगले दिन टीचर को अपना काम सौंप सके।

अब जबकि देश के सभी केंद्रीय विद्यालयों के लिए फेसबुक और ट्वीटर पेज रखना अनिवार्य हो गया है फैसल बताते हैं उन्होंने उन्होंने 2010  “लाइब्रेरी जंक्शन ” नाम से स्कूल का सोशल मीडिया नेटवर्किंग  शुरू किया जहाँ स्कूल के छात्र और शिक्षक आपस में मेल जोल कर सकें और विचारों का आदान प्रदान कर सकें।  इस प्रोजेक्ट को दो अवार्ड मिले

फैसल ने छात्रों के बीच सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने के लिए  2013 में ‘गिफ्ट ए बुक’ और ‘गेट ए फ्रेंड’ कार्यक्रम शुरू किया था, कार्यक्रम के तहत  केवी पट्टम के छात्रों ने तिरुवनंतपुरम जिले के सरकारी स्कूलों का दौरा किया, समाज के हाशिए पर रहने वाले वर्गों के छात्रों के साथ मेलजोल किया और उन्हें किताबें साथ ही पढाई के लिए जरूरी सभी सामग्री भी। उपहार में दीं। आंदोलन ने 2021 तक 7 स्कूलों को कवर किया है और 4000 किताबें उपहार में दी हैं। अब तक इन्होने 7 स्कूल को कवर किया है और  हर स्कूल में छात्रों और सामुदायिक योगदान से लाइब्रेरी स्थापित किया है। इस योजना ने कम सीमित संसाधन या गरीब परिवारों से आने वाले छात्रों को बहुत लाभान्वित किया है साथ ही समृद्ध छात्रों में   समाज को वापस लौटाने की भावना को मजबूत किया है। ख़ास बात ये है कि इसके तहत कई छात्र अलग पृष्टभूमि के बावजूद आपस में हमेशा की दोस्ती के रिश्ते बनाते हैं, कुछ छात्र मेंटर बनकर गाइड करते हैं।

2014 में “फेस अ बुक” की शुरूआत की, गर्मी की छुट्टियों से पहले इसके लिए रजिस्ट्रेशन किया जाता है और छुट्टियों में छात्रों को अपनी पसंद की चुनी किताब को पढ़ना होता है और उसपर सारगर्भित समीक्षा लिखनी होती है।  जिसे बाद में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है।
और 2020 में एक वर्चुअल लाइब्रेरी और एक ऑडियो लाइब्रेरी खोली। 2021 में  स्मार्टफोन पर पुस्तकालय लांच किया।

पट्टोम केंद्रीय विद्यालय से ट्रांसफर हो जाने पर वो क्या करेंगे इस पर फैसल कहते हैं नए स्कूल में फिर नए प्रयोग, अपनी अगली नई योजना की बात पर फैसल ने कहा अब मैं होम बेस्ड सेपरेट डिजिटल लाइब्रेरी पर काम करना चाहता हूं ताकि छात्र डिजिटली कैसे अपनी लाइब्रेरी को व्यवस्थित रख सकें और कैसे आपस में अपनी लायब्रेरी शेयर कर सकें।  

और आखिर में  ये पूछने पर कि आप किस लाइब्रेरी को ज्यादा पसंद करते हैं डिजिटल या फिजिकल फैसल ने हंसते हुए कहा बेशक फिजिकल उसका कोई मुकाबला नहीं इसलिए मैंने हमेशा बच्चों को लाइब्रेरी में आने को प्रेरित किया है, मैं उन बच्चों को भी लाइब्रेरी आने को कहता हूं जी कोई किताब नहीं पढ़ना चाहते, मेरा मानना है वो देखकर बहुत सीखते हैं और प्रेरित होते हैं। मैंने रीडिंग बडी की अवधारणा पर भी काम किया है जिसमें कोई और दोस्त उस दोस्त के लिए किताब पढता है जिसे किताबें पढ़ने में मन नहीं लगता और सच में इसका असर होता है।

 

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