
मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर पूर्वी चम्पारण जिला की सीमा से सटा गांव है अहियापुर। एक समय था जब अहियापुर गांव के बगल से सालों भर पानी से लबालब रहने वाली बाया नदी बहती थी। मछली पालन से लेकर खेतों की सिंचाई में भी बाया नदी के पानी का उपयोग किया जाता था। महिलाएं झुंड बनाकर कपड़े धोने नदी घाट जाती थीं। नदी का पानी इतना शुद्ध होता था कि बिना साबुन के भी बहुत गंदे कपड़े साफ हो जाते थे। उस समय शैम्पू का भी जमाना नहीं आया था और नदी के किनारे की मिट्टी से ही बाल धोया जाता है। आज यह नदी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रही है। अब लोग नदी की पेटी में ही खेती करने लगे हैं। करीब एक दशक पूर्व नदी की पेटी को गहरा करने और व दोनों किनारों को मिट्टी डालकर तटबंध बनाने की योजना बनी थी। न जाने उस योजना का क्या हुआ? अहियापुर गांव के लोगों को इस योजना में कोई दिलचस्पी भी नहीं है। शायद लोगों ने नदी के बिना जीवन जीना सीख लिया है। इसी अहियापुर गांव में मेरा जन्म हुआ था जिसकी कहानी बाया नदी की कहानी से बहुत कुछ मिलती जुलती है।

गांधी जी की चम्पारण यात्रा के समय पूरा अहियापुर अपने गांव के ही एक प्रतिष्ठित व्यापारी स्वर्गीय हरगुण लाल साह के नेतृत्व में मोतिहारी स्टेशन पहुंच गया था। गांधी के चम्पारण आने से पहले ही उनकी ख्याति चम्पारण और उसके आसपास के क्षेत्रों में पहुंच गई थी। यहां के लोग यही मान रहे थे कि एक अवतारी पुरुष उनके क्षेत्र में आ रहा है जो उन्हें अंग्रेजों से आज़ादी दिलवाएगा ही साथ ही उनकी व्यक्तिगत समस्याओं का भी समाधान करेगा। इसी मूल भावना से पूरा गांव बैलगाड़ी, हाथी, घोड़ा जो भी उनके पास था, पर खाने-पीने की चीजें लेकर गांधी के चम्पारण पहुंचने से पहले वहां पहुंच गया था।
हरगुण लाल साह द्वारा बनवाए गए इस स्कूल ने लगभग दो दशक में गांव की किस्मत बदल दी। गांव का कोई ऐसा घर नहीं रहा जहां के बच्चे शिक्षित न हुए। यहां के बच्चों ने शीघ्र ही शिक्षा, इंजीनियरिंग, बैंकिंग और अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करना शुरू कर दिया। कलक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर आदि सभी पदों पर इस स्कूल के पढें विद्यार्थियों ने सफलता पाई। जब कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़ा-अतिपिछड़ा वर्ग आरक्षण लागू किया तो इस गांव के शिक्षित युवाओं ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए। अहियापुर एक पिछड़ी जाति बहुल गांव है लेकिन शिक्षा के मामले में अगड़ी जाति के गांवों को भी पीछे छोड़ देता है। इन पंक्तियों के लेखक को मुजफ्फरपुर शहर में आने से पहले पता ही नहीं था कि वह पिछड़ी जाति में आता है।
1990 के मंडल और राम मंदिर आंदोलन ने भी अहियापुर गांव को तेजी से आंदोलित किया था। आज़ादी के बाद से ही गांव के लोग डॉ राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन से प्रभावित थे। इसी कारण एक तरफ वे समाजवादी विचारधारा की पार्टी जनता दल के साथ रहे तो दूसरी तरफ राम मंदिर आन्दोलन को तन मन धन तीनों से सहयोग किया। यहां मुसलमानों की भी अच्छी आबादी है लेकिन किसी भी तरह का साम्प्रदायिक विद्वेष नहीं फैला। कुल मिलाकर मंडल और मंदिर दोनों आंदोलनों में इस गांव के लोग पूरी तरह सक्रिय रहे।
1990 में ही वैश्वीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत हुई। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने गांवों के नष्ट होने की प्रक्रिया को तेज कर दिया। शहर केंद्रित विकास नीति में गांवों का जीना मुहाल हो गया। आज अहियापुर गांव का वह स्कूल अपनी दुर्दशा पर रो रहा है। भले ही स्कूल की बिल्डिंग नई बन गयी है, मध्यान्ह भोजन योजना के तहत बच्चों को भोजन भी मिलने लगा है लेकिन जो मिलना चाहिए वह शिक्षा उन्हें नहीं मिल रही है। कहने को तो शिक्षा मित्रों की भी नियुक्ति हुई है लेकिन घर से टंगवाकर स्कूल लाने वाले कपिल देव सिंह, राम सागर साहू, आदि मास्टर साहब गायब हो गए। शिक्षक और छात्र दोनों को शिक्षा से कोई मतलब नहीं रहा। जिन्हें मतलब है या जो प्राइवेट स्कूल में जा सकते हैं वे इस स्कूल की तरफ देखना भी पसंद नहीं करते।

आज गांव का हाल यह है कि सभी वहां से निकलना चाहते हैं। जो निकल सकते थे, निकल गए। शिक्षा, नौकरी, व्यापार आदि की तलाश में रोज कोई न कोई गांव छोड़ दे रहा है लेकिन हमारे अंदर का गांव हमसे बाहर नहीं निकल पा रहा है। हम ख्यालों में गांव चले जाते हैं, लीची के मौसम में, छठ के महीने में, होली के दिन, पंचायत चुनाव में या हर उस घटना पर जो हमें गांव की याद दिलाती है। ख्यालों में हमारा वह अहियापुर गांव हमेशा जिंदा रहेगा जहाँ मेरा जन्म हुआ, जहां मैं पला-बढ़ा और शिक्षा पाई।
(पूर्व पत्रकार डॉ अरुण कुमार भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली में फेलो रहे हैं। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)




