प्रो डॉ श्रीप्रकाश
सिंह
महात्मा गांधी का आदर्श निस्संदेह अनुकरणीय है, लेकिन आजादी के बाद से ही गांधी के आदर्शों को कमोबेश त्याग दिया गया। गांधी कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के पक्षधर थे, मध्यम दर्जे का उद्योग लगाए जाने की बात करते थे। यह कोई नई बात नहीं थी। 17 वीं व 18 वीं शताब्दी में हमारे गांव पूरी तरह से आत्मनिर्भर थे। गांव में ही बाजार था, जहां जूते, सब्जी, वस्त्र सब मिल जाते थे। आज गांव के लोग जरूरत की इन वस्तुओं की खरीदारी के लिए शहर की ओर भागते हैं। किसानों की आमदनी में कमी आई है जिसके कारण जीवन मुश्किल हो गया है। हम सब रोटी खाना चाहते हैं, लेकिन धान-गेहूं नहीं उगाना चाहते। कृषि पूरी तरह से अर्थ पर आधारित हो गयी है।
देश में पंचायती राज व्यवस्था तो लागू किया गया, लेकिन वह गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना के बिल्कुल उलट है। गांव की आत्मनिर्भरता में भूमिका निभाने के बजाए पंचायतें राजनीति का अखाड़ा बन गई हैं। इससे ग्राम समाज की एकजुटता प्रभावित हुई है। गांधी चाहते थे कि स्थानीय समस्याओं का निराकरण ग्राम स्तर पर हो। ग्राम समाज में पंच परमेश्वर की परंपरा जीवित रहे। राजनीति के हस्तक्षेप के कारण पंच परमेश्वर की व्यवस्था खत्म हो गयी है। इसके दो प्रमुख कारण दिखाई देते हैं। पहला बाजार का बढ़ता प्रभाव, दूसरा गांव के आसपास सुविधाओं और संसाधनों का अभाव। मूल रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।
मैं उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के मुरैनी गांव से आता हूं। उस समय गांव में जो प्राथमिक विद्यालय था, वह आज भी है। अंतर बस इतना आया है कि उस समय के शिक्षक दायित्व समझ के पढ़ाते थे, लेकिन आज स्कूल में शिक्षकों का अभाव है। प्राथमिक विद्यालय में गरीब परिवार के बच्चे ही पढ़ने जाते हैं, जिसके पास थोड़ी सी सुविधा है, वह तो अपने बच्चों को निजी संस्थाओं में पढ़ाना चाहता है। स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण समाज परंपरागत औषधियों और अप्रशिक्षित चिकित्सकों के भरोसे रहता है। बाजार और रोजगार की मजबूरी में युवा वर्ग गांव से बेदखल होता जा रहा है। गांवों में बुजुर्ग ही देखे जा रहे हैं। भारतीय समाज के मूलाधार संयुक्त परिवार का बंधन भी कमजोर होने लगा है।
शहरों के प्रभाव और जातीय राजनीति ने गांव समाज को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पहले गांव का प्रत्येक व्यक्ति रिश्ते में कुछ न कुछ लगता था, उनकी जाति चाहे कुछ भी हो। लेकिन बदलती राजनीति और राजनीति में बंधे जातीय प्रभुत्व ने उन रिश्तों को ही खत्म कर दिया। यदि गांव की संरचना देखें तो सदियों से गांव की बसावट में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। छुआछूत, धर्मांन्धता जैसी बुराईयां ग्राम समाज में बरकरार हैं, व्यक्ति शहर के संसर्ग में आकर भी लोगों का अभ्यास नहीं बदल रहा।
मेरे दादा रघुराज सिंह 45 वर्षों तक ग्राम प्रधान रहे। यह शायद उत्तर प्रदेश में रिकार्ड भी है। पूरे जीवन में उन्हें सिर्फ दो बार चुनाव लड़ना पड़ा। सामान्यतः उनके विरोध में कोई चुनाव नहीं लड़ता था। उनके प्रति लोगों की श्रद्धा ऐसी थी कि यदि कोई आपस में झगड़ा कर रहा हो और उनके आने की खबर होते ही या उनका नाम लेते ही झगड़ा बंद हो जाता। उनकी पंचायत का निर्णय जिला न्यायालय के निर्णय की भांति सर्वमान्य होता था। गांव में सड़क नहीं थी तो उनके नेतृत्व में गांव के लोग त्योहारों के उपलक्ष्य में श्रमदान किया करते थे। वे स्वयं सुबह-शाम घूमते हुए गांव के लोगों का समाचार लेते रहते थे। लेकिन यह 1989 के पहले का दौर था, जब पंचायतों में पैसा होता ही नहीं था।
जबसे पंचायतों में पैसा आना शुरू हुआ, उसका स्वरूप भी बदलना शुरू हुआ। पंचायतों में जाति, धर्म, टोला आदि विभेद और ग्राम प्रधानों द्वारा या सरकारी तंत्र के द्वारा भ्रष्टाचार के दर्शन होने लगे। पंचायतों के माध्यम से सामाजिक चौकीदारी या देखरेख का जो स्वप्न गांधी ने देखा था, वह अब दिवास्वप्न हो गया है। मेरे परिवार में 1984 तक अनाज बेचा नहीं गया। अपने जरूरत के अतिरिक्त ग्राम जीवन को चलाने वाले नाई, धोबी, लोहार, मुसहर, नट, केवट, ब्राहम्ण और कोई ऐसा किसान जिसकी उपज खराब हो गई हो, को बुलाकर सम्मान सहित बखार की व्यवस्था कर दी जाती थी। यह सब मैने स्वयं देखा है और सहयोग भी किया है। परंतु अब यह संभव नजर नहीं आता।
गांवों में कृषि के प्रति रूझान इसलिए भी कम हो रहा है क्योंकि किसान को जीवन की आवश्यक सुविधाएं और उचित सम्मान नहीं मिल पाता। उसको आज भी मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। किसानों ने भी स्वयं को परिवर्तित कर लिया। पहले दरवाजे पर बैलों की जोड़ी का बंधा होना सामर्थ्यवान होने का सूचक होता था, दरवाजे पर बंधा पशुधन सिर्फ पशु नहीं था बल्कि किसान के मन में उसके प्रति ममत्व का भाव भी रहता था। उसका ध्यान परिवार के सदस्य की भांति रखा जाता था, प्रत्येक व्यक्ति अपने भोजन से मवेशियों के लिए रोटी अवश्य निकालता था। नियमतः परिवार के बड़े व्यक्ति द्वारा रोटी और सानी की व्यवस्था की जाती थी। पशु स्वस्थ रहें इसके लिए नीम खली, सरसों खली का इंतजाम किया जाता। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। दूध सबको चाहिए, लेकिन गाय कोई पालना नहीं चाहता। उन्नत किस्म का अनाज चाहिए लेकिन उपजाना नहीं चाहता। कृषि के प्रति बढ़ते उपेक्षा भाव ने भी गांव के जीवन को बहुत प्रभावित किया है। मुझे लगता है कि अब नगरीय गांव की स्थापना की जानी चाहिए जिससे गांव के नजदीक ही अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और बाजार की व्यवस्था की जा सके।

मेरा मानना है कि गांधी के सिद्धांतों को बदलते परिवेश के अनुसार ढ़ालना चाहिए और शहरों पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए नगरीय गांव को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह समझना होगा कि शहरों की नकल से गांव का विकास नहीं हो सकता, बल्कि इससे गांव के स्वत्व के खत्म होते जाने का खतरा है। अभी तक यह देखा गया है कि नदी या सड़क के किनारे के गांवों में विकास की रोशनी कुछ हद तक पहुंच भी जाती है, लेकिन दूर-दराज के गांवों में अमूमन विकास नहीं हो पाता। यदि ग्राम संकुल या कल्स्टर बनाकर विकास योजनाओं को आगे बढ़ाया जाए तो इससे गांव आत्मनिर्भर भी होंगे और इलाके का विकास भी होगा।
(दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं।)

