गांव से नगर बनने की यात्रा में खो गया गांव गजरौला

पंकज पुष्कर, पूर्व विधायक दिल्ली

मेरा गांव गजरौला है जो उत्तर प्रदेश राज्य के अमरोहा ज़िले में स्थित एक नगर व नगर पालिका परिषद है। गजरौला गंगा नदी की पूर्वी ओर राष्ट्रीय राजमार्ग 24 व राष्ट्रीय राजमार्ग ९ पर स्थित है। यह राजमार्ग उसे पश्चिम दिशा में गंगा की दूसरी पार गढ़मुक्तेश्वर से जोड़ता है। बड़ी बात ये है कि गजरौला मेरे देखते-देखते गांव से कस्बे और नगर पंचायत में बदल गया। मुझे याद आता है जब वह गांव हुआ करता था तो अपने किस्म का प्राणवान गांव हुआ करता था। लेकिन इस बीच काफी कुछ ऐसा बदला कि जो बहुत अप्रिय किस्म का है। बहुत जन विरोधी मिजाज का है।

मेरी जो दृष्टि बनी है वह सिर्फ मेरे गांव से नहीं आती। 1992 में जब भारतीय जन आंदोलन की स्थापना हुई तभी मैं ब्रह्मदत शर्मा जी से जुड़ गया और उससे पहले मैं गांधी और लोहिया की धाराओं को पढ़ते हुए गुजर रहा था। उससे कुछ अपूर्णताः महसूस हो रही थी इसलिए मैं भारतीय जन आंदोलन की ओर गया। चुनावी राजनीति को बहुत करीब से देखने के बाद मैंने गैर चुनावी राजनीति में भागीदार बनना तय किया था और उसके बाद मेरी जो विश्वदृष्टि बनती है, उसमें भारतीय जन आंदोलन के दौरान जब मैंने झारखंड, छत्तीसगढ़ तमाम आदिवासी इलाको के, सघन किसानी क्षेत्रों के अनुभव और उत्तराखंड में लंबा समय व्यतीत करने के बाद जो अनुभव है उससे मेरी गांव को लेकर समझ विकसित होती है। यह सभी मेरी पूंजी है।

बचपन को जब याद करता हूं तो गजरौला का ग्राम चुनाव याद आता है, जिसमें बहुत अपनापन था। आम के बाग बगीचे थे, आपके घर में जो बना है वह जब आपको प्रिय नहीं है तो आप पड़ोस के घर में जाकर पूछ लेते थे चाची क्या बना है? आप जाकर मांग लेते थे। कभी घर में चीनी खत्म हो जाती थी तो पड़ोस के घर में जाकर एक कटोरी चीनी मांग लेते थे, कई बार आटा भी मांग लेते थे। यह सब लेनदेन का व्यवहार चलता था। मुझको बहुत अच्छी तरह से याद है कि यह ऐसा दौर था कि हमारे घर में और पड़ोस के घर में एक खिड़की सी बनी रहती थी जिसमें हम एक घर से दूसरे घर में जा सकते थे। उसकी बातें सुन सकते थे और उसको लेकर बहुत बड़ा प्राइवेसी का उल्लंघन हो गया, ऐसा हमें महसूस नहीं होता था। मुझे ऐसा गांव याद आता है बचपन का जिसमें आसपास के घरों की छत मिली रहती थी। हम कूद-कूद कर एक दूसरे की छतों पर जाते थे। अपनापन महसूस होता था। वह गांव का समय हमें याद आता है, जब दोपहर में हम सभी बच्चे गांव के मिलकर खेलते थे और पढ़ाई करते थे। चर्चा करते थे अपने अपने परिवेश से सीखते थे। उस गांव को मैंने बदलते हुए देखा है। औद्योगिक किस्म के कस्बे में अपने गांव को हमने बदलते हुए देखा। उस पूरी राजनीति को बदलते हुए देखा है।

मैं  एक रूपक के रूप में कहूं तो मेरे गांव के करीब एक नदी थी जिसका नाम था बगद। गंगा मेरे घर से आठ या दस किलोमीटर दूर है। बगद उसकी एक सहायक नदी है जो गंगा में जाकर मिल जाती थी। वह बगद नदी जिसके पास मेरे बहुत सारे पुरखे दफन हुए हैं। कोई वयस्क मरता था तो गंगा के करीब ले जा कर उसका अंतिम संस्कार किया जाता था उसे जलाया जाता था और कोई बच्चा मरता था तो तो पास की बगद नदी में जाकर दफना दिया जाता था। मेरे गांव के बहुत से छोटे बच्चे जो अकाल मृत्यु के शिकार हुए। वे उसी बगद नदी के पास जाकर दफनाए गए।

1990 के दशक के गजरौला गांव औद्योगिक नगर के रूप में विकसित होना शुरू होता है और वहां केमिकल इंडस्ट्री बनती है। वह बगद नदी धीरे-धीरे एक नाले के रूप में बदल जाती है। केमिकल वेस्ट को ले जाने वाला इकट्ठा करने वाला एक नाला है उसने हमसे हमारी वह नदी विकास जिसमें कि मेरे पुरखों का संस्कार हुआ है, उस नदी की नाला को पास में बहती हुई गंगा में मिलाया जा रहा है। बहुत गहराई में अगर उतर कर देखते हैं तो ना केवल गांव छिन गया है बल्कि एक खास तरह के आधुनिक विकास के एक अंधी दौड़ में बहुत कुछ बह गया है।कहने वाले यह भी कहेंगे कि हमने कुछ पाया भी है। कोई उदार तरीके से कह सकता है कि जो मिला है वह बहुत चमकीला है, प्यारा है। जो गया है वह कुछ अमूल्य चला गया है।

एक और बात मैं आपको रूपक के साथ में बताऊं कि गांव की जो छवि हमारे मन में आती है वो ये है कि गांव माने प्रकृति से तालमेल। जो प्रकृति के साथ हंसता खेलता बड़ा हो वह गांव, जो प्रकृति पर विजय पाने की चाहत से खड़ा हो वह शहर। अगर इस तरह से हम समझना चाहे तो वह गांव था जिसमें पानी की निकासी की व्यवस्था थी, बरसात में ज्यादा पानी होता था उसके पानी के एकत्रित होने की व्यवस्था थी। पानी एकत्रित होता था तो वह पानी जमीन सोख सकती थी। ग्राउंड लेवल वाटर बना रहता था। एक तरफ से नेचुरल रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम था। गांव तो प्रकृति से लड़ता नहीं है। प्रकृति जैसी है गांव उसको वैसा ही स्वीकार करता है। मैंने ऐसा गांव देखा है जिसके चारों ओर बहुत से तालाब थे। तालाब होने का मतलब बरसाती पानी को इकट्ठा करने की व्यवस्था थी। जब उस गांव को एक कस्बे में और एक औद्योगिक नगरी में बदलने की ठानी गयी तो सबसे पहले तालाबों के भराव का काम शुरू हुआ। भराव बड़ा आकर्षक काम है। किसी भी तालाब का भराव करने में एक तो आप रियल स्टेट बनाते हैं, आप ऐसी जमीन तैयार करते हैं जिसके ऊपर इमारतें बनाई जा सके, जिसे खरीदा बेचा जा सकता है, जिसमें रहने के लिए मकान और बेचने के लिए दुकान में बनाई जा सकती हैं। उसमें यह भी दिलचस्पी है कि भराव करने के क्रम में आप कुछ लाख या कुछ करोड़ का ठेका देंगे। इस भराव से भ्रष्टाचार की व्यवस्था बनेगी। तालाब में भराव का काम आपके घर की तिजोरी भरने के काम और या कहे तो घर की गुल्लक को भरने का काम तो करती ही है। गांव से नगर बनने की यात्रा है।
हम ऐसे गांव में थे जिसमें कि आम के बाग थे, जब उसकी बौर आया करती थी, तो उसकी खुशबू से बहुत सारी चिड़िया आती थी, वहां मोर भी थे, बहुत सारी गौरैया थी, और एक बहुत सी ढूंढ का इलाका भी बना हुआ था। ढूंढ कहते है रेतीले इलाके को जो गंगा के किनारे का जो मोटा रेट होता है, जो पानी को एकदम से सोखता नहीं है। वह पानी को अपने अंदर बचा कर रखता है। उसको ढूंढ का इलाका कहते हैं। उस इलाके में पहली बारिश में बहुत ही मस्त कर देने वाली या पागल कर देने वाली एक महक आती है। यह महक उस गांव की स्मृति से जुड़ी हुई है। उसकी जगह अब केमिकल इंडस्ट्री होने के बाद सबसे घटिया जो इंडस्ट्री हो सकती है उसकी महक ने ले ली है। वहां सल्फा के कंसंट्रेशन है। पूरे देश में बहुत ही घनी आबादी का क्षेत्र तो यह नहीं है लेकिन वहां जानलेवा बदबू नुकसान देने वाली गैसों का क्षेत्र है। वहां पर त्वचा संबंधी बीमारियां है, और सांस लेने वाली बीमारियां निश्चित रूप से बहुत ज्यादा बड़ी हैं। यह सब बड़े बदलाव हैं जो हमारे गांव से कस्बा बनने के क्रम में हुआ।

हमारे यहां भारतीय ग्रुप जो कि बिरला जी के दामाद हुआ करते हैं, उनकी बहुत बड़ी इंडस्ट्री है। जिसका नाम ऑर्गेनिक केमिकल इंडस्ट्री हुआ करता है वह अब वेब आॅरगेनिक के नाम से जाना जाता है। अब विलियम जुबली ईयर इंडस्ट्री उसका नाम है। मैं केवल इसकी एक बात कहता हूं कि इस कंपनी की यह पाॅलिसी थी कि लोकल आदमी को काम पर नहीं लेना है। लोकल आदमी होगा तो यहां की खबरें भी लोकल क्षेत्र में जाएंगे। एक ऐसी इंडस्ट्री है जो कि पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा रही है। जो कि वहां की वायु में बहुत गंभीर प्रदूषण पैदा कर रही है, बहुत गंभीर जल प्रदूषण पैदा कर रही है जो कि नदी को नाले में बदल चुकी है और स्थानीय लोगों को यदि अंदर की जानकारी होगी तो उससे एक प्रतिरोध पैदा होगा। शायद जनता के प्रतिरोध को एक रूप मिलेगा संगठन बनेगा। इसलिए उन्होंने एक नीति अपना रखी थी कि किसी भी स्थानीय आदमी को नौकरी पर नहीं रखना है। मैं बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि उस तरह के औद्योगिक तंत्र में वहां के स्थानीय राजनीतिक वर्ग को खरीद लेने में कामयाबी पाई। मैं जानता हूं वहां जो नेता लोग होते थे उनको गाड़ियां उस व्यक्ति से मिलती थी। ड्राइवर मिलते थे और भी ना जाने क्या—क्या मिलते होंगे। यही कारण होगा कि उन्होंने कभी यह बात नहीं उठाई।

 

गजरौला गांव को बर्बाद करने में वहां के नेताओं का बड़ा योगदान है। मैंने आज तक किसी भी नेता को नहीं देखा है जिसने इस गंभीर मुद्दे को उठाया हो। यहां के पानी को, यहां की हवा के संबंध सवाल खड़ा किया हो। बड़ी बात ये है कि रोजगार भी नहीं देते हैं। यह बात किसी भी नेता ने वहां कभी नहीं उठाई। मतलब भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा विकेंद्रित व्यवस्था भी उस औद्योगिक तंत्र ने विकसित की। परिणाम स्वरूप बहुत भारी मात्रा में रोजगार उस इलाके के लोगों को मिला हो यह कतई संभव वहां पर नहीं हो पाया।

मैं इस परिवेश में पला-बढ़ा, बड़ा हुआ। मैंने उस गांव को बहुत ही गंदे औद्योगिक नगर में तब्दील होते हुए देखा और उसका उपाय खोजने के लिए मैंने जितने भी राजनीतिक विचार राजनीतिक रास्ते थे उनको सीखना समझना शुरू किया। इसको सीखने समझने की कोशिश में मेरे सामने एक उपाय गांधी का था, एक उपाय लोहिया का था। मैंने मार्क्सवाद का भी अध्ययन किया, बाबा साहब अंबेडकर को भी देखा। चुनावी राजनीति को भी देखा और गैर चुनावी राजनैतिक को भी देखा, खोजा। इन सब को देखते-देखते मुझे लगा कि जहां तक पर्यावरण को और स्थानीय गांव को बदलने की या बचाने की बात थी गांधी हमें कुछ कह रहे हैं, बाबा साहब अंबेडकर जो कर रहे थे उसको भी मैं बराबर पढ़ रहा था। मुझको कई बार ऐसा लगा कि डॉक्टर लोहिया में गांधी और अंबेडकर के बीच के तनाव का उत्तर आपको मिलेगा। डॉ राम मनोहर लोहिया गांधी से भी जब कुछ ले रहे हैं और बाबा साहब अंबेडकर से भी कुछ ले रहे हैं और इसी की परिणती चौखंबा राज जिसमें की गांव एक बुनियादी जरूरत है।

गांव यानी गांधी की तरह कोई सपनों का गांव नहीं, आदर्श गांव नहीं जहां गांव की बात करते समय जाति से बाहर आने की बात है। राम मनोहर लोहिया की जाति तोड़ो दृष्टि में,चौखंबा राष्ट्र की दृष्टि में मुझे दिखाई दिया। लोहिया की जो उनकी चुनावी राजनीति थी, जो उनके चुनावी वारिस थे वह बहुत हल्के और कमजोर थे। मैं आज तक उनसे अपना रिश्ता और अपनापन पाता हूं लेकिन इसके बावजूद भी मुझे लगता है कि जो लोहिया के चुनावी वारिस या राजनीतिक बारिश हैं वह लोहिया से बहुत छोटे निकले और वह बहुत बड़े क्रांतिकारी सपने को पूरा करने में काफी पीछे छूट गए। उसके बाद भी लोहिया के दृष्टिकोण का बहुत महत्व है।

गांधी के उस ग्राम स्वराज के दृष्टिकोण जो कि दुकान से ज्यादा धरती को बचाने का सपना लिए चल रही है, पर्यावरण को बचाने का कार्यक्रम बहुत महत्वपूर्ण है। बाबा साहब अंबेडकर से हमें सीखने की जरूरत है, यह मुझे हमेशा महसूस हुआ। बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि गांव एक परनाले की तरह है जिसे जितनी जल्दी हो सके छोड़ देना चाहिए। इस बात पर उनकी बहुत आलोचना भी हुई है। इस आलोचना को देखने समझने की जरूरत है। इकोलॉजिकल दृष्टि से और सोशियोलॉजिकल दृष्टि के साथ ही हमें राजनीतिक दृष्टि से भी देखने की जरूरत है। गांव के अंदर की जो सामाजिक चुनौतियां हैं, जड़ता है उसको अनदेखा नहीं कर सकते। मैं बाबा साहब अंबेडकर को इस अर्थ में लेता हूं कि वह गांव के अंदर के सामाजिक विभेद को अनदेखा नहीं करते हैं। बिहार में पूरा राज्य दान हो गया था, भूदान हो गया था। हमें एक हाथ में गांधी और एक हाथ में अंबेडकर को साथ लेकर देखना चाहिए ऐसा मैं समझता हूं।                                                 ….गजरौला 

दिल्ली के अंदर रहकर दिल्ली की जो शहरीकृत गांव है उनमें आत्मनिर्भरता की बात सोचने के लिए या प्रेरित करने के लिए बिल्कुल नए तरीके से सोचना पड़ेगा और स्थान बिंदु बनाने पड़ेंगे। दिल्ली के गांव को अगर हम छोड़ भी दें तो आस-पड़ोस के गांव हैं, मेरे साथी देव शर्मा कहा करते थे कि पश्चिमाञ्चल यानी मेरठ गाजियाबाद के किसान को भूख क्या है, गरीबी क्या है, इसका एहसास एक अलग ही तरह का है। क्योंकि हम लोग दिल्ली जो कि केंद्रीय कृत सत्ता का प्रतीक है, के बहुत नजदीक होने के कारण हमारी एक सेटेलाइट जैसी स्थिति बन गई है। हम दिल्ली जो कि पूरे देश की ऊर्जा, पूरे देश की आर्थिक केंद्र का एक प्रतीक बन गया है। यहां से बैठकर उड़ीसा के कालाहांडी, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा या बिहार के वे ईलाके जहां साल में एक बार अगलगी होती ही हैं के उस किसान की पीड़ा को समझ पाना या जान पाना बहुत ही मुश्किल है। तो यहां की जो स्थिति है उसको लेकर हमारा सपना केवल इतना है कि गांव माने एक जो बजारी सभ्यता है, बाजारी व्यवहार है वह मतलब की रिश्तेदारी है से आगे नहीं है। गांव माने गांव,जहां मतलब की रिश्तेदारी नहीं होती है। दिल्ली का रिवाज है कि रात में एक या दो बजे भी कोई आपके घर आए तो पूछते हैं कि चाय पियोगे। क्या लोग यह सोचते ही नहीं है कि वह भूखा भी हो सकता है, उसे खाने के लिए पूछा जाए। लेकिन गांव का रिवाज यह है कि एक सामाजिक आचरण यह है कि वहां मनुष्य से मनुष्य के स्तर पर मिलने की एक संभावना होती हैै यह हमारी पहली बुनियादी बात है। हम इसी दिल्ली के अंदर, इसी महानगर बनती हुई दिल्ली के अंदर वह जो गांव का संस्कार है जिसमें कि जिससे मतलब के रिश्ते नहीं हैं, की बुनियाद डालना चाहते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहर जो हैं, पूंजी के प्रतीक हैं और गांव जो है प्रकृति और मनुष्य के जुड़ाव का प्रतीक है। तो हम इसी दिल्ली में पूंजी का अंधा राज नहीं चाहते हैं हम मनुष्यता का राग गाते हैं। यह गांव का रंग ढंग है जो कि हम दिल्ली के अंदर और दिल्ली के गांव के अंदर या दिल्ली की बच्चियों के अंदर विकसित करना चाहते हैं उसे अपनाना चाहते हैं, उस जानना चाहते हैं, और बढ़ाना चाहते हैं। गांव में हर किसी को हर किसी की फिक्र होती है। जो बूढ़े हुआ करते थे जो कि सोने से पहले आसपास के 20 या उससे ज्यादा घरों में आ जा कर पूछ लिया करते थे, राम-राम कर लिया करते थे। इस परिपाटी का मतलब यह हुआ करता था कि किसी घर में कहीं ऐसा तो नहीं है किसी वजह से आज चूल्हा ना चला हो। सभी ने खा लिया है या नहीं खा लिया। दिल्ली या कोई भी महानगर जो होता है पड़ोस वाले की या ऊपर वाले की रोटी खा ली, रोटी खाएं या ना खाएं इस तरह के भाव बोध से मुक्त होता है। हम दिल्ली के अंदर वह ग्रामीण सरकार लाना चाहते हैं कि वह पड़ोसी ने खाया या नहीं खाया है इसकी फिक्र करें। दिल्ली में आप को पीने के पानी की जगह मिलनी मुश्किल हो जाती है। हम दिल्ली को उसके मूल संस्कार में, ग्रामीण संस्कार में रंगना चाहते हैं जिसमें की प्याऊ लगाने की या ऐसे काम की जो आर्थिक मुनाफे के काम नहीं है वह भी हम करना शुरू करें। हम दिल्ली को उस ग्रामीण संस्कार में डालना चाहते हैं। हमारा सपना अभी सिर्फ इतना ही सीमित है है दिल्ली को लेकर।  ….गजरौला 

क्योंकि मैं अभी दिल्ली का चुना हुआ विधायक हूं (अब पूर्व विधायक), दिल्ली के संदर्भ में यही कहना चाहता हूं कि दिल्ली की विधानसभा, दिल्ली की सीमा पार करते हुए मैं एक साधारण नागरिक हो जाता हूं और साधारण नागरिक की तरह व्याकुल हो जाता हूं और सपना देखने लगता हूं कि मैं किसी और जिम्मेदारी के लायक बनूं। ऐसे में अभी तो मुझे यह लगता है दिल्ली की जिम्मेदारी इतनी बड़ी जिम्मेदारी है कि मैं यह कर नहीं पाता हूं। भविष्य के लिए मैं सपना देखूं तो मुझे यह साफ नजर आता है कि पूंजीवादी व्यवस्था के परिणाम स्वरूप एक विकृत समाज नि​र्माण हो रहा है जो रिश्तेदारी, नातेदारी, सामूहिकता को खत्म करना चाहता है या अनजाने ही खत्म कर रहा है। प्रकृति के साथ जीने की रिवाज और और तरीकों को नष्ट कर देना चाहता है और गांव को गांव के साथ जोड़कर जीने वाले लोग खतरे में है। इस नाते मुझे लगता है कि भारत माता, धरती माता खतरे में है। जो भी गांव और प्रकृति से जुड़कर जीना चाहता है उसका जीवन पहले से लगातार कठिन होता जाता है। यह कठिनाई कोई साधारण संकट या चुनौती नहीं है। सभ्यता के स्तर पर संकट है। केवल भारत ही नहीं पूरे विश्व के लिए संकट का स्वर है। जो गांव में या पूरे ग्रामीण समाज के साथ प्रकृति के साथ मिलकर चलने की सभ्यता है को मजबूत करना ही होगा। अगर हमें धरती को बचाना है तो किसानों से, आदिवासियों सीखना पड़ेगा। सीखने की कला, जीने की कला खतरे में है। दिल्ली का विधायक होने के नाते मैं दिल्ली में रहकर कुछ काम कर रहा हूं, लेकिन भारत और पूरे देश के लिए मैं बहुत चिंता में हूं। अभी तो मैं यह एक सपना देख सकता हूं कि दिल्ली में एक संवेदनशील तरीके से ईमानदारी पूर्वक बुनियाद मजबूत किया जा सके और पूरे देश में कोशिश करें कि ईमानदारी कायम हो। आज भी जब गांव को याद करता हूं उत्तराखंड का वह गांव याद आता है जहां 15 साल में स्थानीय नागरिक की तरह मैं सजग हुआ? मुझे झारखंड के सिंगूर जिले की याद आती है। मुझे वे गांव याद आते हैं जहां मैंने बहुत लंबी अवधि बिताई। जहां मुझे बहुत सारी मां से अपने बेटे जैसा प्रेम मिला। ओरिया आस पड़ोस के गांव, बिनोला गांव जहां महेंद्र सिंह धोनी के दादा है? वहां मैंने पढ़ा है। गांव से जुड़ी कई तरह की यादे हैं। गिरीश कुमारी गिरधारी गीत याद आते हैं मुझे। मातृभूमि भूमि तेरी जय जयकारा। मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी मेरी मां है। यह घर, यह खेत खलिहान मेरी मां हैं।                             ……… गजरौला 

वहां के लोग, वहां से मिला प्रेम, वहां जाकर जैसे सब कुछ एकाकार हो जाता है। हमने आदिवासी समाज के बीच भी काम किया है। इसी तरह के बहुत सारे अनुभव मेरे इन जगहों के भी है। गांव पूरी तरह से टूट चुके हैं। कई स्तरों पर। हमें टूटे हुए को फिर से बनाना होगा, जोड़ना होगा, संवारना होगा। हमको गांव को फिर से रचना होगा और गांव के नाम पर जो कुछ था उसको फिर से संवारना होगा। उसकी बेहतरी के लिए लड़ना होगा, अड़ना होगा और हासिल करना हो। मेरा तो मानना यह है कि इस क्लाइमेट को इस धरती को बचाना है तो गांव को गढ़ने, गांव को सवारने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि और इन सबके लिए जरूरी भी है कि हमको बार-बार सीखने के लिए गांधी के पास जाना होगा। लोहिया के पास जाना होगा, कभी बाबा साहब अंबेडकर के पास भी जाना होगा और एक ऐसा गांव बनाना होगा जिसमें स्त्री को खुश होकर, खिल कर काम करने का अवसर हो। लेकिन हालात ये है कि गांव को नए सिरे से बचाये बिना, संवारे बिना स्मार्ट सिटी बनाने का पागलपन का दौर चल रहा है। यह हमारे संकट को और और बढ़ा रहा है, गंभीर बना रहा है। हमें और गहरे संकट की तरफ ले कर जा रहा है। हमें शहरों का ग्रामीणीकरण चाहिए। गांव का शहरीकरण नहीं चाहिए। मैं इतना ही कहूंगा कि हमको गांव को बचाना और बनाना होगा और उस की पुनर्रचना करनी होगी क्योंकि हम धरती को बचाना चाहते हैं देश को बचाना चाहते हैं राष्ट्र को बचाना चाहते हैं।                                                             ….  गजरौला 

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