नियति ने बिहार के बजाय झारखंड के गांव सलिमा और चौखंडी का वासी बना दिया

0
639
मनोज कुमार पाठक  संपादक-संथाल हूल एक्सप्रेस

महानगर दिल्ली में रहता हूं। वहां मेरी पहचान बिहार के वासी की है, हालाकि मैं अपने को झारखंडी कहता हूं क्योंकि मेरा पैतृक गांव सलिमा और चौखंडी झारखंड में है। लेकिन गांव का भौगोलिक विन्यास ऐसा है कि यह झारखंड और बिहार की सीमा पर स्थित गांव है, जिसके तीन तरफ से बिहार कि सीमा लगती है,हालांकि नक्शे में यह गांव झारखंड में है। साफ है राज्यों के बटवारे ने मुझे झारखंडी बना दिया है, लेकिन बिहार और झारखंड के सीमावर्ती गांव का वासी होने की वजह से दोनों राज्यों से करीब का नाता है।

पश्चिम मे विस्तृत सोन और दूसरे तरफ कररबार नदी है, सोन के उस पार रोहतास का बन्जारी सीमेन्ट प्लांट और कररबार के उस पार बिहार कि राजनीति का चितौडगढ़ कहलाने वाला नबीनगर,औरंगाबाद, बिहार का एक प्रखंड। करीब 4,380 मेगावॉट वाले नबीनगर बिजलीघर में एनटीपीसी (राष्ट्रीय तापविद्युत निगम लिमिटेड) की करीब आधी हिस्सेदारी है। इसी के बगल मे झारखंड कि सीमा के अंदर बेलबिगहा पंचायत मे दो छोटे-छोटे गांव सलिमा और चौखंडी। कहा जा सकता है कि जितना बड़ा किसी गांव में टोला होता है उससे भी छोटा गांव। मात्र 16 घर एक ही परिवार से अलग हुए लोग हैं, कोई दूसरी जाती के नहीं न किसी दूसरे संप्रदाय के मानने वाले, एक परिवार जो दो गांव के रूप में बस गया।

खेती से टूटा नाता
खेती ही गांव सलिमा और चौखंडी के  बासिन्दो का मुख्य पेशा रहा है, हालांकि यहा की खेती बटाईदारी से चलती है, चिकनी मिट्टी वाला गांव जिसे हमारे यहां केवाल कहा जाता है। खरीफ यहां की मुख्य फ़सल है। रबी कि पैदावार कम ही होती है। खरीफ के कटनी के पश्चात खेसारी, मसुरी, तिसी (अलसी) मुख्य पैदा होने वाली फ़सल थी परंतु सिचाई के आभाव मे पैदावार उतनी भी नही थी कि पर्याप्त हो सके। वैसे तो 90 के दशक के पूर्व पूरी कृषि व्यवस्था इन्द्रदेव कि कृपा पर निर्भर थी, अब उत्तर कोयल नहर परियोजना कि नहर यहां के खेतों को सिंचित करती है। पापा बताते हैं 67 के अकाल के पश्चात नहर कि परिकल्पना हुई, सन 1972 मे मोहम्मदगंज मे कोयल नदी को बांधकर इस क्षेत्र को सिंचित करने के लिए नहर कि आधारशिला रखी गई। 90 के दसक से उसमे पानी आना सुरु तो हुआ परंतु आज तक ब्यवस्थित नही है, इसी नहर के लिए मुख्य जलाशय का दो बार शिलान्यास हो चुका है, बीते लोकसभा चुनाव के पूर्व वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने भी बड़े बाजे गाजे के साथ इसका पुनः शिलान्यास किया परंतु आजतक उसका कार्य प्रारम्भ नही हुआ है।

पलायन की पीड़ा में छुपा है तरक्की का राज
खेती भले ही भगवान भरोसे रही हो परंतु गांव सलिमा और चौखंडी के सारे घर इंट पत्थरो से पक्के के बने हुए हैं, इनमे एक भी घर प्रधानमंत्री आवास योजना के नही हैं। इन मकानो के पक्के होने कि कथा के पीछे पलायन का अर्थशास्त्र है। बाबुजी वाली पीढी भी नौकरी के लिए कोइलवरी (कोयला खदान)और बन्जारी सीमेन्ट कि निवासी हो गई थी। हमारी वाली पीढ़ी ने महानगरों का रुख कर लिया। जबकि उसके बाद की पीढ़ी और एक कदम आगे निकल गई और कोई लोग नौकरी-चाकरी करते हुए विदेशों तक पहुंच गए। बड़ी बात यह है कि अभी भी प्रवासी परिंदों का लगाव गांव-घर से बना हुआ है। संयोग से ही सही टूटा नहीं है।

 

स्वाभाविक है युवा रोजगार के लिए यहां नही रहते, गांव सलिमा और चौखंडी के सारे युवा गांव छोड़ कर जीवकोपार्जन हेतु देश के बिभिन्न कोनो में बस गए हैं, परिवार से मिले संस्कार, अपने परिश्रम और कौशल के दम जहां हैं खुशहाल हैं। इसका मतलब यह हुआ कि गांव इसके पूर्व की पीढ़ी के लिए भी वृद्धाश्रम था अब भी है। बावजूद इसके लोगो ने भगवान् शंकर, राधाकृष्ण और बजरंग बली को रहने हेतु तीन सुन्दर मंदिरों का निर्माण भी करवा दिया। ये प्रसंग छेड़ने के पीछे मंशा यह बताना कदापी नहीं है कि मैं इस समृद्ध गांव का नागरिक हू। मैंने यह प्रसंग सिर्फ इसलिए छेड़ा है की इस गांव की भी कुछ प्राथमिकतायें हैं जिसकी उम्मीद वह राज्य और केंद्र की सरकार और अपने जनप्रतिनिधियों से करता है।

बदलाव के विभिन्न पड़ावों से गुजरता मेरा गांव अमृत पाली

जब कभी अपने गांव सलिमा और चौखंडी जाता हू तो मंदिर के बगल में बने तीन साल से अधूरे पड़े सामुदायिक भवन का खड़ा पिलर और उसकी छत विहीन दीवारें मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं, और अपने ग्रामीणों से सवाल करने पर विवश, आप भी सोचिये क्या जरुरत थी इस गांव में सरकारी पैसे के दुरूपयोग से अर्धनिर्मित सामुदायिक भवन की? क्या औचित्य था इन पैसो के बंदरबांट का? इस सरकारी खजाने के पैसों की सार्थकता तो तब थी जब इस जैसे दस गावों में होने वाले इस प्रकार के फंड को एकत्रित कर वहां बीच में एक डिस्पेंसरी का निर्माण कर दिया जाता और उस गांव से डिस्पेंसरी तक की कनेक्टिविटी दुरुस्त कर दी जाती, तात्पर्य यह है की हर क्षेत्र, ग्राम और व्यक्ति की अपनी अलग प्राथमिकतायें होती है और उस तक वैसी ही सुविधाएं पहुचनी भी चाहिए। हमने अपने बाल्याकाल से लेकर युवावस्था तक उन कठिनाईयों को देखा और अनुभव किया है, मेरे गांव तक कोई सड़क नही आती थी, रेलवे स्टेशन डेढ़ कोस पर और सड़क मार्ग भी एक कोस पर, हमारे क्षेत्र का इकलौता बाजार मेरे गांव से डेढ़ कोस दूर था, मतलब कि यदि नमक भी खरीदने की जरूरत है तो आपको डेढ़ कोस कि पैदल दूरी तय करनी होती थी। बरसात के दिनों मे यदि कोई बीमार पड़ जाए तो दुर्दशा…..। व्यक्तिगत और गांव सलिमा और चौखंडी के सामूहिक संपन्नता के बावजूद गांव की स्थिती आज भी सड़क संपर्क के लिहाज से बहुत बेहतर हुआ हो ऐसा भी नहीं है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत करीब दो साल पहले मेरे गांव के लिए एक सड़क का निर्माण शुरू हुआ था, वर्तमान स्थिति बयान करती इन तस्वीरों से तरक्की का आकलन किया जा सकता है।

यह भी पढें…

बदलते हुए गांव में ढ़ीली पड़ती संबंधों की गांठ

पूर्वजों का गांव दंगवार
अब जरा मेरे इलाके में ही पड़ने वाले दूसरे गांव (दंगवार) की चर्चा करते हैं। हमारे पूर्वज यहीं से जाकर अपने गांव सलिमा और चौखंडी में बसे हैं। पीढ़ियों पहले का छोड़ा हुआ खंडहर आज भी विराजमान है। दंगवार की आबादी लगभग एक लाख है और उस गावं में करीब एक हजार घर हैं वहां के अधिकांश युवा किसी न किसी व्यवसाय में लगे हैं। किसी ने परचून की दुकान खोली है तो कोई मोबाइल रिचार्ज कर अपना जीविकोपार्जन कर रहा है। मतलब एक छोटा सा बाजार लग चुका है और आस पड़ोस के 25—30 गांव के लोग इसी बाजार से अपने घरो की उपयोगिता की वस्तुएं क्रय कर आते हैं। इस गांव में खंडहर होता वह उच्च विद्यालय का भवन जो मेरे गांव से इस बाजार के रस्ते में पड़ता है और मुझे चिढ़ाता सा प्रतीत होता है। इस गांव में नालियां पक्की हो गई हैं, गांव की सड़कें पक्की हैं, अस्पताल आज तलक नहीं बना, जनधन का धन किस बैंक के किस खाते में जमा हो जब ग्रामीण बैंक है एटीएम नहीं, जिससे जनधन का धन सुगम तरीके से जन के काम आये।

यह भी पढें…

पैतृक गाँव चमथा के लिए अपनी जवाबदारी

 

 

शराब बंदी बना व्यापार
चूकी यह क्षेत्र झारखंड और बिहार के सीमा पर स्थित है जिसके एक तरफ बिहार का एक जिला औरंगाबाद और एक तरफ रोहतास आता है।नीतीश कुमार जी की शराब बंदी का दुष्प्रभाव ही यहां पड़ा है। इस क्षेत्र के युवा जो तरक्की और विकास की इबारत लिख सकते थे, आजकल शराब की तस्करी करके पैसे बना रहे हैं, यूं कहें की बिहार के मगध क्षेत्र में शराब की आपूर्ति इसी क्षेत्र से हो रही है, शाम होते ही सीमा का बंटवारा करती सोन नदी का टीला मयखाने में तब्दील हो जाता है, और सीमा पर बसा रेलवे स्टेशन (काजरात नावाडीह) अराजक और नशेड़ियों के अड्डे मे, जो चिंतित करता है । नीतीश कुमार जी के बिहार कि शराबबंदी का आलम यही है कि रोजाना इस क्षेत्र से हजारों लीटर शराब की स्मगलिंग का कारोबार है जो बिहार के शराबबंदी कानून के सख्ती से लागू होने के ढ़कोसले का मुंह चिढ़ा रहा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here