मेरे गाँव बालेंगा पारा के कुछ यक्ष प्रश्न

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प्रयाग जोशी

कुछ दिन पहले मेरी एक पूर्व विद्यार्थी हमारे घर अपनी सहेलियों के साथ आई थी। वह पड़ोस के गाँव में रहती है। बातचीत के दौरान उसने उसके गाँव के युवाओं की कुछ वर्तमान समस्याओं को साझा किया ।
उसने बताया कि आजकल हमारे गांव कोदागांव  में शादी, जात्रा और अन्य सामुदायिक कार्यों में शामिल न होने पर युवाओं से गाँववाले भारी दंड वसूल करने लगे हैं क्योंकि ऐसे अवसरों पर गाँव के कई लड़के-लड़कियाँ अनुपस्थित रहते हैं। इस अनुपस्थिति के कई कारण होते हैं – घर के काम, पढ़ाई का बोझ, गाँव के समुदाय के प्रति लगाव का अभाव और गाँव के बाहर रोज़गार के लिए पलायन। भारी दंड से यह समस्या हल होगी ऐसे नहीं लगता।
सामाजिक संगठन आदिवासी संस्कृति को सहेजने और शादियों में होने वाले ख़र्च को कम कराने के उद्देश्यों से शादियों में लाउड्स्पीकर और बैंड-बाजा पर बजने वाले संगीत, रिटर्न गिफ़्ट्स, शराब, मांसाहार और नयी नवेली दुल्हनों के साथ उनके ससुराल भेजे जाने वाले सामान पर रोक लगा रहे हैं। लेकिन हमारे गाँव के कई लड़के लड़कियाँ तो पारम्परिक गाने और नाच नहीं जानते हैं । अगर शादियों में पारम्परिक नृत्य एवं संगीत नहीं होगा और आधुनिक नृत्य संगीत पर भी रोक होगी तो क्या मज़ा रह जाएगा? गांव में आयोजित होने वाली अन्य शादियों में धन का इस्तेमाल देखकर ही तो अपनी शादियों में हमारी पीढ़ी के लोग ठाट बाट का दिखावा करते हैं। इस मानसिकता को भला समाज कैसे रोक पाएगा?    ……गांव बालेंगा पारा


मांसाहार और मदिरापान तो आदिवासी संस्कृति और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन पर पाबंदी लगाकर हम आदिवासी संस्कृति को कैसे सहेजेंगे?
हमारे जैसे स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों की स्थिति बहुत कठिन है। जब सामुदायिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो हम असहज महसूस करते हैं क्योंकि इन समारोहों के लिए ज़रूरी कौशल एवं सीख हमने नहीं पायी है। अगर वहाँ शामिल न हुए तो बड़ों की डाँट खानी पड़ती है और जुर्माना भी देना पड़ता है।
मेरी विद्यार्थी ने खड़े किए सवाल मेरे लिए नए नहीं थे। मेरे गाँव में भी कुछ समय से यही सवाल उठ रहे हैं। अगर ऐसे ही सवाल बस्तर के अन्य गाँवों में उठ रहे होंगे तो आश्चर्य की बात नहीं होगी।
मुझे लगता है आदिवासी संगठनों से ऐसा राजनीतिक दवाब शायद इस लिए आ रहा है क्योंकि आदिवासी समुदायों के पास शोषण का विरोध करने और अपनी जमीन बचाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। यह स्वाभाविक है, लेकिन यह भी लग रहा है कि हमारे गाँवों के कई वर्तमान प्रश्न यहाँ के घोटुल बंद हो जाने के कारण उभर रहे हैं। इस लेख में मैंने नीचे मेरे गाँव का उदाहरण लेकर इस विषय को कुछ हद तक खोलकर आपके लिए प्रस्तुत करने की कोशिश की है।

मेरा गाँव बालेंगा पारा
चलिए मैं आपको मेरे गाँव ले चलता हूँ। हमारा गाँव बालेंगा पारा, जो कि छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के ग्राम पंचायत किबाई बालेंगा में है। यह गाँव भी बस्तर के पठार पर बसे कई गाँवों जैसा ही एक गांव है। हम राज्य महामार्ग से लगभग चार किलोमीटर दूरी पर बसे हुए हैं। गाँव तक डामरीकृत सड़क आती है और वह यहीं आकर ख़त्म हो जाती है। कहा जाता है कि इस गाँव को लगभग 50 से 70 साल पहले हमारे पड़ोसी गाँव में रहने वाले कुछ मुरिया जनजाति के लोगों ने बसाया था। वे चाहते थे कि पड़ोसी गाँव के विपरीत जहाँ विविध समुदायों के लोग एक साथ रहते थे, हमारे गाँव में केवल मुरिया गोंड समुदाय के लोग ही निवासरत रहें।
आज बालेंगा पारा गाँव में लगभग 65 घर हैं जो तीन बस्तियों में बिखरे हुए हैं। हमारी कुल आबादी 350 के आस पास होगी। यहाँ मेरे अलावा सभी निवासी मुरिया ग़ोंड़ जनजाति के हैं। सभी गोंड परिवारों की उपजीविका का प्रमुख साधन खेती किसानी और आसपास के जंगल से प्राकृतिक उत्पाद बटोरकर हाट बाज़ारों में बेचना है। शासन ने इन सभी परिवारों को ग़रीबी रेखा से निम्न घोषित किया है और उन्हें रियायती दरों में राशन और अन्य सुविधाएँ प्राप्त होतीं हैं। तीन परिवारों में वेतनधारी सदस्य और दो में छोटे व्यावसायिक हैं।                                             …. गांव बालेंगा पारा


हमारा घोटुल
सन 2007 में जब मैं हमारे गाँव पहली बार आया और वहाँ रहने लगा तब मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ के सभी घर लगभग समान आकार के थे। गाँव के लोगों में कौन से धनी हैं और कौन से ज़रूरतमंद यह बिलकुल समझ में नहीं आ रहा था। इस गाँव में कई दशकों से घोटुल परंपरा चली आ रही थी। उस समय मैं हमारे गाँव के
घोटुल के पास ही रहता था। उन दिनों हमारे गाँव में बिजली नहीं पहुँची थी और रातें गहरी अंधेरी होती थीं । हर रात घोटुल से लड़के-लड़कियों की ऊँची आवाज़ों में पारम्परिक गोंडी गीतों की महफ़िल गूँज उठती थी। तब मेरी भावी पत्नी भी घोटुल की सदस्य थीं। उनकी पीढ़ी तक के सभी लोग घोटुल के सदस्य रह चुके थे। जब भी ऐसे किसी व्यक्ति के साथ घोटुल के समय की बातें होतीं हैं उसे एक गौरवशाली और आनंदमय अतीत की यादों को ताजा करते हुए देखता हूं।
हमारे गाँव में घोटुल शब्द के दो प्रयोग होते हैं।
1.मुरिया, ग़ोंड़ जनजाति में प्राचीन समय से आधुनिक काल तक चलती आयी शिक्षा व्यवस्था को घोटुल कहा जाता है।
2.एक सामुदायिक स्थान जो गाँव के सबसे पुराने नलकूप के पास होता था उसे घोटुल कहा जाता था। वहाँ लकड़ी के खम्भों से बनी चारदीवारी के अंदर एक छोटासा आँगन, देसी खपरों से छायी हुई एक झोंपड़ी और छींद के सूखे पत्तों से छायी एक मंडली (लकड़ी के खम्भों पर खड़ी खुली झोपड़ी जिसकी दीवारें बस दो फ़ुट ऊँची थीं) हुआ करती थी। अब उस स्थान पर ख़ाली मैदान है। उसके क़रीब एक अन्य स्थान पर सीमेंट-काँक्रीट का एक आधुनिक सांस्कृतिक भवन शासकीय अनुदान से बन गया है। उसे अब लोग घोटुल कहतें हैं।             …. गांव बालेंगा पारा      
घोटुल – एक समुदाय आधारित शिक्षा व्यवस्था
घोटुल शिक्षा व्यवस्था को हमारे गाँव के सभी लोगों का समर्थन और सहभाग मिलता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य था गाँव के युवाओं को सामुदायिक जीवन के लिए तैयार करना। इस व्यवस्था की बदौलत कई मुरिया सांस्कृतिक परम्पराएँ (जो सामुदायिक जीवन का हिस्सा होतीं हैं ) भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सहजता से सौंपी जाती थीं। यहीं गाँव के भावी नागरिक अपनी युवावस्था में ही सीख लेतें थे कि मुरिया मानसिकता में व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन से सामुदायिक जीवन का अधिक महत्व होता है।
अविवाहित लड़के और लड़कियाँ ही अपने विवाह तक हमारे गाँव के घोटुल के सदस्य हो सकते थे। हर घर के विवाहित स्त्री पुरुष अपने घर के सभी युवाओं को घोटुल जाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। अतः अपने बचपन से ही लड़के-लड़कियाँ घोटुल जाने के सपने देखने लगते थे। युवाओं को तालीम देने कुछ विवाहित पुरुष भी घोटुल के कार्य में सहभागी होते थे।
सिर्फ़ विद्यालय में जाने वाले छात्र छात्राओं को घोटुल न जाने की छूट थी ताकि वे स्कूल में दिया गया गृहकार्य और परीक्षा के लिए पढ़ाई अच्छी तरह से कर सकें। जब कोई विद्यार्थी स्कूल छोड़ देती/देता तो वह तुरंत घोटुल जाना शुरू करती/करता। उन दिनों शासकीय स्कूली व्यवस्था से दुःखी होकर उसे छोड़ देने वाले कई विद्यार्थी हमारे गाँव में होते थे, आज भी हैं।                                                                                               …. गांव बालेंगा पारा


घोटुल के सदस्य दिन भर अपने घरों के कामों में व्यस्त रहते थे – जंगल से अलग अलग प्राकृतिक उत्पाद बटोरना, उन्हें बेचने साप्ताहिक हाट बाज़ार ले जाना, शिकार करना, खेती-बाड़ी सम्भालना, घर बनाना, उसकी मरम्मत करना, अपने छोटे भाई-बहनों को सम्भालना, पानी भरना, धान कूटना, खाना पकाना, खेलना, इत्यादि।
रात्रि- भोजन के बाद लगभग आठ बजे ये सभी युवा अपने अपने घरों से निकलते और छोटी-छोटी टोलियों में घोटुल पहुँच जाते। उन में से कुछ युवतियों ने अपनी बारी के मुताबिक़ उस दिन सवेरे ही घोटुल की ज़मीन को गोबर और पानी से लीपा होता, आँगन को साफ़ कर के गोबर पानी से छिड़काया होता, या शाम को मंडली में लकड़ी लाकर आग जला कर रखी होती। वैसे ही सभी युवकों ने अपनी बारी के अनुसार उस सप्ताह में घोटुल के लिए लकड़ी काटकर वहाँ जमा करके रखी होती।
घोटुल में आगमन के बाद सदस्यों की उपस्थिति ली जाती, दैनिक कार्य का मूल्यांकन होता, अगले कुछ दिनों में होने वाले सामुदायिक कार्यों का नियोजन किया जाता और अगर आवश्यक हों तो उचित कारणों के लिए विशिष्ट सदस्यों को दंड दिए जाते । उसके बाद सभी उपस्थित सदस्य मिलकर लगभग आधा घंटा पारम्परिक गोंडी गीत गातें, शादियों के पहले सात दिन गीत गाते हुए नाचतें और अंत में सौंपे गए साथियों के साथ सोने चले जातें।             …. गांव बालेंगा पारा
घोटुल के सभी सदस्यों को हर रोज़ घोटुल में रात्रि-भोजन के बाद उपस्थित रहना अनिवार्य था। बीमार होने पर या किसी विशेष कार्य के लिए पूर्वानुमती के साथ ही वे घोटुल से अनुपस्थित रह सकते थे। गाँव के बाहर एक रात भी काटने के लिए उन्हें घोटुल से पूर्वानुमती लेनी पड़ती थी। सदस्यों को घोटुल की सफ़ाई और गाँव के सामुदायिक कार्यों में सहभाग लेना और सौंपे हुए साथियों के साथ रात गुज़ारना भी अनिवार्य था। इन नियमों का उल्लंघन करने पर सदस्यों को सज़ा (शारीरिक प्रताड़ना या/और अधिक कार्य ) घोटुल के पदाधिकारियों द्वारा दी जाती। यह अनुशासन अधिकतर सदस्य सह लेतें लेकिन कुछ न सह पाते और घोटुल जाना बंद कर देते थे। इस व्यवस्था के कारण गाँव का समुदाय उन दिनों अपने युवा वर्ग को गाँव में ही उपस्थित रखने और गांव से सतत् जोड़े रखने में कामयाब था।


एक न्यायसंगत सुरक्षा कवच
गाँव के कोई भी निवासी किसी भी शाम घोटुल में आकर अपना कुछ काम कराने हेतु विनती कर सकते थे। शादी ब्याह या बच्चे के नामकरण समारोह के काम, कृषि- कार्य, नए घर का छत छाना, पुराने घर के कवेलू पलटना, इत्यादि कई कार्यों को कराने की सूचना गाँव के निवासी घोटुल में आकर देते थे। किसी के देहांत के बाद के सामुदायिक कार्य करना भी घोटुल के सदस्यों की ज़िम्मेदारी होती। ये सारे कार्य घोटुल के सभी सदस्य मिलकर या लड़के लड़कियों की अलग अलग समितियाँ (टोलियाँ) बनाकर करते थे। कार्य सम्पन्न होने पर इन समितियों को निम्न मात्रा में अनाज, दालें, पैसे और शराब काम कराने वालों की तरफ़ से मिलते थे। अनाज, दालें और पैसे इकट्ठे कर के साल के अंत में पूरा गाँव कई दिनों तक सामूहिक भोजन का मज़ा लेता। इस प्रथा ने हमारे गाँव में यह सुनिश्चित किया था कि कोई भी निवासी मामूली भुगतान देकर अपने यहाँ ऐसा कार्य करवा सकते थे, जिसको सम्पन्न करने के लिए कई लोगो की जरूरत पड़ती थी ।
यह प्रथा श्रम गहन कार्य में भागीदारी के माध्यम से पारस्परिक सहायता और सहयोग प्रदान करने पर आधारित थी। यह हमारे समुदाय को एक शक्तिशाली पूंजीवादी बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की अनिश्चितताओं, शोषण और असमानता से सुरक्षा कवच और स्वतंत्रता प्रदान करती थी। यह कवच निरंतर और शाश्वत था और हमारे समुदाय के प्रत्येक सदस्य को उसकी स्थिति, वर्ग, लिंग, आयु और प्राकृतिक या अन्य संसाधनों की उपलब्धता या उन पर नियंत्रण – के बावजूद मिलता था। यह प्रथा आज भी हमारे गाँव में कुछ बदले हुए स्वरूप में प्रचलित है।
उपर्युक्त सामुदायिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता ’मिल्टन फ्रीडमैन’ के द्वारा पुरस्कृत पूंजीवादी बाजार अर्थव्यवस्था में भाग लेने वाले व्यक्तियों की स्वतंत्रता के ठीक विपरीत है। ऐसे व्यक्ति की स्वतंत्रता उसके पास जितनी पूंजी है, उसके समानुपाती होती है। इसके अलावा, ऐसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता अक्सर भ्रामक होती है क्योंकि बाजार कभी भी परिपूर्ण नहीं होता है। दूसरी ओर बाज़ार शक्तिशाली पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित होता है जो यह सुनिश्चित करते हैं कि अर्थव्यवस्था में भाग लेनेवालों की स्वतंत्रता प्रतिबंधित और नगण्य है।                                               …. गांव बालेंगा पारा


एक साथ अलग अलग कार्य करने के अलावा युवा कई सांस्कृतिक गतिविधियों में भी शामिल होते थे – धान कटाई के बाद दूसरे गाँवों में चेरता नाचने जाना, शिकार पर जाना, गाँव में पूनी या झिरलिटी नाचना, शादियों के दौरान नाचना, इत्यादि। इन सभी सामूहिक गतिविधियों और घोटुल के दैनिक जीवन के दौरान ही युवा सदस्य अपने समुदाय और सामुदायिक जीवन का महत्व सीखते थे। सामुदायिक जीवन को व्यक्तिगत जीवन पर प्राथमिकता देना भी वे घोटुल में ही सीखतें थे।
यहाँ और अपने घरों में उन्हें अपनी जनजाति के उदारवादी विश्वदृष्टिकोण (जिसमें सहिष्णुता और परस्पर संबंधिता के अहम स्थान हैं) के पहले पाठ भी मिलतें। घोटुल से विदाई लेने के बाद वे इन्हीं संस्कारों की नींव पर अपनी गृहस्थी रचतें थे।
अतः जब तक हमारे गाँव में घोटुल कार्यरत था, तब तक सामुदायिक कार्यों में गाँव के युवाओं की कमी हमने कभी महसूस ही नहीं की थी और न ही सामाजिक कार्याें में अनुपस्थित रहने के कारण कड़े दण्ड देने की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी थी । वह ऐसा समय था जब हमारे गाँव के अधिकतर युवक-युवतियाँ अपने मन और तन से गाँव के समुदाय और सामुदायिक जीवन में सक्रिय भागीदारों की भाँति जुड़े हुए थे।                                             …. गांव बालेंगा पारा
उस वक़्त गाँव के सभी साठ परिवार एक ही बड़े परिवार की शाखाएँ थी । यह कहना अनुचित न होगा कि सामाजिक जीवन समृद्ध था और निवासियों में भाईचारा था। लोग अपने गुज़र बसर के लिए खेती करते थे, व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं। लोगों के बीच लेन-देन का निपटान वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय करके किया जाता था, न कि मौद्रिक भुगतान के माध्यम से। मुद्रिकृत बाज़ार अर्थव्यवस्था हमारे ग्रामीण जीवन में उस समय तक कोई ख़ास पैठ नहीं बना पायी थी। गाँव के अधिकतर लोग अपना जीवन उस विशेष पारम्परिक विश्वदृष्टिकोण के साथ बिता रहे थे जिसमें वे अपनी माटी, प्रकृति और एक दूसरे से परस्पर संबंधों में बँधें हुए थे।

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घोटुल की समाप्ति के पश्चात
हर समुदाय की तरह, हमारे गाँव का समुदाय भी उस बड़े समाज की गतिशीलता के अधीन है जिसके भीतर वह आधारित है। सन् 2009 में दो घटनाओं ने हमारे गाँव के सामुदायिक वातावरण पर अपना साया डाला।
1.उस साल मई में हमारे घोटुल के दो सदस्यों ने शादी करने का तय किया। उनके इस रिश्ते से ख़फ़ा होकर लड़की के पिता ने घोटुल तत्काल बंद करने का ऐलान किया। उनके निर्णय को किसी ने चुनौती नहीं दी क्योंकि वे वरिष्ठ व्यक्ति थे। उस वक़्त किसी ने अपेक्षा न की होगी कि घोटुल बंद होने के पश्चात गाँव की सामुदायिक स्थिति के सामने कई चुनौतियाँ खड़ी होंगी।
2.अगस्त 2009 में केंद्र शासन ने अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का क़ानून पारित किया और उस साल से शासकीय शिक्षा विभाग ने गाँव के हर बच्चे को स्कूल में भर्ती कराने का कड़ा आग्रह रखना शुरू किया। गाँव की शासकीय प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूल के अध्यापकों पर इस आग्रह के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी थीं। अब एक भी बच्चे को स्कूली जाल से बचे रहना मुमकिन न रहा।
घोटुल के बंद होने से मानो गाँव के युवा वर्ग के सामने सम्पूर्ण वैयक्तिक आज़ादी का प्रवेशद्वार ही खुल गया – विशेषतः गाँव के बाहर की दुनिया के अन्वेषण का। जल्दी ही गाँव के युवक और कुछ गृहस्थ बोरवेल की खुदाई करने वाले ठेकेदारों के पास रोज़गार खोजने भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में जाने लगे। इन में से कई युवक आठवीं उत्तीर्ण होने के बाद तुरंत निकलतें। युवतियाँ भी छत्तीसगढ़ के शहरों में धान और दाल की मिलों में और कभी कभी आन्ध्र और तमिलनाडु में कुकुटपालन व्यवसायों में काम करने जाने लगीं। ये युवा कुछ अच्छे और कुछ कड़वे अनुभव, पैसे, मोबाइल फ़ोन, नए कपड़े और बाहर की दुनिया में लौटने के संकल्प लेकर ही कुछ महीनों बाद गाँव लौटतें। यह सिलसिला आज तक जारी है।
गाँव के कई युवा बाहर की दुनिया में कई महीनों तक लगातार रह रहे हैं। उस दुनिया को क़रीब से देख रहे हैं, उसकी ओर तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं और शहरी जीवन शैली को अपना रहे हैं। उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन मोबाइल फ़ोन पर सिनेमा देखना बन गया है। दुर्भाग्य से वे प्रमुख ढांचे से जीवन शैली के विकल्प और नैतिक मूल्यों को उनकी आलोचनात्मक जाँच किए बिना अपना रहे हैं।                                   …. गांव बालेंगा पारा


लगातार लम्बे समय तक गाँव के बाहर रहने के कारण, इन युवाओं के अपने जल, जंगल और ज़मीन से रिश्ते भी टूट रहे हैं। वे अपने खेतों में भारी ट्रैक्टर, ज़हरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करने से झिझकते नहीं। गहरे बोरवेल खुदवाकर व्यावसायिक खेती करने में जुट रहे हैं। उनकी आकांक्षाएँ नयीं दिशाओं की ओर मुड़ गयीं हैं। इसके साथ साथ उनका सामुदायिक गतिविधियों में सहभाग निरन्तर घटते जा रहा है, उसमें अधिक संकोच है। वे आपसी सम्बन्धों में संकीर्ण और असहिष्णु हो रहे हैं, और वे तेजी से शहरी मापदण्डों पर और मौद्रिक संदर्भ में चीज़ें, काम, रिश्तें और अपने जल-जंगल-ज़मीन को माप रहे हैं।
घोटुल की समाप्ति के बाद खेती किसानी और वनोपज पर निर्भर हमारे गाँव के वासियों का पारिवारिक और सामुदायिक जीवन काफ़ी दबाव में आ गया है। जब युवकयुवतियाँ गाँव के बाहर रोज़गार तलाशने जाते हैं तब कृषि सम्बंधी और पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ उनके परिवार के अन्य सदस्यों को और स्कूल जाने वाले भाई बहनों को झेलनी पड़तीं हैं। जब वे गाँव लौटते हैं तब स्वाभाविक रूप से सामुदायिक कार्यों में रुचि नहीं लेते हैं। अपने घर के सदस्यों, रिश्तेदारों, मित्रों को फ़िल्मों में और शहरी दुनिया में देखे हुए नैतिक मूल्यों के अनुसार मापतें हैं, जो अक्सर मुरिया संस्कृति की तुलना में संकीर्ण और अनम्य होते हैं।
इस साल हमारा छोटासा ग्रामीण समुदाय तीन हिस्सों में बँट गया – दो मुरिया हिस्से और एक मुरिया ईसाई हिस्सा। अब गाँव की शादियों में सभी निवासी अनायास शामिल नहीं होतें। गाँव के एक हिस्से के लोग न्योता मिलने पर ही दूसरे हिस्से में होने वाले शादी-ब्याहों में जाते हैं। ईसाई हिस्से के लोगों से तो दूसरे हिस्सों के लोगों ने सामाजिक सम्बंध ही तोड़ दिए हैं। उनके बच्चों के साथ दूसरे हिस्सों के बच्चे नहीं खेलतें है।
पिछले तेरह सालों में घोटुल को पुनर्जीवित करने की एक या दो बार कोशिशें ज़रूर की गयी। लेकिन वे नाकामयाब रहीं। सम्पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अनुभव लेने के बाद भला कौन युवक अपने हाथों में सामुदायिक जिम्मदारियों की बेड़ियाँ बँधवाने के लिए तैयार होगा?                                                                 …. गांव बालेंगा पारा

अंतिम टिप्पणियाँ
ग्रामीण स्तर पर आदिवासी समुदाय और सामुदायिक जीवन को समृद्ध और शाश्वत बनाए रखने का अति महत्वपूर्ण कार्य मुरिया समाज में प्रचलित घोटुल व्यवस्था सैकड़ों सालों से बस्तर के गाँवों में करती आयी थी। इस व्यवस्था ने सभ्यता के संकीर्ण मूल्यों को और घातक पूँजीवादी बाज़ार अर्थव्यवस्था को भी काफ़ी हद तक हमारे गाँवों में मज़बूत जड़ें बनाने से रोक रखा था। घोटुल व्यवस्था ने आज तक ग्रामीण आदिवासी संस्कृति और जीवनशैली को सहेज कर रखने में अहम् भूमिका निभायी थी। इसी दूरदर्शी व्यवस्था के कारण कई ग्रामीण आदिवासी समुदायों में न्यायसंगति आधुनिक काल तक बनी हुई थी।                                                                                 …. गांव बालेंगा पारा
घोटुल की समाप्ति के साथ साथ हमारे गाँवों के समुदायों, सामुदायिक जीवन, संस्कृति और विशेष विश्वदृष्टिकोण के ह्रास ने तेज़ गति ले ली ऐसा दिखता है। आर्थिक और अन्य विषमताएँ भी बढ़ीं हैं। ऐसा ही ह्रास व्यक्तिगत स्तर पर भी दिखाई दे रहा है। लेकिन क्या बस्तर के गाँवों में रहने वाले हमारे आदिवासी भाईबहनों को भी घोटुलों के बंद होने के बाद सामुदायिक और व्यक्तिगत स्तरों पर उपर्युक्त क्षति महसूस हो रही है? क्या वे देख रहे हैं कि समुदाय के हित में ही कैसे हम सब का व्यक्तिगत हित है, लेकिन व्यक्तिगत भलाई में सामुदायिक भलाई निहित नहीं होती? सहकारी श्रम गहन कार्य हमारी पारंपरिक जीवन शैली को बनाए रखने में और कमजोर लोगों को बाजारी अर्थव्यवस्था के अन्याय से बचाने में विशेष और महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । क्या उन्हें इस बात का एहसास है?       …. गांव बालेंगा पारा

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मुझे लगता है कि बस्तर के गांवों में ग्रामीण आदिवासी समुदायों के बीच इन सवालों पर गहन आत्मनिरीक्षण और मंथन अतिआवश्यक है। वहीं से अपने समुदायों में न्यायसंगति, संस्कृति और विशेषतः युवाओं में सामुदायिक भावना और परस्पर संबंधों पर आधारित विश्वदृष्टिकोण को पुनःस्थापित करने के समकालीन उपायों की खोज हमारे गाँवों में शुरू हो पाएगी।
इस लेख में साझा किए गए अनुभव और विचार मेरे व्यक्तिगत निरीक्षण और चिंतन के आधार पर बने हुए हैं। यह हो सकता है कि मेरे इन निरीक्षणों, विचारों या विधानों से मेरे गाँव के वासी या आदिवासी समुदाय के अन्य सदस्य या अन्य कोई भी व्यक्ति या संगठन सहमत न हों। ऐसे मतों का मैं आदर करता हूँ। इस लेख का उद्देश्य मेरे गाँव के समुदाय या किसी भी व्यक्ति या आदिवासी समाज, संगठन या संस्कृति या सभ्यता की आलोचना या अवहेलना करना नहीं है बल्कि मेरे ही आस पास में उठे हुए प्रश्नों को पाठकों के सामने रखना है ताकि इस विषय पर ज़रूरत के अनुसार उचित चर्चा हो सके और हमारे गाँवों का सामुदायिक और सामाजिक जीवन अधिक समृद्ध और न्यायसंगत बने। मेरे मन में पारम्परिक आदिवासी संस्कृति और विश्वदृष्टिकोण के प्रति अपार स्नेह और आदर ही है।               …. गांव बालेंगा पारा

(लेखक पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं व आदिवासी गांवों में रहकर उनके शैक्षणिक उत्थान को लेकर प्रयासरत हैं।)

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