
हम्पी से वापस बंगलुरू लौटते हुए हमारे पास अतिरिक्त समय बचा हुआ था, क्योंकि हम सुबह दस बजे ही निकल पड़े थे। इस यात्रा के क्रम में लगातार ’चित्रदुर्ग’ नाम मेरे मन में जिज्ञासा पैदा कर रहा था। इसके पूर्व इसके सम्बन्ध में कोई जानकारी हमें नहीं थी। फोरलेन हाइवे शहर से बाहर-बाहर ही गुजरता है सो हम्पी जाते हुए समयाभाव के चलते सोचने का मौका भी नहीं था। लौटती बार वहाँ पहुँचते हमें भूख लग गई थी और योजनानुसार बेटे और कार दोनों को विश्राम देना जरूरी था। एक तिहाई दूरी तय कर लेने पर अगली एक तिहाई तक बहू को ड्राइव करना था। मेरे पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, अन्यथा मैं भी इस खूबसूरत ड्राइव का आनंद ले पाता। मेरी जिज्ञासा के शमन के लिए बहू ने गूगल पर चित्रदुर्ग को सर्च करके बताया कि शहर में एक मशहूर किला है, जो चालुक्य वंश से सम्बद्ध है। सो हाइवे छोड़कर हम शहर चले गए। हाइवे से किला जाने के मुख्य मार्ग में ’अल्पसंख्यकों’ (?) का मुहल्ला है। उस मार्ग को इतनी बुरी तरह से अतिक्रमित कर लिया गया है कि दो सौ मीटर के बाद हमें कार मोड़ लेने को विवश होना पड़ गया। कार घुमाने में भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी। खैर, दो किलोमीटर लम्बा चक्कर लगाने के बाद हम दुर्ग तक पहुँच गए।
लेपाक्षी मन्दिर (आंध्र प्रदेश)…पर्यटकों को अवश्य देखना चाहिए यह मन्दिर
गिरिदुर्ग श्रेणी के तहत इसे मजबूत ग्रेनाइट पत्थर की पहाड़ी पर स्थापित किया गया था। किले के अन्दर और बाहर खाई व गढ़ों के साथ विभिन्न आकृतियों के प्राचीरों की सात रक्षा पंक्तियाँ हैं, जिन्हें ’थेलु सुनतिना कोटे’ कहा जाता है। चार प्राचीर पहाड़ी की चोटी पर और तीन तलहटी में स्थित हैं। ये प्राचीर टनों भारी आयताकार और चौकोर ग्रेनाइट पत्थरों से बनाए गए हैं। आधार में इनकी मोटाई छह से आठ फुट और शिखर पर तीन से चार फुट तक है। इतने भारी पत्थरों को ऊपर तक पहुँचाकर एक दूसरे के साथ इस प्रकार मिलाना कि कहीं छेद नहीं रह जाए! देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि मनुष्य ने बिना किसी मशीन के ऐसा किया होगा। किन्तु सत्य से बड़ा कोई आश्चर्य नहीं होता है। ऐसे निर्माण मानवीय पुरुषार्थ के जीवन्त प्रमाण हैं।
प्रकृति प्रेमियों के लिए चित्ताकर्षक पर्यटन स्थल है लालबाग (बेंगलुरू)
चित्रदुर्ग के बाहरी प्राचीर की चारों दिशाओं में एक-एक द्वार है। पूर्वी द्वार जो निर्तदी गाँव की ओर है, रंगनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वर्तमान में इसी का उपयोग पर्यटकों के लिए किया जाता है। 15 मीटर ऊँचे प्राचीर वाले इस दरवाजे का डिजाइन अनोखा है। इसके फाटक तक पहुँचने के लिए 90 डिग्री के तीन तीखे मोड़ों से गुजरना पड़ता है। अर्थात फाटक पर तोप के गोलों या लकड़ी की सिल्लियों से सीधा प्रहार करना असम्भव है। उत्तरी द्वार को संतेबागीलू द्वार या फतेह दरवाजा कहा जाता है। पश्चिमी द्वार को उच्छनगी बागीलू कहते हैं। इसके पास मीठे पानी का तालाब है। कठोर ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित प्राचीरों की ऊंचाई 8 से 15 मीटर तक है। कहीं- कहीं ऊँचाई बढ़ाने के लिए शिखर पर ईंट की दीवार का उपयोग किया गया है। एक समय दुर्ग में 19 द्वार, 38 पश्च द्वार और 35 गुप्त प्रवेश द्वार थे।
ध्वंस, पुनर्निर्माण और विस्तार की कहानी कहता चेन्नाकेशव मंदिर
इस बड़े सामरिक महत्व के ऐतिहासिक और अनूठे किले का अवलोकन करने के पश्चात मेरे मन में एक बार फिर विचारों की आँधी उठ गई थी। कई शताब्दियों तक चार चार राजवंशों के वैभव और पराभव में भूमिका निभाकर आज भी शान से सीना ताने खड़े इस दुर्ग को कैसे इतिहासकारों ने भुला दिया! इस धरोहर की इतनी कम चर्चा है कर्नाटक से बाहर के लोग इसे जानते तक नहीं। कर्नाटक के अन्दर भी लोग इसके महत्त्व से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं। इस प्रकार के दर्जनों ऐतिहासिक धरोहरों और तथ्यों की अनदेखी क्या सिद्ध करती है? क्या यह उचित नहीं है कि एक खास विचारधारा से बंधे इतिहासकारों द्वारा किसी बुरी नीयत अथवा खास मिशन के तहत लिखे गए इतिहास की समीक्षा करने की जरूरत नहीं है? क्या भारत के गौरवशाली इतिहास के पुनर्लेखन की मांग उचित नहीं है?
(क्रमशः जारी)








