’चित्रदुर्ग’ किला को कैसे इतिहासकारों ने भुला दिया!

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डॉ. पवन कुमार सिंह

हम्पी से वापस बंगलुरू लौटते हुए हमारे पास अतिरिक्त समय बचा हुआ था, क्योंकि हम सुबह दस बजे ही निकल पड़े थे। इस यात्रा के क्रम में लगातार ’चित्रदुर्ग’ नाम मेरे मन में जिज्ञासा पैदा कर रहा था। इसके पूर्व इसके सम्बन्ध में कोई जानकारी हमें नहीं थी। फोरलेन हाइवे शहर से बाहर-बाहर ही गुजरता है सो हम्पी जाते हुए समयाभाव के चलते सोचने का मौका भी नहीं था। लौटती बार वहाँ पहुँचते हमें भूख लग गई थी और योजनानुसार बेटे और कार दोनों को विश्राम देना जरूरी था। एक तिहाई दूरी तय कर लेने पर अगली एक तिहाई तक बहू को ड्राइव करना था। मेरे पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, अन्यथा मैं भी इस खूबसूरत ड्राइव का आनंद ले पाता। मेरी जिज्ञासा के शमन के लिए बहू ने गूगल पर चित्रदुर्ग को सर्च करके बताया कि शहर में एक मशहूर किला है, जो चालुक्य वंश से सम्बद्ध है। सो हाइवे छोड़कर हम शहर चले गए। हाइवे से किला जाने के मुख्य मार्ग में ’अल्पसंख्यकों’ (?) का मुहल्ला है। उस मार्ग को इतनी बुरी तरह से अतिक्रमित कर लिया गया है कि दो सौ मीटर के बाद हमें कार मोड़ लेने को विवश होना पड़ गया। कार घुमाने में भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी। खैर, दो किलोमीटर लम्बा चक्कर लगाने के बाद हम दुर्ग तक पहुँच गए।

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यह किला कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिला मुख्यालय में बंगलुरू से 220 किलोमीटर और हम्पी से 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सात समकेंद्रित प्राचीरों से आवृत्त अभेद्य माना जाने वाला यह एक पहाड़ी दुर्ग है। इसे कल्लीना कोट, उकिन्ना कोट और एलु सुत्तीना कोट भी कहा जाता है। इस दुर्ग का निर्माण होयसल वंश (11वीं से 14वीं सदी) के द्वारा शुरू किया गया था। विजयनगर (1336–1565) के शासकों ने इसका विस्तार किया। इसकी किलेबंदी सामंत नायक कामागोती तिम्मन्ना ने 1562 में करवाई थी। बाद में उसके वंशज ओबन्ना नायक ने विजयनगर साम्राज्य से स्वतंत्रता की घोषणा करके किले पर कब्जा कर लिया। उसके उत्तराधिकारियों ने यहाँ 1620 से 1779 तक शासन किया। 1779 में हैदर अली ने इस दुर्ग को जीत लिया। तत्पश्चात हैदर अली और उसके बेटे टीपू सुल्तान ने इस दुर्ग को सामरिक दृष्टि से और मजबूत बनाया।

गिरिदुर्ग श्रेणी के तहत इसे मजबूत ग्रेनाइट पत्थर की पहाड़ी पर स्थापित किया गया था। किले के अन्दर और बाहर खाई व गढ़ों के साथ विभिन्न आकृतियों के प्राचीरों की सात रक्षा पंक्तियाँ हैं, जिन्हें ’थेलु सुनतिना कोटे’ कहा जाता है। चार प्राचीर पहाड़ी की चोटी पर और तीन तलहटी में स्थित हैं। ये प्राचीर टनों भारी आयताकार और चौकोर ग्रेनाइट पत्थरों से बनाए गए हैं। आधार में इनकी मोटाई छह से आठ फुट और शिखर पर तीन से चार फुट तक है। इतने भारी पत्थरों को ऊपर तक पहुँचाकर एक दूसरे के साथ इस प्रकार मिलाना कि कहीं छेद नहीं रह जाए! देखकर सहसा विश्वास नहीं होता कि मनुष्य ने बिना किसी मशीन के ऐसा किया होगा। किन्तु सत्य से बड़ा कोई आश्चर्य नहीं होता है। ऐसे निर्माण मानवीय पुरुषार्थ के जीवन्त प्रमाण हैं।

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चित्रदुर्ग के बाहरी प्राचीर की चारों दिशाओं में एक-एक द्वार है। पूर्वी द्वार जो निर्तदी गाँव की ओर है, रंगनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वर्तमान में इसी का उपयोग पर्यटकों के लिए किया जाता है। 15 मीटर ऊँचे प्राचीर वाले इस दरवाजे का डिजाइन अनोखा है। इसके फाटक तक पहुँचने के लिए 90 डिग्री के तीन तीखे मोड़ों से गुजरना पड़ता है। अर्थात फाटक पर तोप के गोलों या लकड़ी की सिल्लियों से सीधा प्रहार करना असम्भव है। उत्तरी द्वार को संतेबागीलू द्वार या फतेह दरवाजा कहा जाता है। पश्चिमी द्वार को उच्छनगी बागीलू कहते हैं। इसके पास मीठे पानी का तालाब है। कठोर ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित प्राचीरों की ऊंचाई 8 से 15 मीटर तक है। कहीं- कहीं ऊँचाई बढ़ाने के लिए शिखर पर ईंट की दीवार का उपयोग किया गया है। एक समय दुर्ग में 19 द्वार, 38 पश्च द्वार और 35 गुप्त प्रवेश द्वार थे।

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किले के भीतर शिलाओं को खोदकर कुल 14 मन्दिर बनाए गए थे, जिनमें सिद्धेश्वर, हिडिंगेश्वर, फाल्गुनेश्वर, गोपालकृष्ण, गणेश, आञ्जनेय, एकनाथेश्वरी आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई मन्दिरों के शिखर चालुक्य शैली में निर्मित हैं जिनके कारण इस दुर्ग का सम्बन्ध चालुक्य वंश से भी जोड़ा जाता है। सिद्धेश्वर और हिडिंगेश्वर मन्दिर के शिखर चालुक्य के गोपुरों की शैली में हैं जो त्योहारों में शामिल होने वाले रथों से साम्य रखते हैं। इन्हें भीमना रथ और हिडिम्बा रथ कहा जाता है। इस स्थान का सम्बन्ध महाभारत के भीम और हिडिम्बा से भी माना जाता है। इस दुर्ग के साथ एक साहसी गृहस्थ महिला ओबव्वा के पराक्रम की कथा भी जुड़ी है जिसे स्थानीय लोगों में ग्रामदेवी का दर्जा प्राप्त है। दुर्ग के अन्दर मुरुगराजेंद्र जैसी धर्मनिरपेक्ष संरचनाएँ, अन्नागार, तेल और घी के भंडार के लिए टंकी, बड़े पैमाने पर पिसाई करने वाले पत्थर आदि विजयनगर काल के हैं। इसके अलावा यहाँ मिट्टी के बने भवनों के खंडहर तथा वर्षाजल संग्रहण के लिए प्राकृतिक और मानव निर्मित बावड़ियाँ भी मिली हैं।

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इस बड़े सामरिक महत्व के ऐतिहासिक और अनूठे किले का अवलोकन करने के पश्चात मेरे मन में एक बार फिर विचारों की आँधी उठ गई थी। कई शताब्दियों तक चार चार राजवंशों के वैभव और पराभव में भूमिका निभाकर आज भी शान से सीना ताने खड़े इस दुर्ग को कैसे इतिहासकारों ने भुला दिया! इस धरोहर की इतनी कम चर्चा है कर्नाटक से बाहर के लोग इसे जानते तक नहीं। कर्नाटक के अन्दर भी लोग इसके महत्त्व से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं। इस प्रकार के दर्जनों ऐतिहासिक धरोहरों और तथ्यों की अनदेखी क्या सिद्ध करती है? क्या यह उचित नहीं है कि एक खास विचारधारा से बंधे इतिहासकारों द्वारा किसी बुरी नीयत अथवा खास मिशन के तहत लिखे गए इतिहास की समीक्षा करने की जरूरत नहीं है? क्या भारत के गौरवशाली इतिहास के पुनर्लेखन की मांग उचित नहीं है?
(क्रमशः जारी)

 

 

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