बस्तर का एक समृद्ध गांव कुम्हारपारा

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भूपेश तिवारी, गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 225 कि.मी. दूरी पर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसा गांव कुम्हारपारा जो अपनी लोक संस्कृति, कुम्हारी शिल्पकला के साथ-साथ सामुदायिक सदभाव के लिए जाना जाता है। इस गांव में आदिवासी, हरिजन, कुम्हार, लोहार, यादव, देवांगन, पटेल आदि समुदायों के लोग आपसी सदभावना के साथ रहते है। परम्परागत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गांव में सभी धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन सभी के द्वारा किया जाता है । गांव में किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में सामाजिक पंचायत को ग्राम पंचायत के ऊपर महत्व दिया जाता है। गांव कुम्हारपारा में लगभग 150 परिवार कुम्हार समुदाय के है, जो आदिवासी जीवन शैली, धार्मिक परम्पराओं के साथ-साथ स्थानीय समाज के दैनन्दिन उपयोग की वस्तुओं के साथ-साथ शहरी बाजार की मांग अनुरूप उत्पादों का निर्माण कर अपनी आजीविका चलाते है।

वैसे तो किसी भी गांव का इतिहास को जानने का मुख्य स्रोत पुरखे ही होते हैं, ठीक उसी तरह गांव कुम्हारपारा के इतिहास के बारे में बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जो तथ्य सामने आते हैं उसके मुताबिक लगभग 300 वर्षों पूर्व इस गांव की स्थापना हुई थी। लेकिन गांव कुम्हारपारा से मेरा नाता लगभग 35 वर्ष पूर्व का है। लगभग 35 वर्ष पूर्व जब पहली बार मैं इस गांव में आया था, तो गांव की परम्परा, संस्कृति, लोककला, शिल्पकला ने मुझे इस कदर प्रभावित किया कि मैनें इस गांव को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर सामाजिक सेवा के क्षेत्र में कार्य करना प्रारंभ किया। जब प्रथम बार इस गांव में आगमन हुआ, तो पता चला कि बहुत कम लोग इस गांव में हिन्दी बोलते तथा समझते थे।

यदि यादों के आईने में शुरूआती दिनों को देखूं तो आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व जब मैं और मेरे दो मित्र स्व. भूपेन्द्र बंछोर एवं हरीलाल भारद्वाज महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र की गांधीवादी संस्थाओं में ग्रामीण विकास एवं गांधी विचार का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे, तब हमारा संपर्क देष के जाने माने गांधी विचारकों से हुआ । प्रशिक्षण के दौरान देश के गांवो की स्थिति को समझने का अवसर प्राप्त हुआ तथा देश में अमीर एवं गरीब के बीच गहरी होती जा रही असमानता की खाई के कारणों को समझने का मौका मिला ।

प्रशिक्षणोपरांत हम तीनों साथियों ने मिलकर यह संकल्प लिया कि हम अपनी शिक्षा और योग्यता का उपयोग समाज के जरूरतमंद तबके की भलाई के लिए करेंगे। अपनी इसी संकल्प की पूर्ति के लिए वर्ष 1988 में अपने राज्य के अत्यंत पिछले जिले बस्तर को अपनी कर्मभूमि बनाने के उद्देश्य से बस्तर का भ्रमण किया तो बस्तर के बारे में सुनी गई तमाम नकारात्मक बातों के उलट यहां शांति, शानदार पर्यावरण, सीधे सादे सरल लोग, समृद्ध आदिवासी संस्कृति, उच्च स्तर की परम्परागत समाज व्यवस्था के साथ-साथ बहुत सी अन्य खूबियों की जानकारी मिली । बस्तर में आने के पहले किताबों में पढ़ी लोगों से सुनी गलत जानकारियों के कारण दिमाग में बसी बस्तर की नकारात्मक छवि तत्काल मस्तिष्क से मिट गई ।
मैंने और मेरे साथियों के अपनी कर्मभूमि की खोज में जब तत्कालीन बस्तर जिले के गांव कुम्हारपारा में (अब कोण्डागांव जिला) कदम रखा तो यहां की समृद्ध शिल्प विरासत अतिप्राचीन आदिवासी संस्कृति, सभी समुदायों के बीच आपसी भाईचारा तथा परस्पर सहयोग पर आधारित जीवन शैली को देखकर लगा कि इस क्षेत्र को पिछड़ा कहना इस क्षेत्र का अपमान होगा, शायद इस क्षेत्र को पिछड़ा कहने वाले लोगों ने बस्तर को अपने अलग चश्मे से देखा होगा अथवा इस क्षेत्र को देखने का उनका अपना नजरिया ही गलत था।

कर्मभूमि गांव कुम्हारपारा
हमने गांव कुम्हारपारा को ही अपनी कर्मभूमि बनाने का निर्णय किया और यहीं रहकर इस गांव को, लोगों को, संस्कृति को, धार्मिक रीति रिवाजों को, गांव के सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को समझने के प्रयास शुरू किये, लम्बा समय इस गांव में बिताने के बाद गांव की समृद्धि के बारे में तथा अन्य व्यवस्थाओं के बारे में जो समझ बनी, उस समझ को तथा इस गांव की विषेषताओं के बारे में आप सभी को बताना चाहता हुँ।
प्रकृति पोषक समुदाय –
सम्पूर्ण ग्रामीण समुदाय प्रकृति का पोषक है अथाह वन एवं प्राकृतिक संसाधन होते हुए भी प्रकृति से उतना ही लेता है, जितने की आवश्यकता है । बस्तर के सभी गांवों में निवासरत समुदाय प्रकृति की पोषण करने वाला है, तथाकथित विकसित समुदाय के लोग प्राकृतिक संसाधनों को अंधाधंुध दोहन करता है या ये कहें कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य की चिंता किये बिना आज ही प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर लेना चाहता है, जबकि इसके विपरीत स्थानीय निवासी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सोचकर संसाधनों को सदुपयोग करना जानता है ऐसे प्रकृति अथवा पर्यावरण की भलाई के बारे में सोचने वाला समुदाय सिर्फ बस्तर जैसे आदिवासी क्षेत्र में ही पाया जाता है।

ग्रामीणों की जीवनशैली, तीज त्यौहार, धार्मिक मान्यताऐं, आर्थिक व्यवहार पूरी तरह असंग्रह पर आधारित है तथा अपनी जरूरत की वस्तु प्रकृति से लेने के पूर्व उससे अनुमति लेने की अद्भुत परम्परा सिर्फ बस्तर में ही देखने को मिलती है । खेतों में बीज डालने के पूर्व बीज त्यौहार, घर निर्माण के पूर्व माटी त्यौहार, आम की फसल आने के बाद आम खाना प्रारंभ करने के पूर्व आमा त्यौहार, नये फसल के आगमन से हरेली त्यौहार जैसे कई उदाहरण गांव समाज के प्रकृति पोषक होने का साक्षात प्रमाण है ।

सदियों पुरानी शिल्पकला
कुम्हारपारा गांव अपनी कुम्हारी शिल्पकला के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय समाज की दैनंदिन उपयोग की सामग्री का निर्माण करना इनका परम्परागत व्यवसाय है, इस गांव में लगभग 150 से अधिक परिवार कुम्हारी कला का कार्य करते थे, लेकिन 35 वर्ष पूर्व जब हम यहां आए तो यह समृद्ध कला समाप्ति के कगार पर थी, बाहरी बाजार से आने वाले एल्युमिनियम, प्लास्टिक, सीमेंट आदि से बने उत्पादों के आने से इनके बनाए गये सामानों की मांग बाजारों में कम होती जा रही थी तथा त्यौहारों को मनाने के तरीके बदलने के कारण समुदाय इनके बनाए उत्पादों को उपयोग कम करते जा रहा था। हम तीनों साथियों ने इस गंभीरता को समझकर कुम्हारी शिल्प तथा शिल्पकारों को संरक्षित करने का प्रयास प्रारंभ किया, जिसमें कौशल उन्नयन प्रशिक्षण, तकनीक तथा प्रौद्योगिकी का विकास शहरी बाजार की मांग अनुरूप उत्पादों का विकास स्व सहायता समूह का गठन कर सहयोगात्मक तरीके से उत्पादन करना, शासकीय योजनाओं से मिलने वाले लाभ तक इन कलाकारों की पहंुच बढ़ाना, नए बाजारों तक इनके उत्पादों को पहुंचाने जैसी प्रमुख गतिविधियों के माध्यम से कुछ वर्षों में गांव के कुम्हार पूरी क्षमता के साथ अपने पुस्तैनी कार्य की ओर आकर्षित हुए तथा इस काम को करके उनकी आजीविका बेहतर हो सकती है ये विश्वास उनके अंदर पैदा हुआ ।
आज की वर्तमान परिस्थितियों में गांव के युवा अपने परम्परागत कुम्हारी शिल्प से जुड़ने में गर्व का अनुभव करते है तथा स्थानीय बाजार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक अपनी कलाकृतियों को भेजकर बेहतर आजीविका प्राप्त कर रहे है ।
प्राकृतिक सामग्री पर आधारित भवन निर्माण तकनीक –
कुम्हारपारा गांव की भवन निर्माण तकनीक एवं डिजाइन भी अत्यंत सुन्दर तथा स्थानीय ग्रामीणों के कौशल पर आधारित है । भवन निर्माण की तकनीक में स्थानीयता का शानदार उपयोग किया जाता है, मिट्टी, घास, बांस, लकड़ी पत्थर जैसी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग कर ऐसे घरों का निर्माण किया जाता है, जो घर में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य को अच्छा रखते है तथा रहने वालो को आर्थिक रूप से परेशान नहीं करते हैं। आजकल भवन निर्माण में उपयोग होने वाली तकनीक तथा डिजाइन ग्रह स्वामी को आर्थिक रूप से परेशान करने वाले होते है तथा उनके स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव डालता है।
कुम्हारपारा के घरों का निर्माण रहने वालों में सामाजिकता पैदा करता है । प्राकृतिक सामग्री के उपयोग के कारण व्यक्ति को स्वस्थ्य रखने में सहयोेग करता है । इन घरों में रहने वाले लोगों का सिर ठंडा, पैर गरम तथा पेट नरम रखता है, जबकि अप्राकृतिक सामग्री का उपयोग कर बनाए गए घरों में सिर गरम, पैर ठंडे तथा पेट कड़ा होने की पूर्ण गारंटी रहती है।

बदलते सामाजिक स्वरूप का प्रभावः.
प्राचीन काल में कुम्हारों की कोई ज्यादा आमदनी नहीं थी अपने बर्तन निर्माण के 25 प्रतिशत हिस्से को ही बाजार में पैसे के लिए ले जाते थे, बाकी 75 प्रतिशत कारीगरी सामान अनाज अथवा अन्य वस्तुओं के लिए गांव में ही रखा जाता था। उससे जो अन्न मिल जाता था उसी से अपने खाने.पीने की आवश्यकताओं को पूरा कर बड़े ही मस्ती से जीते थे। रहन-सहन, खान.-पान पहिनावा- ओढ़ावा कोई खास नहीं होते हुये भी लोग बड़े आनंदित रहते थे। मुर्तियां तो केवल देवी-देवताओं के लिए स्थानीय लोगों के कहने पर ही बनाते थे? जिसमें मूर्ति की साईज के अनुसार बिना मोल भाव के जो ले जाने वाला देता था उसी को स्वीकार करते थे? और यह भावना होती थी, कि हमारी बनाई हुई मूर्ति ही देवी ने स्वीकार की है। इसी पर अपनी खुशियां जाहिर करते थे। कई जगह तो केवल मूर्ति के नाम के आधार पर एक छोटा सा कपड़ा, चावल, दाल दे दिया करते थे, तब भी लोगों में खुशियां होती थी।
विनिमय प्रथा बंद होने के कारण बिक्री हेतु अच्छा बाजार नहीं मिल पाता। दूसरी बात यह है कि आज के आधुनिक युग में अन्य वैकल्पिक उत्पादों जैसे प्लास्टिक, स्टील, एल्युमीनियम, कांच, आदि आसानी से उपलब्ध होने के कारण पारम्परिक कुम्हारों का व्यवसाय कमजोर होता जा रहा है। इस तरह समाज के बदलते स्वरूप एवं आधुनिकता के कारण कुम्हारों को अपने आपको बचाने में कठिनाई महसूस हो रही है। बावजूद इसके हमारी कोशिश रही है कि गांव बदलाव के साथ तालमेल बिठा कर उन्नती के रास्ते पर तो चले लेकिन साथ ही परंपराओं को भी सहेजा जाये।
गांव ही मेरी दुनिया, दुनिया ही मेरा गांव
आज भौतिकतावाद एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से गांव, शहर का स्वरूप बदल रहा है, हमारी पुरानी समाज व्यवस्था में गांव पूर्ण हुआ करते थे, जहां गांव की आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु गांव में या तो उपलब्ध होती थी या गांव का ही कोई समुदाय इन सामग्रियों का निर्माण करता था। गांव की पूरी व्यवस्था परस्पर सहयोग पर आधारित हुआ करती थी। लोग अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए लोगों से वस्तुएंे लेते थे तथा लोगों की जरूरत की ऐसी वस्तु जो हमारे पास है उसे दूसरों को देते थे । कुम्हारपारा गांव इस सहयोगात्मक समाज व्यवस्था का जीता जागता उदाहरण था, लेकिन समय के साथ-साथ अब गांव में दुनियाभर की वस्तुएंे आसानी से उपलब्ध है, ऐसे में गांव का आत्मनिर्भर तथा स्वाबलम्बी स्वरूप बदलकर बाहरी चीजों तथा सुविधाओं के लिए किसी ना किसी पर आश्रित होता जा रहा है। ऐसा होने से गांव का पुराना समृद्ध स्वरूप बदलकर बदहाल गांव की तरफ अग्रसर हो रहा है ।

गांव का बदलता स्वरूप- जिम्मेदार कौन ?
मैंने इस समृद्ध गांव कुम्हारपारा को लगभग 35 वर्षों से हर रूप में देखा है तथा मैं इसके बदलते हुए रूप का साक्षी रहा हूँ। पुरानी परम्पराऐं बदल गई, त्योहारों को सामूहिक रूप से मनाने की जो भावना थी अब हर कोई अपने दायरे में रहकर त्योहार मनाता है। होली पर गांव में एक बड़ी टोली गीत गाते हुए गांव में निकलकर घर-घर जाती थी, अब ऐसा कहीं नजर नहीं आता है। पहले गांव में कोई विवाद होता था तो उसका निपटारा गांव में ही होता था, लेकिन अब हर कोई ऐसे विवादों में सीधे थाना पहंुच जाते है, ऐसे कई नकारात्मक बदलाव गांव में हुए है, इन नकारात्मक बदलावों के कारणों का पता लगाने पर जो समझ बनती है वो है –
1. ग्रामीण बुजुर्ग जो पहले सिर्फ गांव के भले की सोचते थे, वे अब या ता वृद्ध हो गए या उनकी मृत्यु हो गई तथा वर्तमान में गांव में जो बुजुर्ग सामाजिक पंचायतों का आयोजन करते है वे अब उतने ईमानदार नहीं रहे।
2. युवाओं में ग्रामीण संस्कृति, परम्पराओं, धार्मिक अनुष्ठानों तथा अन्य सामाजिक मुद्दों की समझ ठीक नहीं है, वे सोचते हैं कि इन परम्परागत बातों को मानना पिछड़ेपन की निशानी है।
3. तकनीक मीडिया, मोबाइल के अत्यधिक उपयोग के कारण बच्चों में पुरानी संस्कृति, परम्पराओं, मान्यताओं, तीज त्यौहारों के प्रति अरूचि का भाव बढ़ता जा रहा है।


अंत में मैं कहना चाहता हुँ कि बस्तर क्षेत्र के ऐसे असंख्य समृद्ध एवं सम्पन्न गांव आज वैश्वीकरण तथा भौतिकतावाद के कारण अपने असली स्वरूप को खोते जा रहे है, हमारे जैसे संवेदनशील लोगों को तथा राज्य एवं केन्द्र सरकार को साझा प्रयास कर हर गांवो के मूल स्वरूप को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो हमारे गांव कैसे होते थे यह सच्चाई समय के साथ इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी। ऐसे में स्वाभाविक रूप से कुम्हारपारा भी इन बदलावों से अछूता नहीं रहेगा हालाकि हमारी कोशिश जरूर है कि बदलाव के इस रफ्तार को थामा जाए और बस्तर के इस समृद्ध गांव कुम्हारपारा की समृद्धी अन्य गावों के लिए मिसाल बने।

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