
नयी दिल्ली: रबी के बुआई का मौसम है। लेकिन किसान सड़क पर है। संग्राम में है। हर हाल में जीतना चाहता है। उधर सियासत अच्छे दिन के सपने दिखा रही है। लेकिन किसान आंदोलन की आंच में अच्छे दिन के सपने बौने साबित हो रहे हैं। बातचीत हो रही है लेकिन न तो अन्नदाता हुक्मरान पर भरोसे को तैयार है और न ही हुक्मरान बातचीत करने का मौका हाथ से जाने देना चाहते हैं। अन्नदाताओं पर आरोप भी लग रहा है और आरोप की जद में सियासत भी है। लेकिन इस आरोप-प्रत्यारोप के भंवरजाल से कैसे निकला जाये ये न तो अन्नदाता को सूझ रहा है और न ही हुक्मरान को। कुछ इसी तरह की स्थिति आज पूरे दिन बनी रही।

कल रात देश के गृहमंत्री अमित शाह के साथ किसान प्रतिनिधियों के हुई बातचीत में इस बात पर सहमती बनी थी कि सरकार किसानों के किन मांगों पर सहमती दे रही है उसके बारे में लिखित रूप से जवाब देगी। जब सरकार की तरफ से जवाब सामने आया तो किसान आंदोलन से जुड़े संगठन इन विंदुओं पर चर्चा करने के लिए एकजुट हुए और लंबी बैठक की। सबसे पहले समझते हैं कि सरकार किसानों की कौन सी मांग मानने को तैयार हुई और इस पर किसानों की बैठक के बाद क्या राय बनी।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव मुख्य रूप से यह हैं-
- राज्य सरकार प्राइवेट मंडियों पर भी शुल्क/फीस लगा सकती है।
- राज्य सरकार चाहे तो मंडी व्यापारियों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर सकती है।
- किसानों को कोर्ट कचहरी जाने का विकल्प भी दिया जाएगा।
- किसान और कंपनी के बीच कॉन्ट्रैक्ट की 30 दिन के अंदर रजिस्ट्री होगी।
- कॉन्ट्रैक्ट कानून में स्पष्ट कर देंगे कि किसान की जमीन या बिल्डिंग पर ऋण या गिरवी नहीं रख सकते।
- किसान की ज़मीन की कुर्की नहीं हो सकेगी।
- एमएसपी की वर्तमान खरीदी व्यवस्था के संबंध में सरकार लिखित आश्वासन देगी।
- बिजली बिल अभी ड्राफ्ट है, इसे नहीं लाया जाएगा।
- एनसीआर में प्रदूषण वाले कानून पर किसानों की आपत्तियों का समुचित समाधान किया जाएगा।

- सरकार के प्रस्ताव से साफ था कि सरकार ने किसानों के 10 अहम मुद्दों में से सबसे बड़ी मांग यानी कृषि कानून रद्द करने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया। 5 मुद्दों पर सफाई देने की बात कही और 4 मुद्दों पर मौजूदा व्यवस्था में बदलाव का भरोसा दिया।
ऐसे में जब किसान नेता इन प्रस्तावों पर विचार विमर्श के बाद सामने आये तो उन्होंने कहा प्रस्ताव गोल-मोल है। सरकार भलाई की बात कह रही है, लेकिन ये कैसे करेगी, स्पष्ट नहीं है। किसानों ने बताया है कि उनके पास केंद्र सरकार ने 19 पन्नों का लिखित प्रस्ताव भेजा है जिसमें किसानों की मांग के आधार पर सरकार ने समाधान का प्रस्ताव दिया है। ये वही प्रस्ताव हैं जो पांचवीं दौर की वार्ता के दौरान भी सरकार ने रखा था। इसके बाद इन किसान प्रतिनिधियों ने आंदोलन को और तेज करने की बात कहते हुए आगे की दशा-दिशा के बारे में बताया। किसानों ने 4 अहम ऐलान किए…
- किसान शनिवार को देशभर में टोल प्लाजा फ्री कर देंगे। दिल्ली-जयपुर हाईवे को बंद किया जाएगा।
- देशभर के सभी जिला मुख्यालयों में 14 दिसंबर को धरना दिया जाएगा। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसान इसमें शामिल होंगे। जो शामिल नहीं हो पाएंगे, वो दिल्ली कूच करेंगे।
- अंबानी-अडानी के मॉल, प्रोडक्ट और टोल का बायकॉट किया जाएगा। जियो के प्रोडक्ट्स का भी बायकॉट किया जाएगा। जियो की सिम को पोर्ट करवाया जाएगा।
- भाजपा नेताओं का नेशनल लेवल पर बायकॉट करेंगे। उनके बंगलों और दफ्तरों के सामने प्रदर्शन किया जाएगा। 14 दिसंबर के बाद से अनिश्चितकालीन प्रदर्शन जारी रहेगा, जब तक तीनों कानून वापस नहीं लिए जाते।

इस बीच अब तक किसानों के पीछे खड़ा विपक्ष जो कि भारत बंद के दौरान खुल कर सामने आया था एक बार फिर इनके नेता सड़क पर एकजुटता का प्रदर्शन करते नजर आये। मौका था 5 विपक्षी नेताओं के राष्ट्रपति से मिलने का। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार समेत विपक्ष के 5 नेता बुधवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिले। इनमें माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई के डी. राजा और डीएमके के एलंगोवन भी शामिल थे। हालांकि इन पांच नेताओं का दावा था वे 20 सियासी विपक्षी दलों का प्रतिनिधित्व करते हुए किसानों के मांग के समर्थन में खड़े हैं। इस दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने कहा, ‘किसान ने देश की नींव रखी है और वो दिनभर इस देश के लिए काम करता है। ये जो बिल पास किए गए हैं, वो किसान विरोधी हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि ये बिल किसानों के हित के लिए है, सवाल ये है कि किसान इतना गुस्सा क्यों है। इन बिलों का लक्ष्य मोदीजी के मित्रों को एग्रीकल्चर सौंपने का है। किसानों की शक्ति के आगे कोई नहीं टिक पाएगा। हिंदुस्तान का किसान डरेगा नहीं, हटेगा नहीं, जब-तक ये बिल रद्द नहीं कर दिया जाता।’
साफ था न तो किसान डरने को तैयार है और न ही सरकार डराने को लेकिन मूल सवाल वहीं बना रहा कि आखिर किसानों का आंदोलन कैसे समाप्त होगा और दोनों पक्षों के बीच जो डेडलॉक बना है वो कैसे समाप्त होगा और देश के आम नागरिकों को जो इस आंदोलन के समाप्ती के लिए सरकार और किसानों की ओर देख रहे हैं उनकी तमन्ना कब पूरी होगी। जिसकी सभावना नहीं दिख रही है। हालांकि किसान नेताओं ने यह भी कहा है कि यदि सरकार आगे कोई प्रस्ताव भेजती है तो उसपर विचार किया जायेगा यानी लोकतंत्र में आंदोलन को नतीजे पर पहुंचने के लिए जो संवाद का रास्ता होता है वो अभी खुला हुआ है। देखा जाना होगा कि संवाद कहां तक पहुंचता है।
