अन्नदाता के विश्वास और हुक्मरानों के प्रति अविश्वास से पसरता ही जा रहा है किसान आंदोलन..बढ़ती जा रही है खाई

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मंगरूआ

नयी दिल्ली: रबी के बुआई का मौसम है। लेकिन किसान सड़क पर है। संग्राम में है। हर हाल में जीतना चाहता है। उधर सियासत अच्छे दिन के सपने दिखा रही है। लेकिन किसान आंदोलन की आंच में अच्छे दिन के सपने बौने साबित हो रहे हैं। बातचीत हो रही है लेकिन न तो अन्नदाता हुक्मरान पर भरोसे को तैयार है और न ही हुक्मरान बातचीत करने का मौका हाथ से जाने देना चाहते हैं। अन्नदाताओं पर आरोप भी लग रहा है और आरोप की जद में सियासत भी है। लेकिन इस आरोप-प्रत्यारोप के भंवरजाल से कैसे निकला जाये ये न तो अन्नदाता को सूझ रहा है और न ही हुक्मरान को। कुछ इसी तरह की स्थिति आज पूरे दिन बनी रही।


कल रात देश के गृहमंत्री अमित शाह के साथ किसान प्रतिनिधियों के हुई बातचीत में इस बात पर सहमती बनी ​थी कि सरकार किसानों के किन मांगों पर सहमती दे रही है उसके बारे में लिखित रूप से जवाब देगी। जब सरकार की तरफ से जवाब सामने आया तो किसान आंदोलन से जुड़े संगठन इन विंदुओं पर चर्चा करने के लिए एकजुट हुए और लंबी बैठक की। सबसे पहले समझते हैं कि सरकार किसानों की कौन सी मांग मानने को तैयार हुई और इस पर किसानों की बैठक के बाद क्या राय बनी।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव मुख्य रूप से यह हैं-

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