आओ अब गांव व खेतों की ओर लौट चलें,अनंत संभावनाएं पुकार रही हैं…

कमलेश कुमार सिंह
रोविंग एडिटर, पंचायत खबर
कोरोना के बाद आने वाले समय में विश्व मानचित्र पर भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से उबरने में ग्रामीण व्यवस्था का ही हाथ होगा
कोरोना वायरस महामारी ने आधुनिक अर्थव्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। बात अगर अपने देश की करें तो, सरकार की स्वप्नलोकी अर्थव्यवस्था एक महीने के भीतर ही लाॅकडाउन से उपजे आर्थिक तंगी में गोते लगाते दिखी। इधर कटौती, उधर कटौती। आर्थिक भविष्य को लेकर चिंता। आम लोगों को रोजी-रोजगार की चिंता। कोरोना काल से उपजे अनिश्चिय व भय वाले आर्थिक भविष्य के खिलाफ सुरक्षा कवच के तौर पर लंबे समय से दरकिनार किए गए गांव व खेत उभर कर सामने आ रहे हैं। पहले लोग गांव से पड़ोस के शहरी इलाकों की ओर पलायन किया, उसके बाद बड़े व महानगरों की ओर और बाद में विदेशों की ओर। लेकिन, मौजूदा संकट में सबकुछ फिर से उलटे क्रम में लौटता दिख रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण से ज्यादा प्रभावित राज्यों में से एक राजस्थान में लाॅकडाउन के बाद आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए गठित टास्क फोर्स का मानना है कि मौजूदा हालात में अर्थव्यवस्था में भरोसा बहाल करने के लिए सरकार को छोटे उद्योगों और खेती-किसानी तथा स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सबसे ज्यादा फोकस करना होगा। आम लोगों मे यह धारणा घर करने लगी है कि अब बेहतरी का एक ही मार्ग है, आओ अब फिर से गांव व खेतों की ओर लौट चलें।

मानव सभ्यता इसी काम को करके आगे बढी है। आधुनिक कल-करखाने हमारी विलासता की जरुरतों को तो पूरा कर सकते हैं, लेकिन विपरित स्थिति में जब यह खुद को नहीं संभाल सकते तो लोगों व अन्य आर्थिक पहलुओं को क्या खाक संभलेंगे। इस समय देश-विदेश के बाजार में जरुरत भी काफी है. अनंत संभावनाएं जन्म ले रही हैं। लेकिन, समय भी तेजी से बीत रहा है. ऐसे में समय की मांग है कि किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम जरूरी कदम उठाए जाएं. संसाधन का प्रावधान कर देने से बात नहीं बनेगी और नीतियों की चर्चा कर लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता, उन पर तेजी से और प्रभावी तरीके से अमल करना होगा. किसान आत्मनिर्भर होगा तभी तो तमाम बुरी आर्थिक खबरों के बीच उम्मीद की एक आस दिखा रहा कृषि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत मददगार बनेगा.

हमारे पास अनगिनत ऐसे उदाहरण हैं, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने न केवल देश को मंदी के दौर से उभारा है बल्कि आर्थिक विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि विश्व को मंदी के दौर से निकालने में भी भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। क्योंकि आज भी देश की 70ः जनसंख्या गांव में ही बसती है और अपनी इस विशाल जनसंख्या के साथ वह विश्व बाजार को प्रभावित करने में सक्षम है। आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी यह समझ में आ रहा है कि भारतीय ग्रामीण बाजारों की ओर गंभीरता पूर्वक देखने का यही सही समय है। अब वह ग्रामीण परिचालन के लिए अपनी रणनीति दोबारा बनाने की होड़ में जुट गई है। हाल फिलहाल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आज ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौती कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था की और स्थानांतरण है। एक तरह बड़े पैमाने पर कृषि से हो रहे पलायन को रोकना जरूरी है तो दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों के लिए विकास के लिए भी काम करना होगा। कृषि से हो रहे पलायन को एक हद तक कोरोना वायरस काबू कर लेगा। ऐसी संभावना है। तमाम चुनौतियों के बीच इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकास की नई शक्ति के रूप में उभर कर सामने आएगी। गांव लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर होंगे और न केवल अपने लिए संसाधन जुटाएंगे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान भी देंगी। अगर यह कहा जाए कि आने वाले समय में विश्व मानचित्र पर भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से उबरने में ग्रामीण व्यवस्था का ही हाथ होगा तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।आधुनिक कल-करखाने हमारी विलासता की जरुरतों को तो पूरा कर सकते हैं, लेकिन विपरित स्थिति में जब यह खुद को नहीं संभाल सकते तो लोगों व अन्य आर्थिक पहलुओं को क्या खाक संभलेंगे।

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