सहजीवन और सहअस्तित्व की संस्कृति की अभिव्यक्ति है गांव

तीसरी सरकार अभियान के संयोजक डॉ चंद्रशेखर प्राण पंचायती राज व्यवस्था को उसके वास्तविक स्वरूप में जमीन पर लागू किया जा सके इसके लिए सतत रूप से प्रयासरत है। उन्होंने  इस विषय पर एक लंबा लिखा है। उस लेख को पंचायत खबर सीरिज के रूप में आपके सामने प्रस्तुत कर रहा है। उम्मीद है आपको पसंद आयेगा और पंचायती राज व्यवस्था के विभिन्न आयामों से आप रूबरू हो सकेंगे। पेश है उस सीरिज की तीसरी कड़ी…

ग्राम स्वराज के अंतर्गत जिस विकेंद्रित अर्थव्यवस्था पर जोर दिया गया है उसका समर्थन करते हुए जय प्रकाश नारायण ने भी इसकी विशेषताओं की चर्चा करते हुए कहा कि विकेंद्रित आर्थिक विकास का एक लाभ यह होगा कि केंद्रित क्षेत्र की अपेक्षा यह विदेशी सहायता पर तथा केंद्र पर हमारी निर्भरता कम करेगा। उन्होंने इसके मुख्य रूप से इसके तीन कारण भी बताएं। पहला स्वैच्छिक श्रम का तत्व अपेक्षाकृत कम होगा, दूसरा वह बहुत बड़े अनुपात में लघु बचतो को आकृष्ट कर उनका उपयोग करेगा, और तीसरा ऊपरी खर्च एवं यातायात तथा अन्य सामाजिक मूल्य बहुत कम होंगे। उनके अनुसार इस अर्थ में विकेंद्रित अर्थव्यवस्था अधिक लोकतांत्रिक होगी।  जयप्रकाश नारायण ने इस व्यवस्था को अत्यंत आधुनिक किस्म की अर्थव्यवस्था के रूप में चिन्हित करते हुए कहा कि ऐसी अर्थव्यवस्था ना आज है और ना कभी रही है और इसके निर्माण के लिए विज्ञान का जिसमें सामाजिक विज्ञान भी शामिल है यथासंभव अधिक से अधिक सहारा लेना होगा।

जेपी के शब्दों में “इस विकेंद्रित अर्थव्यवस्था के लिए एक नई यंत्र प्रौद्योगिकी का और साथ ही एक नई सामाजिक आर्थिक प्रौद्योगिकी का निर्माण करना होगा। स्वराज के इस सपने को साकार करने के लिए आर्थिक विकेंद्रीकरण के साथ-साथ सत्ता अर्थात राजनीतिक सत्ता का भी विकेंद्रीकरण अनिवार्य होगा।“ 

मूलतः ग्राम स्वराज का आधार राजनैतिक सत्ता का ही विकेंद्रीकरण है। जब गांधी यह कहते हैं कि वह सत्ता को 7 लाख गांवों में बिखेरना चाहते हैं तो इसका आशय राजनीतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण ही था। यह इस सत्ता के विकेंद्रीकरण का माध्यम पंचायत को मानते थे ग्राम स्वराज के बुनियादी सिद्धांतों में पंचायत को शामिल करते हुए उनकी परिकल्पना थी कि गांव का शासन चलाने के लिए हर साल गांव के 5 आदमियों की एक पंचायत चुनी जाएगी। इस पंचायत को सभी प्रकार की आवश्यकता सत्ता और अधिकार रहेंगे। उनके अनुसार इस ग्राम शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला संपूर्ण प्रजातंत्र काम करेगा। उनका मानना था कि आजादी का अर्थ हिंदुस्तान के आम लोगों की आजादी होनी चाहिए। इसके लिए हर एक गांव में प्रजातंत्र या पंचायत का राज होगा इसका मतलब यह होगा कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा रहना होगा। 

आज जिस आत्मनिर्भरता अथवा स्वावलंबन की बात की जा रही है बापू  पंचायतों के माध्यम से ही खड़ा करना चाहते थे। इस पर उनको इतना विश्वास था कि वे इसे ही भारत के पुनर्निर्माण का मूलाधार मानते थे। बापू ने पंचायत के जिस पुरातन मिठास की बात की है वह शताब्दियों से इस देश की वाहक रही है। भारत के गांव समाज ने अपने बेहतर संचालन के लिए जो सरल जीवन पद्धति अपनाई उसे ही पंचायत की संज्ञा दी गई। जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है कि संबंधों पर आधारित परिवार और पड़ोस को मिलाकर ही एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में गांव की संरचना हुई है। आज जब यह कहा जा रहा है कि दुनिया की तमाम प्राचीन सभ्यताएं मिट गई लेकिन ‘कुछ खास बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’। तब यदि गहराई से देखें तो यह श्रेय पंचायत की उस जीवनशैली को जाता है जो परिवार और पड़ोस के मूल तंतु ‘संबंध’ को बनाने अथवा बेहतर करने के लिए सदैव प्रयोग की जाती रही। परिवार और पड़ोस बचा रहा तो गांव बचा रहा और गांव बचा रहा तो भारत की संस्कृति बची रही। जब तक भारत की सहजीवन और सहअस्तित्व की संस्कृति बची है तब तक भारत भी बचा है।  पंचायत इन मूल्यों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यावहरित करती रही है। तभी तो वह जीवन के केंद्र में प्रतिस्थापित हो गई थी। तभी तो मैगस्थनीज की घोषणा कि पंचायतें गांव जीवन का ही नहीं अपितु समस्त भारतीय जीवन का अनिवार्य अंग बन गई हैं, इसी बात का परिचायक है। उसके अनुसार उस समय के नगर शासन भी ग्राम शासन की तर्ज पर ही विकसित हुए थे। 

वास्तव में पंचायतें भारत की सामाजिक और राजनीतिक दोनों व्यवस्थाओं का आधार बन गई थी। गांव समाज जो सामान्यतः अपनी संस्कृति और परंपरा के आधार पर चलता था उसके संचालन और नियमन का कार्य पंचायतें करती थी। उस समय के राजतंत्रीय और गणतंत्रीय शासन के लिए भी पंचायतों की आवश्यकता कुछ कम नहीं थी। बल्कि स्वयं स्फूर्त सामाजिक व्यवस्थाअथवा राज्य सरकार द्वारा नियोजित शासन का संचालन इन्हीं के माध्यम से होता था।

इस पूरी व्यवस्था को ई० वी० हैबल यदि आर्यों की प्रजातांत्रिक पद्धति की आधारशिला मानता था तो लॉर्ड मेटकाफ गांव समाज के छोटे-छोटे प्रजातंत्रों की नियोजन एवं संचालन प्रणाली के रूप में इस को प्रतिस्थापित किया था। पंचायत की इसी बेहतर व्यवस्था का परिणाम मानते हुए फाह्यान ने अपने संस्मरण में लिखा है कि यह ग्राम राज्य का ही प्रत्यक्ष फल है कि लोग स्वेच्छा से बंधुता के नियमों का पालन करते हैं और बड़े शांतिप्रिय और उन्नतशील हैं। वास्तव में इस बंधुता शांतिप्रियता और उन्नतिशीलता ने ही भारत के गांवों को समृद्धि और संपन्नता से परिपूर्ण किया था।

ट्रेवेनीयर के शब्दों में ‘ प्रत्येक गांव में मैदा, मक्खन, दूध, साग, सब्जियां,खाँड और मिठाई प्रचुर मात्रा में मिल जाती थी जो गांव की सुख और समृद्धि की परिचायक थी। कार्ल मार्क्स ने भारत के ग्राम समुदायों की परिपूर्णता और आत्मनिर्भरता की प्रशंसा करते हुए एशिया के समाज के सुदृढ़ संगठन और स्थायित्व का श्रेय इन्हीं स्वावलंबी ग्राम समुदायों की उत्पादन प्रणाली को ही दिया था।भारत में प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक, पंचायतों का एक लम्बा इतिहास है, जो अलग-अलग कालों में, अलग-अलग रूपों में विद्यमान रहा है लेकिन उसके मूल्य और गुणधर्म, सभी कालों में समान रूप से व्यवहरित होते रहे हैं। वैदिक काल में पंचायत बहुत सुदृढ़ थी। प्रत्येक गांव एक छोटा स्वायत्त राज्य था। रामायण और महाभारत काल में राज्य, पंचायत की इस सामाजिक व्यवस्था का उपयोग, अपने हितों में भी करने लगा था।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी से सोलह महाजनपदों के कालखंड तक भारत में पंचायतों की व्यवस्था उत्कृष्ट रूप ले चुकी थी। गणराज्यों का विकास, पंचायत की ही कार्य प्रणाली के आधार पर हुआ था।  मौर्य और गुप्त काल भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता है। मध्यकाल में पंचायत प्रणाली ने गांव जीवन को अधिक से अधिक खुशहाल बनाने का कार्य किया। चोल राजवंश के लेखों से तमिल देश में सभा और समिति के कार्यों का विस्तृत विवरण अग्रहार गांवों के बारे में मिलता है। भरहटा शासनकाल में पंचायत के फैसलों पर ब्राह्मण ही नहीं दलितों तक के हस्ताक्षर मिलते हैं। मुगलकाल में भी गांव जीवन की संस्थाएं सुरक्षित रहीं। ब्रिटिश काल, भारत के गाँवों की गुलामी और पंचायत प्रणाली के ह्रास का काल है। व्यापारी बनकर आये अंग्रेजों ने इस प्राचीन एवं लोकप्रिय व्यवस्था पर सबसे अधिक चोट की, जिससे गाँव-समाज में टूटन और दरार पड़ गयी। इसका सबसे बड़ा खामियाजा उसकी समृद्धि और आत्मनिर्भरता पर पड़ा। गाँव धीरे-धीरे परावलम्बी होने लगे। विपन्नता एवं संवादहीनता के कारण लोकमानस में व्यापक पैमाने पर असंतोष फैलने लगा।  शोषण और अत्याचार से उपजे असंतोष के कारण ही 1857 की क्रांति हुई। इस क्रांति के बाद भारत की सत्ता ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथ से निकल कर ब्रिटिश सरकार के हाथ में चली गई। अपनी सत्ता की जड़ों को गहराई तक ले जाने तथा भारतीय के असंतोष को कम करने के लक्ष्य के साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थानीय स्वशासन की बात की जाने लगी थी। 

सन् 1870 में लार्ड मेयो का प्रस्ताव, सन 1880 में अकाल आयोग की रिपोर्ट तथा 1882 में लार्ड रिपन का प्रस्ताव, इन सभी में स्थानीय स्वशासन की पुरजोर वकालत की गई। इसके बाद सन 1907 में 5 सदस्यीय शाही विकेन्द्रीकरण आयोग का गठन किया गया। इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही अंतत: पूरे देश में पंचायतीराज की नये सिरे से पुनर्स्थापना प्रारम्भ हुई। स्थानीय स्वशासन और विकास के नाम पर, नये स्वशासन का ढांचा तैयार कर पंचायतों को सरकारी तंत्र के अधीन करने का प्रयास किया गया। वर्ष 1919 में गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट लागू हुआ, जो माण्टेग्यु- वचेम्स फोर्ड के सुझाव पर आधारित था। इस एक्ट के लागू होने के साथ पंचायतों का विषय केन्द्रीय सरकार का न होकर राज्य सरकार का हो गया। इसका लाभ यह हुआ कि सभी प्रदेश सरकारों ने अपने पंचायतीराज एक्ट बनाना शुरू कर दिया। इस तरह 1920 के आसपास ब्रिटिश भारत के सभी प्रांतों में पंचायत सम्बन्धी कानून बन गये और कानूनी पंचायतों का गठन शुरू हो गया। पंचायतों की पुनर्स्थापना का यह प्रयास प्रकारान्तर से उसकी परम्परा को और अधिक कमजोर करने का प्रयास सिद्ध हुआ। इस काल की यह पंचायत वस्तुत: नौकरशाही की एजेंसी बनकर रह गयी। इनमें न तो पंचायतीराज की मौलिक भावना विकसित हो पायी और न ही यह पंचायतें जन-समुदाय की सामूहिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकी। आजादी के बाद महात्मा गाँधी की दृष्टि में पंचायत को ही भारतीय संविधान का आधार बनाना चाहिए था, लेकिन उनकी परिकल्पना का सम्मान संविधान सभा नहीं कर सकी। गलती का अहसास होने पर, पंचायत की व्यवस्था को समयाभाव का बहाना बनाकर नीति निर्देशक तत्वों (अनुच्छेद 40) के मध्य, भारतीय राज्य के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया। जन-सहभागिता और गाँवों के विकास के लिए प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू किया। जिसके चलते पंचायत परम्परा उपेक्षित हो गई। किन्तु सामुदायिक विकास कार्यक्रम की कमजोर सफलता के कारण लगभग 9 वर्ष के बाद एक बार फिर से पंचायतों का सहारा लेने के लिए बाध्य होना पड़ा।

बलवन्तराय मेहता कमेटी का गठन हुआ, इसके सुझावों के आधार पर नये रूप में पंचायतीराज व्यवस्था की स्थापना हुई लेकिन यह कोशिश बहुत दूर तक नहीं चल पाई। राज्य सरकारों के रहमोकरम पर छोड़ी गई पंचायत मरणासन्न स्थिति में पहुँच गई। इसके बाद करीब 20 वर्षों तक पंचायत व्यवस्था की चर्चा छिटपुट रूप में या दबे स्वर में कभी-कभार उठती रही। सरकारें तो बदलीं लेकिन व्यवस्थागत परिवर्तन अधूरा ही रहा। राजीव गाँधी के आगमन के साथ पंचायतीराज व्यवस्था के पुनरुत्थान का नया अध्याय फिर से प्रारम्भ हुआ। संविधान संशोधन के माध्यम से व्यवस्थागत परिवर्तन करके नये पंचायतीराज का खाका तैयार किया गया। उनके कार्यकाल में तो वह नहीं हो पाया, लेकिन उनके बाद वर्ष 1992 में 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से नये पंचायतीराज की स्थापना का प्रयास पुन: प्रारम्भ हो गया। धीरे-धीरे 1994 तक लगभग सभी राज्यों के अधिनियमों में संविधान की मंशा के अनुरूप परिवर्तन किये गये। इसी के साथ भारत के इतिहास में पंचायतीराज का एक नया दौर प्रारम्भ हो गया।

जारी है….
पेश है सीरिज की पहली व दूसरी कड़ी

गांव का पुनर्निर्माण:ग्राम स्वराज्य ही विकल्प

बापू का स्वदेशी और स्वावलंबन ही गांव की आत्मनिर्भरता का मुख्य आधार

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