बाबा ने ठाना… मंदिर बनाकर ही मरूंगा

कुमार विनोद, वरिष्ठ टीवी पत्रकार
अब नई दिक्कत शुरु होती है- बघड़ियों के टीले पर. बाबा ने अपने पांच बेटों के साथ टोला तो बसा लिया, लेकिन खाने पीने की दिक्कत तमाम थी. ये फतेहपुर बाजार तो अब हुआ है न, जहां सबकुछ मिल जाता था. पहले नून-तेल-मसाला और सरकारी राशन लेने के लिए भी पुराने गांव कुरमुरी ही जाना पड़ता था. और दुश्मनी की वजह से ये काम आसान नहीं था. फौदार बाबा, कुलपत बाबा, धनपत सिंह, गांव के दबंगो को फूटी आंख नहीं सुहाते थे. तब ये सारा जिम्मा योगी सिंह को दिया गया था. गांव में उनसे ही कोई बोलता नहीं था. थोड़े पढ़े लिखे थे और जमींदारों के घर नौजवानों से दोस्ती भी थी, तो किसी तरह काम चलता गया…
योगी सिंह के दो बेटे थे- बड़े देवराज सिंह और छोटे राम सरीखा सिंह, मेरे बाबा, जिनसे ये पूरी कहानी सुन रहा हूं. एक बेटी भी थी, जो शादी से पहले ही मर गईं. बाबा कहते थे बाबूजी की बहुत दुलारी थी. भात की जगह पानी में चावल फुलाकर गुड़ के साथ खाती थी. कच्चा चावल खाने की वजह से उसे पेट की बीमारी थी. मना किया जाता था नहीं मानती थी. एक दिन योगी बाबा गुस्सा हो गए. हल जोत कर आए थे, देख लिया छुप कर गुड़ चावल खाते हुए. गुस्से में चाबुक चला दिया. चोट ज्यादा नहीं लगी थी. माई ने हल्दी दुध पिलाया, वो सो गई. लेकिन सोते सोते ही मर गई. (हमारे घर में आज भी दीवाली पूजा होती है, उसमें धोती योगी बाबा के लिए और एक साड़ी उनके लिए चढ़ती है, जिसके आंचर में फुलाया हुआ चावल और गुड़ बांधा जाता है…)
बेटी की मौत के बाद योगी सिंह सचमुच के योगी हो गए. दीन दुनिया से विरक्त. कभी खुद को कोसते तो कभी बेटी को लेकर सजाए सपनों को गुनते. एक ही तो बेटी थी. वो भी हाथ से ऐसे गई. ये पाप उन्हीं के हाथ लिखा था? तब मेरे बाबा छोटे थे. बड़े बाबा, यानी बाबा के भाई देवराज सिंह जवान हो चुके थे. योगी सिंह के संन्यास के बाद घर का पूरा जिम्मा उन्हीं पर. खेती बाड़ी समेत हर काम. शादी भी उनकी जल्दी कर दी गई. घर में थोड़ी चहल पहल बढ़ी. तब तक योगी बाबा की हिदायतें बदल चुकी थी. पूजा पाठ के साथ पढ़ाई लिखाई पर जोर बढ़ने लगा. अपने बड़े बेटे देवराज से कहा- तुम तो पढ़ लिख नहीं पाए, बुचिया भी नहीं पढ़ी. अब ये छोटा है जो राम सरीखा, इसे स्कूल भेजने का इंतजाम करो…


बाबा इस बात पर हंसने लगे. बताओ, पूरे खानदान में कोई पढ़ा लिखा नहीं. स्कूल भी दो कोस दूर. सब चोरी चमारी में लगे रहते थे या पहलवानी में. जो पूरे 2 हजार बीघे का जोत टोले के आस पास था, उसमें चुराने जैसा कुछ नहीं था. 15-20 लोगों का परिवार था. हर सीजन में थोड़ी थोड़ी धान, गेहूं, चना, मसूर, मटर उठा लिए तो पूरे साल का खाना हो जाता था. समझो समुंदर में से एक बाल्टी पानी निकाल लेना. जमींदारों को पता भी नहीं चलता था. हालांकि ये काम बड़े ही करते थे. बच्चों को इससे दूर ही रखते थे. हम लोग तो दिन—दिन भर भैंस चराया करते थे. मछली मारा करते थे. बरारी, बांगुर, फरहा, सिंघिल, गरई, टेंगरा ये सब मछलियां बहुत बड़ी बड़ी होती थीं. जिस खेत में हाथ लगा वहीं मछली, जिस आहर-जोह में धोती का भी जाल बनाकर डालते थे. खाने भर मछली मिल जाती थी. तब सब्जी कौन पूछता था. बघड़ियों के टीले पर लौकी, कोहड़ा, नेनुअआ एक बार बो दो तो पूरे साल मिलता था. कोई खर्चा ही नहीं था.
भैंस का दूध अपना ही होता था. उसी से घी, मक्खन, दही, मट्ठा सब. घी इतना होता था, कि उसी में पूरे साल सब्जी बनती थी. तो फिर पढ़ता कौन. लेकिन योगी सिंह ने मुझे फंसा दिया. देवराज भैया मुझसे 15-16 साल बड़े थे, लगा दिया मेरे पीछे. मैंने कितना फुसलाया, कि आप अकेले काम करते हो, मैं आपका हाथ बंटा देता हूं, इतनी दूर स्कूल क्या करने जाऊंगा. पढ़ के क्या करूंगा. तब नौकरी का भी किसी ने नहीं सुना था गांव में. पुलिस, फौज और मास्टरी. बस यही था. लेकिन देवराज सिंह नहीं माने. अकेले स्कूल जाने की वजह से मेरे साथ वो रोज स्कूल तक जाते. वहां छोड़कर वापस आते. लेकिन मैं तब भी नहीं पढ़ना चाहता था….


ये उस दौर की बात है, जब देश आजाद नहीं हुआ था. किसी को पता नहीं था हम गुलाम हैं. गांव में ना रेडियो, ना अखबार. किसी तरह की सूचना का कोई साधन नहीं. गांधी का नाम जानते थे कुछ लोग, जिसमें योगी सिंह भी एक थे. पढ़े लिखे लोगों के साथ चर्चा होती थी उनकी, सो देश समाज की कुछ खबर होती थी उन्हें, लेकिन किसी को बताते नहीं थे. योगी बाबा के चार भाई और थे, कुलपत सिंह, वही जो लाला जी के यहां पहरेदारी करते थे- उनके तीन बेटे- रामराज सिंह, दूधनाथ सिंह, राम नरेश सिंह. उसके बाद रामाशीष सिंह, जिन्हें कईल सिंह बुलाते थे लोग- उनके दो बेटे-
सिंहासन सिंह और गंगा विशुन सिंह. उसके बाद धनपत सिंह, जिनके एक मुक्के से सांड मर गया था, उनके भी दो बेटे थे- रामजनम सिंह, शिवजनम सिंह. और सबसे छोटे पहलवान राम परीखा सिंह- उनके भी दो बेटे- रामचंद्र सिंह और चंद्रागीत सिंह.
राम पऱीखा की शादी बहुत बाद में हुई थी, लिहाजा उनके बच्चे भी बाद हुए, जो थोड़ा पढ़े लिखे. रामचंद्र सिंह पढ़ाई लिखाई करने के बाद ट्रक चलाने लगे. कलकत्ता से लेकर देश के तमाम पूर्वी हिस्सों में भ्रमण किया. वो पहले आदमी थे, जिन्होंने शहर देखा. उन्होंने अपने छोटे भाई चंद्रागीत सिंह को टेल्को में नौकरी लगवा दी किसी साहब को बोलकर. छोटे भाई की नौकरी लग गई, तब पिता का हाथ बंटाने के लिए वो सब छोड़ छाड़कर गांव आ गए. मतलब एक भाई नौकरी करने लगा, तो दूसरा क्यों परदेसी बने. ऐसा जुड़ाव था. ये 1970 के दशक की बात है…
लेकिन बाबा की कहानी 1930 के दशक में हमने कुछ देर क लिए रोकी थी, उसे आगे बढ़ाते हैं. उनके बड़े भाई देवराज सिंह दो कोस दूर रोज स्कूल छोड़कर आते थे, लेकिन बाबा इतने खिलंदड़ कि कुछ दिनों बाद स्कूल से कुछ दूर ही कहने लगे- भैया चले जाओ, अब मैं अकेले पहुंच जाउंगा. इधर देवराज सिंह वापस लौटते और बाबा किसी दीन नहर के पुल के नीचे, तो किसी दिन आम अमरूद के बगीचे में, तो किसी दिन चरवाहों के साथ, तो किसी दिन धान के खेत में काट देते. स्कूल तो जाते ही नहीं थे. एक दिन देवराज सिंह को ये बात पता चली. बाबा की बहुत कुटाई हुई…
बाबा बता रहे थे- भैया ने नाहर से हेहर तोड़कर इतना मारा था इतना मारा था, कि पूरा देह सूज गया था. स्कूल से लेकर घर तक मारते मारते लाए थे. तब बाबूजी, यानी योगी सिंह ने बड़ी फटकार लगाई थी उन्हें. कहने लगे थे- मेरे हाथ से बेटी मर गई, तुम अब भाई का वध करोगे क्या. मां ने भी उनसे बात नहीं की थी. कई दिन उन्हें घर से बाहर सोना पड़ा था. लेकिन भैया की उस दशा पर मुझे बहुत तरस खाया था. क्योंकि वो जो गुस्से में मारते हुए बोल रहे थे- वो सब मैंने सुना था- सार, पढ़ब ना तो हरवाही करब. दिन भर धान नोचब. असही दिन चल जाई. पढ़ब हमारा खातिर. नौकरी करब तू, जीवन बनी तहार, हम मेहनत करतानी खाली अपना खातिर का? सरऊ मार के मुआ देब आज के बाद से झूठ बोलब त. हमरा के धोखा दे ताड़, त तहरा के भगवानों ना माफ करिह. हम चहती तो अबहिए तहरा के हरवाही—चरवाही में लसार देतीं, लेकिन काहे कहतानी कि पढ लिख जा बबुआ. तहरा खातिर बाबू तक ले गिड़गिड़ा ताड़न, आ तू, हमनियए से झूठ बोलताड़?
बबुन, ये सब बात हमारे कान में गूंजता रहा. चोट का दर्द अपनी जगह था, जो तीन चार दिन में ठीक हो गया, लेकिन भैया की बात मन में बैठ गई. फिर मैंने स्कूल कभी नहीं छोड़ा. मन लगाकर पढ़ा- स्कूल में भी और घर में दीया जलाकर भी…

वो स्कूल चकिया में था. वहां आठवीं तक की ही पढ़ाई थी. तब आठवीं ही बोर्ड हुआ करता था. 2 साल की मेहनत में इतना तेज हो गया, कि ‘चक्रवर्ती गणित’ (उस समय के मैथ्स की किताब, जिसे आज के बीए वाले लोग भी नहीं हल कर पाते) पूरा मुंह जबानी हल कर दिया करता था. आठवीं पास किया तो पूरे जवार में शोर हो गया- योगी सिंह का बेटा आठवीं पास कर गया है. एक साल के अंदर गांव में कुछ सरकारी लोग आए थे- गणना के लिए. उन्हें ये बात पता चली. तो एक स्कूल में मुझे लगवा दिया. ये 1946-47 की बात होगी. तब 12 रुपये मिलते थे महीने के.
मैं हैरान- 12 रुपये.
बाबा बोले हां- तब इसकी कीमत बहुत होती थी. एक रुपये में सोचो 4 किलो घी मिलता था. अमेरिका के डॉलर जितना होता था हमारा एक रुपया. मेरी नौकरी लगी, इसके कुछ साल बाद भैया के बेटे नारायण सिंह (देवराज सिंह के बेटे) की भी नौकरी लग गई. वो भी शिक्षक बन गया. उसे 15 रुपये मिलने लगे. हम पूरे इलाके में चर्चित हो गए- एक घर में दो दो मास्टर!
बाबा ने आगे बताया- मेरी नौकरी लगने के एक ढेढ़ साल बाद तुम्हारे पिता (सर्वदेव सिंह) का जन्म हुआ. उसके 2 साल बाद जयदेव, और उसके 5 बाद सूर्यदेव, शांति और आखिर में सबसे छोटी कांति का जन्म हुआ.

मैंने पूछा आपके एक बेटे और भी थे ना- उनका भी नाम सूर्यदेव ही था शायद.
बाबा इस बात पर भावुक हो गए बाबा हां. वो पहला बेटा था. बेटी चूरामणि से भी बड़ा. बहुत होनहार था. अकेले स्कूल चला जाता था. घर का सारा खर्च वहीं चलाता था. पाई—पाई का हिसाब रखता था. तब मैं दूर के स्कूल में पढ़ाने लगा था. हफ्ते में एक बार आता था. घर का सारा काम वही करता था. एक दिन वो 4 कोस दूर बाजार से सामान लेकर आया. रात में बुखार आया और फिर कभी उतरा ही नहीं. जब तक अगले रविवार को मैं आया, उसकी हालत खराब हो चुकी थी. 4 कोस दूर सरकारी अस्पताल में ले गए खाट पर लादकर लेकिन पहुंचते पहुंचते दम टूट गया.
तब मन किया था कि नौकरी छोड़ दूं. लेकिन देवराज भैया ने कहा, नहीं. ये मत करो. मैं मन मारकर स्कूल तो चला गया, लेकिन बेटे को खोने का गम कम नहीं हुआ. उसके बाद बेटी हुई चूरामणि. इस तरह कुल 6 बच्चे. छोटा वाला हुआ तो घर के लोग उसे मुन्ना कहने लगे. लेकिन बड़े बेटे की याद में मैंने उसका नाम सूर्यदेव रखा.
अब मेरा ध्येय था- सबको पढ़ाना लिखाना. देश आजाद हो चुका था. मुझे भी नौकरी करते हुए दस साल हो चुके थे, लेकिन परिवार के दूसरे घरों में पढ़ाई लिखाई का कोई माहौल नहीं था. लड़कियों के लिए तो कतई नहीं. बड़ी बेटी चूरामणि और शांति इसीलिए नहीं पढ़ पाईं. तुम्हारे पिता सर्वदेव पढ़ने लिखने में मेरी तरह होशियार था. 1966 के सूखे में उसने मैट्रिक पास किया था. उसके बाद जयदेव भी पढ़ने में तेज निकला. छोटा वाला सूर्यदेव दुलारा था. ये उतना नहीं पढ़ा, लेकिन कद काठी बिलकुल हमारे बाबा जैसा हट्ठा कट्ठा था….


इन्हें पढ़ा लिखा तो दिया, अब आगे? तुम्हारे पिता पढ़ने में तो तेज थे, लेकिन मास्टरी की नौकरी करना नहीं चाहते थे. कहते थे 20 रुपये में पूरे महीने कौन काम करेगा. इससे बढ़िया तो मैं 10 भैंस पाल लूंगा. और वो करता भी था. अकेले 5 भैंस का दूध निकाल लेता था, उन्हें दोनों टाइम खिला लेता था. छोटे भाइयों को काम में लगने नहीं देता था. जो दो बेटियां नहीं पढा पाया उनकी शादी मैंने बड़ी देख सुनकर की. चूरामणि की शादी नए नए मिलिट्री में भर्ती हुए लड़के से की. तो शांति की शादी बोकारो में खटाल चलाने वाले एक परिवार में. बड़ी आमदनी थी उनकी. उसके बाद तीन बेटों की शादी की. परिवार हर जगह पढ़ा लिखा ही ढूंढा. तुम तो जानते ही हो, तुम्हारे नाना रेलवे में नौकरी करने वाले समुदाय के पहले आदमी थे. तुम्हारे नाना से मेरी बहुत बनती थी. पढ़ाई लिखाई को लेकर वो मुझसे भी आगे की सोचते थे. तुम्हारी मां की शादी के बाद भी उन्होंने उसे अपने खर्चे से पढ़ाया. टीचर ट्रेनिंग कराई और आखिर में नौकरी भी लगाने में मदद की. इसी तरह जयदेव की शादी हुई, तो कुछ साल बाद इसकी भी टीचर में नौकरी हो गई. और उसने अपनी बीवी को भी पढ़ा लिखकर टीचर बना दिया. मुन्ना को उसके बड़े जीजा ने राह दिखाई. कद काठी अच्छी थी, तो मिलिट्री में नौकरी हो गई. इस तरह मेरा काम पूरा- दो बेटे नौकरी करने लगे, दो बहुएं शिक्षक बन गईं. एक रहे तुम्हारे पापा, तो वो सबसे ज्यादा पढ़े लिखे थे. लेकिन कहता था- सब भाई नौकरी ही करेंगे, तो घर कौन देखेगा. ऊपर से मेरी नौकरी अभी 5-6 साल बाकी थी ही…
पढ़ाई लिखाई के मामले में इस तरह बघड़ा टोला का ये परिवार पूरे जिले में चर्चित हो गया. ये सबकुछ हुआ सिर्फ एक आदमी की बदौलत. अब भी जो बाबा के पांच परिवार थे, उनमें नौकरी या पढ़ाई को लेकर कोई खास उत्साह नहीं था. ऐसा नहीं, कि प्रेरणा नहीं, बल्कि प्राथमिकता में ही नहीं थी. परिवार के तीन बाबा कुलपत सिंह, धनपत सिंह और कईल सिंह ने कुछ पैसे जुटाकर बघड़ा टोला से 100 कोस दूर कुदरा के पास कटरा गांव में 60 बीघे जमीन ली और वहीं बस गए. यहां रह गए योगी सिंह और राम परीखा के परिवार. जैसा कि उपर मैंने बताया- राम परीखा के दोनो लड़के भी नौकरी करने लगे. जिसमें से बड़े वाले रामचंद्र सिंह ने घर संभालने में पिता की मदद के लिए ट्रक ड्राइवरी छोड़ गांव आ गए….
बाबा राम सरीखा सिंह ने अपना मकसद पूरा कर लिया था. लेकिन एक इम्तिहान अब भी बाकी था उनका, जो उनके पूरे जीवन पर भारी पड़ा- वो था सबसे छोटी बुआ- कांति की शादी।

बाबा का वो इम्हितान और उससे गुजरने का दर्द तो मैंने अपनी आंखों से देखी था. 12-13 साल की उम्र थी सब समझता था. कांति बुआ आज के टॉम ब्वाय की तरह थी. लड़कों की तरह गाली देती थी, आम अमरूद तोड़ने पेड़ पर भी चढ़ जाती थी. मतलब किसी भी मामले में लड़के से कम नहीं. ये 1980 के दशक की बात है. बाबा ने उन्हें पाला भी बड़ी नाज से था. लेकिन एक बात से मजबूर थे. 5वीं की पढ़ाई के बाद कोई स्कूल नहीं था लड़कियों के लिए. था भी तो बहुत दूर. बाबा खुद बाहर रहते थे. इसलिए चाहकर भी उसे पढ़ा नहीं पाए. वर्ना वो भी उसे अपनी तरह शिक्षक बनाना चाहते थे. लेकिन कोई चारा नहीं था. अपनी नौकरी करते या बेटी को पढ़ाने के लिए आरा जैसे शहर में इंतजाम करते. पास के पीरो में स्कूल था, लेकिन 6 कोस दूर लड़की कैसे जाती. वो भी अकेली. गांव में माहौल ही नहीं था लड़कियों को स्कूल भेजने का. पांचवी तक भी पढ़ाना बाबा की हिम्मत का काम था. लेकिन इससे आगे जो नहीं कर पाए, उसके लिए वो कोसते ही रहे. फिर हो गई शादी की उम्र. घर में सबसे ज्यादा उम्र में शादी कांति बुआ की ही हुई थी. करीब 17-18 साल में. लड़का ढूंढा गया बगल के सिकरहट्टा गांव में. लड़का माता पिता का अकेला था. पिता जी इलाके के जाने माने आदमी थी. एक लड़के पर 20 बीघा जमीन थी. बाबा ने सोचा बेटी राज करेगी. लड़का अभी 8 वीं में पढ़ रहा है. सुंदर है, हट्ठा कट्ठा है. नौकरी तो करने ही लगेगा. बस ये सब देख गुनकर हां कर दी.
शादी तय हो गई. बारात आई. बैसाख का महीना था.
बाबा की उम्र 50 पार की कुछ रही होगी. सफेद धोती कुर्ता, नीलहा गमछा. बाबा इसी तरह सबका स्वागत कर रहे थे. दिखने में बेहद खुश और सत्कारी. जैसी की उनकी सामाजिक छवि थी. बारात लड़के वालों की तरफ से पूरी तरह सजाकर लाई गई थी. इकलौता लड़का था, सारे अरमान इसी शादी में में पूरे करने थे. लिहाजा द्वारपूजा से लेकर शामियाने तक नाच-बाजा और पटाखों का पूरा इंतजाम था. गांव में इतनी बड़ी साज-धाज वाली बारात पहली बार आई थी. बाबा इस बात से खुश थे…


लेकिन आधी रात होते होते सबकुछ सुन्न सा पड़ गया…
शादी के अगुवा (रिश्ता तय कराने वाला) ने बाबा के कान में आकर बताया, लड़का चाहता है शादी में ही विदाई हो. उसके पिता समझा रहे हैं, ये अचानक नहीं हो सकता. लेकिन वो मान नहीं रहा. ये किसी सदमे से कम नहीं था. क्योंकि परंपरा अब तक यही थी- पहले शादी होती है, फेरे पड़ते हैं, लड़का लड़की शादी के बाद घंटे दो घंटे के लिए कोहबर में मिलते हैं। उसके बाद बारात अगले दिन वापस चली जाती है. लड़की की विदाई दोनों पक्षों की सहमति के बाद गोने (द्विरागमन) में होती है. बाबा भी यही मानकर चल रहे थे. क्योंकि गौने के लिए तैयारी भी अलग करनी होती है. लड़की को अपनी श्रद्धा से दिया जाने वाला सामान तैयार करना होता है. लड़की के लिए पूरा बेड आइटम (पलंग, गद्दा, तकिया, रजाई) इसके साथ उससे इस्तेमाल की हर चीज, कुछ बरतन, पूरे परिवार के लिए कपड़े और मिठाई (खाझा खजुली). लड़की की विदाई इसी के साथ की जाती रही है. बाबा ने इसकी कोई तैयारी की नहीं थी, क्योंकि इसकी कोई बात ही नहीं थी. लेकिन लड़का तो जिद पर अड़ गया. किसी की सुनने को तैयार नहीं…
इधर बाबा को काटो तो खून नहीं. इसे परंपरा से भी जोड़ा, कि भाईसाहब, हमारे यहां शादी में विदाई सहता नहीं (शुभ नहीं माना जाता) लेकिन ये तरकीब भी काम नहीं आई. अब क्या करें…
अभी इस बात पर चर्चा ही चल रही थी, कि बाबा को दौरा पड़ा. दिल का दौरा नहीं, एक अजीब सी हरकत करने लगे- खुद का कुर्ता फाड़ने लगे, अपने दांत से अपना ही बदन काटने लगे. छोटे से कद के आदमी, किसी की पकड़ में नहीं आ रहे. बार बार बडबड़ाते- उसका लड़का—लड़का है, हमारी बेटी—बेटी नहीं. ऐसे नंगे भेज दें. बाप का कोई फर्ज होता है कि नहीं. साले को भगा दो. नहीं करनी शादी मुझे ऐसे नायालक से. जो लड़का बड़ों की नहीं सुन रहा, उनकी इज्जत नहीं कर रहा. वो मेरी लड़की की क्या इज्जत करेगा…


करते—करते सुबह हो गई. सुबह तक बाबा का शरीर अपने ही काटने की वजह से खून—खून हो गया था. वो बेसुध पड़े थे. कभी अचानक उठकर रोने लगते. तो कभी गाली देने लगते. पूरे घर में मातम. लेकिन विदाई से कम पर बात नहीं बनी. फेरे पड़ चुके थे. उधर बाबा बेसुध थे. घर में जो भी नई साड़ी, कपड़ा लत्ता, मेरी मां चाची का शादी वाला बक्सा था, उसके साजो सामान तैयार कर कांति बुआ की विदाई कर दी गई. विदाई हो रही थी, तो बुआ की आवाज सुनकर एक बार फिर दौरा पड़ा बाबा को. वो खुद को फिर से काटने लगे. डोली दूर गई, तो दूर से देखते ही देखते जमीन पर गिर पड़े. एकदम बेहोश…
ये सब दृश्य हैं, जो मुझे याद है. इसके पीछे क्या क्या हुआ, उसकी डिटेल बस सुनी है, याद नहीं. बाबा कई दिन तक इसी मानसिक हालत में रहे. विदाई के अगले दिन बुआ के यहां परंपरा के मुताबिक कहार भेजा गया, उसके साथ दो चार लोग गए. जो सामान विदाई में रह गया था, वो भेजा गया. लेकिन बाबा की हालत नहीं सुधरी. ये जानकर लड़के के पिता जी बाबा से मिलने आए. शायद उन्हें एक पिता के दर्द का एहसास हो गया था. लेकिन बाबा का गुस्सा कम नहीं था- बोले बेटी छीन कर ले गए न. अब क्या करने आए हैं…
इस बात पर बाबा भी फूट—फूट कर रोने लगे. और वो भी. उन्होंने आकर गले से लगाया. बोले चल कर देख लीजिए- आपकी बेटी खुश है, उदास नहीं. हमने अपनी बेटी की तरह रखा है. आप जब चाहें बुला लें. हमें कोई ऐतराज नहीं होगा….
लेकिन बाबा का उसूल. जो तज दिया तो तज दिया. फिर वापस क्या मांगना. लड़के के पिता ने विदाई की बात कही, लेकिन वो कुछ नहीं बोले. समधी की तरह पूरा सत्कार किया. एक की बजाय दो दिन रखा. लेकिन उनके बुलावे के बाद भी बुआ के घर नहीं गए (परंपरा है- बेटी के यहां का अन्न जल नहीं खाते. जब बहुत मजबूरी हो और जाना भी पड़े, तो दूर के किसी गांव से पानी और खाना आता था, यही लड़की के पिता खाते थे)

कुछ दिनों बाद वो हुआ, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी. बाबा को लकवा मार गया. पूरा बायां अंग सुन्न. सिर से लेकर पांव तक. इलाज हुआ, कुछ दिन बाद ठीक भी हो गए, लेकिन मुंह थोड़ा टेढ़ा ही रहा. 1985-86 में रिटायर हुए. उससे पहले उनके तीनों बेटों में विवाद गहरा चुका था. उन्हें अपने जीते जी बंटवारा करना पड़ा. मेरे पिता अलग हो गए, दो चाचा एक साथ रहे. अब एक नया धर्मसंकट- बाबा किधर जाएं. उन्होंने फैसला तो बहुमत के साथ रहने का किया. चाचा लोगों के साथ रह गए, लेकिन जाने क्यों, दिल मुझसे जुड़ा रहा. अलग होने के बाद कुछ दिन तक दोनों धड़ों में अबोले की स्थिति थी. लेकिन मुझे दिन में एक बार जरूर किसी न किसी तरह पास बुलाते. बाजार से आते तो कुछ ले आते. कभी हाथ, तो कभी माथा चूम लेते और चुप—चाप चले जाते.
इसी दौर में ही वो घर से बाहर रहने लगे थे. वो चाचाओं के साथ थे भी और नहीं भी. ये गजब की उधेड़बुन थी. उन्हें नहीं अंदाजा था ये उन पर किस तरह भारी पड़ने वाला था- लकवे का दूसरा अटैक भी पड़ गया. बाबा इस बार पूरी तरह अपंग हो गये. लेकिन जीने की जिजिविषा देखिए. कुछ दिन में ठीक हो गए. इस बार एक पांव में ताकत कम हो गई. वो बकुली के सहारे चलने को मजबूर हो गए. लेकिन डेढ़ टांग के साथ भी करीब 5 साल चले.


घिसटते—घिसटते, तो कभी मुझे बुलाकर कंधे पर हाथ रखते हुए रोज शाम को बाजार जाते, अखबार पढ़ते और साग सब्जी लेकर चले आते. ये सबकुछ दोनों चाचाओं के परिवार के लिए होता था. वो जानते थे शायद ये गलत है- अपनी कमाई का पैसा उस बेटे को नहीं दे रहा, जो बेरोजगार है. परिवार के लिए नौकरी नहीं की उसने. लेकिन करते क्या…?
एक चीज उन्होंने इसी दौर में तय किया था- मंदिर बनाना. आखिरी दिनों में वो जो शिव शिव कहा करते थे. एक दिन उठे और बोले- मैं मंदिर बनाकर ही मरूंगा. 1989-90 के बाद अपनी पूरी पेंशन और जमा राशि से उन्होंने शिव मंदिर बनवाना शुरु किया. इस दौरान आंख खराब हुई, शुगर भी बढ़ गया. और मैं आरा कॉलेज की पढ़ाई के लिए चला गया था. लेकिन जब भी आता, बाबा ये सारी चीजें मुझसे ही कहते. बाबा के लिए एक बार दो महीने कॉलेज छोड़ दिया था मैंने. सर्दियों में वैसे ही 2 महीने की छुट्टियां हो जाती है. ऊपर से और दो महीने. इस दौरान मैंने बाबा के शूगर का पूरा इलाज किया. सुबह शाम खाते वक्त इंसुलिन का इंजेक्शन, जिसे देना मुझे डॉक्टर ने सिखा दिया था. इसके साथ एक बार यूरीन लेकर ट्यूब में टेस्ट. ये सबकुछ किया. खान पान का ध्यान रखा. बाबा का सुगर 4 महीने में कंट्रोल. इसके बाद आंख का ऑपरेशन. वो भी करा दिया….
बाबा इसके बाद और भी जुड़ गए मुझसे. जहां भी जाते, उठते बैठते मेरी ही मिसाल दिया करते. अब 15 दिन के लिए भी शहर जाता, तो बेचैन हो जाते. बोलते हर रविवार को आ जाया करो ना. जबकि दोनों चाचाओं के 7 बच्चे और भी थे. लेकिन मुझसे ही ये गुजारिश. इस पर मैं कई बार आता भी. और कई बार नहीं भी आता….


इसी प्यार में 1991 में बाबा ने एक और जिद की. मेरी उम्र 19 साल की थी. बीए फाइनल इयर में पढ़ रहा था. बाबा को शायद लगने लगा था- अब मैं ज्यादा देर जिंदा नहीं रहूंगा. कहने लगे- बबुन बड़े नाती हो, शादी कर लेते, तो मैं भी मरने से पहले नतिन पतोह देख लेता. वर्ना मैं अभागा ही मर जाऊंगा. ये सुनकर मैं हैरान. मैं कहता- बाबा अभी आपको मरने नहीं दूंगा. अभी मुझे एमए करना है. आप टीचर थे, मुझे प्रोफेसर बनना है. उससे पहले शादी करके क्यों फंसा रहे हो….
लेकिन बाबा इस बात पर रुआंसे हो जाते. शायद मेरे प्रोफेसर बनने की ख्वाहिश में उनका कोई सपना पूरा होता दिखता- वो इस खुशी में ही भावुक होते. लेकिन अपने आने वाले अंत का आभास भी शायद इसमें मिला होता…
वो किसी न किसी बहाने से जोर देते ही रहे…
आखिरकार 20 साल की उम्र में मेरी शादी करा ही दी. करा ही दी इसलिए, क्योंकि मैं मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं था. लेकिन बाबा के लिए खुश भी था. और बाबा भी खुश- बबुन, दुखी मत होओ, तुम्हारी बहु देखने गया था तो उसे अंग्रेजी की किताब पढ़वाई थी. उसने एक सांस में पूरा पन्ना पढ़ दिया था. पढ़ने में बहुत तेज लड़की है. और सुंदर भी…
बाबा ये कहकर मुझे छेड़ते. मैं उनके गले लग जाता. ऐसा लगता, मेरा भविष्य कितना सुरक्षित करना चाहते थे. तब वो कहते थे- अरे छोड़ो ना, शादी से फर्क थोड़े पड़ता है. हमारी तो 12 साल में ही हो गई थी. गवना देर से करेंगे. जब तुम एमए कर लोगो. उसके बाद पढ़ते रहना. बीवी भी पढ़ी लिखी है. साथ पढ़ना लिखना….

लेकिन वो दिन देखने के लिए बाबा जिंदा नहीं रहे. साल 1993 में, शादी के एक साल बाद उनकी तबियत अचानक खराब रहने लगी. मैं तब बीए का एक्जाम देकर गांव आ गया था. दिन भर वो मुझे पास बुलाते रहते थे. एक बार दो दिन के लिए किसी शादी में जाना था, इसके लिए भी वो तैयार नहीं थे. लेकिन आखिर मान गए, क्योंकि शादी जिसकी थी, उससे जुड़ाव जानते थे. बोले, बारात विदाई होते ही आ जाना. रुकना मत…
ये अप्रैल 1993 था. मैं शादी में गया. उसी रात उनकी तबियत ज्यादा बिगड़नी शुरु हुई. डॉक्टर को दिखाया गया, लेकिन दवा का कोई असर नहीं. तीनों बुआओं को रातो रात बुलाया गया. बुआ ने बताया- बबुआ सब परिवार भरा था, लेकिन बाबूजी सिर्फ तुम्हारा नाम रात भर लिए हैं. बुबुआ कहां बाड़ हो, जातो समय साथे ना रहब का. पनिया के दी हमरा के. मेरा नाम ले लेकर कई बार रो पड़ते थे. पात नहीं उस बारात में भी मेरा मन नहीं लग रहा था. सुबह विदाई हुई तो चार लोगों के साथ गया था, उन्हें अकेला छोड़कर ही चले आया.


आया तो देखा बाबा बेसुध पड़े हैं बेड पर. मैं सुबह 8 बजे पहुंचा हूं. जाते ही उनसे मिला हूं. बाबा बहुत देर तक चिपके रहे. कुछ देर के लिए छोड़ा, तो लोगों ने कहा- बाबू जाकर हाथ मुंह धोओ, इतनी दूर से आ रहे हो बाबा ठीक हैं.
मैं चला गया, घंटा भर भी नहीं बीता, कि बुलावा आया, बाबा को गाय छुआया जा रहा है. मैं दौड़ा हुआ आया. देखा बाबा- के मुंह से झाग निकल रहा है. वो मुझे देखकर बोलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ बोल नहीं पाए. अगले एक दो मिनट के भीतर शांत पड़ गए…
मेरी आंखों के सामने ये पहली मौत थी
उस दिन संयोग देखिए, बाबा का सिलाया हुआ कपड़ा पहन रखा था. अपनी आखिरी पेंशन से जाने क्या सोचकर मेरे लिए एक शर्ट सिलवाई थी. मेरी पसंद की. इसके साथ अपनी पसंद का मलमल का गमछा. वही शर्ट और उसी गमछे के साथ मैं बारात गया था. वही पहने हुए उन्हें कंधे पर श्मसान ले जा रहा था….

क्रमश: जारी…

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