
नयी दिल्ली: आप लोग इन किसान आंदोलनकारियों को शायद न जानते हों लेकिन लंबे समय तक किसान आंदोलन और विभिन्न तरह के सामाजिक आंदोलनों को कवर करने के कारण मंगरूआ इनमें से ज्यादातर चेहरों को पहचानता है। वो जो पंजाब से आये हुए किसानों का 30 जत्था है जिससे तोमर बात कर रहे हैं वो कैप्टन अमरिंदर के पाले हुए है। कैप्टन अमित शाह से मिलें हैं इनके रूख में नरमी आयेगी। लेकिन जो लोग इस आंदोलन में समझौता नहीं होने देंगे वो तीन लोग हैं मीठा मीठा जहर उगलने वाला योगेन्द्र यादव। जिसके पालने में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के अविक शाह झूलता रहा है ये सब स्वराज आंदोलन से जुड़े लोग हैं। इसके अलावां बड़े किसान नेता है सरदार वीएम सिंह जिनका उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश,और पंजाब हरियाणा के कुछ हिस्से के किसानों पर बड़ी पकड़ है।

पहले इन तीन लोगों की चर्चा करते हैं। इनमें से योगेंद्र यादव व अविक शाह खुदरा टाईप के लोग हैं जिनका देश भर के किसान संगठनों से संपर्क है लेकिन इनके पास समर्पित किसान नहीं हैं। ये नहीं चाहेंगे किसान बोर्डर से हटें और कोई समझौता हो। मेधा पाटकर इनके साथ ही हैं जिनका झुकाव वामपंथी है और बड़े किसान भले मेधा के साथ न हों लेकिन गरीब मजदूरों और किसानों का एक बड़ा जत्था मेधा के साथ भी है जो संपन्न किसानों के इस आंदोलन में गरीबों को जुटाकर लोकतांत्रिक चेहरा बनाता है और किसानों के दुर्दशा की कहानी बयां करने में अहम रोल अदा करता है। अब बात करते हैं सरदार वी एम सिंह की। जिनका किसानों को लेकर लंबा संघर्ष रहा है। और दस हजार किसान हमेंशा इनके बुलावे पर तैयार रहते हैं। यही अन्ना आंदोलन में जनरल वी के सिंह को लेकर आये थे। कुछ विंदूओं पर सहमती बनने के बाद ये संघर्ष विराम संघर्ष के गांधी के रास्ते में भरोसा करने वाले लोग हैं लेकिन तोमर ने जो पहले दिन बैठक की उस दिन इनको बुलावा नहीं दिया गया और ये अमित शाह के बुराड़ी में किसानों को जुटने के आह्वाण पर बुराड़ी में बैठे रह गए। अब बात करते हैं। यूपी गेट पर बैठे टिकैत गुट की और चिल्ला में बैठे भानु गुट की। ये मूल रूप से लोकदल और समाजवादी पृष्टभूमि वाला किसान आंदोलन है जो केंद्र में मोदी को देखना चाहता है। इसलिए तोमर ने अलग से राकेश टिकैत को बुलाया था जिन्होंने साफ कहा कि सरकार से बात हुई है और एमएसपी पर कुछ बात बने तो ये पीछे हट सकते हैं। इसके साथ ही भानु गुट ये भी कमोबेश एमएसपी और गन्ना के सवाल पर कुछ बात बने तो पीछे हट सकते हैं। लेकिन जो नहीं चाहते कि समझौता हो उसमें वामपंथी किसान संगठन के हन्नान मौला और योगेंद्र यादव,अविक शाह है जो बाकी किसानों को गुमराह कर रहा है। लेकिन हन्नान मौला केरल के वामपंथी सरकार से ये सवाल नहीं करते कि यदि एपीएमससी एक्ट इतना ही अच्छा था तो फिर केरल में क्यों नहीं लागू है। वहां मंडियां क्यों खत्म कर दी गई हैं।

बाकी एक चेहरा और कक्का जी का जो संघ समर्थित बड़े किसान नेता हैं। किसानों का हित तो चाहते हैं लेकिन ये भी चाहते हैं आंदोलन समझौते के रास्ते पर आगे बढ़े यानी इनकी भूमिका सरकार और उग्र किसान नेताओं के बीच मध्यस्थ की है। पंजाब से आये किसानों का कुछ जत्था ऐसा भी जो अकालियों का है..वो जत्थे में शामिल तो है लेकिन कैप्टन अमरिंदर के पालने में झूल रहे किसान संगठनों से अलग है। सरकार पहचान नहीं पा रही है और न ही इनके साथ संवाद हो रहा है। अकाली साथ रहते तो शायद भाजपा सरकार को आसानी होती।
बाकी तो बातचीत होगी ही। मंगरूआ ने अपने समझ के हिसाब से जस का तस रख दिया है अपनी बात को बाकी आप खुद समझते रहिए और किसान किसान चिल्लाते रहिए। और इस तरह बैरीकेड तोड़ा, ये नारा लगाया,वैसे आवाज लगाई,खाना खाया,पकाया राग अलापते रहिए।
