ईरादा है शेष जीवन केरल के पलक्कड़ जिले के पैतृक गांव वेलिनेझी में गुजरे

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पी सदाशिवन

जब मैंने 30 वर्ष पहले पहली बार केरल के पलक्कड़ जिले के  गांव  वेलिनेझी में अपने पैतृक स्थान थिरुनारायणपुरम से दिल्ली में नौकरी करने के लिए कदम रखा तो यह परिघटना भी सामान्य थी और हमारा गांव देश के अन्य गांवों की तरह ही था जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव तो नहीं ही कहा जा सकता है लेकिन परिस्थितियां दुरूह कही जाएंगी। देश के अन्य हिस्सों के कई अन्य गांवों के विपरीत हमारे यहां उस समय भी डिस्पेंसरी, स्कूल और अन्य बुनियादी ढांचागत सुविधाएं थीं। हालांकि गांव आने जाने के सभी रास्ते सड़क से जुड़े हुए नहीं थे और ग्रामीणों को मुख्य सड़क से अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए एक किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था जहां बस सेवा उपलब्ध है। उस वक्त भी मध्यम वर्गीय परिवारों और ऊपर के लोगों के पास शौचालय की सुविधा थी, लेकिन अन्य लोग इस तरह की सुविधाओं के अभाव में गुजर बसर कर रहे थे।

गांव में गरीबी थी और बहुत से लोग जीवन यापन के लिए भीख का सहारा ले रहे थे। कृषि उत्पादों के लिए प्रचलित सहकारी प्रणाली के किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए काफी मददगार थी। इसने किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद की और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उत्पाद प्राप्त करने में मदद साबित हुई। सहकारिता का मूल्य उद्देश्य भी यही था कि सहकारी प्रणाली गैर-व्यावसायिक आधार पर काम करती है और इसने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर दिया। आम लोगों को इसका बहुत ही लाभ हुआ। उस समय भी प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाती थी इसलिए प्राथमिक विद्यालय और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गांव के लगभग एक किलोमीटर के दायरे में उपलब्ध थे। लड़के और लड़कियों की शिक्षा को उस समय भी गांव में समान महत्व दिया जाता था जब उस दौर में देश के कई अन्य जगहों पर ऐसा नहीं था। उस वक्त भी पंचायती राज व्यवस्था काम कर रही थी लेकिन आज की तुलना में पंचायत प्रणाली उतनी सक्रिय नहीं थी।

स्वभावत: लोग धार्मिक थे। बावजूद इसके उनके मन में कभी भी दूसरे धर्म और समुदाय के प्रति कोई नफरत नहीं थी। जहां तक ​​धार्मिक भावनाओं का सवाल है, मुझे अब भी ज्यादा अंतर नजर नहीं आता। बरसात के मौसम सहित सभी मौसम अपने रिवायत के अनुरूप सही गति पर आगे बढ़ रही थी और लोगों का व्यवहार भी मौसम के अनुकूल ही था। हमें अपनी फसलों और केरल के सामान्य वर्षा वनों के लिए पर्याप्त बारिश मिलती थी। हालाकि समय के साथ मौसम का मिजाज बदला है। जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिखाई दे रहा है। जलवायु की परिस्थितियों में, विशेषकर वर्षा ऋतु में वनों की कटाई और पत्थर खनन आदि के कारण पहाड़ियों के विनाश के कारण बहुत सारे परिवर्तन हुए हैं। इसने क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को धीरे-धीरे प्रभावित किया है। पहले गांव में कुछ ही घर थे और संयुक्त परिवार का चलन था और लोग एक साथ मिल जुल कर रहना ज्यादा पसंद करते थे। लेकिन बदलते हुए समय में एकल परिवार का चलन बढ़ा है ओर घरों की संख्या पहले की तुलना में ज्यादा हो गई है। बावजूद इसके एक जो महत्वपूर्ण बात दिखाई देती है गांव में वो यह है कि लोग भले ही दूसरे राज्यों और विदेशों में रह रहे हैं, वे भी अपने गांव में घर बनाते हैं जिसमें कोई नहीं रहता है और तालाबंदी की स्थिती हुई है।
कुछ लोग इसे विकास कह सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि घरों के इस तरह के अवांछित निर्माण के परिणामस्वरूप नदियों से रेत का अधिक संग्रह हुआ है, जिससे राज्य में कई नदियां प्रभावित हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप नदियों को बचाने के लिए नदियों से रेत के संग्रह पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। साथ ही इसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पत्थर खनन को बढ़ावा मिल है जिसने पारिस्थितिक तंत्र पर बड़ा प्रभाव डालकर वहां की पहाड़ियों को नष्ट कर दिया है। यहां तक ​​कि कृषि भूमि का उपयोग घरों/भवनों के निर्माण के लिए किया गया है जिसने क्षेत्र की खेती और जलवायु की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। हालांकि ये सारी गतिविधियां विकास के नाम पर संचालित की गईं बावजूद इसके मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि किसी भी क्षेत्र का विकास उस क्षेत्र की पारिस्थितिक प्रणाली को ध्यान में रखते हुए और जरूरत के अनुरूप किया जाना चाहिए।

मैं दिल्ली में रहते हुए भी समय—समय पर अपने गांव जाता रहता हूं। अब गांव के लगभग सभी घर सड़क मार्ग से जुड़े हुए हैं। साथ ही पूरा गांव पिछले काफी समय से बिजली से जुड़ा हुआ है। सड़कों पर शायद ही किसी भिखारी को देखा जा सकता है और लगभग पूरा गांव भिखारी मुक्त है जो दर्शाता है कि गरीबी और बेरोजगारी नहीं है या इसमें कमी आई है। कृषि और आवश्यक घरेलू वस्तुओं के क्षेत्र में सहकारी आंदोलन मजबूत हो गया है जिससे बाजार में इन वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण होने के साथ-साथ किसानों को कृषि वस्तुओं के लिए उचित मूल्य प्रदान किया जा रहा है। इस लिहाज से देखें तो केरल एक ऐसा राज्य है जहां की भौगोलिक संरचना के कारण सूर्य लगभग पूरे वर्ष प्रकाशमान होता है। हालांकि, मेरा मानना ​​है कि सरकार की ओर से नागरिकों को सौर ऊर्जा का दोहन करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है, जो आसानी से बिजली की जगह ले सकता है जिसकी उपलब्धता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। केरल के अन्य गांवों की तरह ही हमारा गांव भी बहुत सारी हरियाली के साथ प्राकृतिक सुंदरता को समेटे हुए है। हालांकि पेड़ पहले की तुलना में कम हैं। राज्य के अधिकांश वन वर्षा वन हैं।
हमारे क्षेत्र में पंचायत प्रणाली की तरह ग्राम प्रशासन मजबूत है और लोगों को सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी सुविधाओं का लाभ उठाने में सक्षम बनाकर सरकार और नागरिकों के बीच एक सेतु का काम करता है।
केरल राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है। मेरी शुरुआती पढ़ाई मेरे घर के पास एक सहायता प्राप्त स्कूल में हुई थी जो कक्षा चार तक थी। उन दिनों, मेरे गाँव में, सभी बच्चे, चाहे वे किसी भी लिंग के हों, जिनमें दलित वर्ग के बच्चे भी शामिल थे, बिना किसी भेदभाव के स्कूलों में पढ़ रहे थे और उनमें से अधिकांश ने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। इसलिए युवा पीढ़ी में लगभग कोई निरक्षरता नहीं थी। जनवरी 2016 में, केरल कुल प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। यह राज्य साक्षरता मिशन – अथुल्यम के प्राथमिक शिक्षा समकक्ष अभियान के माध्यम से हासिल किया गया है। हालांकि, कई मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग व्यक्ति थे जो निरक्षर थे। केरल ने 100% साक्षरता वाला भारत का पहला राज्य होने का अनूठा दर्जा हासिल किया है।

केरल का समाज हमेशा से सीखने वाला समाज रहा है। ईसाई मिशनरियों, पुस्तकालयों, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के कार्यों की बदौलत केरल के लोगों में हमेशा सीखने की ललक होती है। साक्षर आबादी की आवश्यकता और बुनियादी शिक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए, केरल सरकार ने बड़े पैमाने पर लोगों के समर्थन और केरल शास्त्र साहित्य परिषद और विभिन्न विश्वविद्यालयों जैसी स्वैच्छिक एजेंसियों की मदद से एक साहित्यिक अभियान शुरू किया।
आंदोलन का पहला चरण कोट्टायम जिले में लागू किया गया था जो प्रिंट मीडिया प्रकाशकों और विश्वविद्यालयों के लिए प्रसिद्ध है। निरक्षरता उन्मूलन के उद्देश्य से, कोट्टायम जिले में लोगों की शिक्षा और साक्षरता अभियान शुरू हुआ। यह एमजी विश्वविद्यालय, केरल सरकार और विभिन्न अन्य संगठनों का एक संयुक्त प्रयास था। 1 साल के भीतर, कोट्टायम 1989 में 100% साक्षरता हासिल करने वाला भारत का पहला शहर बन गया।

केंद्र सरकार की सहायता से एर्नाकुलम जिले में दूसरा चरण शुरू हुआ। फिर से इसे एर्नाकुलम के लोगों का सक्रिय समर्थन मिला और अत्यधिक प्रेरित और संगठित सरकारी एजेंसियों के प्रयास से, एर्नाकुलम को 1990 में पूरी तरह से साक्षर घोषित किया गया। जनता की भागीदारी और प्रेरित और समर्पित स्वयंसेवकों की बदौलत केरल सरकार को मेरे गांव सहित पूरे राज्य में इसी तरह के अभियान को लागू करने की चुनौती को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। केरल सरकार स्कूलों और अन्य अध्ययन केंद्रों में अधिक से अधिक निरक्षरों को लाने और राज्य में कुल साक्षरता प्राप्त करने के उद्देश्य से अक्षर केरलम परियोजना शुरू की।
यह वास्तव में एक सुव्यवस्थित आंदोलन था। प्रशासनिक निकाय और सरकार वास्तव में सक्रिय थे और विभिन्न स्तरों पर योजना बनाई, सभी उपलब्ध संसाधनों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित की।

• आंकड़ों को इकट्ठा करने और निरक्षरों का पता लगाने के लिए राज्य भर में सामान्य सर्वेक्षण करने के लिए शिक्षित लोगों के विभिन्न वर्गों से कई लोगों को नियुक्त किया गया था।
• सर्वेक्षण से पता चला कि पूरे केरल में लगभग 30 लाख लोग निरक्षर थे।
• प्रशिक्षकों की पहचान की गई और उन्हें प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण राज्य, जिला, तालुका और पंचायत स्तर पर आयोजित किया गया था। विभिन्न स्तरों में प्रशिक्षण के विभाजन ने पूरे राज्य के लिए आवश्यक संख्या में प्रशिक्षकों को खोजने में मदद की। सरकार ने इन प्रशिक्षकों और कार्यकर्ताओं की मदद से शिक्षण केंद्र खोले। सरकार ने प्रशिक्षकों को हैंडबुक और अन्य सामग्री की आपूर्ति की। अध्ययन सामग्री जैसे नोटबुक, स्लेट आदि एजेंसियों और संगठनों के योगदान की सहायता से उपलब्ध कराए गए थे।

• सरकार ने फंड और समर्थन जुटाने के लिए प्रत्येक तंत्र का इस्तेमाल किया। जनता के बीच जागरूकता और रुचि पैदा करने के लिए नाटक, नुक्कड़ नाटक जैसे सभी प्रकार के मीडिया और अन्य कला माध्यमों का उपयोग किया गया।
• स्थानीय पंचायत और वार्ड अधिकारियों के प्रशासन के साथ सभी क्षेत्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। प्रगति की समीक्षा के लिए विभिन्न समितियों को नियुक्त किया गया था और पढ़ने और लिखने के कौशल का आकलन करने के लिए विभिन्न मूल्यांकन परीक्षण लगातार किए गए हैं।
• राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के मानदंडों के अनुसार, अंतिम मूल्यांकन में 70 प्रतिशत से अधिक प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों को साक्षर घोषित किया गया। नामांकित 16 लाख शिक्षार्थियों में से 12 लाख को सफल घोषित किया गया।
90 प्रतिशत से अधिक वाले राज्य को कुल साक्षर राज्य घोषित किया जा सकता है। इस प्रकार 18 अप्रैल 1991 को केरल को 93.64% साक्षरता के साथ कुल साक्षर राज्य घोषित किया गया।

स्वाभाविक रूप से मेरे गांव ने भी साक्षरता मिशन में सक्रिय रूप से भाग लिया और पूर्ण साक्षर गांव बन गया। यह एक आदर्श उदाहरण था कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्था कितना अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। अत्यधिक प्रेरित कार्यकर्ताओं की भीड़ की सहायता से एक अच्छी तरह से संगठित सरकार और प्रशासन इस मिशन की सफलता का मुख्य कारण था। सरकार और अन्य एजेंसियां ​​जनता के बीच जागरूकता बढ़ाने और भागीदारी सुनिश्चित करने में सक्षम थीं।
100% साक्षरता की उपलब्धि हासिल करने के बाद भी, निरंतर और औपचारिक शिक्षा प्रदान करने के लिए आंदोलन किए गए। केरल साक्षरता समिति को इस उद्देश्य के लिए शुरू किया गया था। साथ ही साक्षरता दर में और सुधार के लिए राज्य में विभिन्न अभियान जारी रहे। सामान्य शिक्षा प्रदान करने के अलावा, केरल सरकार ने विभिन्न राज्य की शिक्षा और प्रगति सुनिश्चित करने के लिए पहल।

जहां तक ​​कृषि की बात है तो मेरे बचपन में केरल कृषि उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भर था। हालांकि, धीरे-धीरे किसानों ने वाणिज्यिक फसलों की ओर रुख किया, जैसे रबड़ और आम, कटहल, काजू, नारियल आदि की भी खेती होने लगी। अधिकांश खेत रबड़ के बागानों में बदल गये क्योंकि रबड़ अन्य फसलों की तुलना में अधिक पैसा दे रहा था, जिसके परिणामस्वरूप इनमें से अधिकांश फसलों की उपेक्षा हुई है। यद्यपि लोग रबड़ फार्म से अधिक पैसा कमाने लगे ​लेकिन जहां तक अन्य कृषि उत्पादों का संबंध है केरल एक उपभोक्ता राज्य बन गया। रबड़ की फसलों का एक दु​ष्परिणाम यह भी हुआ किरबड़ की फसलों ने भूमि को बंजर बना दिया है। समय के साथ सरकार की नीतियों के कारण, रबड़ की कीमत भी काफी कम हो गई है, जिसका असर मेरे गांव के कई किसानों सहित रबर की खेती और बागानों को व्यवसाय के रूप में चयन करने किसानों पर पड़ रहा है।

परंपराओं को सहेजे आधुनिकता की डगर पर बढ़ रहा है मेरा गांव कुन्नमकुलम

विकास के नाम पर पर्यावरण में कुछ बदलावों के बावजूद, मेरे गांव में बहुत सारी हरियाली है और यह सभी प्रकार के प्रदूषणों से मुक्त है, जैसे हवा, पानी, ध्वनि आदि। किसी भी अन्य ग्रामवासी की तरह हमलोग भी गांव से जुड़े हुए हैं। शांतिपूर्ण जीवन के लिए वास्तव में गांव से बेहतर विकल्प कोई नहीं हो सकता जहां शुद्ध हवा, पानी, भोजन आदि बुनियादी आवश्यकताएं की पूर्ती की जा सकती है। साथ ही गांव की साफ-सुथरी प्रकृति के कारण वहां मच्छरों और अन्य कीड़ों से फैलने वाली बीमारियां आम नहीं हैं।
केरल के अधिकांश गांवों की तरह, हमारा गांव भी बिजली और आधुनिक संचार सुविधाओं से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मैं जन्म से लेकर स्नातक की पढ़ाई तक अपने गांव में ही रहा हूं। स्वाभाविक है मेरा गांव से काफी लगाव हो। दिल्ली में नौकरी करने के कारण मुझे अपने गांव से दूर रहना पड़ रहा था क्योंकि आज से तीस साल पहले केरल और उसके आस-पास के राज्यों में नौकरी के ज्यादा अवसर नहीं थे।

सुदूर गांव से दूर दिल्ली महानगर में रहने के बावजूद मैं अपने गांव से गहराई से जुड़ा हुआ हूं। यही कारण है कि गांव वाले अभी भी पूरा स्नेह देते हैं। मैं अपने गांव के प्रति इतना जुनूनी हूं कि प्रत्येक साल किसी न किसी बहाने गांव जाने का मौका तलाशते रहता हूं और जाता भी रहा हूं। मेरे अधिकांश करीबी रिश्तेदार भी मेरे पैतृक स्थान पर हैं, मुझे दिल्ली में रहके भी गांव की याद आती रहती है और उदास होता रहा हूं। ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही हो ऐसा भी नहीं है। बल्कि हर गांव वासी भले ही अपने गांव से दूर हो लेकिन गांव की याद बनाये रखता है। मेरी इच्छा है और कह सकते है ​कि ईरादा भी है कि अपना पेशेवर जीवन के पूरा होने के बाद अपना शेष जीवन अपने पैतृक गांव में बीते जिसे मैं युवावस्था में रोजी रोजगार की तलाश करते हुए छोड़ आया था। मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरी इच्छा पूरी होगी !

(पी सदाशिवन केरल के थिरुनारायणपुरम के रहने वाले हैं और पिछले 34 वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं। वर्तमान में द एयरो क्लब ऑफ इंडिया, दिल्ली में कार्यरत।)

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