मर ही जाता मैं शहर में बच गया
गांव की शीतल हवाएं साथ हैं।
अपने गांव को याद करना और उसके बारे में बात करना सुखद है। मैं 1977 ई. तक गांव में ही रहा हूं। पढ़ने-लिखने के क्रम में उस समय का छूटा, गांव आज भी छूटा ही है। ऐसा भी नहीं है कि गांव एकदम से छूट गया है। वहां आना-जाना लगातार कुछ समय के अंतराल पर बना हुआ है। गंवई मन बार-बार गांव की तरफ भागता है। शायद इसी का परिणाम है कि दिल्ली रहते हुए और तमाम व्यस्तताओं में उलझे रहकर भी मैं गांव जाने का अवसर ढूंढ़ ही लेता हूं। महीने-दो महीने में दो चार दिनों के लिए गांव पहुंच ही जाता हूं। गांव में आज भी ऐसा कुछ है जो अपनी तरफ खींचता है। उसका अपना आकर्षण है।भारत के तमाम गांव लगभग एक तरह के हैं। मेरा संकेत उनकी संरचना की तरफ है। उनकी बनावट और बसावट की तरफ है।
मैं जिस गांव में पैदा हुआ-उसका नाम है-टड़वां। यह गांव उत्तर प्रदेश के जौनपुर की पूर्वी-दक्षिणी सीमा पर केराकत तहसील में स्थित है। गांव के नजदीक की बाजार थानागद्दी है। गांव से जौनपुर और बनारस (वाराणसी) की दूरी समान है।
गांव के लोगों को अनेक अवसरों पर शहर की जरूरत पड़ती है। कचहरी और मुकदमें के सिलसिले में हमारे गांव के लोग भले जौनपुर चले जाते हों पर उनकी दूसरी आवश्यकताएं बनारस ही पूरा करता है। खरीदारी से लेकर डाक्टर-अस्पताल और दवा तक की।मेरे गांव की भौगोलिक और प्राकृतिक संरचना अद्भुत है। यह गोमती के दक्षिणी किनारे पर बसा हुआ है। गांव के पूरब और पश्चिम में दो बड़े नाले हैं। ये नाले गोमती में गिरते हैं। पूरबी नाला तो बरसाती पानी का निकास है पर पश्चिमी नाले में पानी का बहाव हमेशा बना रहता है। यह दूर दक्षिण से आकर गोमती में गिरा है। पहले इन नालों के किनारे जंगल था। इन जंगलों में अनेक तरह के छोटे दरख्त और झाड़ियां थीं। जानवरों के लिए अच्छा चरागाह था। बबूल, पलास, सिहोर जैसे मंझोले साइज के वृक्षों की भरमार थी। पलास में फूल लगते तो पूरा जंगल लाल हो जाता था। होली के त्योहार में रंग बनाने में ये फूल खूब काम आते थे। फूल खिले हुए पलास के पेड़ ऐसे लगते थे मानों जंगल में आग लगी हो। इन छोटे-मोटे जंगलों की एक और विशेषता थी। इनमें अनेक जड़ी-बूटियां थीं। बस इन्हें पहचानने वाले व्यक्ति की जरूरत थी।
हमारे गांव के दक्षिण में एक दूसरा गांव है- खर्गसेनपुर। यह गांव सघन आबादी वाला गांव है। हिन्दी के पहले आत्मकथा लेखक बनारसी दास इसी गांव के निवासी थे। उनकी आत्मकथा का नाम अर्द्धकथानक है। बनारसी दास खर्गसेनपुर से जौनपुर जा बसे थे। कालान्तर में जैनधर्म स्वीकार कर वे आगरा और आमेर की तरफ चले गए थे। उनके पिता का नाम खड्गसेन था। कहते हैं कि उन्हीं के नाम पर उस गांव का नाम खर्गसेनपुर पड़ा था। इस तथ्य की पुष्टि हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डा. बच्चन सिंह भी करते हैं। यह गांव बड़ा गांव है। पहले जूनियर हाई स्कूल तक की शिक्षा लेने के लिए पास-पड़ोस के गांव के विद्यार्थी यहां आते थे। यहां का जूनियर हाई स्कूल (मिडिल) मशहूर था और क्षेत्र का अकेला मिडिल स्कूल था।
अब कुछ अपने गांव टड़वां के बारे में। इस गांव को हम सघन आबादी वाला गांव तो नहीं कहेंगे पर आबादी बिरल भी नहीं है। मझोले आकार और बसावट का है यह गांव। जैसा कि भारतीय गांवों की बसावट में होता है, वैसे ही इस गांव में भी लगभग सभी जातियों और धन्धे के लोग मिल जायेंगे। अगर कुछ बच गया तो उसकी पूर्ति बगल के गांव से हो जाती थी। हमारे इस गांव की संरचना सामान्य है। गांव की बनावट और बसावट पूरी तरह से परम्परागत। हर जाति का अलग-अलग टोला, मिले-जुले भी। राजपूतों की दो पट्टियां अलग-अलग भागों में बसी हुई हैं। यादवों की भी दो पट्टियां हैं। दो-तीन घर इन पट्टियों से अलग भी बसे हैं। मालियों और पासियों की एक पट्टी है। गांव के दक्षिण तरफ हरिजनों की आबादी है। गांव के मध्य में घनी आबादी का एक टोला है। इस टोले में अनेक जातियों का निवास है- बारी, कहार, नाई, लाला, बनिया, तेली, सुनार, राजपूत, यादव, धोबी, पासी, कोइरी, मुसलमान, गड़ेरिया और ब्राह्मण। इस टोले को टड़वां (गांव) कहते हैं। इसी टोले में दो-तीन छोटी दुकाने भी हैं जिनमें गांव के लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं। हां, एक बात तो मैं भूल ही रहा हूं। नदी के किनारे का गांव होने के कारण यहां मल्लाहों की आबादी भी है। इनके घर नदी के किनारे की ऊंचाई पर बसे हुए हैं। ऐसे स्थान पर जहां बाढ़ का पानी न पहुंचे। इस गांव के साथ एक और छोटा सा गांव नत्थी है- कन्हईपुर। कन्हईपुर भी जातियों में बंटकर बसा है-यादव, नोनिया, मुसहर और दो-तीन घर राजपूत। यह तो हुई संरचना।
अब गांव की परंपरा और उनमें आ रहे बदलाव की भी चर्चा कर लेनी चाहिए।मैं गांव की स्त्रियों को याद करता हूं। रसोई से सुबह शाम उठते धुंए से उनकी आखें ही नहीं मन भी भर जाता था। धुंए की जलन से उनका मन सुलगता रहता। कुंए की जगत पर जब औरतें अपनी गोतिनों के साथ कपड़े फींचती तो साथ ही अपने मन को भी फींचती। सनलाइट साबुन की झाग के साथ-साथ उनके मन की झाग भी बह जाती, यह उनका रोज का नित्यकर्म था। गांव में टेलीविजन के प्रवेश ने स्त्रियों का गोतिन भाव समाप्त कर दिया। गोतिनों की चरचराहट और खिलखिलाहट अब चित्रहार के गानों के नीचे दब गई या यूं कहूं मद्धिम पड़ गई। रेड़ियो ग्रामोफोन ने तो बहुत पहले से गांव में अपने सुर बिखेर दिये थे लेकिन गांव की स्त्रियों का उस बाजे से खासा मतलब नहीं था। वे देश दुनिया की खबर बड़ी नपी तुली आवाज में बताती। स्त्रियों के संसार में अपनी इतनी रमज गमज और सुख दुख थे कि वहां बीबीसी की खबरों की रत्ती भर जगह न थीं। इसीलिए रेड़ियो बहुत दिनों तक मर्द के बैठके से बाहर नहीं निकल सका।
मेरे जीवन की आदिम अनुभूतियों को निर्मित करने में मेरा गांव ही है। मेरे भीतर व्यक्ति के प्रति, समाज के प्रति सामूहिकता की गझिन भावना गांव की छतनार छाया में निर्मित हुई। बाजार की धमक ने गांव की सामूहिकता को विनष्ट कर दिया। पहले बड़े काश्तकार भी बीज उधार लेकर अपनी खेती संपन्न कर लेते थे। शादी ब्याह कोई भी कार्यक्रम हो याद नहीं आता कि साड़ी-कपड़े, गहने के अलावा कोई सौदा करने बाजार की ओर जाता। गांव में आई बारात को ठहराने की व्यवस्था सिर्फ लड़की के पिता की न होकर गांवभर की होती। सुबह बारातियों के मैदान जाने के लोटे से लेकर रात के हुक्के, चारपाई-बिछौने तक का इंतजाम पूरा गांव मिलकर करता। प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी में बुधिया के मरने पर घीसू को अपने गंवई कुनबे पर जो भरोसा है। वे बार-बार बुधिया के लिए कफन की व्यवस्था करेंगे वह भरोसा 1936 में मजबूत स्थिति में था। देश में उदारीकरण आने के बाद ही उसके दरकने की शुरूआत हुई। हालांकि गांव तक उदारीकरण के प्रभाव को पहुंचने में 7-8 वर्ष का समय लगा लेकिन तब से लेकर आजतक वह प्रभाव दिन-ब-दिन गहराता ही जा रहा है।
गांवों के पर्व त्यौहारों को याद करूं तो पचईयां (नागपंचमी) हमारे यहां साल का पहला त्यौहार होता था। पचईयां के दिन रसोई से उठी देशी घी में बने हलवे-पूड़ी की महक रामनवमी तक बनी रहती। बीच-बीच में गरम मसाले की सालन वाले त्यौहार भी पड़ते, दीपावली और फगुआ उसी श्रेणी में था। मैं सोचता हूं कि बाजार ने कैसे गंवई पकवानों के सोंधेपन को भी मद्धिम कर दिया। अनाज, मसाले, तेलहन हर व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार खेतों में उगा लेता था। जिससे हर थाली में स्वाद व सोंधापन बरकरार रहता। उर्वरक और रासायनिक दवाईयों के आने के पहले हम फसलों की सुरक्षा का जिम्मा हरिअरी माई को सौंप देते थे। घर की महिलाएं नए अनाज और गुड़ से बना प्रसाद खेत की मेड़ पर चढा आती। डीह, बरम, बरैक्षा, सत्ती यहीं हमारे लोक देवी-देवता थे। ये ही गांव की सम्पूर्ण सुरक्षा के जिम्मेदार व पहरेदार दोनों थे। ब्राह्मणों के कर्मकाण्ड का प्रचार-प्रसार गांव में बहुत बाद के दिनों में हुआ।
मेरे गांव में लोक देवी-देवताओं के अलावा राम-जानकी का एक मठ है। यह मठ अयोध्या के राम-जानकी न्यास से जुड़ा है। उस दौर में गांव में अयोध्या से बाबा रामचरण दास महीने, दो महीने पर मठ पर आते। रामचरण दास सिद्ध पुरूष थे। वे जब भी मठ पर आते तो गांव भर में हलचल मच जाती। क्या बच्चे क्या बूढ़े स्त्री-पुरूष सभी उन सिद्ध महात्मा के दर्शन के लिए मठ पर जुटते। बाबा की सिद्धि कहूं या गांव वालों का विश्वास, उनकी की दी गई जड़ी से कई असाध्य रोग भी ठीक हो जाते। मेरी स्मृति में तो मेरी बड़ी बहन का लड़का है। बहन घर आई हुई थी। उसके लड़के की एक आंख की पुतली से दिखना लगभग बंद हो गया था। एक दिन मेरी आजी उस बच्चे को लेकर बाबा के मठ पर पहुंची और बच्चे का रोग बताया। समस्या सुनकर बाबा ने सामने बरगद के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘‘इसके पत्ते का दूध बच्चे की एक आंख में 20 दिन तक लगाओ, विज्ञान के घेरे में रहकर सोचूं तो आज भी वह बात विश्वासयोग्य तो नहीं लगती लेकिन उससे परे जाकर देखो तो सत्य यहीं था कि उस बच्चे की आंख पूरी तरह से ठीक हो गई।
इसी घटनाक्रम में दूसरी एक घटना भी याद आती है-मेरे गांव के एक बड़े सम्मानित बाऊसाहब थे। उनके रसूख की चर्चा गांव भर में थी। उनके घर की एक स्त्री को जलोधर रोग हो गया। यह रोग अब तो लुप्तप्राय हो गया है लेकिन उस दौर में इस रोग में व्यक्ति के पूरे शरीर में जल भर जाता। शरीर का आयतन बढ़ जाता। उस स्त्री के रोग और उसके ईलाज न हो पाने की चर्चा जब गांव वालों के बीच हुई तो बाऊसाहब को लोगों ने सूझाया कि वह बाबा का आर्शीवाद भी ले लें। बाऊसाहब ने लोगों की राय को बहुत गंभीरता से नहीं लिया, फिर भी वे बाबा के पास पहुंचे। होली की पूर्व संध्या थी। बाबा ने कहा- ‘‘अरे भाई इसका तो अंतिम समय आ गया है।’’ जैसे ही होलिका जलेगी इसका जीवन भी समाप्त हो जायेगा। भय से या विश्वास से गांव भर की सम्मिलित राय बनी कि यदि बाबा के कहे अनुसार घटने वाला है तो होलिका ही न जलाई जाय। लोग होलिका को घेर कर बैठ गए और तय कर लिया कि होलिका नहीं जलेगी, रात इसी तरह बीत गई, धीरे-धीरे कुछ लोग उठकर जाने लगे। भोर का समय था उन्हीं में से किसी ने धीरे से होलिका में आग लगा दी। उधर घर पर उस स्त्री के प्राण भी निकल गए। लोग उसे लेकर घाट पहुंचे, जब उसकी चिता जलाई गई तो उसके शरीर से इतना पानी निकला कि चिता बुझ गई। खैर किसी तरह दाह-संस्कार संपन्न हुआ।हर गांव की तरह मेरे गांव में भी कई लोकप्रचलन था। एक था – मेरी याद में गांव के किसी व्यक्ति की मृत्यु सांप के काटने से नहीं हुई। मेरे गांव के जंगल में कई ऐसी जड़ियाँ थी जो सर्पदंश के प्रभाव को खत्मकर देती थी। गांव में किसी को भी सांप काटने पर एक पण्डित परिवार का व्यक्ति, सांप काटे व्यक्ति के घर जड़ी लेकर पहुंच जाता और जड़ी को पीस कर छाँछ, काली मिर्च में मिलाकर पिलाता था। सांप काटे व्यक्ति को यह पेय तब तक पिलाया जाता तब तक विष का प्रभाव पूरी तरह से उसके शरीर से उतर नहीं जाता। विष उतरते ही पेय पीने वाले व्यक्ति को कै होने लगती है। कै होना उसके स्वस्थ होने का सूचक है।
हमारे गांव की एका जातिगत, धर्मगत भेदभाव से ऊपर थी। गांव में मुसलमानों की भी आबादी है, मुर्हरम के समय हमेशा उनका ताजिया गांव के मंदिर के बगल से होकर गुजरता। ताजिया बनाने के लिए पुराने अखबार मुसलमान भाई पूरे गांव से इकट्ठा करते। ताजिया का मजमा देखने पूरा गांव इकट्ठा होता उनमें क्या हिन्दू क्या मुसलमान। अन्य जातियां भी पेशे के अनुसार बंटी जरूर थी लेकिन मुश्किल समय में सहयोग के लिए मदद करने वाले की जाति नहीं देखी जाती थी। सभी जातियों के बीच परस्पर सहयोग का संबंध था, आपसी एका थी। ताजिये के नीचे से अपने बच्चों को आर-पार कराके हिन्दू परिवार उनके स्वास्थ्य के प्रति निश्चिंत हो जाते थे।
गांव में पुरानी परंपराएं, मान्यताएं अब अपने फैशनबल रूप में मौजूद है। मेरे इस कहे का उदाहरण आपको गांव की शादियों में दिख जाएगा। जहां पिछली पीढ़ी के लोग शादी-ब्याह के खास मौके पर पुराने रिवाजों को छोड़ना नहीं चाहते लेकिन वहीं अर्थसंपन्न लोगों ने अब इन तमाम रिवाजों का शार्टकट खोज लिया है। पहले विवाह एक हफ्ते से दस दिन तक चलने वाला एक सामूहिक कार्यक्रम होता था, जहां खाने-पीने,गीत गाने के अलग-अलग नियम थे लेकिन आज उसकी समय सीमा दस से घटकर एक दिन की हो गई है। जहां धन का फूहड़ प्रदर्शन है, पुरानी मान्यताएं, रिवाज, परंपरा की अंतिम कड़ियां भी अब पूंजी के दबाव से दरक रही हैं।पहले गांव धान्य से तो भरे रहते थे पर धन की समस्या प्रायः हर घर में होती थी। ऊंची जाति के परिवारों में बहुत दिनों तक सरकारी नौकरियों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। शहर में बसने की कोई योजना किसी के दिमाग में नहीं होती थी।
गांव के बड़े-बूढा़े को शहर का घनत्व और आबादी संकीर्ण लगती, न वे खुद शहर की ओर जाना चाहते थे न अपनी पीढ़ियों को वहां भेजने की कल्पना करते। कोर्ट-कचहरी या अस्पताल के चक्कर में शहर की ओर गया आदमी सांझ होते ही घर की ओर लौटने के लिए अकुलाने लगता। गांव के घरों में धन का अभाव अवश्य था लेकिन उस अभाव को वे लोग महसूस नहीं करते थे, उसका मुख्य कारण यह भी था कि लंबे समय तक बाजार गांव से दूर ही रहा। गांवों में जमींदारी व्यवस्था को स्थानांतरित कर पूंजीवादी व्यवस्था आई जिससे गांव के मूल स्वरूप पर प्रभाव पड़ा।
आज गांव का बदला स्वरूप अंतर्राष्ट्रीय बाजार और पूंजी के बढ़ते प्रभाव के कारण है।हमारे यहां धन और धान्य दोनों का मुख्य स्रोत कृषि ही था। हर जाति के व्यक्ति मिलकर खेती का काम संपन्न करते। प्राकृतिक आपदा का प्रकोप नहीं होता था तो फसल की अच्छी आमद हो जाती थी। आज कृषि चरमरा गई है या यूं कहूं लगभग टूट गई है। कृषि के क्षेत्र सीमित हो गए हैं, बहुत सी जमीन बेची जा रही है। छोटे उद्योग या सड़कों के निर्माण में खेत विनष्ट हो गए हैं। इससे हर वर्ग जूझ रहा है, दलित और पिछड़ी जातियां पहले खेतों में अपना हिस्सा बांटकर खेती करते, साल भर खेती का चक्र चलता रहता लेकिन आज उनमें से बड़ी संख्या में लोग न्यूनतम मजदूरी पर उन्हीं खेतों में ईंट पाथने और मिट्टी निकालने का काम करने लगे हैं।
एक बड़ा वर्ग पैसा कमाने के नाम पर मुम्बई, कलकत्ता, पंजाब की ओर पलायन कर रहा है। वहां वे मजदूर वर्ग में शामिल हो गए हैं, गरीबी, दरिद्रता गांवों में बढ़ी है, राशन और केरोसिन बेचने की तमाम सरकारी योजनाएं गांव में विफल हैं, सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की प्राथमिक सीढ़ी गांव से ही शुरू होती है। आजादी के बाद कार्यान्वित की गयी तमाम विकास योजनाओं ने गांव का सामाजिक परिवर्तन कर दिया। पंचायती राज, सहकारिता तथा सामुदायिक विकास के प्रचार प्रसार ने पूरे गांव की वर्ग संरचना के ढ़ांचे को प्रभावित किया है।1990 के दशक के शुरूआत से सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में चार गुना वृद्धि से भारत की ग्रामीण अर्थव्यस्था पर संकट आया है। ग्रामीण परिवारों के बीच कर्ज के बढ़ते स्तर और फसलों की कीमतों में आई गिरावट से खेती करने का संघर्ष अब बढ़ गया है। श्रम बाजार में गिरावट आने से नौकरियों की मांग बढ़ गई जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव उच्च जातियों के भूस्वामियों के परिवार पर पड़ा।
भारतीय इतिहास में इतिहासकारों ने जिस सामंतवाद को परिलक्षित किया, वह सामंतवाद आज भी गांवों के सवर्ण परिवारों में ‘‘रसरी जल गई ऐंठ नहीं गई’’ वाले रूप में मौजूद है। बेरोजगारी उसी ऐंठ का भयावह परिणाम है। नौकरियों के अभाव में अब संयुक्त परिवार भी टूट गए हैं। छोटी-मोटी नौकरियों वाले परिवार में खेती और रोटी-कपड़े का संकट बढ़ गया है। आज के समय में काश्तकार परिवार में भी खेती करना घाटे का सौदा हो गया है। बची-खुची फसलों को छुट्टा पशुओं से बचाना एक बड़ी चुनौती है, ऐसे में धीरे-धीरे खेती से लोगों का भावनात्मक लगाव भी कम हो चला है। बड़ी खेती हो या छोटी खेती पूरे परिवार का भरण-पोषण और उनकी शिक्षा स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने में वह अक्षम है।
पुराना गांव सहचर की भावना से संचालित था, किसी का व्यक्तिगत मसला भी सार्वजनिक मान लिया जाता था। अब लोगों के बीच आत्मीयता खत्म हुई है। सहकार की भावना लगभग समाप्त है। गांवों की एकजुटता उनकी सामाजिकता का मूल आधार थी। सोना उगलने वाली जमीन अब पेट भरने भर का अनाज भी नहीं उगा पाती। श्रम पर आधारित जीवन अब बदल गया है, लोगों की आत्मनिर्भता में कमी आई है। श्रम न करने की परिस्थिति में लोग अपने समय की रिक्तता को भरने के लिए ताश जुए के खेल पर निर्भर हो गए हैं। संचार क्रांति के दुष्प्रभाव के जिस चपेट में शहर है गांव भला क्यों उससे अछूता रहे। विदेशी कंपनियों का प्रसार अब गांवों में भी है जिसका परिणाम है कि आज हल की मूठ थामने वाले हाथों में भी स्मार्ट फोन है। मुझे याद आता है कि पहले पहल जब कोकाकोला की कंपनी गांव पहुंची और लोगों को समझाया कि ‘‘ठंडा माने कोकाकोला’’ तो गांव के बच्चे अनाज के बदले कोकाकोला की बोतले खरीदते थे। आज बहुराष्ट्रीय कंपनी के ऐसे तमाम उत्पाद हैं जिसकी गिरफ्त में गंवई लोग हैं। पहले जिस शहरी चमक-दमक की लोग उपेक्षा करते थे आज उन्हीं असीमित संसाधनों को जुटाने में परेशान हैं।
आज गांव संघर्ष के दोराहे पर खड़ा है जिसमें एक तरफ आधुनिकता, तार्किकता और विकास की ताकतें उसे अपनी ओर खींच रहीं हैं तो दूसरी तरफ विकास के माॅडल पर पूँजीवाद की जड़ों को मजबूत करने और बचे-खुचे गांव का अंधाधुंध दोहन करने वाली शक्तियां है। आज जरूरत है कि हम गांवों को गांधी के विचार की ओर मोड़े। गांधी जी ने कहा था कि- गांवों को स्वावलंबी बनाना जरूरी है। आधुनिकता के नाम पर व्यक्ति को उसकी जड़ों से नहीं काटना चाहिए। विकास का माॅडल राज्य केन्द्रित होने की अपेक्षा गांव केन्द्रित होना चाहिए। गांव के कारीगरों, किसानों, बुनकरों, शिल्पियों के हुनर को पहचान गांव के भीतर ही मिलनी चाहिए। अफसोस, गांधी की ये कल्पना आज सर के बल खड़ी है।
(अध्यक्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ।)










