गांव सलेमपुर आज भी अपनी पुरातन परंपराओं को सहेजे हुए है…

प्रो बी एस वर्मा
देश बदला, समाज बदला, संस्कार बदले, संस्कृतियां तक बदल गयीं। परंतु भारतीय ग्रामीण परंपराओं ने अपना परिवेश नहीं बदला। हमारा गांव सलेमपुर नहीं बदला। कई संस्कृतियां आईं और गयी, परंतु असली भारत वर्ष आज भी ग्रामीण परिवेश में देखने को मिल जायेगा।
ऐसा ही एक गांव है सलेमपुर। जो उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के कस्बा सादाबाद से मात्र ​3 किलोमीटर पर स्थित है। आज भी वही अक्खड़ पन और अखंड ग्रामीणता की झलक देखने को मिल ही जाएगी। प्राकृतिक छटाओं से परिपूर्ण हमारा गांव आज गांव सा नहीं लगता, आधुनिकीकरण के दौर में अब सबकुछ अधिकतर बदलाव की ओर अग्रसित है,शहर की ओर पलायन करने वाली नयी पी​ढ़ी का रूख, बोल—बच्चन,पहनावा—ओढ़ावा अलग हो सकता है। परंतु गांव की मूल आत्मा आज भी अपनी पुरातन संस्कृति को सहेजे हुए है।

गांव का इतिहास
मुगलिया राज के दौरान राजस्थान से आये दो वीर जाट भाई और अपने साथ लाये मौसेरे भाई को। अपने पुरूषार्थ की बदौलत इस बंजर भूमि को ही स्वर्ग बना डाला। बड़े भाई बाबा सालिम सिंह, जिन्होंने गांव सलेमपुर बसाया, छोटे भाई रिसाल सिंह जिन्होंने लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम रसीद पुर बसाया। यमुना की सहायक नदी ‘कर्बन’के दूसरे कछार पर करीब 3 किलोमीटर दूर मौसेरे भाई बाबा मौनी सिंह ने जमीन के एक उपजाउ टुकड़े पर मौनिया नामक गांव बसा दिया। इतना ही नहीं तीनों भाईयों ने उस समय के मुगलिया आक्रांताओं से भी लोहा लिया।
बाबा रिसाल सिंह जो कि बाबा सालिम सिंह से छोटे थे, परंतु बाबा मौनी सिंह से बड़े थे, मुगलिया कैद में रहे। परंतु राजस्थान की जाट रियासतों के हस्तक्षेप और बाबा सालिम सिंह के उत्कृष्ट प्रयोगों से मुगलों को उन्हें रिहा करना पड़ा।
उन बुजुर्गों ने तीन गांव बसाये जिसमें ग्राम सलेमपुर आगे चलकर बड़ा गांव बना। तीनों ही गांव जाट जाति के माहुर गोत्र से संबंधित हैं। बाद में अन्य गोत्र एवं अन्य जातियां भी बसीं। वर्तमान गांव सलेमपुर लगभग 16,000 हजार की आबादी वाला एक ऐतिहासिक गांव है।

समय बीतता रहा। सरकारें आयीं और गईं। ग्राम पंचायत की व्यवस्था लागू होने के बाद गांव, खुशहाली की तरफ धीरे-धीरे बढ़ा। हालांकि राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के दीमक ने इस गांव को भी प्रभावित किया और व्यापक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता नहीं दिखा। आजादी की लड़ाई में गांव के कई सपूतों ने अपना योगदान दिया। आजादी मिलने के मात्र ​20 वर्षों के अंदर ही गांव में बिजली आई। आम तौर खेतिहरों के गांव सलेमपुर के अधिकांश ग्रामीण कृषि उपार्जन पर ही निर्भर रहे। हालांकि आजादी के बाद भारतीय सेना में भी इस गांव के नवयुवकों का खासा योगदान रहा।
राजीव गांधी की सरकार के दौरान ग्राम पंचायत के चुनाव में चौ खजान सिंह ने चुनाव जीता, ग्राम प्रधान बने और गांव को कीचड़ मुक्त करने तथा पूरे गांव के लिए बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने की कोशिश की। पहली बार गांव में गली, नाली एवं सड़कों का बुनियादी ढ़ांचा बना। हमारे गांव में कुछ पक्के, कुछ कच्चे-पक्के, कुछ मिट्टी के कच्चे, कुछ झोपड़ी, सब प्रकार के छोटे-बड़े घर होते थे…. हमारा घर गांव से तीन किलो मीटर दूर खेतों पर ही बना था, प्रकृति की गोद में पेड़ पौधों की प्राकृतिक छटा के बीच, चिडियों के कलरव के साथ, एकांतवास ।
चौ. चरण सिंह जैसे किसान नेताओं को समर्थन करने की पहल गांव के लोगों ने किया, जिन्होंने गांव किसान एवं खेती की समस्याओं को समझा। एक समय ऐसा भी था कि गांव के हमारे बुर्जुगों ने गांधी जी के आंदोलन में बढ़ चढ़कर भागीदारी की। हालाकि कई लोग ऐसे भी थे जो आगे चलकर गांधी जी के नीतियों के खिलाफ भी खड़े हुए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी का पैतृक गांव बटेश्वर हमारे गांव से 34 किमी की दूरी पर दक्षिण दिशा की ओर है। बृज ​भूमि के अंदर आने वाले इस गांव ने अटल जी के प्रधानमंत्री बनने पर दिल से बधाईयां दीं। मथुरा, वृंदावन की दूरी यहां से मात्र 40 किलोमीटर है। बृज की मिट्टी की सुगंध और बृज भाषा का समावेश बखूबी महसूस किया जा सकता है। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का भव्य मंदिर यानी बलदेव दाउ जी का मंदिर यहां से कुल 20 किलोमीटर की दूरी पर है, जो कि देश के हजारों लाखों श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। यहां तक की ताज नगरी आगरा भी हमारे गांव से मात्र 34 किलोमीटर की दूरी पर है। बावजूद इसके हमारा गांव मुगलिया आक्रांताओ और उनकी राजधानी आगरा के समीप होते हुए भी उनकी संस्कृति का स्वीकारक नहीं रहा।

 

महान देशभक्त और संस्कृति के संरक्षक मोकुला जाट की सहायता करने वाला गांव सलेमपुर अपनी दास्तां खुद लिखता गया और सामयिक बदलाव के झंझावतों के बीच भी खुद को संजोये रखा।

हमारे परदादा स्व. मुंशी छेदालाल अंग्रेजी राज के अंतिम दिनों में गांव के सरपंच रहे। वे शिक्षा विभाग में बतौर एसडीआई कार्यरत थे, क्षेत्र में बड़ा नाम था अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत एव गणित के बड़े आला काबिल थे, सेवानिवृत्ति के बाद उन्हों ने अपने खेतों में ही अपना आश्रम बना लिया था। कई गांवों की पंचायतें वही हुआ करती थी,उनके पास 18 छोटे—बड़े गांवों के देखभाल का दायित्व था। स्वामी दयानंद के विचारों को आत्मसात कर जीवन यापन करने वाले मुंशी छेदालाल गांव की पंचायत व्यवस्था को गांव से तीन किलोमीटर दूर स्थित अपने आश्रम से ही संचालित किया करते थे। आस पास के 18 छोटे गांवों के सरपंच होने के नाते अपने कर्तव्यों का निर्वहण करते हुए, आर्य समाज द्वारा मिली दीक्षा के अनुरूप मूर्ति पूजा का खंडन करते हुए 1971 में स्वर्गवासी हुए। इस मौके पर तात्कालीन राजनीतिक बिरादरी का जमावड़ा उनकी सामाजिक श्रेष्टता और लोकप्रियता का परिचायक था।
स्व मुंशी छेदालाल के पुत्र यानी हमारे दादा बलबीर सिंह आर्य भी शिक्षाविद् हुए। उन्होंने अपने पैतृक कर्तव्यों का बखूबी निर्वहण किया और आर्यसमाज की परिकल्पनाओं को गांव के हर घर में पहुंचाया। उत्तर प्रदेश के आर्य समाज के प्रधान रहे, उन्होंने भी वहीं अपने पिता के आश्रम में ही रहना प्रारंभ कर दिया, ग्रामीण बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि आसपास के गांवों के पंडित और विद्वान लोग भी मुंशी जी से सलाह म​शविरा किया करते। जाट जाती में जन्म लेकर भी मुंशी जी ब्राह्मण समाज के अग्रणी रहे। 6 फरवरी,2013 को मुंशी बलबीर सिंह का देहांत हुआ तो पूरा ईलाका उमर पड़ा था और सबकी आंखें उनकी याद में नम थीं।
बचपन की यादें
इसी परंपरा को आगे ले जाते हुए हमारे पिता डॉ सीबी सिंह हमारा पालन पोषण भी उसी प्राकृतिक वातावरण में अपने बुजुर्गों के सानिध्य में उसी धूप छांव में हुआ। हमारे यहां से हमारा गांव दूर, कस्बा पास था, इसीलिए हमारी प्राथमिक शिक्षा कस्बा के प्राथमिक विद्यालय में हुई।
बचपन में जिन्होंने हमें पढ़ाया वे मास्टर साहब थे, पंडित रघुनाथ जी, बहनजी कमलेश जी, और मौलवी नसीरुद्दीन जी, सभी ने बड़े तल्लीनता से पढ़ाया, परन्तु सबसे प्रिय और कर्मठ मास्टर साहब थे कन्हैया लाल गौतम , जो कि बाद में प्रधानाध्यापक, और फिर शिक्षा विभाग में एस डी आई हुए। वे हमारे परदादा के शिष्य हुआ करते थे, और बड़ा ही प्रेम करते थे, विशेषकर होनहार बच्चों को। पढ़ाई में अच्छा होने के कारण वे मुझसे खासा स्नेह रखते थे। वैसे तो हमारे गांव के भी कई अध्यापक थे लेकिन वे पढ़ाने के लिए गांव से बाहर दूर विद्यालयों में तैनात थे।


अब आते हैं प्राथमिक शिक्षा पर, हमारे बचपन में विद्यालय चारों ओर से छोटी-छोटी चार दीवारी से बंद था…. । पानी संग्रह के लिए मुख्य द्वार के पास चार दीवारी पर एक टंकी बनी हुई थी। जिसमें नल लगा हुआ था। बरामदे में शिक्षकों के लिए मटके में पानी रहता, जिस पर शीशे का गिलास भी रहता।
ज्यादातर छात्र अपने बैठने के लिए अपना साधन लेकर आते जिसमें टाट की बोरी, कट्टा, कपड़ा आदि। बाद में बैठने के लिए टाट पट्टी की व्यवस्था विद्यालय की ओर से ही हो गई। जो बच्चे पहले पहुंचते वे कक्षा में सबके लिए टाट पट्टी बिछाने, नल से पानी लाने, सफाई व्यवस्था को संभालने के काम में लग जाते। छुट्टी होने पर टाट पट्टी व्यवस्थित ढंग से लपेट कर रखना भी बच्चों का काम रहता।
प्रार्थना-राष्ट्रीय गान के बाद पढ़ाई-लिखाई प्रारंभ होती। हरेक के पास पत्थर की स्लेट, किसी किसी के पास हल्की फुल्की लोहे वाली होती। इस पर लिखने के लिए पेम रहती। साथ ही लकड़ी की तख्ती, स्याही की दवात, कलम तो सबके पास रहती। इसमें भी किसी किसी के पास काली, नीली और लाल स्याही की अलग अलग दवातें होती।
दवातों को सुरक्षित रखने के लिए लकड़ी के खांचे जिनके पास होते, उनकी बात ही अलग होती। इसमें कई तरह की कलाकारी, बेल-बूटे इसकी और अधिक शोभा बढ़ाते। कलमदान रखना तो बहुत ही बड़ी बात थी। तख्ती पर लिखने के लिए सरकण्डे की कलम। थैले में हिसाब यानी गणित की किताब। कलम की अच्छी नोंक बनाना सबके बस की बात नहीं थी। कालांतर में लोहे की निभ वाले होल्डर से लिखना प्रारंभ कर दिया था, लेख भी गजब का लिखा जाता था, सबका एक से बढ़कर एक……
मास्टर जी, जिन्हें हम गुरु जी, आचार्य जी, मुन्शी जी या मास्साब के संबोधनों से नवाजते थे।

अनेक बार चेहरे देखने लायक बन जाते जब शरीर एवं कपड़ों पर स्याही के निशान अपनी छटा बिखेरते नजर आते। गिनती-पहाड़े सभी छात्रों को एक साथ मिलकर जोर—जोर से बोलने पड़ते जिसकी आवाज दूर—दूर तक सुनाई देती। सजा मिलना, पढ़ाई-लिखाई का अभिन्न अंग था। डंडे लगना, मुर्गा बनना, एक टांग पर खड़े रहना, हाथ ऊपर करके खड़े रहना, गर्मी में धूप में खड़ा होना, खूंटी पर लटकना, कान ऐंठना, उंगलियों के बीच में पेंसिल रखकर दबाना, थप्पड़, तमाचे, घूंसा-धौल लगना तो बहुत ही सामान्य सी बात थी। इसे कोई क्या याद रखे? कभी कभी तो यूं ही हमारे अध्यापक मखौल में ही दो चार लगा दिया करते थे। फिर भी कोई गिला शिकवा नहीं होता था।
एक दिन का वाक़या कभी ना भूलने वाला रहा, हम तीसरे दर्जे में आ गए थे, लिखते अच्छा थे, गुरु जी ने सुलेख लिखने का आदेश दिया था, हम भी बड़े उत्साह से लिख रहे थे, तभी एक सहपाठी ने हमारी कलम की दिशा भूलवश बिगाड़ दी। गुस्से में एक धौल हमने उसके जमा दी, मास्साब ने देख लिया, और दो धौल उन्होंने हमें जमा दीं, हमने आव देखा ना ताव, अपना बस्ता उठाया, और लगे घर की ओर सूध बांधने। घर पहुंचे, पिताजी को सारा किस्सा सुनाया, सुनकर उन्हें रोष आया और लगे कहने अच्छा, मास्टर जी की इतनी हिम्मत, चल मेरे साथ। फिर क्या था, बड़ी खुशी, जोश, उत्साह, अकड़ में हम पहुंचे बस्ता लेकर। गुरुजनों को प्रणाम भी ना किया। मगर अपने पिताजी का बयान सुनकर अपनी सीट्टी पीट्टी गुम हो गई। सारा उत्साह जोश ठंडा पड़ गया। सोचा, कहां फंस गया मुसीबत में। जब पिताजी ने फ़रमाया कि मास्टरजी इसका नाम काट दो, और या फिर इसकी चमड़ी आप रख लो और हड्डियां हमें दे दो। इसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि आपकी कक्षा से बाहर निकल आया। अब बुरे फंसे, अब यहां से भागना भी आसान नहीं। क्या होगा?

खैर, पिटाई तो हमने भी खाई मगर पढ़ाई-लिखाई में कम, शरारतों में ज्यादा। हर तरह की सजा का अनुभव है अपने पास । ऐसा तो संभव ही नहीं था कि पढ़ने गए हो और मार नहीं लगी, सजा नहीं मिली। कम ज्यादा की बात अलग है। किसी न किसी बहाने से सजा तो मिल ही जाती थी। कभी कभी तो करता कोई और सजा किसी और को ही मिल जाती। हमारे समय में अभिभावक अपने बच्चों की होड़ नहीं लेते थे, अध्यापक भी अपने शिष्यों को स्नेह पूर्वक पढ़ाते थे
वह समय अब भी याद आता है, याद आते हैं वे अभूतपूर्व पल, जब विद्यालय के पीछे की दीवार पर चढ़ कर बेरी के बेर खाना, और मास्टर जी की मार खाना, विद्यालय के समाने वाले प्रांगण में दाऊदयाल के तेजाब से भुने हुए खट्टे चूर्ण की पुड़िया, 20 पैसे की चार, मीठे चूर्ण की पुड़िया, लेमनचूस की गोली बीस पैसे की बीस, एक रुपये के पांच किलो सिंघाड़े, अजीब से बचपन के शौक, बात बात में झगड़ा, और फिर एक साथ खेलना….
वो समय भी क्या था और ये समय भी क्या है…..
एक तथ्य यह भी है कि गांव सलेमपुर पुरातन काल से ही पहलवानों का भी गांव रहा है। ​अलग—अलग कालखंड में यहां के पहलवानों ने अपना लोहा मनवाया और देश के लोगों की प्रशंसा पाई है। आज का परिवेश पहले की अपेक्षा काफी बदल गया है। भले ही गांव में बुनियादी सुविधाएं पहले के मुकाबले बढ़ी हैं, पर लोगों का दायरा सिमट कर परिवार तक रह गया है। यह काफी दुखद है। अमूमन पार्टी बंदी से दूर रहने वाले हमारे गांव सलेमपुर में पंचायत चुनाव भ्रष्टाचार और तमाम तरह के प्रलोभनों का माध्यम बन जाता है। गांव के आस पास आज भी बालक व बालिकाओं के लिए अच्छा विद्यालय व महाविद्यालय सरकार की ओर से नहीं खोला गया है। यहां तक गांव को जोड़ने वाली सड़क की स्थिती भी अच्छी नहीं है। साथ ही साथ गांव में बुर्जुगों के बैठने, बच्चों के खेल के मैदान, किसानों के लिए बेहतर सिंचाई व्यवस्था का अभाव है यानी कुल मिला के यह कहा जा सकता है कि गांव सलेमपुर ने विकास की ओर कदम बढ़ाया तो है लेकिन सरपट दौड़ने के लिए अभी और भी कई कदम उठाने होंगे।
बावजूद इसके आज भी गांव तो गांव ही है,जहां मेरी आत्मा बसती है और दिल्ली में रहकर भले ही मैनें पठ्न पाठन का पेशा अपनाया है लेकिन गांव आज भी मेरे रगों में दौड़ता है।

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