भविष्य में भारत के गांव ही बचेंगे, नगर और महानगर नहीं

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उदय प्रकाश

छत्तीसगढ में मेरा छोटा-सा गांव है सीतापुर। मध्यप्रदेश के दक्षिणी पूर्वी छोर पर स्थित। आज भी इस इलाके में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ी संस्कृति का समावेश दिखाई देता है। इसे मैं छत्तीसगढ़ी अंचल कहता हूं। सीतापुर सोन नदी के तट पर है। यहां से 50 किलोमीटर दूर अमरकंटक है। स्थानीय लोग सोन को पिता मानते हैं। गांव की महिलाएं सोन की पानी पर आश्रित हैं। रेत काफी कीमती है। गांव में आये बदलाव में इनका योगदान है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने गांव के परिवर्तन की गति को तेज किया। मेरा जन्म 1952 में हुआ। उस वक्त जमींदारी थी। 1953 में जमींदारी उन्मूलन हुआ। 1947 में पिता यानी कुंवर प्रेम कुमार सिंह कांग्रेस में थे। हम लोग जब सीतापुर आये तो सीतापुर में जन्म लेने वाला मैं पहला बालक था। जमींदारी उन्मूलन के बाद की पैदाईश, पिता गांधीवादी, गांधी-बिनोबा से जुड़े लोगों का घर में आना जाना था। एम के सिंघा बिनोबा जी के सचिव थे। वही पहले अध्यापक थे। उन्होंने गांधी-बिनोबा के सिद्धांतों को हमारे मन में डाला।

गांव बहुत ही छोटा, जल, जंगल, वन्य प्राणियों से भरा हुआ। हमारे घर में वन्य प्राणी, हाथी, चीता, खरगोश पालने के अनुभव हैं। सुबह से लेकर रात तक इन्हीं वन्य प्राणियों के बोलने से पहर का अनुमान लगाया जाता था। विकास, आधुनिकता से कटा हुआ गांव। सोन नदी पर पुल नहीं था। मानसून में गांव पूरी तरह कट जाता था यानी अलग-थलग पड़ जाता था। प्राथमिक पाठशाला बिल्कुल अलग तरह की। अध्यापक किराये के घर में गांव में ही रहते। खुद खाना बनाते। दुनिया से बिल्कुल मशरूफ। पहाड़ा पूछते। उन्नीस और सत्रन का पहाड़ा कठिन था। छप्पर की बड़ेरी में हाथ का पंजा टांग कर सजा दिया जाता। आज ऐसा करना बाल उत्पीड़न कहा जाएगा। जो जितना पिटता था, उतना ही अनुग्रहित होता। उन्होंने गांव में वृक्षारोपण कराया, गांव में ऐसे संस्कार डाले जो आज भी लोग याद करते हैं। जब भी घर आते तो खाना खाकर जाते। तब खरबूज, खीड़ा, ककड़ी की खेती होती।

छठी से मध्य विद्यालय शुरू हुआ। वह अनूपपुर कस्बे में था। नदी पार कर स्कूल जाना होता। मानसून के दिनों में घवैया पकड़कर पार किया जाता। अब नदी सूख जाती है। मानसून में पानी नहीं होता है तो रेत की वैध और अवैध खनन होती है। नदी की हत्या में खनिज का अवैध दोहन बहुत बड़ा कारण हैं। गांव में पानी अब नदी से नहीं, बोरिंग से आता है। कुंए सूख गये। दो तालाब थे, मेड़ पर उगे आम बूढ़े होकर फलहीन हो गये। गांव में आज पक्के घर हैं लेकिन प्राकृतिक रूप से गांव उजड़ा हुआ, नशे में डूबा हुआ दिखाई देता है।

बचपन जंगली पशुओं, वनों, आदिवासियों से जुड़ा रहा है। मेरी रचनाओं में इसकी झलक मिलती है। 1960-70 के दशक में मेरे घर से सात किलोमीटर दूर अम्लई में कागज कारखाना खुला ओरिंयंट पेपर मिल। कागज बनाने के लिए बहुत अधिक पेड़ चाहिए। इसी के साथ शुरू हुई पेड़ों की कटाई और निवर्णीकरण। भारतीय पेड़, साल, शीशम, पाकड़, कीकड़, अर्जुन, सेमल आदि के विकास में वर्षों लग जाते हैं। साल-सड़ई के घने जंगल उस क्षेत्र की विशेषता थी। सरई, महुआ, चार, तेंदू ये सारे वनोपज हुआ करते थे और नदी की मछलियां थी हीं जिनके सहारे आसपास के आदिवासी जनता अकाल के दिनों में भी भूख का शिकार नहीं होती थी। लेकिन कागज के कारखाने के साथ जो र्निवनीकरण हुआ, उससे केवल पेड़ ही नहीं, वन प्राणियों की दुर्लभ प्रजातियां भी गायब हुईं।

अब सिर्फ स्मृतियां शेष है। कागज के कारखाने को तेजी से बढ़ने वाले पौधे चाहिए। यूकिलिप्टस या सफेदे के पेड़ रोपे गए। इससे भूजल और नीचे चला गया, खेती पर आने वाला संकट बढ़ा। फिर थर्मल पावर स्टेशन बना जिसने जल विद्युतीकरण के लिए नदी के पानी को रोक लिया। साथ ही पेड़ों की लकड़ी को गलाने के लिये सोडा फैक्ट्री। पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा। हवा गंदी हुई, चिड़ियों की चह-चहाहट गुम हो गई। नये-नये किस्म के रोग दिखाई दे रहे हैं। इसके समानांतर लोग आर्थिक रुप से समृद्ध होते गये। कच्चे घर पक्के होने लगे। पहले साईकल आयी, बाद में ट्रैक्टर आया। अब कोई भी घर नहीं है जिसमें मोटरसाईकल या कार न हो। मध्यवर्गीय शहरी जीवन से जुड़े गजेट्स आए।

1990 के बाद समृद्धि तो आयी लेकिन उस समृद्धि का स्रोत क्या है पता लगाना मुश्किल है। श्रम से मुक्त सेवा प्रक्षेत्र से समृद्धि आई। जो गांव में विभिन्न जात समुदायों के बीच परस्पर निर्भरता का साझा तानाबाना था वो टूटने लगे। पहले पांच पीढ़ी को जानते थे, अब गांव ऐसा बदला कि लोग एक-दूसरे को नहीं पहचानते। 68 वर्ष के उम्र में जब गांव में निकलता हूं, तो बाहर से आया हुआ व्यक्ति समझा जाता है। यदि आप 20 वीं सदी के प्रारंभिक दशक के गांव देखें और आज उसकी तुलना करें तो पूरा स्वरूप बदल गया दिखता है। उस समय के गांव आत्मनिर्भर, स्वरोजगार से संतुष्ट, अपने भीतर के चौपाल या पंचायत में विवादों को सुलझा लेने वाले, एक दूसरे के दुख-सुख में सहभागी और साझीदार होते गांव का चित्र जेहन में उभरता है। उसी विकास के राष्ट्रीय राजमार्ग पर भागते-दौड़ते, हांफते, गिरते दुर्घटनाओं के शिकार होते गांव। वो गांव जहां पहले घड़ियां नहीं होती थीं। जो गांव भारत के तमाम उपन्यासों में दिखते हैं। वो गांव अब ताबड़तोड़ बेतरतीब विकास के अंधी दौड़ में शामिल होते दिखते हैं। खेती के लिए उपयोगी पशु, गाय, बैल, ढ़ोर, डांगर की अब कृषि में उपयोगिता नहीं रही। अब वे सिर्फ राजनीति के काम आते हैं। ट्रैक्टर किसी अभिशाप की तरह समृद्धि का सपना लिए हुए आया लेकिन हकीकत, पलायन, कर्ज के रूप में नजर आती है। महानगर में बढ़ती जनसंख्या का कारण खोजेंगे तो गांव की बदहाली नजर आयेगी।

 

20 वीं सदी के उतरार्द्ध से लेकर 21 वीं सदी के दूसरे दशक तक मेरे गांव के बदलने के कुछ अन्य कारण भी रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। पहले हमारे जिले में दो या तीन खदानें होती थी। अब उन्नीस-बीस हो गयी हैं। सातवें दशक में अल्युमूनियम, बॉक्साईट का भी खनिज भंडार गांव से कुछ दूर अमरकंटक में पाया गया। उसकी खुदाई का विंध्याचल पर्वत श्रृंखला जिसमें मध्यप्रदेश का प्रमुख तीर्थस्थल ‘अमरकंटक’ स्थित है, के पर्यावरण पर गहरा असर हुआ। अमरकंटक वन औषधियों के लिए प्रसिद्ध था। ब्राह्मणी जड़ी घास की तरह उगता था। आंवले, हरर, अर्जुन, वनेले आम के घने जंगल हमारे इलाके में थे, जिसमें हमारा गांव भी शामिल था। वो सब नष्ट हो गए। कोयले के खदान, अल्यूमुनियम, बाॅक्साईट और उसके बाद गैस की खोज बड़े परिवर्तन का कारक बना। हाईवे, रेल पटरी, बसें, गाड़ियों, ट्रकों, परिवहन के तमाम साधनों का आना, खनिजों का दोहन इन सबने गांव की काया को पलट दिया। दो सिमेंट फैक्ट्री बाद में खुली, छह पावर प्रोजेक्ट आ गए। तीन इलाकों में गैस पाया गया, प्राकृतिक गैस मिथेन। रिलायंस, मोजरबियर, लैंको आदि कंपनियां आ गयी हैं। लोग कहते हैं रूपया सड़कों पर बहता है। वह छोटा-सा शहर अनूपपुर जिला मुख्यालय में तब्दील हो गया। अब वह एमपी का पावर हब बनता जा रहा है। उर्जा केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है। फलाईओवर, 5 स्टार, 3 स्टार होटलों से गुलजार हो गया, लेकिन सवाल है किस कीमत पर।

जब हम छोटे थे, स्कूलों में पढ़ते थे तब एक तरफ साम्यवाद और दूसरी तरफ गांधीवाद, ये दोनों मिलकर हमारे सपनों का निर्माण करते थे। गांधी हमेशा सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात करते थे और वह उत्पादन के साधनों को छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों तक पहुंचाने की बात करते थे। वह गांव की आत्मनिर्भरता की बात करते थे। लेकिन मुझे लगता है कि आधुनिकीकरण की आंधी ने और बड़े औद्योगिक घरानों के हितों को ध्यान में रखकर बनायी गयी नीतियों ने गांधी के सपनों को चकनाचूर कर दिया। साम्यवादी दृष्टि प्रणाली में भी सहकारिता पर बहुत जोर दिया गया था।

1950-60 के दशक में जब भारत की अर्थनीति मिश्रित अर्थ प्रणाली पर आधारित थी, जब सहकारी व सरकारी या निजी और सरकारी उद्यमों के बीच संतुलन कायम था और कृषि अर्थव्यवस्था भी इस बदहाली तक नहीं पहुंची थी, तब वह ग्रामीण श्रमिक वर्ग को रोजगार देने में बहुत हद तक सक्षम थी। मुहावरा चलता था,‘‘उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान।’’ यानी आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक आय देने वाली व्यवस्था खेती मानी जाती थी। उसके बाद नौकरी से बेहतर तो भीख माना जाता था। आज नौकरी और व्यापार के लिए तो गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा दिखती है। व्यापार देश की अर्थव्यवस्था में विषमता की ऐसी मीनार खड़ी कर रहा है जहां चोटी पर बैठे डेढ़-दो प्रतिशत लोग अपने देश की संपूर्ण संपदा का 86 फीसदी अपने पास रखे हुए हैं और उस मीनार के पायदान पर रहने वाला किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहा है। दूसरी तरफ नौकरी की चाहत लिए हर साल दो करोड़ पैदा होते नौजवान, समाज के भीतर जातिगत कटुता, टकराहट, संघर्ष को जन्म दे रहे हैं। पूरी राज व्यवस्था को इन्हीं दो रोगों का वायरल फीवर हो गया है।

याद करें गांधी को जिनको हम अपना आदर्श मानते हैं जिन्होंने भारत को लाखों गांवों से बना एक बहुत बड़ा गांव माना था। वह देश अब चीन और अमेरिका से होड़ लगाता हुआ एशिया का महा-आर्थिक शक्ति बनने के दौर में है। गांव और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पीछे छूटती जा रही है। हर बार चुनाव के समय कर्जमाफी का वादा कर नेता चुनाव जीतते हैं, अगले पांच साल तक गांव और किसान वहीं छूट जाता है। चिकित्सा, शिक्षा और आवास की बुनियादी समस्याएं बढ़ती हुई आबादी के मद्देनजर गांव में ज्यों की त्यों हैं। अधिकतम आय और न्यूनतम आय के बीच इतना बड़ा अंतर अतीत में कभी नहीं देखा गया था।

एक सुप्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री डीबी जोशी का कहना है कि 10 एकड़ जमीन वाला का एक सफल किसान जो खेती के आधुनिक और उन्नत साधनों का उपयोग करता है, फसल पर अधिकतम दाम मिलने पर उसकी मासिक अधिकतम कमाई 2700 रूपये की होती है, जबकि केंद्र सरकार में काम करने वाले चपरासी का न्यूनतम वेतन 15,000 रूपए है। लगभग तीन पीढ़ियां खेती से विमुख हो चुकी हैं। शहर की ओर पलायन करने से शहर के संकटों को भी बढ़ा दिया है। ऐसा भी कहा जाता है कि हमारा देश हर साल एक बेरोजगार आस्ट्रेलिया पैदा करता है। इस कथन की सच्चाई ग्रामीण अर्थव्यवस्था के समाप्त होने के साथ जोड़कर देखी जा सकती है।

आज हर गांव गांधी की बाट जोहता है क्योंकि गांव से गुजरने वाला हर हाईवे नदियों की तरह, खेतों- परिवारों और प्रकृति के बीच मेल नहीं दे सकता। इतिहास गवाह है कि सारे बड़े नगर और सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुए। सड़कें नदियां नहीं हैं, एटीएम की मशीनें आक्सीजन पैदा नहीं करतीं और ट्रकों, कारों और कारखानों से निकलने वाला धुआं, वायुमंडल को शुद्ध करने वाली हवन सामाग्री नहीं है। मुझसे अभी हाल में पूछा गया था कि आप भारत में गांव का भविष्य किस रूप में देखते हैं। इसका जवाब यह है कि भविष्य में भारत के गांव ही बचेंगे। ये नगर और महानगर नहीं क्योंकि जो मानव सभ्यता के इतिहास को जानते हैं उन्हें यह सत्य मालूम है कि प्राचीन डायनासोरों की तरह विशाल होते जाते महानगर नहीं बचेंगे। मोहनजोदाड़ो, कालीबंगा और लोथल नहीं बचे। उस समय के गांव आज भी हैं।

(जाने माने साहित्यकार। कवि,कहानीकार।)

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