मेरे बाजी (डॉ. केदारनाथ सिंह) कहीं भी रहे पर गाँव उनकी रगो में बसता था और बहता था। गाँव, गाँव के लोग, खेत खलिहान, भागड़ यहाँ तक कि खेत में खड़ा ‘कुदाल’ भी उनको आमंत्रित करते रहे। उनकी कविताओं में ये बिंब बार-बार आते हैं। ड्राइंगरूम में कुदाल की जगह ढूढँते-ढूढँते वे दिल्ली और गाँव के बीच बार-बार आवाजाही करते रहे। जाने से कुछ महीनें पहले तक भी। यह खोज भरी यात्रा उन्हें एक ओर बेचैन करती रही तो दूसरी ओर रचनात्मक ऊर्जा और सुकून भी देती रही। गाँव के लोगों के लिए बहुत कुछ करना चाहते थे। यह इच्छा अंत तक बनी रही। इसीलिए टॉलस्टॉय इन्हें बहुत प्रिय थे। उन्हीं की तरह गाँव में रहकर गाँव के लिए तो वे कुछ नहीं कर पाए पर उनकी कविताओं में गाँव अपनी पूरी ताकत के साथ बोलता रहा। अपनी अंतिम बातचीत में उन्होंने बड़े दुख के साथ यह कहा भी कि कुछ लोगों के पढ़ने-लिखने में जरूर मदद की, कुछ पिछड़े तबके की महिलाओं को आर्थिक मदद की, पर अपने गाँव के साथियों और उनके परिवारों के लिए और पूरे गाँव के लिए बहुत कुछ न कर पाने का मलाल है- कुछ-कुछ अंतिम इच्छा की तरह यह बात उन्होंने कही थी। मेरी माँ के नाम पर एक स्कूल खोलने की योजना थीं पर केवल कुछ लड़कियों को स्कॉलरशिप ही दे पाए।
बहुत छुटपन में ही वह पढ़ने के लिए बनारस चले गए थे। एक रिश्ते की ‘फूआजी’ (बुआजी) थीं, उन्होंने ही उन्हें पढ़ाने के लिए भेजा था। उन दिनों खेतीबाड़ी ही एक मात्र आर्थिक संबल था। बहुत खेती भी न थी, पर पिता के अकेले होने के कारण बहुत थी। घर-परिवार-रिश्तेदारों की खेतीबाड़ी भी इन्हें ही मिली। इया (दादी) के मायके से कुछ संपत्ति भी मिली। पर सब मिलाकर भी इतनी नहीं थी की इन्हें बाहर भेजकर पढ़ाना आसान होता। ‘फूआजी’ पूरे गाँव में उनका यही संबोधन था। जगफूआ सबकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहती। गाँव में किसी के घर खाना नहीं बना तो अपने घर का खाना वहाँ भिजवा देती। किसी की लड़की की शादी-ब्याह हो तो वह फूआजी के अपने घर का ही होता था। तन-मन और धन से। मेरे पिता को पढ़ाने में वे सबसे आगे रहीं।
मेरे पिता की दो शादियाँ हुई थी। पहली शादी मुजफ्फ़रपुर के पास उनसर मे हुई थी। वो लगभग सवा महीने ही जीवित रहीं। मेरे बाजी ने तो उन्हें देखा भी न था। शादी के तुरंत बाद ही बनारस चले गए थे, शायद सातवीं कक्षा मे पढ़ते थे। उसके कुछ सालों बाद जब मेरी माँ से शादी हुई तो उनसर वाली माँ के परिवार के लोग मेरी माँ में अपनी बेटी-बहन को देखने लगे थे। उन्होंने बहुत कोशिश की यह संबंध बना रहे। एक बार उनके भाई आए और मेरी माँ से मिलना चाहा तो, मेरे पिता को पढ़ाने वाली, पूरे गाँव की समस्या को अपनी समस्या मानने वाली वही जग फूआजी आड़े आ गई। किसी पर पुरुष से भला वह कैसे मिलने देती। तत्कालीन समाज का यह अंर्तविरोध (कमोबेश आज भी है) उनके भीतर भी था। समाज का यह अंर्तविरोध मेरी बुआ (मेरे पिता की बहन) को भी मिडिल स्कूल के बाद बाहर पढ़ाने में आड़े आया। आर्थिक तंदी के साथ-साथ सोच की तंगी भी आड़े आई ही होगी। मेरे बाजी के मन में यह मलाल अंत तक बना रहा। वह हमेशा कहते थे कि मेरी बहन को पढ़ाया गया होता तो वह मुझ से आगे होती। मेरे बाजी जब भी छुट्टियों में गाँव जाते थे तो अपने स्कूल की पत्र-पत्रिकाएँ और कुछ साहित्यिक-पत्रिकाएँ (वो बहुत छोटे थे तभी से साहित्यिक पत्रिकाएँ भी पढ़ने लगे थे) ले जाते रहे। मेरी बुआ की रौशन खयाली मे उन पत्र-पत्रिकाओं का बड़ा योगदान रहा। इन दिनों पढ़ने का जो चश्का उन्हे लगा वो आज अस्सी के आसपास पहुँचती मेरी बुआ में आज तक ज्यों का त्यों बना हुआ है। पढ़ने की धुन ऐसी कि कुछ भी हो जाए पर उनका ध्यान भंग नहीं होता। उन्होंने ही बताया था कि उनकी शादी के बाद तोहफे मे उन्हे ‘चंद्रकांता संतति’ का पूरा सेट मिला था। उसे पढ़ते-पढ़ते उनका खाना रोज़ जल जाता था। गाँव में बिजली नही हुआ करती थी।
हम लोग छुट्टियों मे गाँव जा रहे थे। पडरौना से चली पेंसेंजर गाडी छुक-छुक करती भोर की चली (छपरा से दूसरी बदलनी होती थी) शाम को सूरज ढले वहाँ पहुँचती थी। सुरेमन पुर स्टेशन से रानीगंज बाज़ार के लिए ताँगा मिलता था। झुटपुट अंधेरा, कहीं-कहीं दूर किसी दुकान पर मद्धिम सी रोशनी दिखाई पड़ती। मुझे आज भी याद है वह घुप अँधेरा, घोड़े की रून झुन वाली टप-टप। अँधेरे से शुरू हुई वह यात्रा जब रानीगंज बाज़ार मे पहुँचती तो चहल-पहल दिखाई देती। वहाँ मेरे गाँव के ही रामकिशोर बाबा और प. रमाशंकर तिवारी खड़े मिलते थे। मेरे पिता के लँगोटिया यार थे ये लोग। पंडित जी तो बनारस के हॉस्टल मे साथ-साथ भी रहे थे। उनमें गज़ब का विट था। पतली सी तार और दो कटोरी लेकर टेलीफ़ोन बनाकर हॉस्टल के कमरों मे एक-दूसरे से बात कर लिया करते थे। ऐसे मज़ाकिया पंडितजी के साथ जब रानीगंज से चकिया गाँव (बलिया) के लिए पैदल यात्रा शुरू होती तो अँधेरे में खेतों की पगडंडी पर एक-दूसरे से चिपके हम, साथ-साथ चलती एक नदी होती थी। पर इन सबके साथ-साथ होती थी पंडितजी की कभी न खत्म होने वाली कहानियाँ। कभी चुड़ैल तो कभी भूत की कहानियाँ। सफेद साड़ी में लिपटी चुड़ैल के छम-छम करते पाँव जैसे ही पानी में पड़ते पंडितजी की आवाज़ कुछ धीमे हो जाती। हम लोग कुछ और चिपक जाते। आँखे बंद होती। बस उनकी आवाज होती- कभी ऊँची, मद्धम तो कभी लगभग फुसफुसाती सी। पर गाँव तक का लगभग दो-तीन किलोमीटर का सफर कब पूरा हो गया पता ही नही चलता। कहानी के कहानी होने का थोड़ा एहसास तब होता था जब उसमें रामकिशोर बाबा भी एक पात्र की तरह आ जाते। पंडित जी की गज़ब की किस्सागोई के एक पात्र हमेशा रामकिशोर बाबा होते ही थे।
इया और बाबा (मेरी दादी और दादा) उन दिनों गाँव में ही रहते थे। इया मेरे बाजी को बबुआ कहती थीं। मेरे पिता अकेले बेटे थे। इया के प्रिय बबुआ। इसीलिए बनारस के बहुत से लोग उन्हे बबुआजी कहने लगे थे। मेरी बुआ कलकत्ते मे ही रहती थी। कभी-कभी वो भी अपने परिवार के साथ गाँव आ जातीं। फिर तो हमारी धमाचौकड़ी एक ओर और बुआ और बाजी की नोंक-झोंक दूसरी ओर। बुआ के लिए कहानियाँ गढ़ने का काम मेरे बाजी करते- उनको चिढ़ाते, डराते हुए। बिल्कुल बच्चों की तरह। इया मेरी डंडा लिए मास्टरनी बन जाती सबको निशाने पर लेती। दिल्ली आने के बाद भी इया का वही स्वर सुनने को मिलता था। पर जब कभी बाजी बीमार होते तो चुपके से उनके कमरे में जाकर बैठ जाते। इया बिना कहे समझ जाती और तलवे में तेल मलतीं। मेरे बाबा घनघोर कांग्रेसी थे। बिस्तर के नीचे पत्र-पत्रिकाएँ और कान में रेडियों, यही उनकी कुल पूँजी थी। गाँव में थे तो विरहा भी गाते थे। मेरी इया तो जे.एन.यू. कैंपस में टहलते हुए विदेशियों से भी बातचीत कर लेती थी, वह भी भोजपूरी में। पर बाबा पोलियो के कारण कम ही बाहर निकलते थे। मेरे बाजी की राजनीतिक बातचीत बाबा से ही होती थी। बाजी को जब कोई बात (जानकारी) कंफर्म करनी होती तो बाबा ही उन्हें अपडेट करते थे। कविता के लिए कच्चा माल कई बार बाबा से ही मिलता। बाद में बाबा थोड़ा ऊँचा सुनने लगे थे (कम सुनने वालों के लिए प्रयुक्त)। इसका उन्हे फायदा रहा। सारे न सुने जाने लायक बातों, प्रपंचों से दूर रहते थे। बिस्तर पर लेटे-लेटे, कान में ट्रांजिस्टर लगाए जब कभी उनके कमरे के दरवाज़े पर कोई दिखता, उनका चेहरा खिल उठता था। बाबा की यह निश्चल हँसी देकर मुझे बिस्मिल्ला खाँ याद आते है। बिस्मिल्ला खाँ जब होठों से शहनाई हटाते तो चेहरे की मुस्कान से शहनाई बज उठती थी। मुस्कुाते हुए दर्शकों को देखने का उनका वह अंदाज़ मुझे बाबा जैसा ही लगता था।
हमारा बचपन पडरौना में गुजरा था। वह भी गाँव जैसा ही था, छोटा सा कसबा। उदित नारायण डिग्री कॉलेज में मेरे पिता प्रिंसिपल थे। इसलिए जब भी वे दिल्ली से गाँव की और जाते थे तो रास्ते में कई पड़ावों में एक पड़ाव पडरौना भी होता था। हर पड़ाव से कुछ लोग उनके साथ हो लेते थे और उनका कारवाँ निकल पड़ता था, गाँव की ओर। दिल्ली में रहकर अंत समय तक वे गाँव को ही जाते रहे। गाँव के लोगों से भागड़ का हालचाल, लोगों का हालचाल लेते ही रहते थे। भोजपूरी मे ही बतियाते थे। भाषा और परिवेश का ऐसा जुड़ाव था कि दिल्ली में भी उनका एक गाँव बसता था। नाश्ते के समय (चूड़ा दही उनका प्रिय नाश्ता था) गिलहरी उनका साथ देती थी। अपने हाथों में वह भी थोड़ा-सा दबा लेती थी। यहाँ पर रहनेवाले पुरबिहा ऑटो रिक्शा वाले, सब्जी वाले, ड्राइवर से उनके घर परिवार का हालचाल पूछते रहते थे, भोजपूरी में ही। किसी की बेटी की शादी, पढ़ाई और उनकी बीवी की बीमारी सब कुछ उन्हें याद रहना था। उनका एक प्रिय ऑटोरिक्शा वाला था। वो हम बहनों के घर या कहीं भी आस-पास जाने के लिए अक्सर उसे बुला लेते थे। उससे बात करते हुए आना उन्हें अच्छा लगता था। हमलोग अक्सर उनसे कहते थे कि आप अपना ध्यान रखिए। मेरा भाई कहता जब कहीं जाना हो तो ड्राइवर को बोलिए, पर उन्हें उस ऑटोवाले के साथ एक अपनापन सा हो गया था।
कभीं-कभीं गुस्सा होकर कहते- ‘देखा हम जईसे रहल बानी ओइसही रहब। हमरा इहे नीमन लागेला।’ पहनने को कुर्त्ता पाजामा, रहने को किताबों वाला एक कमरा, खाने को खिचड़ी और चूड़ा दही प्रिय भोजन, एक थाली एक कटोरी और गिलास। यही उनकी ज़रूरत थी। इन सबके साथ खूब सारे लोगों के साथ भीड़ मे रहना उन्हे अच्छा लगता था। कभी-कभी, अचानक फ़ोन आता। मैं शाम को आ रहा हूँ। कुछ लोग साथ मे है वे भी खाएंगे। जहाँ भी जाते दो-एक लोग साथ होते ही थे। शाम को साथ बैठकर खूब सारे संस्मरणों का दौर चलता….। उनकी स्मृति में गाँव या फिर खालिस इंसान हुआ करते थे।
बहुत सालों बाद मेरी इया के न रहने पर 2012 में फिर गाँव जाना हुआ था। एक नया गाँव हमारे सामने था। खपरैल के मकान अब ईटों के ढाचें में बदल चुके थे। किसी के घर गाय भैंस कम ही देखने को मिलते हैं। युवा पीढ़ी शहर को चली गई है और जो बची है उनका खेतो से कोई लगाव नहीं। गाँव में कोई काम तो है नहीं। खेती से सिर्फ़ पेट भर पाता है। आज का युवा शहर की और भागना चाहता है भले ही कोई छोटा-मोटा काम कर के जी ले। खेती को लेकर जो आग्रह होने चाहिए वह हमारे यहाँ के गाँव में नहीं है। पश्चिम में जैसे पंजाब में खेती काफी वैज्ञानिक ढंग से हो रही है लेकिन पुरब के लोग गाँव छोड़कर दिल्ली, दिल्ली छोड़कर अमेरिका भाग रहे हैं। इस तरह गाँव खाली हो रहा है। पलायन लगातार बढ़ रहा है। गाँव नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता में रह ही नहीं गया है। खेती किसानी के लिए बजट भी कम ही होता है। आज हम कौशल विकास की बात कर रहे है लेकिन इस कौशल में खेती नहीं है। गवंई कला लुप्त होती जा रही है। इस कला कौशल पर बहुत ध्यान देने की जरूरत है।
गाँव में किसी भोज के बाद बायन बाँटने का रिवाज़ है। शाम के समय पूड़ी, सब्जी, बुनिया जलेबी वगैरह लेकर हम लोग आस-पास के घरों में बाँटने के लिए निकले। बहुत से पुराने-पुराने चेहरों को देखने के लिहाज़ से भी यह काम हमने अपने हाथ मे लिया। घरों के दरवाज़े खटखटाते ही जो चेहरा बाहर झाँकता उसे अँधेरे में देखना संभव न था। जैसे ही उनको पता चलता कि हम लोग आए हैं, आव भगत करने लगते। हम लोग लालटेन लेकर गए थे। किसी ने कहा, ‘देख त शहर में वह तारी स, आ बायन बाँट तारी स।’ हम लालटेन उठाकर चेहरा देखते। आवाज़ को चेहरे के साथ मिलाने की चाहत मे लालटेन थोड़ा ऊपर उठाकर देखते थे। कोई पूछता- ‘कइसन लागेला गाँव में। नीमन लागेला’ सुनकर कुछ आश्वस्त हुए स्वर में फिर कोई कहते- ‘काहे ना नीमन लागी, आपन घर दुआर ह।’ फिर कोई कहता- ‘शहर में रह के भी आपन संस्कार ना भूलइले स….. ।’ ऐसे बहुत-सी झूठी तसल्ली और विश्वास दिलाते हुए हम बहुत सी आवाज़ों और चेहरों से मिलते रहे। वे आवाज़ें कोई चाची थी, तो कोई भाभी। पर उस समय तो केवल चेहरे थे। उसी समय एक भाभी से मिलना हुआ। चेहरा क्या था हडि्डयों का ढाँचा था। उम्र से ज़्यादा बूढी लगने लगी थीं। ये वही चाची थीं जो ब्याहकर आयी थीं तो हमें परी जैसी लगती थी। डोली से जब पहली बार उनका लाल मोज़ा पहने पाँव बाहर निकला तो हम एकटक उन्हें देखते रहे। घूँघट के पीछे छिपे चेहरे को देखने की जल्दबाजी भी थी। धीरे से उठाकर झाँक भी लिया। उसके बाद तो जबभी छुट्टियों में गाँव जाते उनसे मिलना, बात करना मेरा सबसे प्रिय समय होता था। वो अपने गाँव की बातें बतातीं। चंपारण के पास (तिरहुत) की रहने वाली थी। संभवत: मगही बोलती थीं। उनकी बोली की मिठास और उनकी गरीबी और अभाव, पर आज़ादी और मस्ती की बातें एक रोमांच सृजित करती थीं। उन्हे देखते ही वह सब याद आया। एक बार गाँव गए तो पता चला वो बीमार हैं। मैं गली में उनके दरवाज़े से झाँकने की कोशिश करती कि शायद दिख जाएँ। मेरे घर के एक कमरे की खिड़की से उनका आँगन दिखता था। मैं हर संभव झाँकने की कोशिश करती, पर वह कभी नहीं दिखीं। हम बच्चों का वहाँ जाना मना था। तरह-तरह की कहानियाँ सुनाई पड़ती। कोई कहता उनको चुड़ैल ने पकड़ लिया, वो अपने ऊपर गंदगी लपेट कर बैठ जाती है, आँखों में अंगारे दिखाई पड़ते हैं, कुछ बोलती नहीं, गुमसुम रहती हैं। और भी बहुत कुछ। हमें विश्वास ही नहीं होता कि हमें कहानियों की दुनिया मे सैर कराने वाली चाची खुद एक कहानी बन चुकी थीं। कुछ बड़े हुए तो समझ आया कि दांपत्य जीवन, घर-परिवार की असंतुष्टि उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से धीरे-धीरे कमज़ोर करती चली गई। स्त्रियों के लिए तो अब भी बहुत कुछ नहीं बदला है।
मेरी माँ जब गाँव जाती थी तो अंत तक पर्दे में ही रही। घर से बाहर नहीं निकलती थीं। मेरी बुआ ने उनकी एक सखी बनवा दी था। कभी-कभी उनसे शाम को थोड़ी देर के लिए वे मिलती थी। वह क्षण एक आयोजन की तरह होता था। एक-दूसरे को उपहार भी देते-लेते थे लोग। कभी-कभी किसी शादी-ब्याह में भी मिल लेते थे लोग। माँ की सखी थी बाला बाबा की दूसरी पत्नी। दोनों की शादियाँ लगभग एक ही साथ हुई थी। बाला बाबा गणित के प्रसिद्ध मास्टर थे। कलकत्ते में रहते थे। ट्यूशन पढ़ाते थे। बंगाली जगत और पुरबिहों में एक नामी अध्यापक की तरह जाने-माने जाते थे। मेरे पिताजी ने जब कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली तो शुरूआती दौर में घर वाले यही चाहते थे कि वे भी बाला बाबा की तरह मास्टर बन जाएँ। ट्यूशन करके खूब पैसा कमाएँ। उसी बाला बाबा की दूसरी पत्नी और मेरी माँ की सखी का मिलन मेरे लिए हमेशा कौतूहल रचता था। सखी बनाने का यह प्रचलन भी अजीब था। इसके अपने नियम और कायदे भी थे। बहुत बाद में मैंने यह जाना कि उन दिनों गाँव के हर रीति-रिवाजों और पर्देदारी के बीच गाँव की स्त्रियाँ अपनी जगह अपनी आज़ादी इस तरह भी बनाती थीं। एक दूसरे की राज़दार बनकर। बगल में भैया के घर जाने पर भाईजी याद आए। ‘भाईजी’ यानी पड़ोस के भैया के पिताजी। जाड़े की कई रातें उनसे कहानियाँ सुनते बिताई हैं। वे घर के अंदर कभी नहीं सोते थे। जाड़ों में भी नहीं। बाहर के ओसारे में पुआल का बड़ा सा मोटा गद्देदार बिस्तर होता था। जिस पर हम धमाचौकड़ी मचाते थे। वहीं पास में कौड़ा (अलाव) का इंतज़ाम भी होता था। हम गोल-गोल बैठ जाते और कहानियों का सिलसिला शुरू होता। शाम से रात होने का एहसास ही न होता। उनकी आँखें खूब गहरी थीं। वे भक्त थे। पूजा पाठ करते थे और कभी-कभी देवी को अपने पास बुला भी लेते थे। मैंने एकाध बार चुपके से झाँककर कमरे में वह दृश्य देखा था।
इस बार गाँव जाने पर बहुत कुछ बदलाव में यह भी दिखा कि सुरेमन पुर स्टेशन से मोटर साइकिल पर बैठकर हम सीधे गाँव पहुँच गए। अब तो बैटरी वाला रिक्शा भी चलने लगा है। घर पक्के बन गए हैं। पर खेती करने वाले लोग दुकानदारी करते मिले। दुख हुआ गाते-गुनगुनाते मस्ती में खेतों से घर लौटने वाले वे लोग अब उदासी भरे दुकान पर बैठे थे। स्कूलों की अब भी वही हालत है। भागड़ में अब पानी नहीं है। सूखी पतली सी एक लकीर की तरह पानी बहता है। जलकुंभियों की मार से दबा-दबा। पहले उस पर एक बाँस का पुल हुआ करता था। आँधी आते ही हम दौड़ जाते तो उन पुलों के पार आम के बागीचें में। वहाँ पर एक स्कूल भी था। बाहर चिट और फर्रे बिखरे थे। पता चला अभी-अभी जो परीक्षा हुई है उसमे कराए गए नकल के फर्रे थे वो। पर स्कूल की दीवारों पर खूब सारे आदर्श वाक्य भी लिखे मिले। मेरे गाँव से लगे मिलकी गाँव में एक प्राइमरी स्कूल था। वहाँ भी हम गए। उसी स्कूल में मेरे बाजी पड़े थे। वहाँ जाते ही टीचर्स पहले तो डरी। फिर अपनी बातें बताने लगी। पढ़ाई के रोने में बच्चों का कटाई-बुबाई में व्यस्त रहना भी था। फिर भी थोड़ा सुकून मिला यह देखकर कि अध्यापिकाएँ पुरे लगन से पढ़ाने की कोशिश में लगी थी। बगल के आँगनबाड़ी से बच्चे झाँककर हमें देखने लगे। हम आगे बढ़ गए।
मेरे पिताजी कहीं भी रहे गाँव वाला बनकर ही रहे। अंत तक साल में दो बार गाँव जाते रहे। शुरू-शुरू में दिल्ली आए तो ग्रीन पार्क में चाहते तो घर ले सकते थे। कहते, हमरा कौनो दिल्ली में रहे के बा। लेकिन दिल्ली जैसे जकड़ लेती है। गाँव में उनके उम्र के लोग साथ छोड़ते गए या बाहर बस गए। वे दिल्ली में गाँव बनाना चाहते थे। मकान लिया लेकिन मकान के एक कमरे तक सिमटे रहे। एक गिलास, एक स्टील का प्लेट, बाबा दादी की फोटो, माँ की यादें। किसी का फोन आता। पूछता कहाँ हैं, कहते, बेटी के यहाँ बैठें है, बेटी खाना वाना बनाई है। हमारी बेटी एनसीईआरटी में है न। पिताजी को खेती से कोई लेना देना नहीं था लेकिन हमारे पास खेत था। लेकिन अब भी गाँव में दो बड़े खेत बचे हुए थे- सराड़ी और गोयडा। घर से सटा हुआ था। बटाई पर खेत दे दिया जाता था। जो लोग खेत जोतते बोते थे वे लोग अक्सर उनकी कविताओं में आते रहे नाम के साथ।
अपनी कविता ‘मांझी के पुल’ में लाल मोहर मांझी का नाम लेते हैं। वो दुसाध थे। किसान मजदूरों के नाम उनके कविताओं में अक्सर आते हैं। भरदुल लोहार कविताओं में आते हैं। गाँव के बाज़ार में खुटकी मिलती थी। वे जब भी बाजार जाते थे तो ठोंगे में भरकर खुटकी लाते थे। जैसे वापस आते हम लोग हाथ फैला देते थे। आस-पास के बच्चों में वह बँटती हुई आती थी। उनकी कविताओं में ग्राम्य जीवन की ये सारी खूबियां मिलती हैं। खेलते हुए बच्चे, हाथ फैलाये हुए बच्चे। लालमोहर मांझी पहले कैसे थे और अब कैसे। निषाद जी यानी कैलाशपति निषाद पडरौना के सामान्य से स्कूल में मास्टर थे। वे निषाद जी मेरे के बहुत करीबी थे। साथ-साथ पडरौना के बाजार में जाते थे। पडरौना का बाजार, निषाद जी का ज़िक्र कविताओं में आता है। 19 नवंबर 2017 को इसी घर में जन्मदिन मनाया गया था। उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ भी पढ़ी थी। बहुत खुश थे लेकिन एक उदासी भी थी। जनवरी के पहले सप्ताह में वे कोलकाता चले गए। हावड़ा में भी उनके लिए गाँव जैसा ही माहौल होता था। साल में दो बार जाते थे। नवंबर में गाँव गए थे। 15 दिन रहे थे। उसके बाद पटना गए। मेरी बहन के बेटे की शादी थी।
अभी हाल ही में एक साल पहले उन्होंने गाँव में गाय बांधने के लिए जो कमरा खाली पड़ा था वहाँ अपने लिए अलग से (घर के सामने ही) कमरा बनवाया था। उसमें रहे भी। गंगा और सरयू की मिलन वाली नदी भागल उसके पास से जाती थी। जो जलकुंभियों से एक पतली लकीर बन चूकी है। बाढ़ आती है, लेकिन गाँव में नहीं। आज भी गाँव में रिक्शा नही जाता। हमें याद है कि चाची बीमार हो गई थी तो डोली में लेकर गये थे हॉस्पीटल। डोली में दुल्हन आती थी लेकिन डोली में बीमार को ले जाते देख हमें आश्चर्य होता था। मेरी माँ का नाम शिवकली था। उन्हीं के नाम पर लड़कियों को स्कॉलरशीप देते थे। माँ के नाम पर गाँव में एक स्कूल खोलना चाहते थे। अब हम भाई-बहन उनकी किताबों और रचनाओं को समेट रहे हैं। साल में एक बार समय हुआ तो 19 नवंबर उनके जन्मदिन पर गाँव में कार्यक्रम करेंगें। महिलाओं को लेकर काम करने की योजना है। अपनी भाषा की लय और गाँव की लय से जुड़े रहना चाहते हैं। मेरे बाजी ने भाषा की इस लय को हमेशा पकडे रखा। संभवत: इसी लय में गाँव और गाँव वालों के साथ रिश्ते में हमेशा सहज लोच बनाए रखा।
(लेखिका केदारनाथ सिंह की बेटी हैं व एनसीआरटी में पढ़ाती हैं।)












