…खाक में क्या सूरतें होंगी

बघड़ियों का टीला…

कुमार विनोद, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

वो ख़ाक की तरह ही दिखता है अब यादों के झरोखे से. मिर्जा गालिब के मशहूर शेर में इस बयान की तरह. ये खाकसार भी उसी खाक से, उसी मिट्टी से बना है, जिसमें दबी गड़ी जाने कितनी ही सूरतें बरसों की खाक कुरेद जाती हैं- सूरतें कुछ देखी हुईं और कुछ कल्पनाओं की रची हुईं… 

टीला तो आपने सुना सुना ही होगा. क्या होता है, किसे कहते हैं? टीले को लेकर जो मै जानता हूं, अगर बताऊं तो मैदान के बीच सतह से थोड़ा ऊपर उठी हुई वो जमीन, जो आम तौर पर वीरान होती है. लंबे लंबे घास, झाड़ियां, चूहों, सांपों का घर माना जाता है. वो लहलहाते खेतों के बीच खड़ा होता है, लेकिन उसे लेकर एक डर आम होता है. उसकी वजह से कोई टीले पर जाता नहीं. खेती के वक्त कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो टीले की भी साफ सफाई कर देते हैं. घास झाड़ी काटकर. उसे उठने—बैठने लायक बना देते हैं. मगर ये काम विरले ही कर पाते हैं. आमतौर पर आदमी टीले को वीरान ही छोड़ देता है. मेरे गांव की कहानी कुछ इसी टीले जैसी है….
टीला मेरे गांव की कहानी में एक मेटाफर है.
ये टीला याद आया कोरोना के संकट काल में शहर से पलायन करते लाखों लोगों का दृश्य देखकर. इतना दर्द, इतना बिछोह, इतनी पीड़ा, इतना दुख, इतनी बेचैनी. और इस पर इतनी हिम्मत कि तपतपाती गर्मी में भी हजार डेढ़ हजार किलोमीटर पैदल चलकर भी अपने टीले- अपने गांव पहुंच जाएं. ये सबकुछ हमारी आंखों के सामने होता रहा. लेकिन हमारे जैसे कई तमाम लोग इतने लाचार, कि कार के बगल से काफिला गुजरता रहा, लेकिन मदद के नाम पर उनके हौसले को सलाम करने से ज्यादा की हैसियत नहीं…
इस बेचैनी में कई बार अफ्सोस की मुट्ठियां तनी, कभी डैश बोर्ड पर, तो कभी अपने ही जंघे पर जम कर बरसी- मैं इस लायक क्यों नहीं, कि इनकी पीड़ा में शामिल हो सकूं. कुछ मदद कर सकूं. सोनू सूद जैसे लोगों को मदद करते देखा, तो खुशी से आंखें छलकी. थोड़ा सुकून मिला. इस सुकून में टीले, अपने गांव से जुड़ी तमाम चीजें तैरने लगी…


क्या गांव हुआ करता था. क्या मौज होती थी….
आम का घना बगीचा, झील की तरह विस्तार वाली जोह (पानी की प्राकृतिक झील), जोह की सुंदर सुंदर मछलियां, जोह के उस पार अमरूद का बगीचा, एक सवा किलोमीटर दूर बाजार, बाजार के उस पार स्कूल. आसाढ़ सावन के वो दिन. धान की रोपनी के साथ आसमान में गूंजते रोपनियों के गीत. चरवाहों की लोरकी, आल्ला उदल गाने वाले वो लोग. पुआल की वो टाल. टाल के ऊपर लेदरा डालकर चांद से बतियातें वो ठंडी राते. कितनी चाचियां, भौजाइयां, कितनी शादियां, कितनी कन्याएं (दुल्हनें), उनके किस्से. वो रंग बिरंगे हित नाता- बांडा आश्रम में नौजवानों का मेला. कभी मछली, तो कभी मीट, कभी मुर्गे की दावत. महीने में एक दो बार ईंट वाले चूल्हे से उठती सोंधी महक और इसके आर्मी के जवानों के दिए रम की बोतल. सरल इतने, कि पहले पैग में ही मस्त. दिन बेरोजगारी के थे, लेकिन इतने बेफिक्र…
कितना कुछ तो था उस टीले में. ये ज्यादा नहीं, मेरी स्मृति के मुताबिक 3 से 4 दशक पहले की बात है…वो सब कैसे विलुप्त होता गया, या जो बच गया, वो हमारी जिंदगी से इतनी दूर होता गया….


मेरे कविता संग्रह एकरंगा में एक कविता है- गांव से जुड़ी एक याद को लेकर…
दादी की कोठरी वाली ढिबरी
अंधेरी कोठरी में झिलमिलाती ढिबरी
दादी कहती थी आस की तरह होती है.
और उसकी बाती हमारी देह की तरह
जब तक जलती है, ढिबरी आस जगाती है
मैंने पूछा था एक दिन दादी से-
और किरासन का तेल, जो हर शाम डालती हो?
कांच की शीशी में तेल डालती दादी चुप.
ढिबरे में तेल के साथ लंबी सांस भरती हुई बोली
संझवत में जब सूरज साथ छोड़ जाता है तब
ये तेल की ढिबरी सांस बन जाती है
जीने के लिए, अंधेरे से लड़ने के लिए भरनी पड़ती है.

दादी की कोठरी वाली वो ढिबरी
दिखती तो अब भी है- उसी तरह झिलमिलाती हुई
जब छाते हैं बादल और इनके बीच घिर जाता है सूरज
लगता है भरे दीन में ही डूबने लगा
संझवत से पहले ही ऐसे छिपने लगा
तब किस आस की ढिबरी जलाएं?
जब आस ही खुद जलने लगे
तो सांस कहां से लाएं?
दादी होती तो कोई तरकीब जरूर बताती!

…ये तो हुई टीले की बात. अगर पूछेंगे, तो ये है कहां- तो मैं दिल्ली से ही रास्ता बता दूं- दिल्ली से पटना के लिए ट्रेन, पटना से 60 किलोमीटर पहले आरा स्टेशन पर उतर जाइए. 1857 के योद्धा बाबू बीर कुंवर सिंह का शहर है. शहर में उनका बसाया धरमन और करमन टोला है. कहते हैं धरमन और करमन उनकी प्रेमिकाओं के नाम है. प्रेमिका सिर्फ देह की नहीं, बल्कि रूह की, हौसले की और उस विद्रोह में जान की परवाह न करते हुए आखिरी सांस तक साथ निभाने की. आरा में ऐसी कई निशानियां है उस बीर बांकुड़े की. एक महाराजा कॉलेज है, जहां से हमने कॉलेज की पूरी पढ़ाई की. वहां एक स्मृति स्थल है- उसके बीच में कुआं है, जिसके बारे में कहा जाता था- वो कुंवर सिंह की गुप्त सुरंग का एक सिरा है. इसका दूसरा सिरा कुंवर सिंह की जन्मस्थली जगदीशपुर में खुलती है. कुंवर सिंह इसी सुरंग के जरिए आते जाते थे और अंग्रेजों को चकमा देते थे…
शहर ऐतिहासिक है और हमारा टीला इससे 45 किमी दूर, जिसका कोई ज्ञात इतिहास नहीं है. यहां जाने के लिए आरा के बस स्टेंड से आपको पीरो या फतेहपुर कुरमुरी के लिए सीधी बस मिलती है. डेढ़ दो घंटे लगते हैं हमारे टीले तक पहुंचने में- टीला जो अब टोला बन गया है- बघड़ा टोला
अब ये गूगल मैप पर भी मार्क हो गया है. टोले का नाम एक जनजाति पर पड़ा है, जो दो ढाई सौ साल पहले यहां रहते थे. पुराने बुजुर्ग बताते हैं बघड़िया कहा जाता था उन्हें।


कोई नहीं जानता, कौन थे बघड़िए. कहां से आए थे, कहां चले गए…
जितनी जुबान, उतनी कहानियां हैं बस. कुछ मैंने भी सुनी थी बचपन में. तब ये ढीबर कहा जाता था. टोले के पूरबी हिस्से में एक फुटबॉल मैदान जितना बड़ा खाली हिस्सा. पूरे मैदान में, चारों तरफ बिखरे हुए खपरैल घरों के निशान. छोटे छोटे झिटके। ढीबर के किसी किसी कोने में पठार जैसा उभार भी था. उस पर अब दूब घास जम चुकी थी. जानवरों का चारागाह बन चुका था और बच्चों के लिए मलमली ढलान, जिस पर से कूदने-फिसलने का आनंद ही कुछ और ही हुआ करता था….
सब कहते थे ये टीला बघड़ियों का घर हुआ करता था. लेकिन वो कहां गए, कैसे टूटा उनका मकान, इस बात का जवाब कोई नहीं दे पाता था…
हम बचपन में चुना करते थे उसमें से से कुछ अजीब अजीब से आकार वाले टुकड़े. लगता था- जैसे किसी का मकान टूटा हो अभी. खपरैल छत के सारे नरिया-खपड़े चकनाचूर हो गए हों…कोई आंधी तूफान आया होगा, या फिर कोई महामारी फैली होगी. वर्ना, ऐसे भी कोई जाता है क्या, बिना अपना इतिहास, अपनी कहानी अनकही छोड़कर…
मैंने बहुत खोजा, गूगल सर्च किया. कुछ नहीं मिला बघड़ियों के नाम पर. लगता है मैंने ही शायद देर कर दी, अपने पुरखों से वो सबकुछ जानने की, जिसे उन्होंने जुबानी तौर पर सुना तो जरूर होगा…
इसलिए आज भी लौट जाता हूं कई बार उस ढीबर पर. उस टीले पर, जहां से फिसला करते थे, जिसके सपाट मैदान में फुटबॉल और क्रिकेट खेला करते थे. याद वो जाती नहीं कभी. क्योंकि पहेली उसकी कभी सुलझी नहीं. कौन थे वो लोग, जो मौजूदा गांव से दो-तीन मील दूर एक ऐसी जगह बस गए थे, जहां से देखने पर क्षितिज के सिवा कुछ और नहीं दिखता- दूसरी सभ्यता के कोई नाम ओ निशान तक नहीं. दिल्ली में 23 साल से रहते हुए भी उस ख्याल को आज तक मार नहीं पाया, न उस वक्त को भुला पाया, जब बघड़ियों के टीले पर खपड़े के टुकड़े चुनते हुए बाल मन में जाने एक सवाल किसी अचंभे की तरह उभरता था- कैसे होंगे बघड़िये, कैसा होगा बघड़ियों का घर, कैसे होंगे मकान और….
ये सबकुछ याद कर रहा हूं, तो आप अंदाजा लगा सकते हैं ये 8-10 साल के बालक की कौतुहल होगी. मतलब 1980 का दशक….
इमरजेंसी खत्म हो चुकी थी. ‘खाई गई राशन पी गई तेल’ वाला नारा आज भी जब कभी पढ़ता हूं, तो लगता है, मैंने कहीं सुना तो था इसे. बाद में जाना इसे इंदिरा गांधी के बारे में कहा जाता था. इंदिरा गांधी और फूलन देवी- ये दो नाम बचपन में रोएं सिहरा देते थे. डर था या इनके बारे में जानने की उत्सुकता, नहीं कह सकता. मगर इनकी कहानियां सुनते हुए कुछ तो होता था किशोर होते मन में. इंदिरा गांधी देवी की तरह पूजी जाती थीं और फूलन देवी उस दौर की विद्रोहिणी के तौर पर पेश की जाती थीं. मगर दोनों औरतों में एक बात आम थी- हमारे टोले की औरतें तो कुंए पर पानी भरने भी सास-ससुर-पति से पूछ कर जाती हैं, ये कैसी औरते हैं, जो देश को बदलने की कोशिश करती हैं- बालमन की ये उत्सुकता सहज ही थी….

मगर पूछते किससे?
तब बड़े भी ऐसे कहां हुआ करते थे, जो बच्चों के ऐसे सवालों के जवाब दे सके. अव्वल तो परंपरा ये थी कि कोई अपने बच्चों से बात नहीं करता था. खेलने के लिए, ख्याल रखने के लिए चाचा थे, बुआएं थी, दादी थीं, पिता तो अपने बच्चों को गोद में उठाने से भी शरमा जाया करते थे. एक बाबा थे- जब सबको प्यार करते थे. सबको गोद में उठाकर, नाती पोतों का झुंड लगाकर बात किया करते थे. लेकिन वो आते भी हफ्ते में एक दिन थे….
अगर मैं परिचय दूं, तो कह सकता हूं- मेरे बाबा, राम सरीखा सिंह, प्राइमरी टीचर, अंग्रेजों के जमाने के पहले नौकरीपेशा थे पूरे टोले में…
और मैं उनका बड़ा पोता- विनोद कुमार सिंह. आज जब अपने गांव को याद करने बैठा हूं, तो सबसे पहले बाबा ही याद आ रहे हैं. उन्होंने ही कुछ कोशिश की थी, मेरी कुछ उत्सुकताओं का जवाब देने की. लेकिन उससे पहले कुछ बातें बाबा की…
बाबा अपना जन्मदिन 1922-23 का बताते थे. एक बार महात्मा गांधी को देखने का मौका मिला था उन्हें, ये भी बड़े गर्व से बताते थे. उस दर्शन के आधार पर वो गांधी का पूरा स्केच मेरे सामने खींच दिया करते थे. शिक्षक थे, उनमें इतनी योग्यता तो थी ही- ये आज मैं समझ सकता हूं…
और शिक्षक बनने की कहानी भी कम दिलचस्प थोड़े थी उनकी. ये कहानी मुझे उन्होंने 1983-84 के साल बताई होगी. तब वो भोजपुर जिले के नगरी गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ा रहे थे. बघड़ियों के टोला से करीब 3-4 कोस दूर. हर रविवार को घर आया करते थे. पहले तो पैदल ही खेतों के रास्ते आया जाया करते थे, लेकिन तब बस-जीप चलने लगी थे. मेरे गांव तक कच्ची सड़क बन गई थी. इस बार गांव आए, तो जाने क्या सूझा मुझे भी साथ ले गए. तब मेरी उम्र 12-13 साल की रही होगी.


बाबा का ये रूप मैं पहली बार देख रहा था. गांव में तो वो मलीन धोती-गंजी में दिन भर काम मे जुटे रहते थे, स्कूल में चकाचक सफेद धोती- कुर्ते और नीलहा गमछे के साथ अलग ही लग रहे थे. स्कूल और आस पास के पूरे गांव में बहुत सम्मानित भी थे. लोग स्कूल के बाद भी उनसे मिलने जुलने आते. बाबा उनसे बातचीत के बीच खाना बनाते- अरहर की दाल, उसमें घी का छौंक, आलू प्याज टमाटर का चोखा और अरवा चावल का भात. लिट्टी चोखा के भी खूब शौकीन थे. किसी ने रहने के लिए घर दे दिया था- उसी में उनका पूरा संसार बसता था…
बाबा को अपने संसार में वैसे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए था. घर के आगे की क्यारियों में कुछ गेंदे के फूल, एक रात रातरानी की गांछ और एक नींबू का पेड़… इतनी ही याद आता है- इनका नाम लेते ही इनकी महक आज भी नथुनों में भर जाती है. इनसे लगाव ऐसा, जैसे लगता है बाबा इन सबसे बतियाया करते थे. स्कूल जाने से पहले सबको पानी-पटवन और उसके बाद स्नान ध्यान…
और इस बार तो मैं भी था, लिहाजा मुझे नहलाना धुलाना और खुद से पहले मेरी थाली में सबकुछ परोस कर मेरे आगे करना. बाबा का प्यार मुझे आज भी पहेली की तरह लगता है…
तब तक शिक्षक तो मेरे परिवार में और भी कई सारे बन चुके थे. मेरी मां मिडिल स्कूल में पढ़ाती थी. बीच वाले चाचा की नौकरी भी स्कूल में लग गई थी. उनसे जिनका विवाह हुआ, वो भी कुछ दिनों बाद टीचर बन गई. लेकिन बाबा का कद शिक्षक होने से कहीं ज्यादा का लगता था. लिहाजा एक दिन पूछ लिया- बाबा आप शिक्षक कैसे बने…?
बाबा इस सवाल पर देर तक चुप बैठे रहे. कुछ देर बाद खाट से उठ खड़े हुए और सूख रहे प्याज के खेतों की तरफ चल पड़े. बाबा का यही पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था. गर्मी शुरु होने के साथ ही उनकी खाट खेत में लगनी शुरु हो जाती थी. घर के पीछे दो कठ्ठा खेत हुआ करता था, जिसे डीह बोलते थे. उसमें हर मौसम की साग सब्जियां लगती थी. गर्मी के दिन में बस प्याज बच जाता था. उसके साथ लौकी, तोरई, करैला, भिंडी, बोदी जैसी सब्जियां अंकुरित हो रही होती थी. बाबा की खाट इनके बीच ही लगती थी. रात चाहे अंधेरी हो, या फिर अंजोरा. बाबा की रात शिव शिव, हरे राम, हरे कृष्ण जैसे जाप के साथ कटती थी. रिटायर होने के बाद उन्होंने डीहर के कोने में ही एक कोठरी बनवा ली थी. आंधी बारिश में यही उनका ठिकाना होता था.
ये गजब बैराग था. तीन बेटे और तीन बेटियों के पिता रिटायर होते होते ऐसे विरक्त हो चुके थे. बाबा के इसी वैराग पर एक ख्याल मैंने कविता की शक्ल में दर्ज किया था-
मैं भी कभी रक्त था
अब मैं विरक्त हूं!

खैर, बाबा कुछ देर की चहलकदमी के बाद रुके. चांदनी रात को निहारते हुए, लंबी सांस भरते हुए उन्होंने कंधे पर हाथ रखा और फिर खाट पर बैठ गए…
बबुन, शिक्षक बनना तो संयोग था कह लो. वर्ना इस टोले का आदमी और टीचर. आज भी सोचता हूं तो असंभव लगता है…
बाबा ने ये सब कुछ अपनी मातृभाषा भोजपुरी में बताया था. उसे में पाठकों की सुविधा के लिए हिंदी में कर रहा हूं…
उन्होंने पूरब दिशा की तरफ इशारा करते हुए बोला- वो गांव देख रहे हो न- कुरमुरी. मैंने हां में हां मिलाई- कई बार गया हूं. पंचायत और ब्लॉक के काम से. बड़ा गांव है. दस हजार की आबादी तभी थी. पूरे पंचायत में ढाई हजार बीघे का जोत (जमीन) था, जिसमें से 2 हजार बीघा एक ही परिवार का था. पुराने जमींदार हैं. आज उनके परिवार में एक दो लोग ही रहते हैं. बाकी सब लोग बड़े बड़े पदों पर हैं. कोई रिजर्व बैंक में, कोई आईएएस अफसर, कोई अमेरिका में, कोई यूरोप में. लेकिन आज भी जो लोग हैं उनके ठाठ जमींदारों वाले ही हैं. जिनके पास 10-20-50-100 बीघा जमीन है, उनके भी रौब ऐसे ही हैं. उनके लड़के भी स्कूल में उसी रौब के साथ आते थे. खैर, ये तो 1990 के दशक का वर्तमान था. बाबा हमें इस परिचय के साथ फ्लैश बैक में ले जा रहे थे…
70-80 बरस पहले मेरा भी जन्म उसी गांव में हुआ था. हम लोग गांव के पश्चिमी हिस्से में एक बेहद ही तंग गली में रहते थे. छोटे छोटे घर थे. एक घर में हम लोग 10 12 लोग. जमीन अपने पास कोई नहीं थी. बड़े लोगों की जमीन जोतते थे, उसी से खाते थे. उसके बदले पूरे साल उनकी सेवा करते थे. उनके सामने खाट पर बैठना तो दूर, खड़ा भी दस गज दूर ही होना पड़ता था…


गांव के हर परिवार को इसी रिवाज का पालन करना होता था. लेकिन मेरे बाबा को इससे दिक्कत होती थी. वो खेती के लिए जमीन मांगने भी नहीं जाते थे. पहलवान आदमी थे. अपने ही रौब में रहते थे- नाम था फौदार सिंह…
फौदार सिंह के पिता जी भी पहलवान थे- चंभित सिंह. इनके किस्से काफी मशहूर थे. नाम भी था, इसके बदले थोड़ी इज्जत भी. वो सबकुछ निभाकर चलते थे. बड़े लोगों के घर आना जाना, मनी (किराये) पर जमीन लेना, फसल पहुंचाना सब वही करते थे. शादी ब्याह में काम धंथे के लिए भी वो बुलाए जाते ते…
चंभित सिंह जब असक्त हो चले थे. तो ये सबकुछ फौदार सिंह को ही करना था. पहलवान वो भी थे. कई अखाड़े वो भी जीते थे. लेकिन बड़े छोटे के बीच भेद भाव वाली बात उन्हें खटकती थी. फौदार सिंह अपने पिता की अकेली संतान थे. उनके पांच बेटे हुए-
योगी सिंह, कुलपत सिंह, रामाशीष सिंह, धनपत सिंह, और राम परीखा सिंह.
बाबा कहते थे- जैसे ये पांच पांडव थे. योगी सिंह, जो मेरे बाबा के पिता थे- वो बिलकुल नाम की तरह युधिष्ठिर. इसी तरह कुलपत और रामाशीष सिंह भैंस पालन और खेती बाड़ी में माहिर. धनपत सिंह भीम की तरह पहलवान. उनकी लाठी बंसवार के सबसे मोटे बांस की बनती थी. 7 फीट लंबे थे और उनकी लाठी दस फीट की होती थी. जोर से आवाज लेकर जब किसी को बुलाते थे, तो लगता था बाघ गरज रहा है. अकेले पूरे बधार की रखवाली कर देते थे. एक बार एक सांढ को इतना दौड़ाया था, कि हांफ कर मर गया. दूसरे ने एक बार सींग मारने की कोशिश की, तो उनके एक मुक्के से ही मर गया था सांड. ऐसे तमाम किस्से मशहूर थे धनपत सिंह के. और सबसे छोटे राम परीखा सिंह बिलकुल नकुल सहदेव की तरह थे. कद काठी से ये भी पहलवान लेकिन बिलकुल सीधे.
गांव में विवाद की शुरुआत हुई कुलपत सिंह के जरिए. पहलवान वो भी थे, लेकिन खेती बाड़ी में मस्त रहते थे. भैंस चराना, उनका दूध निकालना उनकी जिम्मेदारी थी. लेकिन गांव के लालाजी की नजर उन पर पड़ गई. लालाजी के पास जमीन तो जमींदार लोगों से कम थी, लेकिन पैसा बहुत था. उसके घर में दो दो बेटियां थी. बहुत ही सुंदर. मतलब समझो इतनी सुकुमार कि सींक से छू दो तो खून निकल आए. उन दोनों लड़कियों को लालाजी घर से नहीं निकलने देते थे. तब चलन भी नहीं था. 13-14 की उम्र के बाद लड़कियों को घर के अंदर ही रखते थे. लेकिन लालाजी की परेशानी कुछ और थी. गांव के कुछ दबंग लड़कियों पर बुरी नजर रखते थे. उन्हें इंतजार रहता, कि कब लाला व्यापार के लिए घर से बाहर जाए. लालाजी ये बात समझ चुके थे. वो कहीं बाहर आते जाते नहीं थे. इस वजह से धंधे में नुकसान भी हो रहा था. दबंग नौजवान उनके घर में ढेला भी फेंकने लगे थे. एक दिन लाला जी ने अपनी ये परेशानी फौदार बाबा को बताई…
लाला जी ने कहा, आपका मझला बेटा बड़ा सीधा शांत है, और कद काठी से मजबूत भी. इसे मेरे यहां लगा दो फौदार. जितना नुकसान हो रहा है, उसका आधा भी दे दूंगा इसे, तो तुम्हारा पूरा परिवार इतने में खा पी लेगा…


फौदार बाबा ने कहा- अरे इस बात के लिए हम पैसे थोड़े लेंगे. रहने दीजिए लाला जी. लड़के पर भरोसा है, तो ले जाइए, ये आपकी मदद कर देगा. ये सुनकर कुलपत बाबा को गुस्सा आया. उन्होंने कहा ठीक है मै रहूंगा आपके घर आज से. देखता हूं, किसकी हिम्मत है…
कुलपत बाबा लाला जी के घर पहरा देने लगे. इसके बदले लाला जी ने 12 बीघे खेत जोतने के लिए दिए थे. कुलपत बाबा ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली. लाला जी निश्चिंत होते गए. काम धंधा उनका चल निकला. कुलपत बाबा के डर से किसी की क्या मजाल, कि ढेला फेंकना तो दूर, कोई उनके घर की तरफ नजर उठाकर भी देख सके…
लाला जी तो निश्चिंत हो गए, लेकिन गांव के दबंग लोग अपने परिवार के दुश्मन होते गए. फौदार बाबा उन्हें वैसे ही भाव नहीं देते थे, कुलपत सिंह की पहरेदारी के बाद गांव में रहना मुश्किल हो गया. कई तरह के प्रतिबंध लगा दिया. जोतने को कोई खेत नहीं. कई गलियों से निकलने पर भी पाबंदी…
एक दिन फौदार बाबा ने फैसला कर लिया इस गांव में नहीं रहना. हफ्ते दस दिन के अंदर ही वो अपने पांचों बेटों को लेकर इसी बघड़िया टीले पर चले आए. पूरे इलाके में यही एक ऐसी जगह थी, जो ऊंची थी, बिना माटी भराए हुए मड़ई लगाकर भी रह सकते थे. जानवर वगैरह चराने के लिए पूरी जगह थी. फौदार बाबा पूरे परिवार और माल मवेशियों के साथ चले आए. वहां का घर बेच दिया. उस पैसे से यहां मिट्टी-खप्पर का घर बनाया. कुछ मदद लाला जी ने भी की. उन्होनें अपनी दोनों बेटियों की शादी जल्दी कर दी. वो किस्सा वहीं खत्म हो गया…
कमश:जारी..

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