ददिहाल के गांव बड़ौत से ज्यादा…ननिहाल के गांव पुरकाजी से रहा है नाता

निशि सिंह

म सभी की जड़ें गांव से जुड़ी हैं। व्यक्ति उम्र के किसी भी पड़ाव पर पहुंच जाये, सफलता की कितनी भी सीढ़ियां चढ़ लें लेकिन जब यादों का पिटारा खोलता है,  तमाम खिड़की, दरवाजों,झिर्रियों के पार बचपन के वो अनमोल क्षण कुछ चुहल,कुछ बदमाशियां, कुछ सखी-कुछ सहेलियां सामने आ खड़े होते हैं। स्वाभाविक है आपका मन वर्षों पीछे चला जाता है और आप यादों में गोते लगाने लगते हैं।

 इस मौके पर ठहर कर मैं निदा फाजली का यह शेर जरूर गुनगुनाना चाहूंगी,

‘‘नैनों में था रास्ता हृदय में था गॉंव, हुई न पूरी यात्रा छलनी हो गये पॉंव।’’

कुल मिलाकर भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांवों की स्थिति आज कमोबेश वैसी ही है। कथित तरक्की के इस दौर में गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं और शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है। पर बात जब भी सुकून और खुशहाली की आती है तो लोग आज भी गांवों को याद करते हैं।

 

 

मेरी जड़ें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़ी हैं। मेरे पिता वीरेंदर सिंह, सेवानिवृत आईएएस अधिकारी, उत्तर प्रदेश कैडर बड़ौत(मेरठ) से हैं। उनकी शिक्षा दीक्षा मेरठ में हुई और वे कॉलेज के गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। अपनी लगन और परिश्रम के बल पर वे भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हुए। पिता के नौकरी पेशा होने के कारण मेरी स्कूली शिक्षा उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों में हुई। मेरी मां कस्बा पुरकाजी (जिला मुजफ्फर नगर) से हैं लेकिन उनकी उच्च शिक्षा रूड़की में हुई। तो आपको लिए चलती हूं अपने ननिहाल के गांव पुरकाजी में क्योंकि ददिहाल की याद मुझे नहीं।  मेरे दादा-दादी मेरे जन्म से ही हमारे साथ ही रहे। जब मैं छोटी थी तो उनका देहांत हो गया था। वैसे तो मैं अपने नानी गांव को कभी नहीं भूलती या यूं कहूं तो गांव हमारे साथ ही चलता है, हमारे बोली में, भाषा में, चिंतन में, हमारे खान-पान में, हमारे परिवेश में। क्योंकि किसी भी व्यक्ति का लोक संस्कृति, लोक कला और लोक परम्परायें, अपनी मिट्टी से व्यक्ति का प्रथम परिचय गांव में ही होता है। तो वो गांव भला भूलाया कैसे जा सकता है। 

ऐसे में जब मैं अपने बचपन के गांव को याद करती हूं तो याद आता है  नानी के ऑंचल और नीम की ठंडी छांव में रचा बसा वो बचपन। याद आता है ननिहाल के विशाल प्रांगण में स्थित सरस, नीम, इमली, पीपल के घने पेड़ आंगन में तुलसी का बिरवा, नानी की रसोई, आंगन के एक कोने में बंधे पशु, गाय, भैंस, बैल। दूध—दही मक्खन की प्रचुरता। याद आता है नानी जी का मट्ठा(छाछ) को बिलौने में बिलोकर शुद्ध मक्खन निकालना और याद आते हैं खेत खलिहान कमल के फूलों से भरे तालाब (ज्यादातर तालाब अब सूख गये हैं) और गांव के अनेक किरदार जिनका मेरे बाल्यकाल की स्मृतियों में विशेष स्थान है।

यदि पुरकाजी के भौगोलिक बनावट व बुनावट की बात की जाये तो पुरकाजी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले में स्थित नगर पंचायत है। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरकाजी की आबादी 27000 थी जो अब 45000 के आस-पास है। यह दिल्ली देहरादून हाईवे, एन एच 58 पर स्थित है। दिल्ली से 150 कि.मी. की दूरी पर है। यहां सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।

मेरे नाना जी स्वर्गीय बलजीत सिंह कस्बे के जाने माने और प्रतिष्ठित व्यक्ति थे आज भी गांव के लोग उनका नाम बड़े आदर व श्रृद्धा से लेते हैं। वे एक प्रगतिशील विचारों के व्यक्ति थे और महिलाओं की उच्च शिक्षा के भी पक्षधर थे जिसके कारण मेरी मां और मौसी की शिक्षा एम.ए. तक हुई। उत्तर प्रदेश के इस ईलाके की पहचान बाकी बातों के साथ ही मुख्य रूप से अपनी उपजाऊ मिट्टी, गेहूं और गन्ने की पैदावार के कारण।

नानाजी की कई बीघे जमीन थी जिस पर मुख्यतः गन्ने और गेहूं की पैदावार होती थी। खेती का काम खेतीहर मजदूर किया करते थे।  मेरे नाना की समाधि उनके खेतों के बीच स्थित है। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी कुछ अस्थियां खेतों में बिखरा दी जाएं जिससे उनकी आत्मा जमीन और उनके खेत खलियानों से जुड़ी रहें। मुझे आज भी याद है जब मैं छोटी थी तब नानी के साथ अकसर खेतों में जाया करती थी। नानी मजदूरों का विशेष ख्याल रखती थीं और उनका खाना घर से ही बनकर जाता था। मेरे नाना सरकारी नौकरी में थे इसलिए खेती-बाड़ी की देखभाल का जिम्मा नानी का था। मेरी मां 6 भाई बहन थे। उनकी देखभाल और खेती की देखरेख का दायित्व का निर्वहन नानी बखूबी निभाती थी।

मैंने उनके जैसी कर्मठ और जुझारू महिलाएं बहुत कम देखी हैं।  उत्तर प्रदेश में गन्ने की सर्वाधिक फसल इसी क्षेत्र में उगाई जाती है। यहां किसानों से जुड़ा मुख्य काम गुड़ और चीनी बनाना है। इसलिए इस क्षेत्र में बहुत से कोल्हू और थ्रेसर हैं। एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मण्डी मुजफ्फर नगर में है। इसके साथ गांव से कस्बे का आकार लिए पुरकाजी की अन्य विशेषताओं की बात करूं तो इसकी सबसे बड़ी खूबी  गंगा-जमुनी तहजीब, यहां की साझी संस्कृति है। इस क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल दी जाती है। दोनों समुदाय सौहार्द और आपसी प्रेम के साथ रहते हैं। मेरी नानी बताया करती थी कि जब बंटवारा हुआ तो बहुत से मुस्लिम परिवारों को नानाजी ने अपने घर में शरण दी थी। उनके खाने-पीने रहने की व्यवस्था उन्होंने तब तक की जब तक कोई दूसरी व्यवस्था नहीं हुई। अन्य हिन्दू परिवारों ने भी उनकी सहायता की। बंटवारे के भीषण पीड़ा के बीच जो हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल कायम की गई थी वो आज तक बनी हुई है। दंगों के समय जब पूरा हिन्दुस्तान नफरत की आग में जल रहा था तब पुरकाजी के हिन्दू-मुस्लिम परिवारों ने मुट्ठी में नमक लेकर प्रतिज्ञा की थी कि चाहे देशभर में कहीं भी दंगा फसाद हो उसकी आंच पुरकाजी तक नहीं आने देंगे और आज तक वहां के हिन्दू-मुस्लिम उसी प्रतिज्ञा से प्रतिबद्ध हैं। बातचीत के दौरान मां अक्सर कहा करती थीं कि  उनकी शादी में नानाजी के बहुत से मुस्लिम मित्रों ने घर के अन्य रिश्तेदारों की तरह ही फर्ज निभाया था। ईद हो या दिवाली सारे त्योहार सब मिलकर मनाते हैं। आज के साम्प्रदायिकता से भरे माहौल में ये सब बातें कल्पना सी लगती हैं, मगर हकीकत है। कितनी ही बार मुजफ्फर नगर और मेरठ साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलसे परन्तु कभी भी उसकी आंच पुरकाजी तक नहीं पहुॅंची। पुरकाजी मुस्लिम बहुल कस्बा है। इसके अलावा यहां हिन्दू धर्म की लगभग सभी जातियां रहती हैं। 

पुरकाजी की अधिकांश स्मृतियां मेरे बाल्यकाल से जुड़ी हैं। जब स्कूल में गर्मियों की छुट्टियां हो जाया करती थीं। तब हम ननिहाल जाने की बेसब्री से प्रतीक्षा करते थे। मेरे नानाजी हमारे आने से पहले ही रूड़की (पुरकाजी से मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर है) से बहुत-सा खाने पीने का सामान (बेकरी आईटम्स) चॉकलेट, कॉफी आदि लाकर रख देते थे। उस समय पुरकाजी का बाजार अधिक विकसित नहीं हुआ करता था। बस जरूरत भर का सामान ही मिलता था। नानी मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया करती थीं जिसका स्वाद ही अलग होता था। दालें,अनाज सब खेतों से ही आता था। गेहूं को घर पर ही सुखाकर पीसा जाता था। ध्यान देने योग्य बात यह है कि नानाजी जैविक खेती पर ज्यादा जोर देते थे। मेरे कक्षा 8 तक आते-आते नानी की रसोई का स्वरूप बदल रहा था। बिलौने और सिलबट्टे की जगह मिक्सी ने ले ली थी। चक्की की जगह आटा मशीन ने ले ली थी। लेकिन खाने की शुद्धता कायम थी। नाना के खेत के अलावा उनके आम, अमरूद और जामुन के बाग भी थे। हम अक्सर बाग में जाकर अमरूद तोड़ते थे। पुरकाजी के अमरूद बहुत मीठे होते हैं। मेरे नाना ने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए रूड़की में एक मकान बनवाया मेरी मां और उनके बाकी भाई-बहनों की उच्च शिक्षा रूड़की में ही हुई।

रूड़की, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। मेरे मामा बारहवीं के बाद पहले ही प्रयास में इंजीनियरिंग कॉलेज रूड़की में चुन लिए गये। दूसरे मेडिकल तथा तीसरे वकालत करने लगे। मेरे सभी मामा उच्च पदों पर आसीन हैं। साफ जाहिर है कि एक छोटे से कस्बे से निकलकर नानाजी ने जिस लगन से अपने बच्चों को शिक्षा दिलाई वह वाकई प्रेरणादायक है। उनके दोनों दामाद भी प्रशासनिक अधिकारी रहे। ये सफलतायें हमें सीख देती हैं कि विशेष रूप से उन युवाओं को जो युवा शार्टकट से आगे बढ़ना चाहते हैं परन्तु वास्तविकता यह है कि आदमी अपनी मेहनत और लगन के बल पर क्या कुछ हासिल नहीं कर सकता? 

 

लोककला, लोक संगीत, ग्रामीण रीति-रिवाज ग्राम्य संस्कृति की ए अनमोल धरोहर है जिसे सहेज कर रखना बहुत जरूरी है। सही मायने में यही अनमोल धरोहर आम जन  के जीवन और समाज की आईना होती हैं।   मां बताती हैं कि शादी ब्याह के शुभ अवसरों पर गांव की औरतें आंगन में एकत्रित होकर ढोलक की थाप पर लोकगीत गाया करती थीं तथा रतजगा हुआ करता था। कुछ महिलाएं इतनी सुरीली थीं कि यदि उन्हें सही मौका मिलता तो वे लोक गायिकाएं होतीं। अब रतजगों और लोकगीतों की जगह डीजे ने ले ली। डीजे के इस दौर में संगीत का शोर तो सुनाई देता है पर वो मधुरता नहीं।

गर्मियों के दिनों में हम अक्सर छत पर बिछी चारपाईयों पर लेट जाया करते थे और आसमान में टिमटिमाते तारों को देखा करते थे। कहां शीतल बयार, धवल चांदनी और तारों से सजा आकाश का आंचल और कहां शहर में एसी की कृत्रिम हवा और धुंधला आकाश, मन में एक कसक सी उठती है।  ग्राम्य समाज में हर कुल का एक कुल देवता होता है जिसके छोटे-छोटे मंदिर खेतों में होते हैं। नव-वधु के आगमन पर उसे कुल देवता से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ले जाया जाता था। मुझे याद है कि मेरी मामियों के आने पर उन्हें आशीर्वाद प्राप्ति के लिए वहां ले जाया गया था। 

पुरकाजी का ‘छड़ का मेला’ भी बहुत प्रसिद्ध है। यह मेला जाहरवीर गोगाजी की स्मृति में लगाया जाता है। गोगाजी का जन्म चुरू चौहान वंश के शासक जेवर सिंह की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। इस मेले को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। लोकनृत्य, नृत्य नाटिका का चलन अस्सी के दशक तक पुरकाजी में रहा। इसमें ‘भांड़’ और नौटंकी प्रमुख थे। ‘भांड़’ उत्तर भारत के पारंपरिक समाजों में लोक-मनोरंजन करने वाले लोगों को कहा जाता है, जो समय के साथ-साथ एक भिन्न जाति बन गई। भांड़ों द्वारा प्रदर्शन को कहीं-कहीं स्वांग भी कहा जाता है। भांड़ों में नाचने-गाने, नाटक रचाने, मसखरे, कहानीकार, नक्काल सभी शामिल हुआ करते थे। यह कला विद्या अब लुप्त हो गई है। 

बहुत से लोकगीत आज भी प्रचलन में हैं पर लोक नृत्य और अन्य लोक कलाएं संरक्षण और संरक्षकों के अभाव में दम तोड़ रही हैं। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। गॉंव में शिशु जन्मोत्सव के अवसर पर ‘सौहर’ गाया जाता था जिसमें मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हुआ करती थीं।  इसके अतिरिक्त होलिका दहन का भी विशेष महत्व था। गांव की औरतें नई फसल और ऊपले (गोबर से बने) होलिका मां को समर्पित किया करती थीं। ऊपलों को ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था। शुभ कार्यों पर घर आंगन को गोबर से लीपा जाता था। पहले मकान अधिकतर कच्चे हुआ करते थे। अब लगभग सभी मकान पक्के हो गये हैं। अतः गोबर से लीपना अब समाप्त हो गया और चूल्हों की जगह अब गैस ने ले ली। अस्सी के दशक के शुरूआती दिनों में ही बहुत से घरों में बिजली आ गई थी पर ज्यादातर गुल ही रहती थी। वर्तमान में बिजली की स्थिति पहले से बेहतर हुई है अधिकांश समय बिजली रहती है ‘18 से 20 घण्टे’।

‘‘सब में है राम, सबके हैं राम’’ इसका जीता-जागता उदाहरण यदि देखना हो तो पुरकाजी की रामलीला का भव्य आयोजन में देखा जा सकता है। इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है।  नगर पंचायत अध्यक्ष जाहीर फारूकी ने मुझे बताया कि 2019 में रामलीला में अच्छी व्यवस्था होने पर रामलीला कमेटी ने उन्हें कुरान भेंट की थी। हरिद्वार नजदीक होने के कारण बहुत अधिक संख्या में कांवड़िये यहां से गुजरते हैं। कांवड़ियों के लिए की गई व्यवस्था में भी हिन्दू-मुस्लिम एकता व भाईचारे की झलक मिलती है। बहुत से मुस्लिम परिवार भी कांवड़ियों की सेवा की व्यवस्था करते हैं। पिछले दो सालों से नगर पंचायत पुरकाजी कांवड़ियों के लिए विशेष व्यवस्था करती आ रही है। कौमी एकता और भाईचारे में सिख समुदाय भी पीछे नहीं। ग्रामीण बताते हैं कि पुरकाजी में रह रहे एक मात्र सिख परिवार ने पुरकाजी में मस्जिद के निर्माण हेतु अपनी 100 गज जमीन दान की। इस सिख परिवार के मुखिया सुखपाल सिंह ने अपनी जमीन के कागज नगर पंचायत अध्यक्ष  ज़ाहीर फारूकी को सौंपे। इतना ही नहीं 23 मार्च को शहीद दिवस पर बहुत बड़े स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन पुरकाजी में होता है। साथ ही पुरकाजी में हर साल 23 मार्च, 26 जनवरी, 15 अगस्त बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन दिनों पुरकाजी का ‘सूलीवाला बाग’ विशेष रूप से पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

सूलीवाला बाग की ऐतिहासिक महत्ता के पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है। 1857 की क्रांति के समय ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी जो रूड़की की ओर से आ रही थी, पुरकाजी के निकट आते ही क्रांतिकारियों द्वारा उस पर हमला हुआ। इस हमले के बाद ब्रिटिश सरकार ने पुरकाजी मेरठ, शामली, सरधना से लगभग पांच सौ भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को पकड़ा और इसी बाग में फांसी पर लटका दिया तब से इस बाग को सूलीवाला बाग के नाम से जाना जाने लगा।

यह जगह सालों से उपेक्षित पड़ी हुई थी। मुझे याद है जब हम छोटे हुआ करते थे तब यहां एक बाग और कचरे के ढेर के अलावा कुछ नहीं था। कुछ पढ़े-लिखे लोगों और नगर पंचायत ने सरकार से यहां शहीद स्मारक बनाने की अपील की। 2016 में 15 अगस्त के अवसर पर यहां पहली बार झण्डारोहण हुआ। उस वर्ष से लगातार शहीदी दिवस, 15 अगस्त और 26 जनवरी को झण्डा फहराया जाता है और देशभक्ति के कार्यक्रम आयोजित होते हैं। जिसमें आम आदमी से लेकर खास सभी वर्गों और समुदायों के लोग शामिल होते हैं। अब नगर पंचायत ने इस जगह को साफ-सुथरा करके एक पार्क बना दिया है। इसे ऐतिहासिक धरोहर और राष्ट्रीय स्मारक बनाने की मुहिम एक बार फिर जोर पकड़ रही है। पिछले साल नगर पंचायत अध्यक्ष के नेतृत्व में हजारों लोगों ने तिरंगा यात्रा में भाग लिया।  पुरकाजी में सेना का सीईटीसी ट्रेनिंग सेंटर है व बहुत बड़ा मिलिट्री ग्रांउड  भी है।अपने बाल्यकाल से लेकर किशोरावस्था तक मैंने पुरकाजी में अनेक बदलाव देखे। विवाह के पश्चात् भी मैं एक दो बार पुरकाजी गई और वहां के स्थानीय लोगों से मिली। नानी के वहां नहीं रहने से थोड़ा आना जाना कम हुआ।  नानी अब मेरे मामा के घर दिल्ली आकर रहने लगीं क्योंकि अब वे बूढ़ी हो चली थीं।  1994 में नानाजी का स्वर्गवास हो गया था। दिल्ली में आने के बाद भी नानी का मन और हृदय पुरकाजी में ही बसा रहा। 2013 में उनके स्वर्गवास के बाद पुरकाजी से मेरा संपर्क लगभग टूट गया। पुस्तैनी मकान और खेती अभी वहीं है और उनकी देख-रेख कुनबे के अन्य लोग कर रहे हैं। इस दौरान पुरकाजी में आये बदलाव को टोहने के लिए मैंने अपने कुनबे के एक सदस्य सुशील सिंह से बात किया।  यह जानकर कर काफी खुशी हुई कि पिछले दो तीन सालों में पुरकाजी में सुखद बदलाव आये हैं।

पिछले दो सालों में नगर पंचायत के नेतृत्व में अनेक विकास कार्य हुए हैं। ये बदलाव हैं उत्तर प्रदेश की नम्बर वन सरकारी गौशाला का निर्माण, 25 लाख की लागत से बनाया गया देश का पहला सरकारी महिला जिम पुरकाजी के बदलाव की कहानी कह​ते प्रतीत हो रहे है। बड़ी बात भारत के किसी कस्बे में इस तरह का महिला जिम कहीं नहीं है। इसके निर्माण से स्थानीय गृहणियों और पुरकाजी थाने की महिला पुलिसकर्मियों को विशेष रूप से लाभ हुआ है। वे अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हुई हैं इसके अलावा कस्बे में आईबीपीएएस अर्थात इंटरनेट प्रोटोकॉल बेस्ड पब्लिक एड्रेस सिस्टम लगाया गया है। साथ ही नगर पंचायत की सक्रियता से ईलाके में सुरक्षा के लिहाज से कस्बे से लेकर बाईपास तक लगभग 50 सीसीटीवी कैमरे भी लगाये गये जिन्हें इस सिस्टम से जोड़ दिया गया है। इसका कन्ट्रोल सिस्टम नगर पंचायत ऑफिस में है। अगर पंचायत अध्यक्ष को जनता तक कोई संदेश पहुंचाना है तो वे इस कन्ट्रोल सिस्टम की मदद से पहुंचा सकते हैं। संदेश पहुंचाने के लिए हर चौराहे पर 25 वाट के स्पीकर भी लगे हैं। इस हाईटेक सिस्टम से पुलिस को कानून व्यवस्था संभालने में भी मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त कई वार्ड में सड़क नाले और पुलियाओं का निर्माण भी हुआ है। कुछ समय पहले तक कई इलाकों में जलभराव हो जाया करता था। नालियोें के निर्माण से जल निकासी की व्यवस्था बेहतर हुई है। जगह-जगह पब्लिक टॉयलेट्स का भी निर्माण किया गया है। प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है। यहां किसानों से जुड़ा मुख्य कार्य गुड़ बनाने का है पिछले साल गन्ने की फसल अच्छी होने के कारण किसानों को विशेष लाभ हुआ।

इसमें कोई दो राय नहीं की मेरा गांव हाईटेक हो रहा है लेकिन ​बुनियादी शिक्षा का अभाव है। अगर गांव में ही शिक्षा की अच्छी व्यवस्था हो जाये तो गांव के होनहार छात्रों को शहर की तरफ नहीं जाना पड़ेगा। साधारण परिवार अपने बच्चों को शहर में पढ़ाने का खर्च वहन नहीं कर सकते। आज भी वहां के होनहार छात्रों को पढ़ने के लिए रूड़की या मुजफ्फर नगर जाना पड़ता है। ऐसा भी नहीं है कि यहां शिक्षा की व्यवस्था कभी न रही हो।  ब्रिटिश काल से एक प्राइमरी पाठशाला चलती आ रही है। कुछ साल पहले वहां राजकीय इन्टर कॉलेज खुलने की घोषणा हुई। बिल्डिंग का निर्माण अवश्य हुआ परन्तु स्कूल सुचारू रूप से नहीं चल पाया। नगर पंचायत और स्थानीय लोग ही मिलकर इसे चला रहे हैं इसमें कुछ गरीब बच्चियां पढ़ रही हैं। इस तरह से पुरकाजी में ना तो कोई इन्टर कॉलेज और ना ही डिग्री कॉलेज खुला। साथ ही यहां  चिकित्सा सुविधा का भी अभाव है। चिकित्सालय के नाम पर यहां सिर्फ एक प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र है। ईलाके लोग एक सुविधा संपन्न अस्पताल की व्यवस्था का बाट जोह रहे है।

 मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा जब पुरकाजी में शिक्षा की अच्छी व्यवस्था हो जायेगी। स्वास्थय सेवाओं के अभाव में लोगों को दूर जाने को मजबूर न होना पड़ेगा। तब सही मायनों में ‘‘सबका साथ सबका विकास’’ होगा। मेरी कामना है कि मेरा गांव प्रगति के नये आयाम स्थापित करे और भारत के नक्शे में चमकता सूर्य सा दिखे।

संस्थापिका नाद फाउंडेशन, कवयित्री, लेखिका, गायिका व पेन्टर

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