अब गोविंदाचार्य बनायेंगे आदर्श गांव…आजमगढ़ के कैथोली तिरहुतीपुर गांव में बनाएंगे ठिकाना

मंगरूआ
नयी दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ का जो हश्र हुआ है उसकी पड़ताल की जानी बाकी है। जो मीडिया रिपोर्ट सामने आती है उसके आधार पर यदि बात रखी जाये तो नरेंद्र मोदी के देश के प्रधानमंत्री बनने के 6 साल पूरे होने वाले हैं लेकिन उनके दूसरे कार्यकाल में यह योजना सिर्फ कागजों पर चलती नजर आ रही है। दूसरे दलों के सांसदों की बात कौन करे अब भाजपा सांसद भी प्रधानमंत्री के इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत गांव गोद लेने से कतराने लगे हैं। यहां तक प्रधानमंत्री भी बाकी मुद्दों पर तो देश की जनता से ‘मन की बात’ करते हैं लेकिन आदर्श गांव के मामले में एक तरह की चुप्पी ही दिखाई देती है। इस बीच पूर्व भाजपा नेता और संघ की पृ​ष्टभूमि से आने वाले के.एन. गोविन्दाचार्य ने कहा है कि मेरा दृढ़ विश्वास है कि कोरोना के चलते खराब हुई देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रकृति केन्द्रित विकास के एक ऐसे माडल पर काम करना होगा जिसमें गांवों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि गांवों के विकास में सरकार से ज्यादा निर्णायक भूमिका समाज की होती है। देश का प्रत्येक नागरिक गांवों के विकास में किस प्रकार अपने-अपने स्तर पर योगदान कर सकता है। गोविंदाचार्य ने कहा है कि कोरोना महामारी से लड़खड़ाती देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए  गांवों पर विशेष ध्यान देने की बात कही है। इस दिशा में पहल करते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में स्थित कैथौली-तिरहुतीपुर गांव (मार्टिनगंज) को अपना गांव मानकर काम करने का फैसला किया है। कोरोना के दौरान पूरे देश में लॉकडाउन है। लाकडाउन के बाद वे संबंधित गांव रहकर ग्राम विकास के ऐसे सूत्र ढूंढेंगे जो सभी गांवों के लिए उपयोगी सिद्ध हों।

उनका इस दिशा में किया गया प्रयास सफल हो। इसके लिए उन्होनें सोशल मीडिया पर मेरा गाँव मेरा देश – My Village My Country नामक एक समूह बनाया है। इस पेज से जुड़कर ग्राम निर्माण के भविष्य की गतिविधियों और निष्कर्षों को जानने के साथ-साथ उनसे संवाद भी किया जा सकता है।
इनको साथ लेकर आगे बढ़ेंगे गोविंदाचार्य
गोविंदाचार्य ने कहा है कि जिस दिन देश का आम नागरिक गांवों के विकास से जुड़ जाएगा, उस दिन हम वह सब हासिल कर लेंगे जो सरकारें और सामाजिक संस्थाएं अभी तक हासिल नहीं कर पाई हैं।
हमारे सामने नागरिकों के मुख्यतः निम्न चार समूह हैं, जिनके लिए उपलब्ध विकल्पों की हमें पड़ताल करनी है।
1. शहरों के वे लोग जो अभी भी अपने पुश्तैनी गांव के संपर्क में हैं।
2. शहरों के वे लोग जो अपने पुश्तैनी या किसी अन्य गांव के नियमित संपर्क में नहीं है।
3. गांवों के वे युवा जो अपनी आजीविका कमाने के लिए शहरों मे आना चाहते हैं।
4. गांवों में रह रहे अन्य लोग।
उल्लेखनीय है कि गोविंदाचार्य समय—समय पर सरकार से अलग समाज निर्माण की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की दिशा में सतत रूप से प्रयास करते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2011 के नवंबर माह में में राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के बैनर तले..पंचायतो को कुल बजट का 7 फीसदी आवंटन के लिए आंदोलन किया था। उनका कहना था कि महात्मा गांधीजी जिस स्वराज की बात करते थे, उसकी सार्थकता सच्चे अर्थों में ‘ग्राम स्वराज्य’ स्थापित करने में है। संविधान में संशोधन करके स्थापित ‘पंचायती राज’ क्यों प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा है? जब हम इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की कोशिश करते हैं तो पता चलता है कि आर्थिक संसाधनों पर पंचायतों का पर्याप्त नियंत्रण न होना इसका एक बड़ा कारण है। कहने को तो पंचायतों के पास खूब पैसा भेजा जा रहा है, लेकिन वह सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रहा है। पंचायतों पर नौकरशाही का शिकंजा यथावत बना हुआ है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ वर्ष से अधिक बीत जाने के बावजूद अधिकांश गांवों की बदहाली और कंगाली में कहां फरक पड़ा है? 1991 से आर्थिक सुधार का दौर शुरू होने के बाद से शहरों और गांवों के बीच की खांई और अधिक चौड़ी हुई है। केन्द्र और राज्य सरकारों की अनेक योजनाएं गांवों के विकास के लिए लागू हैं पर उनकी दशा तो सब जानते ही हैं। देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक बार कहा था, ‘‘विकास कार्यों के लिए दिल्ली से भेजे गए एक रुपए में से 15 पैसा ही आखिर तक पहुंचता है।’’ इस बात का अहसास होने के पश्चात ही उन्होंने ‘पंचायती राज’ की बात करनी शुरू की थी।

सन 1993 में 73वें संविधान संशोधन के द्वारा नए सिरे से ‘पंचायती राज’ की व्यवस्था बनी। पंचायतों का ढांचा खड़ा हुआ और उन्हें कुछ कार्यों के अधिकार भी दिए गए। पर साथ में आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था न करने से पंचायती राज का सपना अधूरा ही रह गया। पंचायती राज के ढांचे को खड़े 15 से अधिक वर्ष बीत जाने पर भी अपेक्षित परिणाम कागजों से बाहर नहीं आ पाए हैं। ‘पंचायती राज’ कानून में राज्य सरकारों से अपेक्षा की गई थी कि वे पंचायतों को कार्य के अधिकार के साथ-साथ आर्थिक संसाधन भी हस्तांतरित करेंगे। लेकिन अधिकांश राज्य सरकारें तो दिवालिया होने के कगार पर हैं। उनमें से अनेक को अपने कर्मचारियों को वेतन तक ऋण लेकर देना पड़ता है। वे कहां से ‘ग्राम पंचायतों’ को धन हस्तांतरित करेंगी? तो फिर कैसे गांवों तक विकास और विकास के लाभ को पहुंचाया जाए? अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो एक तरफ गांव उजड़ते चले जाएंगे और दूसरी तरफ आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा शहरों की झुग्गी-झोपड़ियों में बसने के लिए अभिशप्त हो जाएगा। फिर रास्ता क्या है?

अब सबसे असरदार रास्ता दिखता है- केन्द्रीय बजट से सीधे ‘ग्राम पंचायतों’ को धन हस्तांतरित करना। आज देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। अतः केन्द्र सरकार के बजट की कम से कम 7 प्रतिशत राशि सीधे ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित की जाए। सभी ग्राम पंचायतों को यह राशि समान रूप में मिले क्योंकि बड़े गांव वैसे भी चल रही अन्य सरकारी योजनाओं को अपनी ओर खींचते रहते हैं। इस हस्तांतरण को सरल तथा प्रभावी बनाने के लिए निम्न रूप से लागू किया जा सकता है-

(१) केन्द्र सरकार सीधे ग्राम पंचायतों के बैंक खातों में धन भेजे।

(२) ग्राम सभा विकास कार्यों को मंजूर करे।

(३) ग्राम सभा द्वारा स्वीकृत योजनाओं को ग्राम पंचायत लागू करे।

(४) राज्य सरकार केवल ग्राम पंचायतों के बही खातों की आडिट करे।

(५) बजट के बाद प्रति वर्ष मार्च में हस्तांतरित राशि का प्रचार-प्रसार उसी तरह हो जैसे सरकार आजकल पोलियो निर्मूलन अभियान चलाती है।

वर्तमान में केन्द्रीय बजट 11 लाख करोड़ रुपए से अधिक का होता है। अतः उसकी 7 प्रतिशत राशि लगभग 77 हजार करोड़ रुपए होती है। देश में इस समय लगभग 2.5 लाख ‘ग्राम पंचायतें’ हैं। अतः प्रत्येक ग्राम पंचायत के हिस्से में हर साल 30 लाख से अधिक राशि आएगी। जिन समाज सेवकों ने ग्राम विकास के क्षेत्र में काम किया है वे बता सकते हैं कि हर साल 30 लाख रुपए मिलने पर कैसे गांवों का कायाकल्प हो सकता है। आज भी हजारों स्वयंसेवी संस्थाएं, समाजसेवक और समर्पित सरपंच हैं जो आर्थिक संसाधनों के अभाव में भी क्रियाशील हैं। केन्द्र से ग्राम पंचायतों को उपरोक्त राशि मिलने पर देश में हजारों आदर्श गांव स्थापित हो जाएंगे जो अन्यों को अनुकरण करने के लिए मार्गदर्शन भी करेंगे और बाध्य भी। बाध्य इस तरह से कि लोग पूछेंगे कि जब उतनी ही राशि से उस गांव का कायापलट हो गया तो हमारे गांव में क्यों नहीं?

कुछ लोग इस मांग का विरोध करेंगे कि पंचायतों में भ्रष्टाचार होगा। लेकिन यह तर्क खोखला है। भ्रष्टाचार की आशंका के कारण किसी अच्छी योजना का विरोध हो तो सबसे पहले केन्द्र और राज्य सरकारों की सभी योजनाओं को बंद कर देना होगा,क्योंकि वहां तो भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार हुआ भी तो 10-15 प्रतिशत ही होगा। न कि सरकारी योजनाओं की तरह 85 प्रतिशत। पंचायतों में 10 से 15 प्रतिशत तक होने वाले भ्रष्टाचार पर भी धीरे-धीरे ग्राम सभाएं नियंत्रण कर लेंगी।

केन्द्र सरकार के बजट से 7 प्रतिशत राशि ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित होने से जहां एक तरफ उसके गुणनात्मक प्रभाव (Multiplier Effect) से देश की विकास दर आने वाले अनेक वर्षों तक दहाई अंक में बनी रहेगी, साथ में वह महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

गोविंदाचार्य के साथ जुड़े नजदीकि सूत्रों की माने तो उनकी परेशानी ये है कि वे समाज के ज्वलंत विषयों को सामने लाते हैं। उस विषय पर जनमत भी तैयार करते हैं लेकिन टिकाउ आंदोलन नहीं खड़ा कर पाते और समय के साथ दूसरे विषयों को अपने हाथों में लेकर आगे बढ़ जाते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि आजमगढ़ जिले में स्थित कैथौली-तिरहुतीपुर गांव (मार्टिनगंज) को अपना गांव मानकर काम करने का गोविंदाचार्य का फैसला दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ेगा और ग्राम निर्माण व समावेशी विकास की दिशा में उल्लेखनीय उदाहरण बन पायेगा। अच्छा तो यही होता कि गोविंद जी इस कार्यक्रम के साथ अब तक प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चयनित गांवो में हुए काम की पड़ताल करते हुए आगे की राह तय करते।