लंबे समय बाद गांव जाना हुआ। पटना से करीब 18 किलोमीटर दूर, पटना मसौढी गया रोड पर पुनपुन नदी के किनारे है गांव अलावलपुर। अपनी सवारी हो तो आधे घंटे में पटना से गांव पहुंच जायें। दिल्ली के एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले जितना दूर। एक जमाना था कि गांव पहुंचने के लिए दो तीन किलोमीटर पैदल चलना होता था। पक्की सडक से गांव तक जाने के लिए नदी पार करनी होती थी।
मैं गांव में ज्यादा रहा नहीं। पटना में रहते थे और बचपन में गांव जाते-आते रहते थे। तब दादी वहीं रहती थीं और उनसे मिलने का आकर्षण हम भाइयों को गांव खींच ले जाता था। 70 और 80 के दशक के शुरुआती सालों तक गांव जाने-आने का सिलसिला बना रहा। फिर नौकरी -चाकरी और पत्रकारिता के संघर्षों में लग गया। बाद में दादी भी पटना में ही हमलोगों के साथ रहने लगीं।
1987 में मैं पीटीआई में नौकरी करने दिल्ली आ गया। इसके एक साल बाद दादी भी गुजर गयीं। तब से पच्चीस तीस सालों तक यदा कदा ही गांव जा पाया। माता पिता के गुजर जाने के बाद गांव के जमीन जायदाद को देखने- समझने की जिम्मेदारी जब हम भाइयों पर आई तो गांव जाने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि गांव में अब रहना नहीं होता, सुबह जाना और शाम तक लौट आना।
चूंकि गांव में रहा नहीं और परिवार के लोगों को छोड़ कर गांव के दूसरे लोगों से ज्यादा संवाद नहीं रहा। इसलिए पिछले तीन दशक की गांव की कहानियां ज्यादा पता नहीं और न हीं गांव की अंदरूनी राजनीति से परिचित रहा।
गांव में हमारा काफी बड़ा मकान है। बचपन की बहुत सारी यादें हैं। दुआर पर पोस्ट आफिस हुआ करता था और चाचा ठाकुर यदुवंश नारायण सिंह पोस्टमास्टर थे। दूरा पर सुबह से ही बैठकी शुरू हो जाती थी और हमेशा चहल -चहल पहल बनी रहती थी।
घर में, जिसे जनानी किता कहते थे, दादी के कमरे में पीढा पर बैठ कर खाना खाने का एक अलग ही आनंद था। दादी को हम मामा बोलते थे। गांव में ही दादी की एक मौसेरी बहन थीं जिन्हें हम मौसी मामा पुकारते थे। उन्हें जब पता चलता कि हम आये हैं तो वह हमारे लिए दूध दे जाती थीं। लोटा भर दूध जिसे वह आंचल से ढंक कर लाती थीं। मौसी मामा के पति कारू चाचा बहुत ही सज्जन सरल व्यक्ति थे। वह सुन और बोल नहीं सकते थे। लेकिन लिख कर और इशारों से बहुत अच्छे से बात कर लेते थे। मुक बधिर लोगों की दुनिया से मेरा पहला परिचय उसी समय हुआ था। उन्हीं से संवाद के बाद ही संभवत पहली बार मैंने यह जाना कि ज्यादातर मामलों में जो बोल नहीं सकता वह सुन भी नहीं सकता। मौसी मामा और चाचा जी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें स्मृति में जीवंत बनी हुई हैं।
गांव के मकान की हालत अब पूरी तरह से जर्जर हो गयी है। मरम्मत न होने के कारण कुछ हिस्सा गिरता जा रहा है। कुआं अब बिल्कुल निर्जीव पड़ा है। जंगल झाड़ उग आये हैं। घर के लोग अब कुआं का पानी नहीं पीते, बोरिंग का सहारा है। दूआर का भी बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और गिरने की स्थिति में है।
पटना से लगे होने के कारण गांव के ज्यादातर लोगों की हाईस्कूल के बाद की पढाई -लिखाई पटना में हुई है। यहां तक कि खरीददारी और बीमारी में इलाज भी पटना से। गांव के बहुत सारे लोग पुलिस में काम करते हैं। एक समय कहां जाता था कि पूरे बिहार और झारखंड में किसी भी पुलिस थाने में चले जाइये, वहां तैनात सिपाही से लेकर डीएसपी तक में से कोई न कोई हमारे गांव अलावलपुर पियरिया का आपको जरूर मिल जायेगा। एक दो अवसरों पर मुझे इसका व्यक्तिगत अनुभव भी हुआ है।
मेरे परिवार के ज्यादातर लोग पटना में रहते हैं। सब के अपने अपने मकान हैं पटना में। वैसे शायद कम ही परिवार होंगे जिनमें उतार चढ़ाव के बावजूद इतना प्रेम भाव और आपसी सौहार्द होगा। आज जब भाई -भाई में दूरिया बढ़ती जा रही है और गोतिया जैसा बर्ताव होने लगता है, वैसे में जब मैं अपने परिवार की ओर देखता हूं तो गर्व होता है। दूर के रिश्तों के बावजूद नजदीकी बनी रही। जैसे मेरे पिता अकेले भाई थे। मेरे दादा भी अकेले थे। मेरे परबाबा तीन भाई थे और उन्हीं से पूरा परिवार है। लेकिन परिवार में प्रेम भाव बना रहा। कभी लगा नहीं कि हम दूर के रिश्तेदार हैं। बहुत छोटे थे तो रिश्तेदारी की गांठ का पता भी नहीं था। तमाम मतभेदों और नाराजगी के बावजूद हमने पिताजी या चाचा लेागों के बीच कभी तेज आवाज में बात होते नहीं देखा। झगड़ने की बात तो दूर। हमेशा एक दूसरे का लिहाज करते देखा। हालांकि हमारी पीढ़ी के आते आते आपस में दूरियां बनने लगी और बंधन ढीले पड़ने लगे। पता नहीं आगे बच्चे सब एक दूसरे को पहचानेंगे भी कि नहीं।
तकरीबन 533 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस गाँव की आबादी करीब सात आठ हजार है और कागजों में अब शायद यह आदर्श ग्राम हो गया होगा। भाजपा के दिग्गज नेता और वर्तमान में केन्द्रीय मंत्रिमंडल में प्रमुख जिम्मेदारी संभाल रहे रविशंकर प्रसाद ने 2015 में आदर्श ग्राम योजना के तहत हमारे गांव को गोद लिया था। फिलहाल हाइवे से उतरकर गांव जाने वाले रास्ते में सोलर लाइटें लग गयी हैं और सड़क की हालत भी ठीकठाक दिख रही है।
गौरीचक से हमारे गांव का रास्ता जाता है। गौरीचक को कस्बा कह सकते है। हमारे गांव का बाजार है जहां बैंक से लेकर दूसरी जरूरी चीजों की दुकानें हैं। अगमकुआं से गौरीचक तक, जिस सड़क पर पहले कभी जाम नहीं लगता था उस पर अब लम्बा जाम लगता दिखा। सड़क के किनारे बड़े बड़े गोदाम और कई आवासीय विद्यालय खुल गये हैं जहां पटना के विभिन्न मुहल्लों से बच्चे पढने आते हैं। पहले इस रोड पर इक्का दुक्का दुकानें हुआ करती थीं अब तो काफी दुकानें हो गयी हैं। बैरिया, संपतचक बड़े कस्बे बन गये हैं। अब तो यह राजमार्ग फोर लेन का बनने जा रहा है। इसी पटना गया रोड पर बैरिया के निकट अंतरराज्जीय बस अडडा बन रहा है। गौरीचक भी अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले टेम्पो अगमकुआं से गौरीचक तक ही आती थी अब अगमकुआं से टेम्पो सीधे मेरे गांव तक जाती है। वह भी मेरे बगीचे के पास तक। बल्कि यह कहें कि वहीं पर एक तरह से टेम्पो स्टैन्ड बनता जा रहा है। एक दो दुकानें भी खुल गयी हैं। गैस एजेंसी और गैस गोदाम भी।
बगीचा के पास से गुजरते हुए बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब पुनपुन नदी में नहाना और नदी के पास ही अपने बगीचे में घंटों घंटो रहना, गांव में रहने के दौरान की सामान्य दिनचर्या थी। उस समय बगीचा में आम के कई पेड़ थे। माल्दह से लेकर मिठुआ,फजली और शुकुल तक। सीधे पेड़ से तोड़ कर आम खाने से कई बार मुंह के आस पास घाव भी हो जाते थे। आज के बच्चों को शायद पता भी न हो कि आम खाने से मुहं के आस पास घाव भी हो सकता है।
हालांकि मेरे बगीचे में अब पहले वाली वह रौनक नहीं रही। कुछ ही पेड़ रह गये हैं, कुछ टूट गये, कुछ सूख गये और नये पेड़ लगे नहीं। अब सोचता हूं कि पूर्वजों ने सत्तर अस्सी साल पहले कितनी मेहनत से बगीचा लगाया होगा। उस वक्त तो बोरिंग और हैंड पंप नहीं हुआ करता था। दूर नदी से पानी लाकर पेडों में डाला जाता रहा होगा।
गांव में अनेक नये मकान बन गये हैं और कुछ पुराने मकानों का विस्तार हो गया है। मंदिर के पास कुछ दुकानें बन गयी हैं। जिनमें जरूरत की चीजें मिल जाती है। पूजा पाठ के सामान भी मिलते हैं। चाय पानी की दूकान भी है। मंदिर का भी विस्तार हो गया है। गांव में गेहूं और सरसों की फसल अच्छी दिखी। अपनी जमीन पर लगी फसलों को देखने का एक अलग आनंद है।
बहुत जमाने बाद मंदिर के पास कुछ देर रूका। सामने पुनपुन नदी अपने पूरे विस्तार से बह रही है। अविरल लेकिन बहुत ही धीमी रफतार में। पुनपुन गंगा की एक सहायक नदी है। झारखंड के छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली यह नदी पटना के नजदीक फतुहा में जाकर गंगा में मिलती है। गंगा में मिलने से पहले दरधा और मोरहर नाम की दो सहायक नदियाँ भी पुनपुन में आकर मिलती हैं। एक समय इसमें सालों भर पानी रहता था और नावें चलती थीं। अब इस नदी में पहले जैसा पानी नहीं रहता। खासकर गर्मी में इसमें बहुत कम पानी रह जाता है। नदी को लेकर दिल्ली के मेरे एक लेखक व पत्रकार मित्र नलीन चौहान की बात याद आती है कि हमारे यहां नदी केवल नदी नहीं एक संस्कृति हुआ करती है। नदी का इतिहास गांव और शहर के इतिहास से पुराना होता है। उस नदी के किनारे बसे गांव शहर का पूरा जीवन उस नदी के इर्द गिर्द घूमता है। मेरी स्मृतियों में इस नदी को लेकर बचपन की सिर्फ दो तीन यादें ही अभी तक बनी हैं। एक नदी में घंटों नहाने की और दूसरे पटना से आने जाने के क्रम में नदी को पार करने की।यह पुनपुन नदी हजारीबाग व पलामू के पठारी भागों से निकलती है। उन जगहों पर पहले घने जंगल हुआ करते थे, जिस कारण वर्षा का जल वहां संचय हो जाता था और यह पानी नदी में धीरे-धीरे आता रहता था। इस तरह नदी में पानी का प्रवाह बना रहता था। अब जंगल खत्म हो जाने और पेड़ों की संख्या में कमी आ जाने के कारण वर्षा का जल संचय उतना नहीं हो पाता। नदी में पानी कम होने का इसे भी एक कारण बताया जा रहा है। कई साल पहले सुना था कि बिहार सरकार पुनपुन नदी पर बैराज बनाकर इसके पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए करने की योजना पर काम कर रही है और इस परियोजना के पूरा हो जाने पर पटना और जहानाबाद जिले के बडे भूभाग में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो जायेगी। पता नहीं इस परियोजना की अब क्या स्थिति है।
बगीचा से घर की ओर जाते समय अपने हथखाना (हाथी के रहने का स्थान) पर नजर पड़ी। हथखाना अब उजाड़ विरान और सिर्फ एक ढांचा मात्र रह गया है। पिछले 35-40 सालों से इसमें हाथी नहीं रह रहा। हाथी को लेकर बचपन की कई कहानियां हैं। उस जमाने में इस जानवर को लेकर जबरदस्त कौतुहल हुआ करता था। पांच छह टन के विशाल शरीर लेकिन आमतौर पर शांत स्वभाव वाले इस जानवर को लेकर बचपन में तरह तरह की कल्पनायें होती थीं। कई सवाल मन में रहते थे जैसे यह सोता कब है, खाता कितना है, इसका बच्चा कितना बड़ा होता है, इसके सूंड में चींटी घुस जाये तो क्या वह मर जायेगा और नहाने के बाद अपने गीले शरीर पर वह सूंड से मिट्टी क्यों छिड़क लेता है आदि आदि। अजीब सी उत्सुक्ता रहती थी उसे छूने और उस पर बैठने की। बैठने के क्रम में मैं एक दो बार गिर भी गया था।
दादी बताती थीं कि मेरे जन्म से कुछ साल पहले यह हाथी हरिहर क्षेत्र मेला यानी सोनपुर मेला से खरीद कर लाया गया था। उस समय वह बच्चा था। तब वह घर के आंगन तक चला आता था। बचपन में हमलोगों ने हाथी पर खूब सवारी की और खूब घूमे । अब तो यह सब बातें यादों में सिमटकर रह गयी हैं। उस जमाने में ग्रामीण इलाकों में शादी विवाह में बारात में हाथी घोड़ा ले जाने का प्रचलन था। जैसे आजकल गाडियों की कतार रहती है। लोग सालों साल तक बारात में आये हाथीघोड़ों की संख्या बड़े गर्व से बताते थे।तीस पैंतीस साल पहले इस हाथी की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। इसके बाद से घर में हाथी नहीं है। घर की हालत भी ऐसी नहीं रह गयी थी कि हाथी रखा जाये।। जर्जर स्थिति में पड़ा हथखाना आज अपनी पुरानी भव्यता की याद दिला रहा है। अब तो ऐसे भी हाथी रखने और इसके इस्तेमाल को लेकर तरह तरह की पाबंदियां लगायी जा रही हैं। पशु पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थायें अदालत का दरवाजा भी खटखटा रही हैं। उधर पेड़ों के कटने और जंगल के नष्ट होने से भी हाथियों का जीवन खतरे में पड़ गया है क्योंकि जल जंगल उसके लिए बहुत जरूरी है। पेड़ की टहनियाँ और पत्ते उसका मुख्य आहार है और पानी के करीब रहना उसे सबसे ज्यादा प्रिय है।

अन्य जगहों की तरह हमारे गांव में भी राजनीति पर गप करने में लोगों की बहुत दिलचस्पी है और बातचीत की शुरूआत ही मोदी, नीतीश, लालू पासवान से होती है। गांव से कोई बड़ा नेता नहीं हुआ है। यहां के लोगों की राजनीति ज्यादातर मुखिया सरपंच तक ही सीमित रही है। मेरा गांव पटना साहिब लोकसभा और फतुहां विधान सभा निर्वावन क्षेत्र में आता है। फतुहा विधानसभा क्षेत्र लंबे समय तक अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। 2010 में यह सामान्य जाति के उम्मीदवारों के लिए मुक्त हुआ है। शायद अब लोग यहां से चुनाव लड़ने को लेकर सक्रिय हों। गांव के अनेक लोगों ने संघर्ष कर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मुकाम हासिल किया है।
ऐसा लोग बताते हैं कि हमारे पूर्वज कोई 400 साल पहले मारवाड़ (राजस्थान) से चलकर आये थे और पुनपुन, दरधा व मोरहर नदी के संगम के निकट बसे थे जो आगे चलकर अलावलपुर गाव का रूप लिया। विकास के क्रम में आगे चल कर गांव में प्राथमिक विद्यालय मध्य विद्यालय से लेकर उच्च विद्यालय, स्वास्थ केन्द्र, डाकघर, बिजली, पानी आदि की व्यवस्था हुई। इन विद्यालयों की वर्तमान में क्या स्थिति है यह मालूम नहीं। गांव का प्रतिष्ठित कालिका हाई स्कूल तो सत्तर पचहत्तर साल पुराना है। कुछ साल पहले यहां इंटर की भी यानी 10 प्लस टू की पढाई भी शुरू हो गयी हे। वैसे राजधानी से सटे होने के बावजुद लंबे समय तक यह गांव सीधा सड़क मार्ग से नहीं जुड़ा था।
शिक्षा का विस्तार और आबादी बढने के साथ ही परिवार में खेती की जमीन का रकबा घटने के कारण रोजी रोजगार के लिए लोग शहरों की ओर ज्यादा निकलने लगे और नौकरी चाकरी के कारण शहरो में बसने लगें। पटना के बिल्कुल नजदीक होने के कारण स्कूल की पढाई के बाद कालेज की पढाई के लिए लोग पटना आते। फिर नौकरी और व्यापार के लिए दूसरे शहरों में जा कर बसने लगे।
केन्द्रीय मंत्री और भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद द्वारा आदर्श ग्राम के रूप में हमारे गांव को गोद लिए जाने के बाद यह गांव आज डिजिटली साक्षर है। यहां नाइलिट यानी राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा एक कम्प्युटर प्रशिक्षण केन्द्र संचालित है। नाइलिट केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन आता है। उम्मीद है कि इस कम्पुयटर प्रशिक्षण केन्द्र से गांव के युवाओं, खासकर लड़कियों को काफी फायदा हो रहा होगा।
(कुमार रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक तक दिल्ली में देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी पीटीआई में विभिन्न पदों पर रहे हैं। इन दिनों फ्रीलांस पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं।)




