आसानी से बदलाव को स्वीकार नहीं करता ग्राम समाज

डॉ रश्मि सिंह, आईएएस

पिपरा के पतवा सरिखे डोले मनवा
कि मनवा में उठत हिलोर

गांव की चर्चा होते ही यह गाना मुझे स्वतः याद आ जाता है। मेरे ससुराल का गांव मझई है जो सासाराम जिले में है। मझई में हमारे घर के सामने ही चार तालाब हैं, वहां का दृश्य काफी मनोरम है। खेतों में गेहूं की बालियां जब दिखती है, या सब्जी के खेतों की ओर जब नजर जाती है तो बहुत अच्छा लगता है। जिस तरह का प्राकृतिक वातावरण, मनोहारी दृश्य गांव में दिखता है वह शहर में खोजने पर भी नजर नहीं आता। गांव में रहने वालों के लिए वह सामान्य चीज है पर हम शहर में रहने वालों के लिए वह बेहद आकर्षक होता है।
शादी के बाद जब मझई गांव में गई तो पाया कि हमारे श्वसुर डॉ राधिका रमण सिंह और मेरे पति मनोज कुमार सिंह का भी गांव से बहुत लगाव है। मेरे पति की छठे क्लास तक की पढ़ाई गांव में ही हुई, उसके बाद वे शहर रांची गए। मेरे श्वसुर गांव में निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराते थे। उनके पास रांची तक मरीज आते थे, उनके घर आकर रहते थे। उनके स्वर्गवास के बाद हमें लगा कि ससुर जी के इस काम को जारी रखना चाहिए, बल्कि आगे बढ़ाना चाहिए। आपसी चर्चा में कुछ ऐसा काम करने का विचार आया जिससे गांव को स्थायी रूप से कुछ फायदा हो। इसी धारणा को मन में लिए हमने अपनी निजी जमीन पर एक कमरे के साथ शुरूआत की। सबसे पहले बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा देने की शुरूआत की गई। उस समय शुरू की गई अनौपचारिक शिक्षा की यह छोटी-सी पहल आज पांचवी कक्षा तक की औपचारिक शिक्षा में बदल गयी है। आज उस जगह पर दस गांव से बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। स्कूल में बच्चों की संख्या दो सौ के करीब पहुंच गयी है। यह प्रयोग हमने 2013 में शुरू किया था। हमारे लिए संतोष की बात यह है कि जो बच्चा वहां है उसमें बहुत बदलाव आया है। गांव के इस स्कूल का नाम श्वसुर जी के नाम पर ही रखा गया है यानी डॉ राधिका रमण पब्लिक स्कूल।


स्कूल के बच्चों में जो तेज बच्चे हैं उन्हें हम दिल्ली लेकर भी आए थे ताकि उनके व्यक्तित्व का विकास हो। दिल्ली के एक स्कूल के साथ मिलकर उनका एक्सचेंज कार्यक्रम कराया। इसके पीछे सोच यह थी कि दिल्ली जैसे शहर में बहुत ही उच्च दर्जे के पब्लिक स्कूल है, वैसा ही पब्लिक स्कूल गांव में भी विकसित किया जाए। मकसद शिक्षा का व्यवसायीकरण या लाभ कमाना नहीं है। यदि लाभ ही कमाना होता तो गांव में स्कूल क्यों खोलते? आज भी वहां दो सौ फीस के लिए इंतजार करना होता है कि धान कटेगा तो फीस दे पाएंगे। हमारा मकसद था गांव में शिक्षा का सुधार हो। हालांकि हमने जानबूझकर स्कूल को पूरा निशुल्क नहीं किया। लेकिन जो असमर्थ है वे आवेदन दें और बताएं कि किस कारण असमर्थ हैं तो उनके लिए निशुल्क व्यवस्था है।

वैसे जब हम गांव में कोई भी काम करने जाते हैं तो कई तरह की चुनौतियां आती हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि लोग सकारात्मक कम, नकारात्मक ज्यादा सोचते हैं। आप जो काम कर रहे हैं, उसके पीछे कहीं कोई राजनीतिक एजेंडा तो नहीं है। लोग यह भी सोचने लगते हैं कि बिना स्वार्थ के कोई भला कुछ क्यों करेगा? कहीं कोई एनजीओ का विदेशी फंडिंग तो नहीं है। लेकिन जब आप पूरे लगन से काम करते जाते हैं तो धीरे-धीरे मानसिकता में बदलाव आता है। यदि व्यवसाय बनाना होगा तो भला कोई गांव में स्कूल क्यों खोलेगा। व्यवसाय बनाना होगा तो व्यवसायिक हितों को ध्यान में रखकर काम होगा। उसके हिसाब से चीजें होगी।


शिक्षा की दृष्टि से देखने पर सबसे बड़ी चुनौती है कि लोगों को अभी तक समझ नहीं है कि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से उन्हें कोई फायदा है। आपको उनको समझाना पड़ता है कि बच्चों की पढ़ाई से उनके जीवन में क्या बदलाव आ सकता है। गांव के सरकारी स्कूलों में आजतक पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है। जब मैं पहली बार वहां के सरकारी स्कूलों में गयी तो देखा वहां चारों तरफ कूड़ा पड़ा हुआ है। ऐसे में बच्चे पढ़े कैसे? सिर्फ दो टीचर है इतने बड़े स्कूल में। फिर हमने वहां भी प्रयास किया और सबसे बात की। शिक्षकों ने बताया कि यहां कूड़ेदान नहीं है इसलिए बच्चे बाहर कूड़ा फेक देते हैं। अगली बार जब गई तो हमें पता चला कि जो कूड़ेदान था, उसे हेडमास्टर के रूम में बंद कर दिया गया है। कमरों की रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं। सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा है। वहां शौचालय तो है लेकिन उसमें दरवाजा नहीं है। जबतक हम माहौल नहीं देंगे, बच्चे और अभिभावक कैसे आकर्षित होंगे?
हमने अपने स्कूल पर काफी काम किया, बहुत मेहनत की, उसे खूब सींचा। तब जाकर वहां परिवर्तन का दौर चल रहा है। यह बात सही है कि अब भी वहां अभिभावकों को शिक्षा को जितना महत्व देना चाहिए, नहीं दे पा रहे है। लेकिन जब बच्चे स्कूल से निकलकर आ रहे हैं और उनमें बदलाव दिख रहा है तो धीरे-धीरे अभिभावकों की सोच में बदलाव भी आ रहा है। अब उन्हें लग रहा है कि शिक्षा से वास्तव में बदलाव आता है। हमने न सिर्फ बच्चों को बल्कि महिलाओं को भी इससे जोड़ने का प्रयास किया है। युवाओं के लिए वहां एक कंप्यूटर सेंटर खोला ताकि युवा भी इससे जुड़े। युवा वहां प्रशिक्षण लेते है। तीन-तीन महीने का कंप्यूटर कोर्स पड़ोस के बडडी गांव में शुरू किया। गांव के स्कूल में कंप्यूटर लैब है, एक सामूदायिक लाइब्रेरी है ताकि गांव के अन्य लोगों में भी पढ़ने की आदत लगे। बड़े-बड़े बच्चों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें वहां उपलब्ध है। तैयारी के लिए महंगी किताबें हम वहां पर पहुंचाएंगे।


औपचारिक शिक्षा के अलावा दो से चार बजे तक उन लोगों को निःशुल्क शिक्षा दी जाती है जो कभी स्कूल नहीं गए। उसमें कई मजदूर, गरीब बच्चे जिन्हें अभिभावक भेजना नहीं चाहते वे बच्चे भी शामिल हैं। इनकी संख्या करीब चालीस है। ये स्कूल ड्रॉप आउट बच्चे हैं। बच्चों में बहुत बदलाव आया है। शुरूआत में जब बच्चे आते थे तो बाल गन्दे, नाखून बड़े-बड़े, नाक बह रहा है, कपड़े गन्दे, धुल-धूसरित, पांव में चप्पल नहीं। इनमें उनका भी दोष क्या? वे वर्षों से ऐसे ही रह रहे हैं। सबसे पहला बदलाव यह किया कि उन्हें साफ-सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ाया। अब उन्हें देखकर यह नहीं लगता कि ये वही गांव के बच्चे है। उनको पहले यह नहीं पता था कि क्लास में एकाग्रचित कैसे हों। काफी समय लगा उन बच्चों में एकाग्रता लाने में। शिक्षक को काफी मुश्किलें आयी। इसलिए शिक्षक ने सबेरे-सबेरे योग के माध्यम से इस दिशा में प्रयास प्रारंभ किया। हमारे साथ दीप्ती जी जुड़ी हुई हैं, जिन्होंने मानवीय मूल्यों के विकास के लिए एक पाठ्यक्रम शुरू किया है। उनसे मैंने यह आग्रह किया है कि हमारे स्कूल और आसपास के सरकारी स्कूलों में इस दिशा में प्रयास हो, जिससे एक हब बने। इन्होंने ऐसा मॉडयूल तैयार किया है जिससे लोगों की मानसिकता में परिवर्तन हुआ है। वे हमारे स्कूल में शिक्षकों के लिए दो दिन के लिए शिविर लगाने के लिए तैयार हैं। हमने सोचा क्यों न शुरू में हमारे ही दस अध्यापक इसका लाभ उठाए। यदि शिक्षकों की सोच बदलेगी तो समाज को काफी फायदा होगा।


लेकिन गांव की बहू के नाते मेरा मानना है कि मैं यह गांव के लिए नहीं कर रही हूं, बल्कि यह हमारा कर्तव्य है। हम जितने भी लोग शहर आए है। शिक्षा ग्रहण की है, अच्छी नौकरी में हैं या व्यवसाय में है, यदि हम सब मिलकर गांव के लिए कुछ करेंगे तो जो शहर और गांव के जीवन स्तर में जिस तरह का फासला आज हम देख रहे है, उपलब्ध सुविधाओं में जो दूरी बढ़ती जा रही है, उस दूरी को हम कम कर सकते हैं। इस सोच के साथ काम करेंगे तभी हमारे गांव के जो बच्चे अवसर से महरूम है उन्हें बेहतर अवसर प्रदान कर सकते है।
हमने मझई, देव दोनों गांव में स्वास्थ्य शिविर लगवाया। बहुत अच्छे डॉक्टर गए। ऐसा नहीं है कि सरकार नहीं कर रही है लेकिन आज भी सरकारी सुविधाएं गांव तक नहीं पहुंच पा रही है। ऐसे में समाज की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। हमारे एक पारिवारिक मित्र डॉ धनन्जय का यथार्थ नर्सिंग इंस्टीटयूट है। उनसे कहकर गांव में निशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया। संभव हुआ तो हर तीन महीने में नियमित रूप से शिविर लगाया जाएगा। इसका बहुत ही अच्छा प्रभाव हुआ। मेरे पति ने पहले नेत्र चिकित्सा शिविर लगवाया था जिसमें बहुत सारे लोगों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ। इसके लिए उन्होंने अलीगढ से डॉक्टरों की पूरी टीम को बुलाया। गांव के लोगों को भी इस शिविर में आने को प्रोत्साहित किया। इससे काफी फायदा हुआ।
पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत चुने गए मुखिया से मिलकर कोशिश करते रहे है कि इस तरह के विकास कार्यों में वे ज्यादा रूचि रखें। पहले जो मुखिया थी। वह घूंघट में रहती थी, उनके पति आते थे। फिर हमने उन्हें टोकना शुरू किया कि ऐसे कैसे होगा। आप मुखिया थोड़े न है। धीरे-धीरे हमने महिला मुखिया को आगे लाना शुरू किया। उन्हें कहा कि आप बोलिए आपकी आवाज आनी चाहिए। दोनों जगहों पर महिला प्रतिनिधि को बुलाकर हमने ट्रेनिंग भी करवायी ताकि गांव में शिक्षा, रोजगार में इनकी रूचि बढ़े। आंगनबाड़ी कैसी चल रही है, इसमें उनकी कोई रूचि नहीं है। सड़क का ठेका, पुल का ठेका से हटकर बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में उनकी कोई रूचि नजर नहीं आती। महिलाओं के सेंसिटाईजेशन से मुझे लगता है कि कहीं न कहीं प्रभाव पड़ा। यह मुद्दा बना। कोई भी हुनर या ज्ञान व्यर्थ नहीं जाता इसलिए इन कार्यक्रमों में हमने उन्हें ज्यादा से ज्यादा भाग लेने को कहा।

मुझे याद है कि जब पहली बार मैंने अपनी सास को कहा कि मैं गांव के आंगनवाड़ी को देखूंगी तो उनका कमेंट आया कि इतने साल हो गए हमने तो कभी कहा नहीं कि हम गांव में जाएंगे और ये आंगनबाड़ी देखने को कह रही है। वे काफी दुखी हो गयीं। उनके लिए यह सांस्कृतिक आघात था। मैंने कहा कि मैं ही नहीं जाउंगी, मैं चाहूंगी कि मेरे साथ आप भी चलें। आजतक जो आपने नहीं देखा, वह हम सब मिलकर साथ देखे। चलिए हम दोनों साथ शुरू करते हैं। फिर हम दोनों साथ गए। हमें यह देखकर बहुत दुख हुआ कि वहां न दरवाजा है, न खिड़की। जब पढ़े लिखे लोग ही रूचि नहीं लेंगे तो वह जगह सुधरेगी कैसे? जो मुखिया थी वह अनुसूचित जाति से थीं। मेरी सास को लगा कि जब वह मुझसे मिलेगी तो वह कैसे बैठेंगी, जो आज तक हमारे सामने बैठे नहीं। हमें उन्होंने अपने घर चाय पर बुलाया। आज तक जो नहीं हुआ उन सभी बैरियर को मैंने तोड़ा, मैं वहां गयी उन्हें अपने यहां बुलाया। उनको आदर दिया। स्कूलों में भेदभाव खत्म करने का प्रयास किया। पहले यह मानसिकता थी कि ये बच्चे नहीं पढ़ेगे तो खेत में काम करने वाले आसानी से मिल जाएगे। पढ़-लिख जाएंगे तो उनकी आकांक्षाएं बढ़ जाएंगी। इसलिए मैने सोचा कि इस परंपरागत सोच को बदलने की शुरूआत घर से की जानी चाहिए।


पति मनोज कुमार सिंह (आई०ए०एस०). प्रमुख सचिव,पंचायती राज,उत्तर प्रदेश के साथ

मेरे ससुराल और मायके के घर के बीच की दूरी लगभग 45 मिनट की है। आना-जाना लगा रहता है। पहले से व्यवस्थाएं काफी सुधरी है। सड़क पहले से अच्छे हुई। लेकिन अभी भी मैं मझई गांव में देखती हूं कि पांच बजे सबेरे मंहिलाएं में शौच के लिएं बाहर जाती है। कारण है कि मुखिया ने एक कम्युनिटी शौचालय तो बना दिया है लेकिन सबके घरों में नहीं बन पाया है। जो बना भी है उसका रखरखाव ठीक से नहीं होता है। अभी भी यह चुनौती बनी हुई है। हालांकि मैंने मुखिया पर दबाव डाला तब कई शौचालय बने हैं। स्वभाव में बदलाव के लिए बच्चे संभावक का कार्य करते है। यदि वे शिक्षित होते है तो वह अम्बेस्डर का काम करते है। गांव में हमने खूब पेड़ लगाया और बच्चों को भी प्रोत्साहित किया कि पेड़ लगाओ। धीरे-धीरे उनके माध्यम से बदलाव आएगा। हमारे गांव में घर के आसपास ज्यादा अनुसूचित जातियों के लोग रहते है। मुसहर आदि जातियों के लोग बड़ी संख्या में है। चार-पांच घर ही ठाकुर परिवार है। इनका व्यवहार थोड़ा कठोर होता है। अन्य जातियां हाशिये पर है। इस मौके पर मुझे एक घटना याद आती है कि एक दिन एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को शराब पीकर पीट दिया। मैं गांव में ही थी। हम कुछ महिलाओं को लेकर गई और कहा आगे यदि यह हुआ तो सब मंहिलाओं के हाथ में लाठियां आ जाएगी। हमारे पति की दादी काफी प्रगतिशील थी। मुझे यह तो नहीं पता था कि वह इन घरों के अंदर जाती थी या नहीं, लेकिन उनके दुख-सुख का ख्याल रखती थी। हम इधर-उधर या दिल्ली में सभाओं में बात तो काफी करते है कि ऐसा होना चांहिए लेकिन यह जमीन पर कितना हो रहा है यह ज्यादा जरूरी है। केवल बोलने का कोई फायदा नहीं है।
ग्रामीण समाज में ठहराव ज्यादा है। लोग अभी भी बदलाव को स्वीकार नहीं करते है, हालांकि बदलाव एक सतत प्रक्रिया है। यह उम्मीद जरूर है कि मझई गांव भी देश के अन्य गांवों की तरह धीरे-धीरे बदलेगा, आगे बढ़ेगा और इस बदलाव की प्रक्रिया में हम अपने हिस्से का जवाबदेही जरूर निभायेंगे। हम अपनी शैक्षणिक योग्यता और उससे जो हासिल है उससे गांव में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। जो क्षमता हममें हैं उसकी बदौलत हम कुछ कर सकें तो गांव आगे बढ़ेगा। सिर्फ मैं नहीं, सब को साथ मिलकर उत्प्रेरक की भूमिका निभानी है। यह हमारी जवाबदेही भी है। इसी तरह का एक प्रयास हमने किया।
(लेखिका निदेशक, महिला व बाल कल्याण विभाग एवं सामाजिक कल्याण विभाग, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में कार्यरत हैं।)

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