
आप जब प्रकृति को देते हैं तो प्रकृति भी आपको बदले में भरपूर देती है। बेहर बिट्टल में उसी प्रकृति ने हमें राह दिखाया। हमें एक जगह पर ढ़ाई फूट की परिधी में मिट्टी में नमी दिखी। गांव वालों और अपने सहयोगियों को दिखाया तो उन्हें भरोसा नहीं हुआ। सही है आप चलते तो अकेले हैं लेकिन शुरूआती परेशानियों के बाद, टोक टाक, ना नुकूर के बाद कारवां बनता चलता है। हमने सहयोगियों की मदद से ढ़ाई फुट का गड्ढा खुदवाया। कनीय अभियंता से मिली। उन्हे साथ लिया और उस जगह पर आई, तो उन्होंने कहा कि भगवान ने आपकी सुन ली, यहां तो पानी है। इस तरह से शुरू हो गया नये डगर पर नया सफर। बाकी था सिर्फ अपने सपनों में रंग भरना।
एक पांव दिल्ली तो दूसरा रहा बेहर बिट्ठल में
प्रकृति ने पानी दी तो चाहती तो उस जगह पर टाईल की फैक्ट्री, टाउनशिप या बॉटलिंग प्लांट लगाकर अपने लिए व्यवसाय के अन्य विकल्प बना सकती थी। लेकिन जब मैने पीपल के पेड़ के नीचे ठांव बनाकर उम्मीदों की पौध लगानी शुरू की। इस प्रक्रिया में सबसे पहला नंबर तुलसी का ही था। तीन साल तक चट्टान-ठोस मिट्टी पर एक उम्मीद की फसल उगाने के लिए डटी रही। बड़ी बात ये थी जो जमीन मिली थी वो भले ही उपजाउ न हो लेकिन थी बिल्कुल रासायन मुक्त। इस बीच गांव के लोग हमारा वहां जाना,रूकना,पौधे लगाने में तन्मयता से जुटा देखकर लोग यह भी सोचते रहे पता नहीं शहरी महिला आई है। बड़ी गाड़ी में आई है। क्या दिखाने आई है? राजनीति तो नहीं करना। सिरफिरी तो नहीं है। थोड़े दिन में रो पीट के चली जायेगी। ऐसी आवाजें भी सुनाई देती। लेकिन नियती को कुछ और मंजूर था।
पॉली हाउस बना शुरू किया नर्सरी का काम
हमने नर्सरी लगाने के लिए सात पॉलीहाउस लगाए। बागवानी तैयार होते गए और जो खेत कल तक सूखे दिखते थे वो समय के साथ हरे—भरे होने लगे हैं। हमारी कोशिश है कि ये पूरा गांव और इस क्षेत्र को ड्रैगन वैली में बदल जाये और उसी रूप में पहचाना जाये। ड्रैगन एक विदेशी फल है। हमने यहां इस फल के 3,000 पौधे लगाए हैं। इससे किसानों का भविष्य उज्जवल होगा।
आप हमारी सफलता को इसी बात से समझ सकते हैं कि जिन इलाकों में जानवर फसल बर्बाद कर दिया करते थे। बंदरों और नीलगाय का उत्पात था, लोग खेती छोड़ने लगे थे। वहां हमने वैज्ञानिक तरीके से खेती करते हुए इन सब समस्याओं का समाधान ढूढ़ लिया है। सर्पगंधा की वजह से सांप नहीं आता। अश्वगंधा के पौधे से बंदर दूर रहते हैं और हमें अपनी खेती के लिए किसी बाड़बंदी की जरूरत नहीं है और खेती हो रही है। जंगली जानवरों ने उनके मोरिंगा के पौधों को दो या तीन बार नुकसान पहुंचाया, हालांकि अश्वगंधा के पौधों को बिल्कुल भी नष्ट नहीं किया।
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आवारा कही जाने वाली गायों को दिया आसरा
हरित क्रांति के दौर में जिस तरीके पैदावार बढ़ाने के लिए हमारे जीवन में रसायन लाए, जिसने हमारे स्वास्थ्य, हमारे खेतों और हमारे पर्यावरण को नष्ट कर दिया,उसके दुष्परिणाम से हम सब अवगत हैं। अब समय आ गया है कि हम खेती के अपने पुराने तरीकों पर वापस जाएं। खेती का पुराना तरीका हमें यही बताता है कि हम रासायन का प्रयोग न करें और परंपरागत तरीके से बिना रासायन का प्रयोग किये उर्वरा शक्ति को बनाये रखें ताकी पैदावार प्रभावित न हो। वैसी गायें जिनके दूध से हमारा परिवार पलता रहा और वही गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो लोग उसे जंगल में छोड़ देते हैं। भले ही उन्हें पशु खा जाये या वे कुछ भी खायें। हमने इन गायों के लिए गौशाला बनवाया और उनके खाने का इंतजाम किया। बदले में उनसे गो मूत्र और गोबर मिलता है,उनका प्यार मिलता है और उसी गोमूत्र,गोबर और प्यार की रासायन का प्रयोग हम जीवामृत बनाते हैं और गोबर से वर्मी कंपोस्ट बनाते हैं और खेत के साथ पौधों को पोषक तत्व प्राप्त होता है। इतना ही नहीं हमने गांव के लोगों से बोला कि जो लस्सी वे फेक देते हैं वो हमें दे दें। उस लस्सी को हम खरीदते हैं और उसे एकत्रित कर गोबर,गुड़,केले में मिलाकर वर्मी कम्पोस्ट तैयार करते हैं। यह कम्पोस्ट खुद के खेत में भी इस्तेमाल होता है और गांव के किसानों के भी इस्तेमाल में आता है।
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जिला प्रशासन के सकारात्मक रूख से बदली फिजा
अपर आयुक्त डॉ अमित शर्मा के सहयोग से हमने कार्यशालाएं आयोजित कीं, किसानों से व्यक्तिगत रूप से बात की और उन्हें फसलों के विविधीकरण के लिए राजी किया। इस दौरान विशेषज्ञों के साथ उनकी बातचीत और नर्सरी में उनके दौरे का भी आयोजन किया। औषधीय पौधों के महत्व को सही तरीके से समझने में कोरोना काल भी मददगार साबित हुआ। क्योंकि लोग इस दौर में टीवी पर हो रहे प्रचार से गिलोय और अश्वगंधा सहित अन्य औषधीय पौधों का महत्व समझने लगे थे।
जिला प्रशासन से प्रेरणा पा गांव के भी 21 किसानों ने अश्वगंधा और मोरिंगा की अंतर-फसल से शुरुआत की। जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के उप निदेशक सह परियोजना अधिकारी संजीव ठाकुर का भी काफी सकारात्मक सहयोग मिला। बेहर जसवां पंचायत के दो गांवों में चल रहे जिला प्रशासन की संजीवनी परियोजना के तहत कुल 77,400 पौधे – अश्वगंधा के 62,950 और मोरिंगा के 14,450 पौधे वितरित किए गए। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए मनरेगा के तहत प्रत्येक किसान 1 लाख रुपये की सहायता का हकदार था – श्रम के लिए 60% और सामग्री के लिए 40% रकम देने की व्यवस्था की गई। बड़ी संख्या में किसानों को इसका लाभ मिला। मनरेगा योजना से जुड़ जाने के कारण किसान को मजदूरी भी मिल जाती थी और खेती को लाभ भी होता था। इसके साथ आयुष योजना भी चलाया जा रहा है जो औषधीय वृक्षारोपण पर सब्सिडी देती है। साथ ही साथ किसानों के फसल की खरीदगी की व्यवस्था भी जिला प्रशासन द्वारा की गई है। हमने भी इस तरह की व्यवस्था की है। उम्मीद है कि आगे चलकर ये राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत होने लगे और किसानों को इस तरह की खेती से और अधिक वित्तीय लाभ मिले। क्योंकि किसान तभी औषधीय कृषि से जुड़ा रहेगा जब आर्थिक लाभ मिले नहीं तो बाकी बातें बेकार हैं। आज हमारी हल्दी 100 से लेकर 160 रूपये प्रति किलो तक बिकती है। जैविक गेहूं 80 से 160 रूपये प्रति किलो तक बिकता है।
भले ही मैं कोरोना काल में कोरोना की शिकार हो गयी लेकिन निगाहें बेहर बिट्टल की लगी हुई थीं। बेहर बिट्टल गांव बदल रहा है। बेहर जस्वां पंचायत के सभी 13 गांव बदल रहे हैं। भले ही बेहर बिट्टल की आबादी कम हो। 40—50 घर ही हों लेकिन बेहर जस्वां पंचायत में 12 गांव हैं। लगभग 4000 हजार की आबादी है और ये सभी गांव मिलकर औषधीय खेती के जरिए देश प्रदेश में नया मुकाम गढ़ेगे ये उम्मीद भी है और सपनों को पूरा करने की दिशा में हमने तेजी से कदम बढ़ाया है इस बात का संतोष भी। अश्वगंधा सिर्फ बाबा रामदेव की कहानी नहीं है बल्कि इस उना जिले के इस छोटे से गांव बेहर बिट्टल और बेहर जस्वां पंचायत की भी कहानी है। अब न सिर्फ महिलायें बोल रही हैं, मुंह खोल रही हैं बल्कि समवेत स्वर में पूरा गांव, पूरा पंचायत ही बदलाव की आवाज लगा रहा है, बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
(प्रगतिशील महिला किसान व इंडकेयर ट्रस्ट की रीवा सूद पिछले 30 वर्षों से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में आम जनजीवन को प्रभावित करने वाले जमीनी मुद्दों पर कार्य करते हुए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में हाशिए पर रह रहे समाज के सामाजिक, आर्थिक
और शैक्षणिक विकास के लिए कटिबद्ध हैं।)
हिमाचल के बेहर बिट्टल गांव की कहानी पहली कड़ी….
तू बोलेगी, मुंह खोलेगी, तो जमाना बदलेगा… और यूं बदल गया हिमाचल का बेहर बिट्टल गांव











