
मेरा गांव झारखंड में धनबाद जिला के बरमसिया में है। आज गांव में विकास की बयार है। यह शहरीकृत गांव 1857 के आसपास बसा जब ब्रिटिश सेना ने यहां कैंप लगाया था। आगे चलकर यहां बाल्टी व कांटी फैक्टी लगाई गई थी। 1950 तक सौ-डेढ़ सौ घर थे। बरमसिया गांव के चार कर्णधार माने जाते थे। ये चारों अलग-अलग जगहों से आये थे। केदार सिंह, यमुना प्रसाद सिंह, आनंदी सिंह और रामविलास सिंह। केदार सिंह डीसी ऑफिस में क्लर्क थे, यमुना प्रसाद सिंह, आनंदी सिंह भी नौकरी करते थे। जबकी रामविलास सिंह व्यवसायी थे। मैं रामविलास सिंह के परिवार का वंशज हू। मूल रूप से बिहार के जमुई जिले के पीरंिहन्दा गांव से 1960 के आसपास हमारा परिवार धनबाद आकर बसा। दादाजी यहां आए थे। पिता का नाम विनय सिंह था जो कोयला की दुकान के साथ ही आंटा व तेल मिल चलाते थे। मां अर्थशास्त्र में स्नातक थीं। पिताजी की इच्छा थी कि बेटा पढ़ लिख कर नौकरी करे। कहा करते थे-पढ़ोगे तो अपना करोगे, नहीं पढ़ोगे तो कोयला बेचोगे। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद बहुत सारे हिंदू शरणार्थी भी आए। लगभग 25 बंगाली शरणार्थियों का परिवार मेरे गांव में बसा। कुछ संपन्न जमींदार परिवार के लोग भी पुरूलिया आदि जगहों में जमीन बेचकर यहां आ बसे। इनके आने से गांव में संगीत, नाटक आदि का सांस्कृतिक वातावरण बना।

पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में बाहर रहने से मैं तो गांव में कम ही रह पाया हूं लेकिन गांव में बीता समय हमेशा याद रहता है, खासकर चापाकल से पानी लाने की आपधापी। 300 घरों के लिए इकलौता चापाकल, जिसके सामने गैलन लगा दिया। जबतक नंबर आए इस बीच साथियों के साथ गूल्ली डंडा का खेल, मंदिर के आंगन में कबड्डी। नंबर आया तो पानी भरा। लेकिन आज उस चापाकल से नहीं, घर-घर सप्लाई का पानी आता है। पर इस चापाकल के जरिए जो सामाजिकता बनती थी, जो मेलजोल था वह भी कम हो गया है।
इसके साथ ही याद आता है गांव का जंगल। जहां जाने की बेचैनी हर बच्चे के अंदर होती थी और सारे बच्चे इकट्ठा होकर तरह-तरह के खेल खेलते थे। अब खेल के मैदान की जगह घर बन गए हैं। घर से दो किलोमीटर दूर गांव का जंगल, आज जंगल भी नहीं रहा। पहले जहां गांव में दो सौ या तीन सौ परिवार हुआ करते थे, जो अब पांच हजार परिवारों का गांव हो गया है। आज न वह चापाकल रहा, न फुटबॉल का खेल और न ही जंगल।
संस्थागत ढांचे के विकास के लिहाज से देखें तो गांव विकसित हुआ है। चौबीसों घंटे बिजली की सुविधा है। सरकारी डिस्पेंसरी नहीं है लेकिन प्राइवेट डॉक्टर हैं। पैसा खर्च करके इलाज की सुविधा है। हालांकि पहले गांव अलग-थलग था लेकिन आज पहले की तुलना में देश दुनिया से ज्यादा जुड़ा हुआ है। मंदिर गांव के सामाजिकता का केंद्र होता था। जहां समय सुबह की शुरूआत कीर्तन से होती थी। महिलाएं कीर्तन करती थीं और अहाते में दोपहरी में लूडो खेलती थीं। समय-समय पर रामचरितमानस का पाठ होता था, अष्टयाम का आयोजन होता था। मंदिर का कीर्तन बंद हो गया है, उसकी जगह डीजे आ गया। अब किसी का गार्जियन किसी अपने बच्चों को ऐसे सामाजिक आयोजनों में जुड़ने के लिए मंदिर नहीं भेजता। इन सबके बावजूद गांव में दुर्गापूजा में बड़ी जुटान होती है। बाहर में रह रहे ज्यादातर युवा इस अवसर पर गांव आते हैं। दुर्गा मंडप सजता है। इस पूजा की विशेषता है कि दलित द्वारा पूजा कराई जाती है। रामपती पासवान नामक दलित महिला पिछले 50 साल से पूजा कर रही हैं। लगभग 50 साल से गांव के मौलवी इकबाल साहब अपनी खुशी से कपड़ा देते हैं। इस लिहाज से हमारा गांव सौहार्द की मिशाल पेश करता है।
पैतृक गांव पीरहिंदा
मेरा पैतृक गांव जमुई जिले के सिकंदरा प्रखंड में पीरहिंदा है जो बिगडकर हिंदा से हिन्डा हो गया है। यह बिहार की राजधानी पटना से 137 किलोमीटर और जिला मुख्यालय जमुई से 24 किलोमीटर दूर है। वहां पीर साहब की दरगाह है जिनपर गांव के हिंदू भी काफी श्रद्धा रखते हैं। यह राजपूत बहुल लगभग 10 हजार की आबादी वाला एक बड़ा गांव है। इस गांव की एक प्रमुख खासियत यह है कि हमारे गांववासी चाहे कहीं भी रह रहे हों, लेकिन बच्चे का मुंडन संस्कार करने अपने गांव ही आते हैं। यह सामाजिक एकजुटता का बेहतर जरिया है।
रोजी-रोजगार की समस्याओं के बावजूद मैं समय-समय पर अपने पैतृक गांव जाता रहता हूं। मेरे दादाजी थे, तबतक तो प्रत्येक साल गांव जाया करता था। गांव जाना अच्छा लगता है जो गांव मेरी स्मृतियों में बसा हुआ है उसमें गांव के तालाब की स्मृतियां जीवंत हैं। बचपन में उसी तालाब में गांव के अन्य बच्चों के साथ नहाना मुझे बहुत अच्छा लगता था। पेड़ पर चढ़कर पोखर में छलांग लगाना हमारा महत्वपूर्ण खेल था। गावं जाते समय हमलोग अपने साथ बैट, फुटबॉल आदि खेलने का सामान साथ ले जाते थे। गांव एक बड़ा परिवार ही होता है और इस बड़े परिवार के बच्चों के साथ मिलजुल कर ग्रामीण जीवन का आनंद लेते हुए कब छुट्टियां खत्म हो जाती थी, पता नहीं चलता था। बदलते समय के साथ पोखर का घाट पक्का हो गया है। सड़कें पक्की हो गयी हैं। बचपन में सिर्फ मेरा घर ही पक्के का था, ज्यादातर मकान खपरैल थे। तब जो खपरैल मकान हुआ करते थे, वो अब पक्के हो गए हैं। गांव के बीचों बीच धनराज सिंह महाविद्यालय है, जहां गांव के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हैं।
हमारे जीवन में जो भी बदलाव आया है वह शिक्षा की बदौलत ही आया है। इसलिए गांव के कुछ नौजवानों ने मिलकर शिक्षा के जरिए और गांव-समाज के आपसी समन्वय से गांव में बदलाव लाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए हमने पीरहिंडा विकास केंद्र बनाया है। इस संस्था का गठन देश के अलग-अलग क्षेत्रों और विष्व के विभिन्न देशों में रह रहे गांव के नौजवानों द्वारा किया गया जो गांव की खुशहाली चाहते हैं। इन नौजवानों की तमन्ना है कि उनका गांव भी विकसित हो और आदर्श बने। संस्था के संचालन में मुख्य भागीदारी उन नौजवानों की भी है, जो बिहार में ही रह रहे हैं। यह एक गैर सरकारी संगठन है जो पूरी तरह से गैर राजनीतिक, धार्मिक भेदभाव रहित संगठन है। जिसका उद्देष्य आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों को निशुल्क शिक्षा मुहैया कराने के साथ ही उन्हें विभिन्न तरह के प्रशिक्षण देकर रोजगार में लगाना है ताकि गांव खुशहाल हो सके।
गांव में स्वामी विवेकानंद के नाम से पुस्तकालय बनाया गया है जिसमें रखी ज्यादातर किताबें लोगों ने दान दिया है। इसके संचालन की व्यवस्था लोगों से मिली राशि से की जाती है। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं और एक बेहतर माहौल बना है। हमारा ध्यान इसपर भी होता है कि गांव का जो नौजवान आगे की पढ़ाई के लिए बाहर जाना चाहता हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहता हैं, उसे गांव में ही उपयुक्त माहौल मिले। इसके लिए हमने गांव में ही कोचिंग सेंटर की व्यवस्था की है, जहां बाहर से शिक्षकों को बुलाकर पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है। इसके साथ ही गांव की साफ-सफाई और स्वास्थ्य के प्रति ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए भी समय-समय पर ग्रामीणों की सहभागिता से अभियान चलाए जाते हैं। इसके लिए ज्वॉय ऑफ गिविंग वीक मनाया जाता है और इस दौरान हमलोग लोगों को सैंडविच खिलाते हैं। इसे हमने सेवा सैंडविच का नाम दिया है। इस मौके पर अपने ग्रामीण उत्तम कुमार को याद करना समीचीन होगा जो जर्मनी के हेला कंपनी में आईटी इंजीनियर हैं। पीरहिंदा विकास परिषद के गठन, उसकी गतिविधियों के संचालन के साथ ही गांव से बाहर रह रहे लोगों को एक मंच पर लाकर गांव के विकास से जोड़ने में उनका प्रयास अहम है।

आप जब गांव से निकलकर बाहर आते हैं, अच्छी नौकरी करते हैं तो गांव आपकी तरफ उम्मीद से देखता है। यदि गांव की उम्मीदों पर खड़ा उतर सकूं, उसके विकास में योगदान दे सकंू, ग्रामीणों के जीवन में सीमित संसाधन और सीमित समय के बावजूद रंग भर सकूं तो काफी खुशी होगी क्योंकि जो कुछ दिया है परिवार ने दिया है, गांव से सीखा है और गांव को ही देना चाहता हूं।
(सीईओ, प्रधानमंत्री जन-औषधि परियोजना,दिल्ली)











