बारह वर्ण, 22 टोले में बसा है मुजफ्फरपुर जिले का जारंग पश्चिमी पंचायत.. हरेक जाती के टोले में अलग-अलग कुआं

अमरजीत पासवान
गायघाट: मुजफ्फरपुर जिले का असिया गांव। यह गांव गायघाट प्रखंड के जारंग पश्चिम पंचायत में है। यदि पूरे पंचायत को केंद्र में रखकर परंपरागत जल स्रोतों मसलन, कुएं,तालाब, पोखर, मन यानी न​दी जैसे साधनों का जल आडिट आपके सामने रखूं तो सबसे पहले जारंग पश्चिमी पंचायत के से जुड़े गांवों की चर्चा समीचिन होगी। जारंग पश्चिमी पंचायत 22 टोलों का पंचायत है। लगभग 5 किलोमीटर के चौहद्दी में फैले इस गांव की आबादी लगभग 10,000 हजार होगी और मतदाता सूची में 6000 मतदाता हैं। वैसे तो गांव के विभिन्न टोलों का नाम हैं जारंग टोंक, डीह जारंग,चंद्रहास नगर, जारंग-असिया, जारंग बलुआहां टोंक, जारंग, कहार टोला, सहनी टोला, मल्लाह टोला,नोनिया टोला,मुसहरी टोला,ग्वाला आदि। यानी हमारे पंचायत पश्चिमी जारंग में सभी 12 वर्ण यानी जातियों के लोगों का निवास है। पंडित, राजपूत, ग्वाला, मुसहर, सहनी, पासवान, चमार, कुर्मी,धोबी आदि सभी जाती के लोग हैं।

जारंग हाई स्कूल का शिवमंदिर

 

असिया बाजार का मिडिल स्कूल
मेरे पिता नन्हु पासवान

इस तरह से हमारा गांव यानी जारंग पश्चिम पंचायत बड़ी आबादी,सांस्कृतिक गतिविधियों, पढ़ाई लिखाई,बाजार हाट के मामले में काफी जीवंत हैं। जारंग पश्चिमी पंचायत में उच्च विद्यालय, मध्य विद्यालय, कॉलेज सब हैं। गांव में लगने वाले दो हाट लोगों के गंवई जरूरतों को पूरा करने का साधन होने के साथ ही गांव के लोगों के मेल जोल का जरिया भी है। यह हाट शनिवार और मंगल वार को लगता है। गांव के तीन महत्वपूर्ण चौक हैं जारंग चौक, असिया चौक, असिया हाट। हर धार्मिक परंपराओं में बढ़ चढ़कर भागीदारी करने वाले हमारे गांव में कई मंदिर भी हैं। जारंग असिया में दो शिव मंदिर है, और दो दुर्गा मंदिर भी है।

यदि जारंग पश्चिमी पंचायत के परंपरागत जल स्रोतों की बात की जाये तो कहानी शुरू होती है कचहरी से। कचहरी यानी अंग्रेजों के समय की बनी हुई हवेली से। इसके पास लगभग 3 किलोमीटर लंबाई और एक किलोमीटर चौड़ाई का पोखरा है जिसे आसिया पेठिया का पोखर कहा जाता है। 5 बिगहे से ज्यादा जमीन में फैले इस परंपरागत पोखर जिसे गांव के लोग मन यानी नदी कहते हैं के चारों तरफ अलग-अलग जातियों के विभिन्न टोले बसे हुए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि दीयर के मालिक यानी त्रिपत सिंह, बाबू बीलट सिंह वगैरह ने यह पोखर खोनवाया था। यहीं बनी हुई है कचहरी और अब इस कचहरी के कर्ता धर्ता हैं बृद्धू महतो जिसे आज कचहरी का मालिक कहा जाता है।
मन यानी उस नदी के किनारे आज भी दीयर के मालिक का कचहरी है जिसे परंपरागत बोलचाल में लोग दियरिया मालिक भी कहते थे। यह कचहरी बहुत बड़ा हवेली टाइप का है उसी के साथ हमारे गांव का प्राइमरी स्कूल है जो पहले 5 वीं कक्षा तक था अब सातवीं कक्षा तक हो गया है। इस स्कूल के निर्माण की ठेकेदारी मेरे पिता नन्हु पासवान के पास ही थी। जब हम इस स्कूल में पढ़ा करते थे तो स्कूल के पिछवाड़े में एक कुआं था जो हम उसी कुएं का पानी पीते थे। हालाकि अब यह कुआं बंद हो गया है।
जारंग पश्चिमी पंचायत के विभिन्न टोलों की विशेषता को यदि चंद लाईन में रखना चाहूं तो अलग-अलग जातियां अलग-अलग टोलों में बसी हुई हैं। और प्रत्येक टोले में कुआं हैं। हर कुएं के पास पीपल का पेड़ या बरगद का पेड है। ये सारे कुएं अलग-अलग जातियों के लोगों ने अलग-अलग समय में खुनवाया। इनमें से कुछ कुएं अभी भी चालू हैं तो ज्यादातर कुएं भर दिए गये।

सारा फोटो एवं इनपुट आलोक राज

बात यदि जारंग पश्चिमी पंचायत के असिया चौक की बात की जाए, जहां वर्तमान में हमारा घर है तो असिया चौक पर एक पाकर का पेड़ था। जिसे हमारे दादाजी उचित पासवान ने उस वक्त लगाया था जब वे चोरनिया राजपूत टोला से निकल अपना गांव यहां बसाये। इस चौक की खासियत यह है कि हमारे गांव के सभी 10 टोलों का मुख्य द्वार यही है। खैर बात तो बात हो रही थी गांव के परंपरागत जल स्रोतों की। सबसे पहले चर्चा करते हैं गांव के विभिन्न कुओं की तो पहला कुआं हमारे स्कूल में था। यदि दूसरे कुएं की बात करूं तो हमारा गांव का एक टोला है राय जी का टोला। आशिया जहां पर एक आटे का चक्की है उसके पास एक कुआं है। कुआं तो बंद हो गया है लेकिन आटे का चक्की आज भी है और उसमें से वह पुक- पुक-पुक-पुक की आवाज आज भी आती है।
जारंग पश्चिमी पंचायत का तीसरा कुआं जारंग हाई स्कूल के पास है जो आज भी चालू है। वहां पर एक भोलेनाथ का मंदिर है। छोटा सा पोखर है और वहां हर साल सरस्वती पूजा के समय पर मेला लगता है। हमें आज भी याद है हम लोग बचपन में बड़े उत्साह से मेला देखने जाते थे। वहां पर जो कुआं है आज भी जिंदा है और उस कुएं का पानी आज भी पीते हैं लोग और मंदिर से जुड़ा सारा काम, पूजा-पाठ उसी कुआं के पानी से होता है।
एक कुआं हमारे गांव का कुर्मी टोला में है। जहां पर नदी के किनारे छठ का घाट भी बना हुआ है। इसी के बराबर में कुआं है जो आशिया का कुरमीटोला का कुआं कहलाता है। और चौथा कुआं हमारे आशिया गांव के नोनिया टोला में है जहां पर नोनिया लोगों की ज्यादा आबादी है। यहां पर कुआं होने के साथ ही नदी के किनारे विशाल पीपल का पेड़ है जो आज भी आस पास के लोगों को छावं देता है और ऑक्सीजन मिलता है।
इसी तरह गांव का पांचवा कुआं कहार टोला में है जहां पर कहारों की ज्यादा जनसंख्या है इसलिए उसको कहार टोला कहा जाता है। छठा कुआं जारंग टोला में है जहां पर क्षत्रिय लोगों का टोला है। इसके साथ ही एक कुआं हमारे पंचायत के मल्लाह टोला में है जहां पर मल्लाहों की संख्या ज्यादा है इसलिए उसको मला टोला बोला जाता है वहां पर भी एक कुआं है।

इसके अलावां गांव का एक कुआं बलुआहां टोक पर है। यह टोला भी नदी के किनारे बसा हुआ और उसको बलुआहां बोलते हैं। यह कुआं अभी भी चालू है। कुआं चालू होने के साथ ही इसके पास एक विशाल बरगद का पेड़ है जिसके छांव में गर्मियों में लोग बैठते हैं। आने जाने वालो मुसाफिरों का ठावं है और सभी उस कुएं का पानी पीते हैं यह हमारे गांव की विशेषता
जारंग पश्चिमी पंचायत का आठवां कुआं आशिया गांव में कुम्हार टोला में है जहां कुम्हारों की आबादी ज्यादा है। अब यह कुआं बंद हो चुका है। उस कुएं के पास भी 20 साल पीपल का पेड़ है जो कि कभी आने जाने वाले मुसाफिर उस पीपल के पेड़ के नीचे बैठते थे और उस कुमार का पानी पीते थे वहां पर एक काली माता का मंदिर भी है
एक कुआं अर्शया गांव के बढ़ई टोला में है। इस टोले पर बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी भी है। इसी तरह एक कुआं लोहार टोली में, कुर्मी टोली में है। यानी जहां जिसकी अधिक संख्या है उस टोले पर एक कुआं जरूर है। इस कुएं की भी यह खासियत है कि उस कुएं के पास भी एक विशाल पीपल का पेड़ है। कुआं भले ही बंद हो गया है लेकिन पीपल का पेड़ आज भी वैसे के वैसे ही है।
यदि जारंग पश्चिम पंचायत में कुआं बनवाने वाले के नाम और कुआं निर्माण की तिथी को देखा जाए तो
राम प्रेम महतो— 1955
स्व. वायां महतो— 1970
स्व भीम सिंह— 1986
स्व गुरूचरण दास— 1990
स्व विलट सिंह— 1992
स्व सुखदेव महतो— 1998
स्व महिप सिंह— 1977
इसमें राम प्रेम महतो द्वारा बनवाया गया कुआं अभी भी चालू है। सुचित सिंह द्वारा निर्मित कुआं भी अभी काम में आता है, लेकिन स्व भीम सिंह और गौतम कबीर द्वारा निर्मित कुआं बंद हो गया है। गांव में कुओं के साथ ही नदी, पोखर तालाब भी है और जिस पोखर पर छठ होता है उसके सीढ़ी का निर्माण गंगा सिंह ने ग्रामीणों की सुविधा के ​लिए करवाया था।

गांव में हर घर नल के जल की टंकी

इन सब के बावजूद यदि जारंग पश्चिम पंचायत में परंपरागत जल स्रोतों के सहेजने की बात की जाये तो इस मामले में गांव उदासीन लगता है। भले ही पर्व त्योहार के मौके पर लोगों का ध्यान कुएं, तालाब, पोखर की ओर जाता हो लेकिन पेयजल के लिए गांव नीतीश सरकार के हर घर नल के जल के उपर निर्भर होता जा रहा है और जगह—जगह आपको सार्वजनिक स्थानों पर पानी का टंकी और जल के लिए टोंटी लगे हुए दिखाई देंगे। हालांकि मछली पालन के उद्देश्य से कुछ लोगों ने छोटे पोखर जरूर बनवाये हैं। बावजूद इसके सार्वजनिक जल स्रोतों के प्रति ग्रामीणों की उदासीनता निराशा पैदा करती है और भविष्य के प्रति चिंता भी।

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