उदारीकरण, उद्योगीकरण के बावजूद श्रम की कीमत से वंचित ग्राम समाज

प्रशांत कुमार यादव
आईएएस,संयुक्त सचिव,मुख्यमंत्री दिल्ली

नैनों में था रास्ता, हृदय में था गांव
हुई न पूरी यात्रा, छलनी हो गए पांव

(निदा फ़ाज़ली)
हमारे ग्रामीण समाज में आये महत्वपूर्ण बदलाव के लिहाज से 1990 का दशक काफी महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इस दौरान पंचायती राज संस्थाओं में बदलाव, मंडल आयोग, उदारीकरण, सूचना तकनीक के जरिए गांव में बड़े बदलाव आये। इसने पूरी ग्रामीण व्यवस्था के आमूलचूल बदलाव में अहम भूमिका निभाई। उसके पहले के गांव परंपरागत आचार,व्यवहार, संस्कार को समेटे आगे बढ़ रहे थे। कम से कम उपभोग की हमारी संस्कृति में हमारे गांवों की जरूरतें चूल्हे, भगोना,मिट्टी के बर्तन आदि तक ही सीमित रही और अभाव के बावजूद जीवन में संतोष का भाव रहा। लेकिन 1990 के दशक में आये बदलाव के दौरान हमारे गांव शहर बनने की होड़ में शामिल हो गए। इस प्रक्रिया में हमारे गांव जो सदियों से एक तरह के अंर्तसंबंध को समेटे,सहेजे हुए आगे बढ़ रहे थे, उसमें बिखराव देखा गया। ये बिखराव सकारात्मक था अथवा नकारात्मक इस पर लोगों की राय अलग—अलग हो सकती है, लेकिन गांव की स्वायत्तता, ग्रामीणों की एकजुटता, जातियों के बीच के अंर्तसंबंध व्यापक तौर पर प्रभावित हुए।
रोजगार के अवसर, परिवहन के साधन, संचार और सूचना के माध्यमों की तलाश में लोग शहर की ओर गये या ये भी कहा जा सकता है कि शहर का विस्तार इन्हीं सब कारणों से गांव तक हुआ।

आज आप नोएडा जाईये या किसी भी बड़े शहर में जाईए एक—एक सोसाईटी में 1000 फ्लैट से ज्यादा हैं। वो गांव की जमीन पर बसे हुए हैं। गांव के हिस्से के ही पानी की खपत करते हैं, उनके हिस्से के संसाधनों पर डाका डाल इन ईलाकों का विकास होता है और कीमत गांव को चुकानी पड़ती है। क्या गांव को उनका हिस्सा मिलता है? नदियों का मुंह शहरों की ओर मोड़ दिया जाता है और ये शहरी आबादी अपने नाले का पानी ​नदियों में बहाती हैं। इस तरह से गांव जो पहले नदियों के जरिए स्वच्छ पेयजल और सिंचाई के साधन प्राप्त करता था वह प्रदूषित होती चली गई।
यदि हम अपने पुराने गांवो को देखें तो गांधी के ग्राम स्वराज का मॉडल ही हमारा परंपरागत मॉडल था। लेकिन हमें सपना दिखाया गया कि गांव शहर बन जाये। ऐसे में जब कोई आपदा आती है, लोगबंदी और नोट बंदी जैसी घटनायें होती हैं तो समझ आता है कि हम कहीं के नहीं रहे। उदारीकरण,उद्योगीकरण और पर्यावरण में गांव की हिस्सेदारी कहां गई? गांव को क्या मिला? श्रम तो गांव से ही आया था, बावजूद इसके गांव पीछे कैसे रह गए।


मेरे गांव का इतिहास 200 साल पुराना है। मेरे पूर्वज यहां अजमेर (राजस्थान) से पलायन कर यहां आये थे। भूमि काफी उपजाऊ थी। गंगा के बांगर में बसा हुआ हमारा गांव। रामगंगा की सहायक गांगन नदी गांव के पास से ही बहती है। हमारे गांव से उत्तराखंड का पौढ़ी गढ़वाल जिला काफी नजदीक है। गांव की आबादी लगभग 2000 है। लगभग 400 घर हैं। हमारा जनपद मुख्य रूप से गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। लोगों का ध्यान नगदी खेती पर है। गेहूं—चावल का उत्पादन केवल खाने पीने के लिए ही होता है। जिसके पास कम जमीन है या जो भूमिहीन हैं वे मवेशी पालन और दुग्ध उत्पादन के जरिए जीविकोपार्जन करते रहे हैं।
….महिलाओं के उत्सव वाले गीत आज भी लोकप्रिय हैं। पुरानी पीढ़ी के द्वारा बोले जाने वाले शब्द काफी लोकप्रिय हुआ करते थे। लेकिन नई पी​ढ़ी का ध्यान फिल्मी गीतों पर ज्यादा है। आज भी बचपन की होली भुलाये नहीं भूलती। होली का सांग, बच्चे—बूढ़ों, युवाओं सब के द्वारा मिलजुल कर गांव में होली मनाया जाना आज भी मन में रोमांच भर देता है। लेकिन आज होली का रंग परिवार तक सिमट गया है। बच्चों तक सिमट गया है। न मिठाई, न गुजिया, न ढ़ोल नगारे, न होली के तराने। बचपन में गांव में आयोजित होने वाले रामलीला का इंतजार होता था। सारा गांव एक सूत्र में बंधा नजर आता था। कबड्डी रेग्युलर होती थी। आज कबड्डी का स्थान क्रिकेट ने ले लिया। गिल्ली डंडा, कबड्डी, बॉलीबॉल यही गांव का खेल था। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखता हर युवा इन खेलों में हाथ आजमाता हुआ ही बड़ा होता।


गांव में बिजली वर्ष 1985 में आई।उसकी पहुंच भी पूरे गांव तक नहीं थी। पूरा बचपन लैंप की चिमनी साफ करने और लालटेन जला पढ़ाई की तैयारी में गुजरा।धार्मिक दृष्टिकोण से ग्राम देवी— चमुंडा देवी का मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में ग्रामवासी इकट्ठा होकर मंदिर पर धार्मिक आयोजन करते हैं।पूजा पाठ के बाद भंडारे का आयोजन होता है।सारे गांव में प्रसाद वितरण किया जाता है। गांव में कोई आपदा न आये या आपदा से बचाव के लिए पूरे गांव के चारों ओर दूध व पानी की धार लगाई जाती है।
गांव में सिर्फ हिंदू धर्म के लोग है। आजादी के आसपास एक परिवार मुसलिम भी था। वह परिवार किसी और स्थान पर पलायन कर गया। यदि जातिगत संरचना की बात करूं तो गांव में बड़ी आबादी यादवों की है। हालांकि पहले के समय में गांव के जमींदार त्यागी होते थे। इसके अलावा, नाई, कुम्हार,ब्राह्मण के दो घर, जाटव और डोम परिवार भी हैं। गांव के बड़े भूमिपती त्यागी ही थे। बड़े भूमिपती से मेरा आशय 50 एकड़ से ऊपर जमीन वाला किसान। ऐसे लगभग 10 परिवार रहे होंगे। लेकिन कामचोरी, अय्याशी,फिजूल खर्ची की वजह से इन परिवारों की जमीनें बिकती चली गईं तथा दुर्दशा होती गई। अब उत्तराधिकारी सामान्य जीवन यापन कर रहे हैं।


हज़ार साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
तब जाकर होता है चमन में दीदावर पैदा।

1980 के बाद स्थिती बदलने लगी। गांव में यादवों का उभार देखने को मिला। ये मूल रूप से खेती किसानी और पशुपालन करने वाली जाति है। प्रदेश में रामनरेश यादव ने राज्य सेवा आयोग मे आरक्षण का प्रावधान किया। मुलायम सिंह का शासन आते—आते आरक्षण का फायदा भी मिलना शुरू हो गया था और इसका प्रभाव समाज पर भी दिखा। खेती किसानी की दृष्टि से मेहनती हमारे ग्राम पंचायत धौलागढ़ के यादव परिवारों ने आसपास के गांव की जो भी जमीन बिकी उसको खरीदा और खेती किसानी के लिहाज से संपन्न होते गए। हालांकि भूसंपदा से संपन्न होने के बावजूद

यदि अपने परिवार की बात करूं तो दादा चौधरी शिवनाथ सिंह लगभग 25 साल तक गांव के सरपंच रहे। उन्होंने पैतृक भूसंपदा के अलावा भी काफी जमीन बढ़ाई। अब हमारे पास अच्छी जमीन है लगभग 30 एकड़। पिता ओमप्रकाश सिंह वैसे तो एमए पास थे लेकिन उन्होंने नौकरी करना पसंद नहीं किया और खेती की व्यवस्था से ही जुड़े रहे। हालांकि उन्होंने बच्चों की शिक्षा दीक्षा पर पर्याप्त ध्यान दिया।

जब मैं पढ़ाई के लायक हुआ मुझे शिशु मंदिर पढ़ने के लिए भेजा गया। यह नूरपूर कस्बे में था जो मेरे गांव से 3 किलोमीटर दूर था। जब उस स्कूल में गया तो शिक्षक कहते थे कि तुम्हारे गांव से तो कोई पढ़ता ही नहीं है। उस वक्त शिशु मंदिर में यादव परिवार के इक्का दुक्का लड़के ही हुआ करते थे। आगे चलकर गांव के अन्य बच्चों ने भी स्कूल में दाखिला लिया। इस लिहाज से देखें तो ठीक—ठाक परिवारों के बच्चे ही इस स्कूल में दाखिला लिया करते थे। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है या यूं कहूं तो मुझे इस स्वीकारोक्ति में गर्व है कि हमारे क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार प्रसार में शिशु मंदिर और सरस्वती विद्या मंदिर का अहम योगदान है कि इन्होंने ऐसे इलाकों में स्कूल खोला और शिक्षा की व्यवस्था की जहां सबकुछ सहज उपलब्ध नहीं था। आसपास के गांवों में शिक्षा के संस्कार डाले। 15 अगस्त, 26 जनवरी जैसे विशेष मौकों पर आगरा, फतेहपुर जैसे स्थानों पर जिला स्तर प्रतियोगताओं के आयोजन, संस्कार में परिवर्तन और नैतिक शिक्षा पर जोर दिये जाने से हमारे अंदर आत्मविश्वास बढ़ा। इन स्कूलों के अध्यापकों यानी आचार्यों का परिवार से काफी जुड़ाव रहता था इसलिए अनुशासन में रहने की आदत भी छात्रों में वि​कसित हुई।

इस पड़ाव पर मैं एक संस्मरण साझा करना चाहूंगा। इन स्कूलों के छात्रों को ये कहा जाता था कि उन्हें अपने परिवार के सदस्यों के पैर छूना है। यह आचार्य जी का आदेश था। मैं ऐसा नहीं किया करता था। इसकी भनक परिवार के ​ही किसी छात्र से आचार्य जी को लगी। उन्होंने इसके लिए डांटा। तत्पश्चात यह अनुशासन मेरे दिनचर्या में शामिल हो गया। मुझे याद है कि स्कूल की 5 रूपये, 10 रूपये की फीस भी कई ग्रामीण परिवारों के लिए भर पाना इतना आसान नहीं था। लेकिन आचार्य जी के साथ संबंध काफी सहज,अटूट होता था। सरस्वती विद्या मंदिर से 8 वी कक्षा पास की। उसके पश्चात खालसा इंटर कॉलेज से 9 वीं व 10 वीं की परीक्षा पास की।
1990 के बाद इलाके में कॉन्वेंट आया। लोगों की रूचि कॉन्वेंट की शिक्षा में बढ़ी। यह तो नहीं कह सकता कि कान्वेंट की शिक्षा शहरों की तरह ही गुणवत्ता परक थी। लेकिन ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की तुलना में इसका स्तर ठीक था। अब लोगों ने उच्च शिक्षा के लिए बाहर भी अपने बच्चों को भेजना शुरू किया।


कॉलेज की शिक्षा के लिए उत्तर प्रदेश बोर्ड का सत्र लेट होने के कारण मेरे लिए दिल्ली का विकल्प नहीं था। इसलिए इलाहाबाद की ओर गया। वहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित, सांख्यिकी और अर्थशास्त्र विषय के साथ स्नातक की परीक्षा पास की। परेशानियां तो थीं। जेब में पैसा नहीं। मनीआर्डर जब भी देर से पहुंचा तो परेशानी और बढ़ गई। लेकिन तमाम परेशानियों के बावजूद जज्बा था। उम्मीदें थी। खुद की उम्मीदों के साथ ही परिवार की उम्मीदों का पहाड़ सामने खड़ा था। सफलता, असफलता सोच के डर लगने लगता था। उससे भी बड़ी बात घर वालों की नजरों में अपने लिए उम्मीद देखकर जवाबदेही और बढ़ती चली गई। हमेशा लगता था कि घर वालों का सपना पूरा करना है। इलाहाबाद से स्नातक करने के बाद जेएनयू से स्नातकोत्तर किया। जेएनयू प्रवेश परीक्षा में हिंदी में टॉपर रहा। स्नातकोत्तर में गोल्ड मेडल मिला। जीवन की दिशा तय हो चुकी थी और उस लक्ष्य को पाने के लिए वैसे तो पढ़ाई स्नातक के बाद ही शुरू ​कर दी थी, हालांकि सफलता 2010 में मिली वो भी चतुर्थ प्रयास में। इस बीच जेएनयू से एमफिल किया। हालाकि 2005 में ही दिल्ली में पीजीटी शिक्षक के रूप में चयन हो गया था। 2010 में मिली सफलता ने जीवन को एक दिशा दी। दानिक्स कैडर मिला।


आप पैदा तो करें दस्त-ए-हुनर फिर देखिए
आप के हाथों में पत्थर आईना हो जाएगा

हालांकि इस सफलता ने मेरे और मेरे परिवार के जीवन में तो बदलाव लाया ही साथ ही गांव के पढ़ाई लिखाई करने वाले युवाओं में भी एक अलग तरह का उत्साह अब देखने को मिलता है। वैसे तो बहुत सारे छात्रों ने मेरे बाद सिविल सेवा प्रतियोगता परीक्षा की तैयारी की। भले ही वे सिविल सेवा में चयनि​त न हो पाये हों लेकिन अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में उनका चयन हुआ। कई लोग शिक्षक बन गये, तो कोई ​एसएससी में गया तो कोई पुलिस में। इस तरह से गांव में और आसपास में पढ़ने लिखने का माहौल बना है। अब लगभग हर परिवार से लड़के सरकारी नौकरी में हैं।

लेकिन गांव में आई खुशहाली के साथ एक तरह की वीरानी और सूनापन भी ग्राम समाज में घर करता जा रहा है। नई पीढ़ी का हर बच्चा गांव से भागना चाहता है। गांव की तुलना में शहरों का जीवन आसान और सुविधाजनक है। गांव में आज भी बिजली की कमी है। शहरों की चकाचौंध लोगों को आकर्षित करती है। इसके साथ ही दिल्ली से नजदीकी के कारण लोग ज्यादातर दिल्ली की ओर रूख करते हैं।

इसके साथ ही गांव में अन्य समस्यायें भी हैं। जिनके समाधान की दिशा में मैं अपने स्तर पर सरकारी प्रावधानों के तहत प्रयास कर रहा हूं। गांव में कैंसर एक महामारी का रूप लेता जा रहा है। पीने के पानी की समस्या है। गांव में खेल का मैदान जरूरी है। इन तीनों बातों पर मेरी तरफ से सरकारी महकमों के जरिए प्रयास किये जा रहे हैं। मेरी कोशिश है कि गांव में पानी की टंकी लग जाये। साथ ही गांव में चकबंदी तो हुई है लेकिन वह तरीके से नहीं हो पाई है इसलिए सर्वे कराने का प्रयास भी हो रहा है। इसके साथ ही ग्रामीण बच्चों का कौशल विकास किया जा सके इस लिहाज से अपने दादा जी के नाम पर कंप्यूटर लर्निग सेंटर और वोकेशनल ट्रेनिग सेंटर खोलने की दिशा में मैं प्रयास कर रहा हूं। उम्मीद है सफलता मिलेगी
मुझे मिली सफलता के साथ गांव वालों की अपेक्षा भी जुड़ी है। दिल्ली में पदस्थापित होने के कारण मौका मिलने पर मैं उनकी मदद करता भी रहता हूं। हालाकि उनके मुद्दे ग्राम समाज को लेकर नहीं बल्कि अपनी छोटी—छोटी दैनिक जरूरतों व परेशानियों को लेकर होते हैं। किसी की गाड़ी पकड़ ली, किसी का तबादला कराना है यही सब छोटी—छोटी बातें। कभी—कभी खीझ भी होती है लेकिन हरसंभव संयत रहकर उनकी मदद का प्रयास करता रहा हूं और आगे भी करूंगा।


तुम न होते तो कुछ नहीं होता
ज़िंदगी जीने का मतलब नहीं होता..

आज सोचता हूं कि यदि जेएनयू नहीं होता तो हम न होते। ये तो हमारे लिए माता यशोदा है। जेएनयू ने देश दुनिया से रूबरू कराया। मुझे लगता है कि वहां हर तरह के विचारों के लिए स्पेस है। जेएनयू जो कर रहा है वह देश के अन्य विश्वविद्यालयों को भी करना चाहिए।
परिचय
ज़िला बिजनौर (उ० प्र०) के धौलागढ़ नामक गांव के किसान परिवार में जन्म। प्रारंभिक शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिर एवं विद्या मंदिर नूरपुर से प्राप्त की।उच्च शिक्षा पूर्व के ऑक्सफोर्ड इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। तत्पश्चात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में शोध कार्य किया।
भारतीय सिविल सेवा 2010 में सिलेक्शन।
दमन एवं दीव में विभिन्न पदों पर तथा तिहाड़ जेल में जेल सुपरिटेंडेंट पर कार्य किया। वर्तमान में दिल्ली के मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव पद पर कार्यरत।

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