हर बार कुछ बदला हुआ सा दिखता है गांव

राणा यशवंत
समूह संपादक,इंडिया न्यूज

मेरे छोटे भाई है बलवंत। बिहार की न्यायिक सेवा में हैं और चचेरे भाई हैं चंदन। नेवी की सर्विस करते हैं। दोनों ने अपनी कामयाबी से गांव के लड़कों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तरफ बढ़ने और खुद को तैयार करने के लिए काफी प्रेरित किया। मगर ये कुछ ऐसी बाते हैं जो सुखद और चमकदार लगती है। पर मेरे गांव का बहुत कुछ ऐसा है जो सूख गया, उसर हो गया और उसके बिना बहुत कुछ खत्म हो गया।

पिछली बार जब गांव गया तो चीजें कुछ और बदली हुई सी थी। ऐसा हर बार महसूस होता है, जब भी गांव जाता हूं। चौदह-पंद्रह साल के बच्चे या उनसे छोटे और 50-55 साल की उम्र तक पहुंचे लोग ही नजर आते हैं। बीच की पीढी़ में इक्का-दुक्का कोई दिख जाए तो गनीमत समझिए। मेरा गांव नौजवानों से खाली होता जा रहा है। जब-जब गांव गया यह खालीपन और ज्यादा महसूस हुआ। वैसे घर-दुआर, आंगन, ओसारा पहले के मुकाबले अच्छे हो गए हैं। कुछ मकान तो लगता है जैसे किसी आर्किटेक्ट की डिजाइन के अनुसार बनाए गए हैं। गली-सड़क भी लंबे समय से पक्के हैं। पड़ोस के गांव तक मिट्टी की जो सड़कें दौड़ती थीं अब वह भी ईंटदार हो गईं। लेकिन एक अजीब सा सूनापन, चुप्पी और उदासी तैरती रहती है गांव भर में। सड़क से घर तक जाते यही सब महसूस करता रहा।

मेरा गांव रामपुर कलां

समय यादों की डोर लेकर मुझे मेरे बचपन तक ले जाता है। किसी दालान में, किसी मचान पर, कभी-कभी किसी पेड़ के नीचे दादा लोगों की मंडली जमी रहती थी। फलश, तीन पत्ती, रम्मी के नाम पर तास के पत्ते फेंके जाते और रह-रहकर एक शोर उठता। ताश खेलने वाले तो चार ही होते लेकिन देखने वाले दस-बीस। कभी-कभार बैठे हुए लोगों में से कोई हाथ उठता और किसी बच्चे या छोटे के हांथ को खींचकर मुट्ठी में पैसा पकड़ा देता। दौड़ जाकर भग्गी साह के यहां से दो पनामा ले आ। बीच में कोई जोड़ देता, एक बंडल बीड़ी भी ले लेना। तब बड़ी चहल, पहल व चहक रहती थी। ऐसी मंडलियां, मुहल्ले-मुहल्ले बैठी मिलतीं और सांझ को तब उठतीं जब हाट-बाजार जाने का समय हो जाता। राह में भी किसी के दुआर पर और इनार पर देर तक बतकही चलती रहती।एक मौसम तो चोर लुटेरों का भी होता। गांव के सीवान में वे नहीं आ पाए, इसके लिए टोले-मुहल्ले में मंडलियां बनाई जातीं। रात भर गश्ती करते, गश्ती क्या मस्ती कहिए। जितनी भूली-बिसरी बातें होतीं, सारी रात भर उधेरी बुनी जातीं, अचानक एक शोर उठता..जागते रहियो। अब ऐसा कुछ नहीं है। ना तास की मंडलियां हैं और न सीलन से भरी साव जी की अंधेरी कोठरी वाली वो दुकान और न ही हंसी-ठहाकों के वो कहीं-कहीं से उठते रेले। बहुत बदल गया है मेरा गांव।

यह ठीक है कि माटी के चूल्हों की जगह गैस सिलिंडर और गैस चूल्हों ने ले ली है। ताखे पर ढ़िबड़ी और दालान में लालटेन की जगह एलईडी वाली रोशनी है। माटी के खपरैल घरों की जगह पक्के मकान, दालान हैं, लेकिन गांव बूढ़ा व बेजान है। जवान खून दिल्ली, सूरत, मुंबई और लुधियाना जैसे शहरों में कमाने चला गया। खेत की पैदावार से घर का चलना, बच्चों की पढ़ाई मुश्किल हो गई। वैसे भी जोत छोटी होती चली गई। आंगन के बंटवारे या फिर घरों की दीवारें खड़ी होती गईं। दादा लोगों की तास की मंडली गुजर गई। देखने वाले नौजवान अब गुजरने को आए। जो बच्चे थे उनके बच्चे अब उस उम्र में आ गए।
पिछले 30-35 साल से मेरे गांव की पूरी दुनिया बदल गई। अब तो भादो और चित्रा का पानी भी दशकों से नहीं दिखा। जिन गड्ढों, तालाबों में गर्मियों और बरसात में मछली पकड़ना एक जलसा हुआ करता था वो सब ऊसर पड़े हैं। जिन कुओं से दिन भर बिगहे-बिगहे की पटौनी होती वो झाड-झंखार और रेत से भरे हैं। जो हरा था, पनियर था सूख गए। जिनको सूखना था वो सब उग गए। मां-बाप की सेवा, सत्कार, भाई का प्यार, गांव का बथान, कई पुश्तों तक दौड़ने वाली नाते रिश्तेदारियां, ये सब भी सूखते चले गए। ईष्र्या, बेईमानी, छल, व्यभिचार सब उगते चले गए हैं।

चाय का प्याला लेकर छत पर आ गया। दूसरे माले से सारा गांव दिखता है। ऐसा अक्सर होता है कि घर पहुंचने के बाद कपड़े बदलकर मैं छत पर चाय लेकर आता हूं। पीछे-पीछे मां भी आती है। थोड़ी ही देर में पता चल जाता है कि कितने लोग गुजर गए, कितनों की शादियां हो गईं, कितनों के यहां बड़े झगड़े हुए और किसके बेटे की नौकरी लगी। वह लगभग सांझ का समय होता है जब मैं और मां छत पर होते हैं। मां भी हर बार पहले से कमजोर दिखती है। समय की लकीरें उसके चेहरे पर कुछ और बढ़ गई होती हैं। चारों ओर नजर दौड़ाता हूं तो कुछ न कुछ बदला हुआ सा दिखता है।

लेकिन छतों पर और गलियों में शायद ही कभी कोई नौजवान दिखता है। बस एक मंदिर है जहां से ठीक सात बजे घंटी घड़ियाल की आवाज बचपन से सुनता रहा हूं। अभी आने लगी। आरती का समय होता है, लाउड स्पीकर से समूचे गांव में आरती की आवाज पसर जाती है। थोड़ी देर के लिए मैं आखें मूंदकर अपना सर झुका लेता हूं। पता नहीं वो ईश्वर होता भी है या नहीं, लेकिन घंटी की आवाज उम्मीद देती है कि दशकों से जैसे ये आरती की परंपरा नहीं बदली, मेरा गांव भी अपने गांवपन के साथ बचा रहे।

बिहार के छपरा जिले में मेरा गांव है रामपुर कलां। छपरा से 10 किलोमीटर दूर। गांव से दो किलोमीटर पर अवस्थित है खैरा बाजार। जो सिर्फ बाजार मात्र नहीं, बल्कि आसपास के गांवों और वहां के लोगों से मेल जोल का जरिया भी है। सब्जी और घरेलू सामान लोग वहीं से लेते हैं। बिरहा वाले केदार पांडे और चिट्ठी वाले मुंशी जी। पहले समझ में नहीं आता था कि ये कलां क्या होता है। लेकिन एक रोज अपने पिता बबन प्रसाद सिंह से पूछ बैठा। उन्होंने बताया कि जहां कलां होता है वहां पक्के तौर पर खुर्द भी होगा। यानी दो रामपुर। एक बड़ा और एक छोटा। तो अपना वाला बड़ा है और चार किलोमीटर पश्चिम खोरा रामपुर है, वो दरअसल खुर्द है। यह समझ लो कि पुराना गांव हम और नया गांव खोरा रामपुर वाले। तो हमारा गांव बड़ा वाला रामपुर। बाबू साहब लोगों का गांव। सिसोदिया, चैहान व परमार। इन तीनों कुनबों में गांव में सिसोदिया सबसे ज्यादा हैं। लेकिन ठीक से देखें तो पूरा हिंदू समाज हमारे गांव में बसता है। 25 घर ब्राह्मण, 20 घर नाउ, 5 घर तेली, 5 घर माली, 20 घर कुम्हार, 3 घर बढ़ई, कोईरी, कुर्मी, दुसाध सब हैं। कोई मौका-मुहाल हो तो कुछ कहने की जरूरत नहीं। पंडित जी अपना काम करेंगे, नाउ-नाउन अपना, माली, कुम्हार अपना। साल के गिने चुने मौका-मुहाल, शादियों और श्राद्ध से ही समूचे गांव की अर्थव्यवस्था चलती थी।

बदलाव की बयार तो 1990 के बाद धीरे-धीरे आनी शुरू हुई। रामपुर कलां ऐसा गांव है जहां 1964 में बिजली आई, उन्हीं दिनों नहर का पानी भी। गांव के उच्च विद्यालय का नाम राणा प्रताप उच्च विद्यालय है। मध्य विद्यालय, प्राथमिक विद्यालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, डाकघर सब है। एक तरह से पूरा आबाद गांव। श्रद्धा और संस्कार में सबसे आगे। जिले भर में इज्जतदार गांव के रूप में जाना जाता रहा। मेरा गांव शायद अपने जिले में नहीं बल्कि बिहार का इकलौता गांव है जहां हर साल 72 घंटे का अखंड अष्टयाम होता है और ऐसा कब से होता रहा है कोई नहीं जानता।

पापा बब्बन प्रसाद सिंह

एक कैलाश बाबा हुआ करते थे। जब बच्चा था तो गांव में उनकी खूब चर्चा होती थी। वहीं एक हाई स्कूल में प्रिंसिपल थे और एमएलसी भी। मेरे गांव में इकलौते जन प्रतिनिधि। एक और नाम की खूब चर्चा होती है वीरेन बाबू यानी वीरेन्ंद्र सिंह। वे बिड़ला की कंपनी में चीफ इंजीनियर थे। गांव में कैलाश बाबा और वीरेन बाबू दोनों का आना-जाना कम होता। लेकिन दोनों ने गांव के कई लोगों को नौकरी लगवाई। उनके अलावा पढ़ने-पढ़ाने के पेशे में मेरे पापा बब्बन प्रसाद सिंह, एक चाचा रामायण सिंह, दोनों ने इज्जत कमाई। दोनों काॅलेज के प्रोफेसर। एक जूलाॅजी तो दूसरे कमेस्ट्री। अब तो कई लड़के अच्छी नौकरी में हैं। कइयों में बहुत अच्छा करने की संभावनाएं हैं।

इफको केंद्र

सालों पहले गांव के बच्चों में पढ़ने की ललक देखकर मैंने उनके लिए पुस्तकालय खोली। आलमिरा से लेकर किताब, पत्र-पत्रिका सबके पैसे दिए और कैरियर कितनी जरूरी है, यह समझाया भी। तब से जब भी जाता हूं, एक मंडली आ जाती है। किसका चयन हुआ, किसका नहीं, किसकी पढ़ाई कैसी और किसे कौन-सी दिक्कत है, सब बारी-बारी बताते रहते हैं। मैं जहां जरूरी होता है, वहीं टोकता या बोलता हूं। कोशिश करता हूं, उनकी पूरी बात सुनूं और मेरे लिए जो जरूरी है वो कर दूं। मैंने अपने प्रयास से इफको का बड़ा केंद्र खुलवाया। दो करोड़ की बिक्री है। 20 गांव के किसान इसके जरिए लाभान्वित हो रहे हैं।
मेरे छोटे भाई है बलवंत। बिहार की न्यायिक सेवा में हैं और चचेरे भाई हैं चंदन। नेवी की सर्विस करते हैं। दोनों ने अपनी कामयाबी से गांव के लड़कों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तरफ बढ़ने और खुद को तैयार करने के लिए काफी प्रेरित किया। मगर ये कुछ ऐसी बाते हैं जो सुखद और चमकदार लगती है। पर मेरे गांव का बहुत कुछ ऐसा है जो सूख गया, उसर हो गया और उसके बिना बहुत कुछ खत्म हो गया।
वरिष्ठ पत्रकार। कई प्रमुख चैनलों में रहे, वर्तमान में इंडिया न्यूज के समूह संपादक हैं।

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