पैंतीस वर्षों का प्रसंग है- कहां से शुरू करूं, कहां खत्म…डॉ योगेंद्र

अलविदा बंधु !आपके साथ थोड़ा मैं भी मर गया: प्रो पवन कुमार सिंह

(प्रो0 परशुराम राय ‘प्रेम प्रभाकर)

जाने माने शिक्षाविद, साहित्यकार और अंगचंपा के संपादक, हिन्दी विभाग, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व अंगिका भाषा के विभागाध्यक्ष डॉक्टर प्रेम प्रभाकर का देहांत आज सुबह दिल का दौरा पड़ने हो गया। वे 63 वर्ष के थे। प्रेम प्रभाकर के निधन से साहित्यिक, पत्रकारिता, समाजकर्मी, छात्र बिरादरी में शोक की लहर दौड़ गई। किसी को ये भरोसा नहीं रहा होगा वे इतनी जल्दी सब को छोड़ कर अनंत यात्रा पर चले जाएंगे।
समाजकर्मी घनश्याम ने कहा कि साहित्य साधना का एक तपस्वी डाॅक्टर प्रेम प्रभाकर हम सबों को अलविदा कह गये। इस घटना से मर्माहत तिलकामांझी विश्वविद्यालय भागलपुर में अंगिका भाषा के विभागाध्यक्ष, साहित्यकार डॉक्टर प्रेम प्रभाकर एक जिंदादिल इंसान थे। मधुपुर से उनका गहरा लगाव था। 80 के दशक में डॉक्टर प्रेम प्रभाकर के संपादन में जमीन सामाजिक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन किया गया था। भागलपुर से प्रकाशित होने वाली नई बात, किस्सा, सप्तम स्वर, अंग चंपा जैसे कई पत्र-पत्रिकाओं के साथ आजीवन जुड़े रहे। उनका असामयिक निधन होना शिक्षा, समाज और साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है।
डॉ प्रेम प्रभाकर के सहपाठी डॉ आशुतोष ने कहा कि अंगचंपा के संपादक और हिन्दी विभाग, तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर प्रेम प्रभाकर को आज सुबह दिल का दौरा पड़ा। अब वह इस दुनिया में नहीं है। हम सहपाठी थे। गंगा मुक्ति आन्दोलन में भी उसका बहुत योगदान था। सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों से बहुत संजीदगी से जुड़ा रहता था। हम दोस्तों के लिए बहुत प्यारा। उसका घर सबका घर था।
विनम्र श्रद्धांजलि।
अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए आशुतोष कहते हैं कि प्रभाकर मेरा घनिष्ठ मित्र था। उसने हमें धैर्य और सहृदयता का पाठ पढ़ाया है। अत्यंत निम्न आर्थिक स्तर से आया हुआ मेरा मित्र बहुत स्वाभिमानी था। यह ऊपर से कभी दिखा नहीं। बहुत शौकीन तबीयत का था। अच्छा संगीत सुनना उसकी रुचि में शामिल था। छात्र-जीवन में अपने सीमित संसाधन को हम दोस्तों में साझा करता था। हमें कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उसका घर हमारा नहीं है। सदा अध्ययनरत रहता। जैसा प्रायः हर प्रतिभाशाली होता है, वह भी अपने प्रति बहुत लापरवाह था। लेकिन दूसरों की परवाह बहुत करता था।

प्रेम प्रभाकर के बड़े बेटे की सूचना के अनुसार पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार कल 7 नवंबर को भागलपुर के बरारी घाट में प्रात: 10 बजे किया जाएगा।
वहीं प्रेम प्रभाकर के अन्य सहपाठी रवीशंकर सिंह ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बाकी के मित्रों को सूचना देते हुए लिखा है कि बहुत दुखद सूचना है मित्रों ! हमारे मित्र मंडल का पहला विकेट आज डाउन हो गया। 1975 से लेकर अब तक का मेरा सहपाठी डॉ परशुराम राय उर्फ प्रेम प्रभाकर आज हृदय रोग के कारण हम लोगों को अलविदा कह कर उस दुनिया में चले गए जहां से कोई लौटकर नहीं आता है।


दैनिक पूर्वोदय के संपादक और डॉ प्रेम प्रभाकर के संघर्ष के दिनों के साथी रहे रवीशंकर रवी ​अपने भावपूर्ण संदेश में कहते हैं कि जब से प्रेम प्रभाकर जी के निधन की खबर मिली है, अवाक् हूं। आशुतोष जी ने फोन किया, मैंने पूरी बात सुन ली, लेकिन कोई जवाब नहीं दे पाया। कंचन परेशान है। दोपहर से फेसबुक पर मित्रों को पढ़ रहा हूं, लेकिन कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाया। मैं उनका सहपाठी नहीं था, लेकिन उनके साथ एक लंबा संबंध रहा है। हम एक ही परिवार के अंग हैं। हमारे लिए तो मित्र ही सबसे बड़े रिश्तेदार हैं। कंचन हो या उर्वशी जी, मेरे बच्चे हों या उनके, सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। नई बात से आरंभ होकर आज तक। मुझे पत्रकार बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है, बल्कि मेरे अंदर के पत्रकार को उन्होंने अंकुरित होने का मौका दिया और नई बात में लगातार छापा।
मैं मधुपुर से जुड़ा तो वे वहां भी आए और काफी गंभीर काम किया। धनबाद से चर्चा का प्रकाशन आरंभ हुआ तो उस टीम से वे भी जुड़े। गुवाहाटी आया तो वे भी गुवाहाटी आए तथा सेंटीनल में अनीश, मुकेश जी आदि के साथ काम कर रहे थे। बाद में वे भागलपुर लौटे और विश्‍वविद्यालय से जुड़ गए। इसके पहले तक उनका जीवन संघर्षमय रहा। अच्छी नौकरी मिली तो आर्थिक तंगी भले ही कम हो गई, लेकिन दोस्तों के लिए उनका विचार-व्यवहार कभी नहीं बदला। उच्च पद पर जाने के बाद भी हमलोगों के साथ वही व्यवहार। भागलपुर जाने पर उनसे मिलना एक अनिवार्य कार्य था। हर छठ की सुबह उनके यहां जाना, कुछ घंटे रहना नियम बन गया था। पिछल छठ में भी कई घंटे तक उनके आवास पर रहा। आने का मन नहीं करता था मिलने के बाद।
इस बार भी जाने का कार्यक्रम था, लेकिन प्रेम प्रभाकर जी अब नहीं मिलेंगे, कभी नहीं मिलेंगे। लेकिन अब तो उर्वशी जी में भी प्रभाकर जी को देखना होगा। क्योंकि उर्वशी जी की सांसों में निश्‍चित रूप से उनकी महक होगी, आंखों में धूमिल ही सही उनकी तस्वीर दिेख जाएगी।
अलविदा मित्र।


प्रख्यात गांधीवादी चिंतक व सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता में एक जाना-पहचाना नाम मणिमाला ने अपने पोस्ट में कहा है​ कि, गंगा मुक्ति आन्दोलन के साथी रहे प्रेम प्रभाकर को सुबह दिल का दौरा पड़ा और दोपहर को चले गए। साथ में थोडा हमें भी लेते गए।
‘अंगचंपा के संपादक और तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर थे. एकदम सरल, सहज। दोस्तों के इतने अपने कि उनका घर सबका घर था।
अलविदा साथी। अब वहीं मिलेंगे जहाँ गए हो। दरवाज़ा खुला रखना।


डाॅ० प्रेम प्रभाकर : अलविदा मेरे शागिर्द
राजेंद्र सिंह
भागलपुर में सन् 1985 से कई वर्षों तक अभिन्न रूप से जुड़े और वर्तमान में टीएमबीयू के पीजी हिंदी विभाग में कार्यरत तथा अंगिका विभाग के अध्यक्ष डाॅ० प्रेम प्रभाकर के आकस्मिक निधन की खबर ने झकझोर कर रख दिया । अंगिका (भाषा) ने एक सक्रिय कार्यकर्ता और अंग के साहित्यकारों ने तो एक कद्दावर साहित्यकार खोया , लेकिन मैंने पत्रकारिता के आरंभिक दौर का एक सच्ता शागिर्द खो दिया । लेकिन नियति को शायद यही मंजूर था । इस दुखद खबर से मर्माहत हूं … एकदम से हक्का – बक्का … बार – बार वह मुस्कुराता चेहरा सामने आ रहा है , जिस पर मौत ने आज खामोशी की चादर बिछा दी और अपने संबोधन में ” गुरू जी – गुरू जी ” कहने वाले शागिर्द को इस गुरू को लाचार और लंगड़ाती जुबान में न चाहते हुए भी अलविदा कहने को विवश कर दिया । जब तक सांस साबूत रहेगी , यादें जिंदा रहेंगी ।
जाने चले जाते हैं कहां?


पैंतीस वर्षों का प्रसंग है- कहां से शुरू करूं, कहां खत्म…..

डॉ योगेंद्र
ग्यारह बजे के आसपास उर्वशी का फोन आया- ‘योगेन्द्र,जल्दी आइए।’ मैं उस वक्त विभाग में था।मैंने बहादुर बाबू से बात की और विभाग के एक सहकर्मी श्री दिव्यानंद को लेकर चल पड़ा।अभी विभाग से बाहर भी नहीं आया था कि उर्वशी का फिर फोन आया। मैं आशंकाओं से घिर गया। दिव्यानंद जितनी तेजी से बाइक चला सकते थे,चलाया। हमलोग मंगलम अस्पताल पहुंचे, जहां प्रभाकर भर्ती थे। अस्पताल के अंदर गया तो उदासी और आशंका सभी के चेहरों पर था। उर्वशी रो रही थी। कई लोग उन्हें भरोसा दिला रहे थे।तभी एक शख्स ने मुझसे कहा कि हालत अच्छी नहीं है।पेशमेकर लगाने के बाद भी प्रेशर स्थिर नहीं हो रहा है। चिंता बढ़ती चली गयी। मैं आईसीयू के पास पहुंचा।प्रभाकर जी का बेटा सुमित जब आईसीयू से बाहर आया तो सिर हिलाया और फूट फूट कर रोने लगा। सबकुछ समझ में आ गया था। मैंने उसकी पीठ सहलायी। खुद को संभाला। सुमित शांत हुआ। नीचे उर्वशी थी। उसे किसी तरह घर भेजा। मैंने पास बुलाया।बेंच पर जैसे ही बैठा कि आंसू बहने लगे।वह देर तक रोता रहा। मैं सिर्फ उसका शरीर पकड़े रहा। शब्द कहां से आते?
अंदर आईसीयू में प्रभाकर का मृत शरीर था और वह असमय अपनी यात्रा पर निकल गया था।५ नवम्बर की रात तीन बजे। मैं सोया था कि मोबाइल बजी। नींद खुल गयी।मन आशंकाओं से भर गया। मैंने मोबाइल की स्क्रीन देखी- प्रभाकर पीजी। मोबाइल मैंने औन की तो प्रभाकर की दबी दबी आवाज आयी- तबीयत खराब है। कहां जायें? मैं डर गया। अलका ने कहा कि पहले चलिए प्रभाकर के यहां। हम दोनों प्रभाकर के क्वार्टर पहुंचे।वे बाहर निकलने के लिए तैयार था। चलने में परेशानी हो रही थी।किसी तरह कार तक आया।ससमय मंगलम् अस्पताल में भर्ती हो गया। उर्वशी भी आश्वस्त हो गई। उसने फोन पर बताया- कोई दिक्कत नहीं है।दवा का असर हुआ है।पूरे दिन वह ठीक से रहा। बातचीत करता रहा। उसने तय कर लिया था कि बाहर जाकर इलाज करवा लिया जायेगा।मगर आज की मनहूस सुबह। साढ़े आठ बजे सीवियर एटैक हुआ। संभालने की कोशिश हुई, लेकिन बारह बजे सबकुछ खत्म हो गया।
‘जाने चले जाते हैं कहां?’ प्रभाकर चले गए। हम सब दोस्त उसे बहुत कुछ कह देते थे। लेकिन वे सब तो बातें हैं,उन बातों का क्या? पैंतीस वर्षों का प्रसंग है- कहां से शुरू करूं, कहां खत्म…..


वरिष्ठ पत्रकार अनिल सिन्हा लिखते हैं कि मित्र रामनारायण भाष्कर ने जब भागलपुर विश्वविद्यालय के अंगिका विभाग के प्रमुख डॉ प्रेम प्रभाकर के निधन की सूचना दी तो मन दुःख से भर गया। कई लोग ऐसे होते हैं जिनसे मिले लम्बा अरसा हो जाता है, लेकिन आप की यादों के संसार में रहते हैं। वैसे ही थे प्रेम प्रभाकर। हिंदी से जुड़े साहित्यकार- पत्रकारों की यह टोली- किशन कालजयी,योगेंद्र,आशुतोष और प्रेम प्रभाकर-शहर में खूब सक्रिय थी। के नेतृत्व में चले गंगा मुक्ति आंदोलन में बड़ा योगदान किया। साधारण परिवारों से जुड़े इन लोगों ने निजी जीवन में कष्ट उठाये, लेकिन संघर्ष के मोर्चे पर डटे रहे।
इसके साथ ही न जाने कितने लोगों ने जिसे भी जहां खबर मिली वहीं ठहर कर इस कर्मयोगी को नमन करते हुए शब्दों का श्रद्धासुमन अर्पित किया। जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता अनिल कुमार सिंह लिखते हैं कि हमारे अनमोल साथी प्रो. प्रेम प्रभाकर नहीं रहे। दिल के दौरे ने अस्पताल में उनकी जान ले ली। हमसब ने बहुत कुछ खो दिया है। आंसुओं को रोकना मुश्किल है।
प्रो नीरज सिंह लिखते हैं कि कोरोना काल की सर्वाधिक दुखद खबरों में से एक । बहुत पुराना परिचय था उनसे । बहुत ही जीवंत और सक्रिय व्यक्ति थे । उनके द्वारा संपादित पत्रिका ‘अंग चंपा ‘ के प्रवेशांक पर आज ही पुस्तकों की साफ – सफाई के दौरान नजर पड़ी थी तो उनसे जुड़ी कितनी ही स्मृतियां आंखों में तैरने लगी थी । तब कहां पता था कि उनके नहीं रहने की मनहूस खबर भी आज ही मिलेगी ।

फेसबुक पर लगातार सक्रिय रहने वाले प्रो पवन कुमार सिंह लिखते हैं…
मित्र को सादर नमन , विनम्र श्रद्धांजलि ।
अलविदा बंधु!
अलविदा बंधु!आपके साथ थोड़ा मैं भी मर गया: प्रो पवन कुमार सिंह
(प्रो0 परशुराम राय ‘प्रेम प्रभाकर)
डॉ प्रभाकर के गांव में ही मिल रहा है रोजगार, जल-जीवन-हरियाली योजना बन रहा है जीविका का आधार शिष्य रहे मृत्युंजय कुमार लिखते हैं… गुरुदेव डॉ. प्रेम प्रभाकर(डॉ.परशुराम राय) नहीं रहे
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के वरिष्ठ शिक्षक,अंगिका विभाग के विभागाध्यक्ष,पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष,हमलोगों को पत्रकारिता और मीडिया का पाठ पढ़ाने वाले,अंगचंपा पत्रिका के संपादक हमारे गुरुदेव को ईश्वर अभी ही क्यों अपने पास बुला लिए?

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