शिवाजी सिंह
- गांधी की ‘स्वदेशी’ की अवधारणा भारत के लिए बहुत ही प्रासंगिक है। अगर आज देश निर्णय कर ले कि हम स्वदेशी उत्पाद का ही उपयोग करेंगे तो इसके द्विआयामी परिणाम होंगे- नए रोजगार का सृजन होगा एवं आर्थिक असमानता घटेगी।
कोरोना महामारी के इस दौर में देश की आत्मनिर्भरता को लेकर एक नयी बहस चल पड़ी है। आत्मनिर्भर भारत के लिए ज़रूरी है कि हमारी सोच आत्मनिर्भर हो, तभी भारत आत्मनिर्भर हो पाएगा। ऐसे में आत्म निर्भरता के पथ पर यात्रा प्रारम्भ करने के पहले आज देश में विकास से संबंधित वर्तमान अवधारणाओं पर संपूर्णता में विचार किए जाने की जरूरत है। बिना ऐसा किए जब हम इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तो यह खंड-खंड पाखंड सरीखा ही लगता है, जिसका कोई मायने मतलब नहीं है। स्वाभाविक है इतिहास से सबक लेते हुए देशज चिंतन के साथ जब हम इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं तो प्रतीत होता है कि इसमें आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
निम्नलिखित अवधारणाओं में परिवर्तन अपेक्षित हैः-
• देश की अवधारणा
• जन प्रतिनिधित्व की अवधारणा
• प्रति व्यक्ति आय की अवधारणा
• पर्यावरण के अनुकूल विकास की अवधारणा
• मशीनीकरण की अवधारणा
• शिक्षा की अवधारणा
• स्वास्थ्य की अवधारणा
• स्वदेशी बनाम वैश्वीकरण की अवधारणा
अगर हम इन अवधारणाओं की भारत की पृष्ठभूमि एवं आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तित करें तो देश में रोजगार बढ़ेंगे, आय बढ़ेगी एवं खुशहाली आएगी।
देश की अवधारणा
आज भारत की आबादी लगभग 135 करोड़ है। इसमें करीब 70 प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं। लेकिन भारत के वार्षिक बजट का मात्र 30 प्रतिशत का प्रावधान ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सरकार करती है। आजादी के बाद भी देश की 70 प्रतिशत आबादी को दोयम दर्जे के नागरिक का स्थान प्राप्त है। देश को यह निर्णय करना होगा कि यह देश कुछ करोड़ लोगों का है या 135 करोड़ लोगों का। कोई भी योजना 135 करोड़ भारतीयों को ध्यान में रखकर बनानी होगी।
जन प्रतिनिधित्व की अवधारणा
सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए पंचायती राज को लागू किया। लेकिन आरक्षण ने पूरी व्यवस्था को अक्षम एवं भ्रष्ट बना दिया है। आज पंचायतों में महिलाओं के आरक्षित सीटों की स्थिति क्या है? दबंग एवं अपराधी प्रवृति के व्यक्ति अपने घर की अयोग्य महिलाओं को चुनाव जीतवा कर खुद सारे अधिकार का उपयोग करते हैं। अब समय आ गया है कि लोकसभा से पंचायत स्तर तक जन प्रतिनिधित्व के लिए योग्यता एवं चरित्र को तरजीह दी जाय। पूरे विश्व में भारत को छोड़कर किसी अन्य देश में जन प्रतिनिधित्व में आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
प्रति व्यक्ति आय की अवधारणा
एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं। किसी देश में 100 लोग रहते हैं। देश की कुल आय 10 लाख रूपये हैं। अर्थात प्रति व्यक्ति आय रूपया 10,000 है। अगले वर्ष देश की वार्षिक आय बढ़कर रूपया 20 लाख हो जाती है। 95 व्यक्तियों की आय में कोई वृद्धि नहीं होती है। सिर्फ 5 व्यक्तियों की आय बढ़कर रूपया 10 लाख हो जाती है। वर्त्तमान अवधारणा के अनुरूप देश की प्रति व्यक्ति आय रूपया 10, से बढ़कर रूपया 20,000 हो जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि केवल 5 व्यक्तियों की आय ही बढ़ती है। यह उदाहरण दर्शाता है कि प्रति व्यक्ति आय की अवधारणा देश की सही आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाता है। अतः देश में प्रति व्यक्ति आय की चार श्रेणियां होनी चाहिए- निम्न आय वर्ग, निम्न मध्यम आय वर्ग, मध्यम आय वर्ग, एवं उच्च आय वर्ग। यह वर्गीकरण देश की आर्थिक विकास एवं आय की सही स्थिति को दर्शाएगा।
पर्यावरण के अनुकूल विकास की अवधारणा
अंधाधुंध औद्योगीकरण की दौड़ में हम भूल चुके हैं कि हमने पिछले 200 वर्षों में पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाया है? विकास पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए होना चाहिए। लेकिन आज विकास पर्यावरण की कीमत पर हो रहा है। आज हमें शुद्ध हवा, जल, अन्न, फल एवं सब्जियां उपलब्ध नहीं है। 40 वर्ष की आयु तक पहुंचते ही 80 प्रतिशत आबादी अपना स्वास्थ खो देती है। 70 प्रतिशत लोगों को नींद नहीं आती। 90 प्रतिशत लोग तनाव में जीते हैं। ऐसे में विकास की पूरी अवधारणा में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। विकास पर्यावरण परक होना चाहिए।
मशीनीकरण की अवधारणा
अंधाधुध मशीनीकरण देश के लिए घातक है। मशीन का उपयोग नहीं होना चाहिए जहां मानव श्रम की सीमाएं हो। हमारे देश की जनसंख्या 135 करोड़ है। आज कोविड-19 की महामारी ने करीब दस करोड़ लोगों को बेरोजगार कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोगों के पास 300 दिन, 8 घंटे का काम नहीं है। देश को यह निर्णय लेना होगा कि जिस काम में मशीन की जगह मानव श्रम से काम चल सकता है; वहां मशीन को अलविदा कह दिया जाय। खास कर बुनियादी ढ़ांचे के निर्माण में – यथा सड़क निर्माण,नहर खुदाई एवं मरम्मत, मिट्टी भराई, रेल ट्रैक का निर्माण, भवन निर्माण, फसल बुआई, कटाई आदि, सिचाई, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र निर्माण आदि। ऐसा करने से करोड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा।
शिक्षा की अवधारणा
शिक्षा का मूल उद्देश्य देश को एक योग्य स्वस्थ एवं चरित्रवान युवा देना है जो देश के सम्यक विकास में समुचित योगदान कर सके। क्या आज की शिक्षा इस कसौटी पर खड़ी उतरती है? आज भी ब्रिटिश राज में लार्ड मैकाले द्वारा प्रारंभ किए गए शिक्षा प्रणाली को हम ढ़ो रहे हैं। आज की शिक्षा परीक्षा केन्द्रित है। यह शिक्षा आज के युवा को येन केन प्राकरेण धन कमाने वाले मशीन के रूप में रूपान्तरित कर देती है। चरित्र निर्माण का सर्वथा आभाव है। युवाओं के पास डिग्रियां तो है; परन्तु हुनर नहीं है। उनमें भाइचारा का अभाव है। उन्हें किताबों में लिखी बहुत से तथ्य याद हैं (जबकी इसकी आवश्यकता नहीं है), लेकिन वे मौलिक चिन्तन नहीं कर सकते। उन्हें किताबी ज्ञान तो है परन्तु हुनर के अभाव में वे ज्ञान को कार्यरूप नहीं दे सकते। 30 वर्षों की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते आज के अधिकांश युवा डाइबिटीज, उच्च रक्त चाप, दृष्टिदोष, अनिद्रा आदि रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। हमारी शिक्षा ऐसे युवाओं का निर्माण कर रही है जिनके लिए खुद का स्वार्थ सर्वोपरि है – परिवार, समाज एवं देश गौण हो जाता है। इस लिहाज से देखें तो हमारी शिक्षा प्रणाली में मूल परिवर्तन की आवश्यता है।
स्वास्थ्य की अवधारणा
स्वास्थ्य प्रबन्धन के क्षेत्र में आज देश यह मानकर चलता है कि आने वाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोग बीमार पड़ेंगे; अतः ज्यादा से ज्यादा अस्पताल खोले जाएं। जबकि होना यह चाहिए कि हम देश में लोगों को स्वस्थ रहने के लिए जागरूक करें ताकि उन्हें अस्पताल या डॉक्टर के पास जाने की कम से कम आवश्यकता पड़े। अच्छे स्वास्थ्य के प्रति सजगता के लिए लोगों में जागरूकता अभियान चलाना होगा। लोगों को शुद्ध हवा, शुद्ध जल एवं शुद्ध अन्न, फल, सब्जी तथा प्राणयाम एवं व्यायाम के बारे में जागरूक करना होगा। उन्हें निरंतर बताना होगा कि नित्य कितना जहर अपने शरीर में ले रहे हैं। एकबार लोगों में अच्छे स्वास्थय के प्रति जागरूकता पैदा हो गयी तो लोग खुद ही उत्पादन एवं सेवा क्षेत्र में वैसे साधनों का उपयोग प्रारंभ कर देंगे जो स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के अनुकुल हो। कोविड-19 महामारी ने दुनिया को यह बतला दिया कि जिस व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमता जितना ज्यादा है, उसमें रोग से ग्रसित होने की संभावना उतनी ही कम है। आसानी से उपलब्ध कुछ नित्य के खाद्य पदार्थों एवं जड़ी बुटियों का सेवन करके एवं नित्य अपने शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है तथा बीमारियों से अपनी रक्षा कर सकता है।
स्वदेशी बनाम वैश्वीकरण
आज वैश्वीकरण ने बहुत से देशों को आर्थिक गुलामी की ओर ढ़केल दिया है। अब साम्राज्यवाद का स्वरूप बदल चुका है। सेना से किसी देश को जीतने की कोई आवश्यकता नहीं है। आर्थिक गुलामी साम्राज्यवाद का नया रूप है। आर्थिक गुलामी से बचने का एक ही उपाय है। हमें लोगों में अपने देश के प्रति प्रेम जागृत करना होगा। जहां तक संभव हो हम अपने देश में बनी चीजों का उपयोग करें। गांधी की ‘स्वदेशी’ की अवधारणा भारत के लिए बहुत ही प्रासंगिक है। अगर आज देश निर्णय कर ले कि हम स्वदेशी उत्पाद का ही उपयोग करेंगे तो इसके द्विआयामी परिणाम होंगे- नए रोजगार का सृजन होगा एवं आर्थिक असमानता घटेगी।
लेकिन देश के हित में आवश्यक परिवर्तन लाना तभी संभव है जब यह अवधारणा बने कि यह देश कुछ लोगों का नहीं है, बल्कि 135 करोड़ भारतवासियों का है।
(सेवा निवृत्त सहायक महा प्रबंधक, स्टेट बैंक आॅफ इंडिया। 1974 के जे पी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी। भारतीय स्टेट बैंक अधिकारी संघ (बिहार/झारखंड) के अध्यक्ष व महासचिव रहे। समाज सुधार व समाज सेवा में सतत प्रयत्नशील।)






